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Sunday, 8 April 2018

आखिर भुगतना तो बच्चों को ही है

जिम्मेदार शिक्षा के प्रति कितने सजग हैं इसका पता सीबीएसई के दो पर्चों- 10वीं के गणित और 12वीं के अर्थशास्त्र- के लीक होने से ही चलता है। उनकी नाक के नीचे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ का खेल चलता रहा, उन्हें खबर तक नहीं हुई। खबर लगी भी तो तब जब बच्चे परीक्षा देकर अपने रिजल्ट के इंतजार में लग गए। लेकिन नहीं...। उन्हें अब उन्हीं लीक हुए पर्चों को दोबारा देना होगा।

यह तो वही बात हो गई- 'करे कोई, भरे कोई।'

और, यह कोई पहली दफा नहीं जब पर्चा लीक होने का मामला अभी सामने आया हो। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। हर बार सजा बच्चों को ही भुगतनी पड़ती है। उनके अलावा भुगतेगा भी कौन? जिम्मेदार तो यह बयान देकर छूट जाते हैं कि 'उन्हें इस घटना का गहरा अफसोस है। दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी। आगे कभी ऐसा नहीं होगा।'

क्या इतने भर बयान को ही हम देश के भविष्य (बच्चों) की शैक्षिक सुरक्षा की गारंटी मान लें? क्या कान बंद कर यह यकीन कर लें कि ऐसा आगे कभी नहीं होगा? क्या मीडिया के समक्ष अफसोस जता लेने भर से बच्चे अपनी पीड़ा से बाहर आ जाएंगे? नहीं जनाब नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं होगा। ये अफसोस और सजगता बस कुछ दिनों की ही है। आगे फिर कोई ऐसा ही मामला सामने आ जाएगा और फिर मंत्री महोदय द्वारा चिंता जतला दी जाएगी।

मीडिया में ऐसी खबरें भी चल रही हैं कि सीबीएसई को पेपर लीक होने की जानकारी पहले से थी! अगर वाकई ऐसा था तो सीबीएसई ने इतनी गंभीर खबर को सरकार और स्कूलों से छिपाया क्यों? किस बात का डर था उसे? क्या मामला किसी राजनीतिक दबाव का तो नहीं था? हालांकि ये सब आगे जांच का विषय है। फिर भी, इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि सीबीएसई ने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ही किया। जिसकी कोई माफी नहीं बनती।

शिक्षा के संदर्भ में मामला सिर्फ पेपर लीक का ही नहीं है। जिस प्रकार और जिस तेजी से शिक्षा का निजीकरण जारी है यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है। पढ़ाई स्कूलों से अधिक कोचिंग सेंटरों पर निर्भर हो गई है। कोचिंग सेंटरों की फीस भी स्कूल की पूरे साल की फीस के आसपास ही बैठती है। बच्चों को पास होना है तो कोचिंग तो पढ़नी ही पढ़ेगी। इसमें कुछ स्कूलों का दबाव रहता है तो कुछ मां-बाप के पास भी समय नहीं।
शिक्षा में सारा खेल पैसे का है। अगर मां-बाप के पास पैसा है तो वे अपने बच्चे को कहीं भी पढ़ा सकते हैं। पैसा नहीं तो बच्चे की पढ़ाई आगे कितनी और कहां तक चल पाएगी, खुदा जाने। शिक्षक ही जब शिक्षा को व्यवसाय के सांचे में ढाल पैसा बनाने में लगे हुए हैं, फिर किसी और क्या कहें।

मामला चाहे सीबीएसई के पेपर लीक, शिक्षा के निजीकरण या कोचिंग सेंटरों के बढ़ते वर्चस्व का हो इन सब के बीच सरकारें बिल्कुल हताश नजर आती हैं। मानो वो असहाय हों कुछ भी रोक पाने में। शैक्षिक संस्थाएं जो मर्जी करें। यही वजह है कि प्राइवेट स्कूलों में निरंतर फीस वृद्धि पर सरकार सख्त नहीं हो पाती।

ज्यादा दबाव पड़ता है तो खानापूर्ती के लिए कुछ स्कूलों को हड़का भर दिया जाता है। आखिर सरकार क्यों सख्त नहीं हो पाती प्राइवेट स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें लागू कर पाने में। जबकि सरकार की नाक के नीचे प्राइवेट पब्लिशर और स्कूलों के बीच कमीशनखोरी का खेल खुलेआम चलता रहता है। सरकार और मंत्री जी को क्या, फीस का बोझ उठाना तो पेरेंट्स को ही है।

बेशक मंत्री जी पेपर लीक के मसले और बच्चों के हित के वास्ते रात भर न सो पाए हों लेकिन उन बच्चों का क्या जिन्होंने रात-दिन पढ़ाई कर जाने अपनी कितनी रातें गुजार दीं। उन्हें अपनी मेहनत का सिला इस रूप में मिलेगा, शायद उन्होंने कभी सोचा भी न होगा।

खैर, रद्द पेपर दोबारा हो जाएगा। बच्चे पास भी हो जाएंगे। रिजल्ट भी अच्छा ही आएगा। लेकिन लीक का जो कलंक गाहे-बगाहे हमारे शिक्षातंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है उसके खिलाफ सरकार या मंत्री महोदय क्या कड़ा एक्शन लेंगे? या चुनावी जुमलों और हवाई बयानों से ही पूर्ति कर दी जाएगी।

शिक्षा में जड़ जमा चुके लापरवाही के इस घुन का इलाज अगर समय रहते नहीं किया गया तो आगे यह कितने बच्चों के भविष्य को खा जाएगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है।

पता नहीं सरकारी तंत्र बच्चों के शैक्षिक भविष्य के प्रति कब नींद से जागेगा?

Friday, 6 April 2018

हिंसा अंतिम विकल्प नहीं

एक सभ्य समाज में हिंसा की कोई जगह नहीं होती। न ही हिंसा के दम पर किसी भी मुद्दे को सुलझाया जा सकता है। असहमति या नाराजगी का यह मतलब कतई नहीं हो जाता कि आप उक्त मुद्दे के खिलाफ आगजनी या अराजकता पर उतर आएं। मुद्दे हमेशा ही बातचीत से सुलझे हैं, लाठी-डंडों से नहीं।

अभी हाल सुप्रीम कोर्ट के एसी/एसटी एक्ट पर आए फैसले के विरुद्ध जिस तरह कुछ दलित संगठनों ने 'भारत बंद' के नाम पर अपना अराजक विरोध दर्ज कराया, इसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। एक दिन के 'भारत बंद' के समर्थन में जिस तरह कुछ शहरों में हिंसा भड़की, सरकारी वाहनों व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, यह बहुत ही दुखद था। यह 'भारत बंद' नहीं बल्कि 'भारत को बंधक' बनाए जाने का 'कुत्सित प्रयास' था।

इस हिंसक 'भारत बंद' से समाज और देश के भीतर क्या संदेश गया, क्या बंद के कथित समर्थक समझाएंगे?

कोर्ट का फैसला आते ही जिस तरह से पूरे देश में दलित संगठनों ने विरोध के तीखे स्वर अख्तियार किए, देखकर ऐसा लगा मानो उन्होंने फैसले को समझने का प्रयास ही नहीं किया। आग में घी का काम किया चंद सरकार विरोधी दलों ने जो हमेशा ही इस फिराक में बैठे रहते हैं कि किस तरह सरकार को घेरा जाए। विडंबना देखिए, उन्होंने कोर्ट के फैसले को दलितों के खिलाफ सरकार की साजिश करार दिया। जबकि सरकार इस फैसले पर पुर्नविचार याचिका पहले ही डाल चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला इतना भी गलत नहीं कि उसे सिरे से नाकार दिया जाए। माना कि दलित जातियां सदियों से सामाजिक उपेक्षा और घृणा का शिकार होती आई हैं। 21वीं सदी में कदम रखने के बावजूद दलित अत्याचार की खबरें अक्सर ही सभ्य समाज को शर्मसार करती रहती हैं। लेकिन यह मान लेना कि एसी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग नहीं होता, सच नहीं। कुछ मामले तो ऐसे भी संज्ञान में आए हैं जहां एसी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज की गई एफआईआर में, जांच के बाद, मामला फर्जी पाया गया। अधिकार का जब 'सही' की जगह 'गलत' इस्तेमाल होने लगे तब कोर्ट का बीच में दखल देना बनता ही है।

एक यही नहीं पीछे भी हमने जाने कितने ऐसे मामले देखे हैं जब कोर्ट ने सख्त लहजे में सरकार और नेताओं को चेताया है।

2 अप्रैल के विरोध-प्रदर्शन को कोर्ट के फैसले पर असहमति तो किसी भी सूरत में नहीं कहा जा सकता। असहमतियां हिंसक नहीं होतीं। यह पूरी तरह से राजनीतिक बंद था। जिसमें आमजन को मुसीबत में डालकर विरोधी राजनीतिक दलों ने- दलित हित के नाम पर- अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी। बंद पर जिस तरह नेताओं के बयान और ट्वीटस पढ़ने को मिले, वो तो और भी क्षुब्ध कर देने वाले हैं।

देखते ही देखते 500 वाहनों को फूंक देना और 100 से अधिक ट्रेनों का लेट होना क्या यह सोची-समझी साजिश का प्रतीक नहीं? क्या फैसले के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से विरोध नहीं जताया जा सकता था? क्या इस नुकसान की भरपाई करने वो कथित नेता सामने आएंगे, जो बरसों से दलितों का वोट तो पा रहे हैं मगर उन्हें मुख्यधारा में लाने से डरते हैं।
इस हिंसक विरोध में कई उपद्रवी तो ऐसे भी होंगे जिन्हें एसी/एसटी एक्ट के मायने तक नहीं मालूम होंगे! चूंकि उन्हें विरोध करने से मतलब तो वे आंख-कान बंद कर विरोध कर रहे हैं।

देश की राजनीति का इससे बड़ा दुर्भाग्य भला और क्या होगा कि आजादी के 70 सालों में भी दलित और आदिवासी वर्ग को सिर्फ 'वोट बैंक' ही समझा गया है। उनकी और उनके सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों की याद राजनीतिक दलों को चुनावों के आसपास ही आती है। सबसे बड़ा सवाल तो यह भी है कि खुद को दलित हितैषी कहने वाले दलों ने कौन-सा दलितों का भला किया है? क्या उन्होंने भी उनका राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश नहीं की?

इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता कि दलितों का हर राजनीतिक दल ने बराबर शोषण किया है।

दलितों के लिए उनके हित में क्या सही है क्या गलत; यह अब उन्हें ही तय करना होगा। बहुत बन चुके वे नेताओं की राजनीति का मोहरा। समय बहुत तेजी से बदल रहा है। दलित भी खुद को बदलें। खुद को मुख्यधारा में लाने का प्रयास करें। राजनीतिक दलों के भरोसे अगर बैठे रहेंगे तो न अपना भला कर पाएंगे न अपनी आगे आने वाली पीढ़ी का।

कोर्ट के फैसले से असहमति का मतलब यह नहीं हो जाता कि चंद दलित संगठन पूरे देश को 'भारत बंद' के बहाने हिंसा की भट्टी में झोंक दें।

Thursday, 5 April 2018

फेक न्यूज का कारोबार

सोशल मीडिया तरह-तरह की खबरों-सूचनाओं का भंडार है। यहां यह यकीन कर पाना जरा मुश्किल है कि कौन-सी खबर सही और कौन-सी फर्जी (फेक) है। फिर भी, सही और फर्जी (फेक) खबरों के कारोबार का हम किसी न किसी स्तर पर हिस्सा बने रहते हैं।

एक-दूसरे को खबरों के आदान-प्रदान में हम इतना भी धैर्य नहीं बरतते कि उक्त खबर की विश्वसनीयता या अविश्वसनीयता का एक दफा पता तो कर लें। इधर खबर आई और उधर वाइरल हुई। कभी-कभी तो लगता है, जैसे सोशल मीडिया के अत्यधिक प्रभाव या इस्तेमाल ने हमारी सोचने-समझने की शक्ति के साथ-साथ धैर्य को भी खत्म कर किया है। खबर फैलाते वक़्त हम इतना ध्यान भी नहीं रखते कि कौन-सी खबर समाज के बीच कब क्या असर बना सकती है।

फेक न्यूज (फर्जी खबर) का कारोबार हमारे बीच बहुत तेजी से जगह बना रहा है। सोशल मीडिया पर तो इसका असर है ही, साथ-साथ आम जीवन को भी यह खासा प्रभावित कर रहा है। अचानक से किसी खबर का वायरल होना अब संशय पैदा करने लगा है। उक्त खबर के सोर्स को ढूंढना हमारे लिए उतना मायने नहीं रखता जितना कि उसे एक माध्य्म से दूसरे माध्य्म तक पहुंचाना।

हमने देखा है कि फेक न्यूज के कारण न केवल सोशल मीडिया बल्कि आम समाज में भी कई दफा अप्रिय स्थिति बनी है। इन फर्जी खबरों ने सबसे अधिक बवाल धर्म के नाम पर करवाया। सुनाई में तो यह भी आया है कि अभी हाल हुए 'भारत बंद' में भी फेक न्यूज खूब फली-फूली हैं।

सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि फेक न्यूज पर लगाम कैसे कसी जाए? वो क्या मानक हों जो यह तय करें कि फलां खबर असली है या फेक। साथ ही, यह भी उतना ही सही है कि एकदम से फेक न्यूज को पहचान कर उस पर रोक नहीं लगाई जा सकती। क्योंकि जब तक आप फेक न्यूज को पहचान पाते हैं तब तक वो जनमानस के बीच अपना काम कर चुकी होती है।

हालांकि सरकार फेक न्यूज के कारोबार पर सख्त जरूर है पर अपनी सख्ती को इस पर कायम कैसे करे अभी यह तय नहीं कर पा रही। इसी का नतीजा है कि उसे अपने हालिया फेक न्यूज पर आए लगभग तानाशाही पूर्ण आदेश को प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद वापस लेना पड़ा।

आप यह कैसे तय कर सकते हैं कि पत्रकार ही फेक न्यूज को चला रहे हैं? सोशल मीडिया पर ऐसे न जाने कितने ही स्रोत हैं जिनके माध्य्म से फेक न्यूज आ-जा रही हैं। उनका मकसद हर फेक खबर को वायरल करना है फिर चाहे उसका समाज या आमजन पर कैसा भी असर हो। ऐसे में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की मान्यता को रद्द कर देना तुगलकी फरमान ही कहलाएगा।

यह दीगर बात है कि फेक न्यूज में धर्म के अलावा एक बड़ा हिस्सा राजनीति का भी है। फेसबुक और ट्विटर पर कितनी ही पोस्टें राजनीतिक खबरों और प्रतिक्रियाओं से भरी पड़ी रहती हैं। सबसे ज्यादा गाली-गलौज भी राजनीतिक टिप्पणियों पर होती है। चूंकि यह खुला प्लेटफॉर्म है तो यहां कोई भी किसी को कुछ कह-लिख सकता है। सोशल मीडिया पर भाषाई तमीज की बात करना सूरज को दीया दिखाने जैसा होगा।

सख्ती अगर फेक न्यूज के खिलाफ जरूरी है तो उतनी ही जरूरी भाषा के गिरते स्तर पर भी है। एक तो फेक न्यूज और उसमें भाषा का गलीच स्तर भला कोई कैसे नहीं भड़केगा।

एक-दूसरे से जुड़े रहने की अच्छी सोच के साथ शुरू किए गया सोशल मीडिया धीरे-धीरे कर हमें आपस में ही तोड़ रहा है। इस बिखराव का कारण कोई और नहीं हम ही हैं। हम हर जगह केवल अपना हित और दुसरे का नुकसान देख रहे हैं। यही वजह है कि खबरों और सूचनाओं को कुछ इस तरह से पेश किया जाता है जिसमें हकीकत कम फसाना ज्यादा होता है।

फेक न्यूज के कारोबार का निरंतर बढ़ते रहने का कारण भी यही है। बेशक सरकार फेक न्यूज के खिलाफ सख्त कानून बनाए पर अपनी तानाशाही किसी पर भी न थोपे। फेक न्यूज को भी अगर राजनीति का मोहरा बना दिया गया फिर तो इसमें हो चुका सुधार।

Sunday, 31 December 2017

फेसबुक के अपने कुछ अनुभव

फेसबुक पर रहने के अपने फायदे-नुकसान हैं। पर, फेसबुक पर न रहने के भी अपने फायदे-नुकसान हैं। तकरीबन दो साल फेसबुक से दूरी बनाकर यह मैंने करीब से महसूस किया है। बताता हूं...।

दो साल में मैंने फेसबुक पर अपने दो खाते बनाए और बाद में उन्हें थोड़े-थोड़े अंतराल में हमेशा के लिए हटा दिया। फिर एक छोटा-सा गैप लिया। उसके बाद एक और नया खाता बनाया। तीसरी दफा जब मैं फेसबुक पर लौटा। तो देखता हूं यहां का तो पूरा परिदृश्य ही बदल चुका है। फेसबुक में जो अंदरूनी बदलाव हुए सो हुए ही। साथ में सिक्योरिटी मेजर्स भी इतने तगड़े हो गए कि कुछ पूछिए मत।

फिर किया मैंने ये कि अपने पिछले दोनों खातों में जो भी दोस्त-साथी थे उन्हें दोबारा जोड़ना शुरू किया। एक-एक कर सबको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजीं। पुराने कुछ साथियों ने तो रिक्वेस्ट पुनः स्वीकार कर भी ली। उनका दिल से शुक्रिया। पर साथ में यह प्रश्न जरूर दागा गया- 'यार, हमें अमित्र (अन-फ्रेंड) क्यों कर दिया था?' ये प्रश्न स्वभाविक ही था। इसका सहज उत्तर भी मैंने उन्हें दिया। कुछ पुराने साथी तो इतने व्यस्त हो लिए कि उन्होंने मेरी रिक्वेस्ट स्वीकार करना तो दूर साथ में जो संदेश इन-बॉक्स क्या था, वो नहीं पढ़ा। उनकी अति-व्यस्तताएं उन्हें मुबारक।

उनमें से ज्यादातर ने तो यही सोचा होगा कि हमें अन-फ्रेंड करने के बाद महाराज फिर से रिक्वेस्ट भेज रहे हैं, लिस्ट में पुनः जुड़ने की। भला हम क्यों जोड़ें? पड़ी रहने दो ऐसे ही पेंडिंग। कोई नहीं। मैंने बुरा भी माना। हर व्यक्ति की अपनी मर्जी है, रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट करने या न करने की। कोई जोर थोड़े है।

फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने के दौरन एक अनुभव यह भी हाथ आया कि बहुत से लोगों ने अपने फेसबुक की सिक्योरिटी को इतना मजबूत किया हुआ है कि किसी के द्वारा उन्हें रिक्वेस्ट भेजने से पहले फेसबुक आपसे पूछता कि 'आप व्यक्तिगत रूप से उक्त सज्जन को जानते हैं या नहीं?' कन्फर्म करने के बाद भी रिक्वेस्ट नहीं जा पाती। तब आपके पास उस सज्जन को 'फॉलो' करने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होता।

जैसे बिना परमिशन के आईसीयू वार्ड में घुसने की मनाही होती है ठीक ऐसे ही हम लोगों ने अपने फेसबुक एकाउंट को बना लिया है। यहां हर किसी की अपनी अलग दुनिया है। अपने संगी-साथी और संबंधी हैं। अपनी-अपनी डिजिटल विचारधाराएं हैं। सारे संघर्ष और क्रांतियां भी यहीं हैं।

मगर यहां असहमति या आलोचना को बर्दाश्त करने की गुंजाइश कतई नहीं है। सामने वाले से अगर आपने अपनी असहमति को जाहिर किया भी, वो या तो आपको ब्लॉक कर देगा या फिर अन-फ्रेंड कर मुक्ति पा लेगा। ये मैं यों ही हवा में नहीं कह रहा। मैंने ऐसा करते तमाम ऊंचे बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, लेखकों को अक्सर ही देखा है।

फेसबुक पर रहकर हम अपने आप को 'असुरक्षित'-सा महसूस करते हैं। बहस में अलोकतांत्रिक से हो जाते हैं। हरदम कोशिश यही रहती है कि हमसे सामान विचारधारा वाले मित्र लोग ही जुड़ें। विपरीत विचारधारा वालों के प्रति मन में एक 'घृणा' जैसा माहौल रखते हैं।

सबसे बड़ी समस्या फेसबुक से जुड़े लोगों की यह है कि यहां हर कोई खुद को 'विद्वान' समझता है। उस विद्वान से आप न तर्क कर सकते हैं न बहस। विद्वान से पहले उसके चेले ही आपकी इज्जत की ऐसी-तैसी कर डालेंगे। मसला अगर धर्म या जाति से जुड़ा हो तो क्या कहने! इस प्रकार के मसलों का आज सबसे बड़ा अखाड़ा सोशल मीडिया बना हुआ है। हर कोई ऐसे मुद्दों पर लड़ने-भिड़ने को तैयार बैठा है। आप खुद बच सकते हैं तो बचें।

ऐसा भी नहीं है कि फेसबुक पर कुछ सार्थक नहीं हो रहा। गंभीर-पढ़ा या लिखा नहीं जा रहा। ये सब भी हो रहा है पर हमें दिखाई नहीं देता। दिमाग को हमने इस कदर राजनीति के जालों के बीच उलझाए रखा है कि सार्थक चीजें हमें दिख ही नहीं दे पातीं। वही चौबीस घंटे बेमतलब की राजनीतिक बहसें। और अपने-अपने वैचारिक उल्लू सीधा करने की हसरतें।

मुझे लगता है, यही कुछ खास राजनीतिक वजहें हैं जिस कारण हमने अपने फेसबुक को सिक्योरिटी का जाल बना डाला है। कि, किसी भी अनजान का यहां प्रवेश करना सख्त मना है।

महिलाओं का तो समझ में आता है पर पुरुष कब से खुद को असुरक्षित मासूस करने लगे। वे तो इन संसार के राजा हैं। राजा को भला किसका और क्यों डर?

पहले तो मुझे भी थोड़ा अफसोस रहा था कि क्यों मैंने फेसबुक से अपने दोनों खातों को हमेशा के लिए हटा दिया। मगर उसके बाद यहां के जो अनुभव हासिल हुए तो मुझे लगा कि मैंने ठीक ही किया। सोशल मीडिया के अनुभव भी बहुत जरूरी हैं। आखिर पता तो चले कि डिजिटल होता इंसान अपने व्यवहार और स्वभाव में कैसा होता जा रहा है।

हम अक्सर कहते हैं न कि देखो दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है। फेसबुक के अनुभव पाने के बाद यह बात अब मुझे सौ फीसद सच साबित होती हुई दिख रही है। अभी आगे और कितना बदलेगी यह आगे देख पाएंगे।

Friday, 22 December 2017

समाज, रिश्ते और हम

क्या समाज खुद से हार चुका है? क्या समाज के सुधरने की उम्मीद खत्म हो चुकी है? अक्सर ऐसे प्रश्न हमारे सामने मुंह खोले खड़े रहते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर या तो हमारे पास होते नहीं या फिर हम खुद को इनसे बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं। लेकिन कब तक? कभी न कभी तो हमें इनसे रू-ब-रू होना ही पड़ेगा। महज टाल भर देने से काम नहीं चलने वाला।

जिन बेतरतीब रास्तों पर आज का समाज चल पड़ा है उसमें अस्थिरताओं के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता। हर रोज अखबारों में आने वाली खबरों में किसी न किसी रिश्ते के टूटने का जिक्र रहता है। रिश्ते ऐसे ही नहीं बल्कि बहुत बुरी तरह से टूटकर बिखर रहे हैं। कभी रिश्ते हमारी पहचान हुआ करते थे आज एक बोझ समान लगते हैं। किसी को किसी की चिंता नहीं। हर कोई अपनी ही धुन में मस्त अपने से ही मतलब रखे हुआ है। रिश्ते तो रिश्ते रहे यहां तो पड़ोस में भी कोई नहीं जानता एक दूसरे को। जानकर करना भी क्या है, तुम अपनी जिंदगी में व्यस्त हम अपनी।

यही वजह है कि आपसी रिश्तों में मिठास अब नाममात्र की रह गई है। बड़ा अजीब-सा लगता है, अखबारों में अपनी ही बेटी-बहू के साथ बलात्कार की खबरों को पढ़कर। रुपए-पैसे-जमीन के लिए आपने ही भाई-बंधु का कत्ल कर देना। प्रेम-प्रसंगों पर होने वाली घटनाओं की तो जाने ही दीजिए। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता जो जब किसी प्रेमी-युगल के आत्महत्या या ऑनर-किलिंग की खबरें अखबारों में न आती हों।

समझा जा सकता है जिस समाज में प्रेम करना ही गुनाह बना दिया गया हो उसमें रिश्तों की डोर को बांधे या साधे रखना कितना कठिन है।
पिछले दिनों एक बाप द्वारा अपनी चार बेटियों को चलती ट्रेन से फेंक देने की घटना भी ऐसे ही दरकते रिश्तों की बानगी थी। कैसे कोई बाप इतना क्रूर हो सकता है कि अपनी ही बेटियों को फेंक दे! और कैसे कोई बच्चे अपनी मां के प्रति इतने लापरवाह हो सकते हैं कि जब उनकी लाश उनके फ्लैट से निकाली जाए तो पता ये लगे कि उन्हें मरे हुए तो महीनों बीत चुके हैं। इतना ही नहीं हाल की एक घटना तो मेरे शहर से जुड़ी है, जिसमें एक बेटी को आत्महत्या इसलिए करनी पड़ी क्योंकि उसका पिता उसे खाने को कुछ नहीं देता था।

ऐसी तमाम घटनाओं से यह समाज भरा पड़ा है। कभी-कभी तो जानकर ही रौनटे खड़े हो जाते हैं।

बड़ा सवाल तो यह है कि इन सबके लिए किसे दोषी ठहरायें, किसे जाने दें? हमारा सामाजिक ताना-बाना इतनी बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो चुका है कि किसी से कुछ कहते या पूछते हुए भी डर-सा लगता है कि कहीं अगला बुरा न मान जाए। सहनशीलता का निरंतर छीजते जाना भी बड़ी वजह है।

जबकि पढ़ा और सुना यही गया है कि पढ़ा-लिखा प्रगतिशील समाज अधिक जागरूक होता है आपसी रिश्तों की महत्ता को समझ व निभा पाने में। मगर हो उल्टा रहा है, जो जितना प्रगतिशील ऊपर से दिख-जान पड़ता है, वो उतना ही अंदर से खोखला होता है। अपवादों को जाने दीजिए पर सामाजिक हकीकत यही है।

आधुनिकता से हमने कुछ नहीं सीखा। सिर्फ उसका लबादा भर ओढ़ रखा है। आधुनिक समाज इतना दकियानूसी नहीं हो सकता जो अपने ही रिश्तों का बलात्कार करने को उतावला हो बैठे! वो इतना भी बंद-दिमाग नहीं होता कि व्हाट्सअप कर अपनी बीवी को तलाक दे दे। अपने मां-बाप से इतना दूर चला जाए कि जब लौट तो उनकी लाश घर के किसी कोने में दबी-पड़ी मिले।

ये कृत्रिम सामाजिक अधुनिकतायें शहरों को तो विकसित कर रही हैं पर हमें अपने ही रिश्तों से काट भी रही हैं। शायद इस एहसास को हम समझकर भी समझने की कोशिश नहीं करना चाहते।

कभी-कभी इस बात पर यकीन कर लेने का मन करता है कि समाज की मानसिकता को समझ पाना बेहद कठिन है। पलभर में समाज किस करवट अलट-पलट जाएगा कोई नहीं जानता। ये जितना आ-संवेदनशील है उतना ही संवेदनशील भी। जितना आ-व्यहवारिक है उतना ही व्यहवारिक भी। यों समाजशास्त्री समाज को लेकर चाहे जितनी भी परिभाषाएं क्यों न गढ़ लें पर इसकी चाल है निराली।

समाज और हमारे बीच लगातार टूटते रिश्ते शायद ही किसी की चिंता का सबब बनते हों। 'सब चलता है' कि धुन में सबकुछ को बिसरा देने को उतारू हैं सभी। सोचिए, जब रिश्ते ही नहीं ठहर पाएंगे हमारे बीच तो अपना कहने को यहां रह क्या जाएगा? इतना फॉर्मल होना भी ठीक नहीं कि खुद से बिछड़ने का गम भी न रहे।

ये दुनिया भाग तो बहुत तेजी से रही है पर अपने पीछे कितना कुछ छोड़ती भी जा रही है, इसका एहसास नहीं किसी को। वक़्त की कमी के बहाने ने हर रिश्ते को खुद से दूर कर दिया है। जो पास है भी उसकी कोई कद्र नहीं।

कुछ और का कहा नहीं जा सकता पर हां आगे आने वाली पीढ़ी को हम विरासत में टूटे रिश्तों के खिलौने सौंपकर जाएंगे उनका मन बहलाने को! तब तक सामाजिक रिश्ते जाने कैसी शक्ल अख्तियार कर चुके होंगे।

Thursday, 21 December 2017

बूस्टर पर टिकी अर्थव्यवस्था!

इसे समय के साथ समझौता कह लीजिए या कुछ और मगर अब हमें गलत दिशा में चलना भाने-सा लगा है। हम अपनी चाल के शहंशाह बने रहना चाहते हैं। विडंबना यह है कि हमें हमारी गलत चाल के लिए अगर कोई टोकता भी है तो उसे हम तुरंत अपना विरोधी घोषित कर डालते हैं। एक पल को ठण्डे दिमाग से सोचने की जहमत भी नहीं फरमाते कि अगले ने अगर हमें टोका है तो क्यों और किस बात के लिए। टोका-टाकी को बर्दाश्त करने के जमाने शायद लद चुके हैं।

लेकिन मसला जब देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा हो तो हमें हर कदम फूंक-फूंक कर ही रखना पड़ता है। यहां न ढिलाई चलती है न अपनी मन-मर्जी। चूंकि हमारे यहां हर मुद्दे के आगे-पीछे राजनीति का वर्चस्व बना रहता है तो ऐसे में आर्थिक मुद्दे भी नहीं छूट पाते। अर्थव्यवस्था अगर गलत दिशा में जा रही है इस बाबत पार्टी का कोई वरिष्ठ आगाह करता है तो वित्तमंत्री का फर्ज है उन्हें भी सुना और समझा जाए। किंतु ऐसा न हो पाता है न कोई करना ही पसंद करता है। वो ही है न कि अपने मसले के बीच किसी दूसरे की टांग अड़ाना कौन सहन करेगा?
पिछले दिनों पूर्व वित्तमंत्री ने अर्थव्यवस्था के गलत दिशा में जाने को लेकर जो चिंताएं जतलाई थीं तो शायद उचित ही जतलाई थीं ये अगल बात रही कि सरकार का कोई भी मंत्री उसे स्वीकार करने को तैयार न हुआ। लगातार अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा को ठीक ही बताया जाता रहा।

मगर अभी हाल वित्तमंत्री द्वारा अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार को गति देने के लिए दिए गए आर्थिक बूस्टर, जिसमें बैंकों को नौ लाख करोड़ रुपए की संजीवनी दी गई है, के मद्देनजर पूर्व वित्तमंत्री की आशंका ठीक ही साबित प्रतीत होती है। अर्थव्यवस्था में अगर सबकुछ हरा-भरा था तो फिर इतना बड़ा आर्थिक बूस्टर दिया ही क्यों गया? बैंकों को इतने बड़े आर्थिक पैकेज देने के मायने आखिर क्या हैं? और सबसे बड़ा सवाल- क्या यह सब पिछले दिनों किसानों को दी गई कर्ज माफी के बोझ से निपटने की कसरत तो नहीं?

इस आर्थिक बूस्टर के पीछे कुछ न कुछ तो राज है ही जिसे डायरेक्ट कहने या स्वीकार करने से बचा जा रहा है!

हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर उर्जित पटेल ने इस कदम को ऐतिहासिक करार दिया है पर वर्तमान वस्तुस्थिति से वो वाकिफ न होंगे, इसे मानने का मन नहीं करता।

आर्थिक हालात अगर वाकई काबू में रहे होते तो नोटबंदी और जीएसटी के बाद छोटे और मझोले उद्योगों की दुर्दशा न हो रही होती। न किसान आत्महत्या कर रहा होता न ही अपनी खेती से पलायन को मजबूर होता।

इसे सरकार या वित्तमंत्री माने या न माने नोटबंदी का प्रतिकूल असर अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम आदमी पर भी गहरा पड़ा है। जाने कितने ही छोटे उद्योग-धंधों पर ताला लग चुका है। और सबसे बड़ी समस्या, जोकि पिछली सरकारों के साथ भी रही थी, कि रोजगार सृजन की गति ठहरी हुई है। तमाम बड़े-बड़े दावों के साथ सरकार यह खुलासा क्यों नहीं करती कि बीते तीन सालों में देश में कितने रोजगार बढ़े? बेरोजगारों के लिए क्या व्यवस्था की गई है?

रोजगार का मुद्दा भी अर्थव्यवस्था से इतर नहीं है। एक-एक नौकरी- चाहे सरकारी हो या निजी- के लिए लाखों बेरोजगार युवाओं की फौज की फौज तैयार खड़ी रहती है। पता नहीं सरकारें बेरोजगारी के प्रति इतना निष्क्रिय क्यों बनी रहना चाहती हैं?

दूसरी तरफ, आर्थिक पैकेज फौरी तौर पर तो अर्थव्यवस्था को संभाल सकते हैं मगर सुधार नहीं सकते। देश की आर्थिक सेहत तो सुधारने के लिए आपको हवाई किले बनाने से बेहतर जमीन पर काम करना ही पड़ेगा।

अभी हाल सरकार द्वारा बैंकों को जो बूस्टर दिया गया उसका सीधा असर स्टॉक मार्केट में देखने को मिला। सेंसेक्स ने रिकॉर्ड ऊंचाई को छूते हुए 33 हजार का आंकड़ा पार किया। निफ्टी ने भी 10 हजार की सीमा लांघ ली।

सेंसेक्स में आई इस तेजी को देखकर बहुतों ने मान लिया होगा कि देश की अर्थव्यवस्था भी ऐसे ही छलांगे मार रही है। हर तरफ हरियाली आई हुई है। मगर ऐसा है नहीं। सेंसेक्स की बढ़त को आप अर्थव्यवस्था की खुशहाली से नहीं जोड़ सकते। अर्थव्यवस्था में खुशहाली किसानों की आर्थिक मजबूती और खेती की बेहतर सेहत से ही आ सकती है। सेंसेक्स गुलाबी अर्थव्यवस्था व्यवस्था का तो प्रतीक हो-बन सकता मगर समूची अर्थव्यवस्था का नहीं।

और फिर सेंसेक्स की यह तेजी स्थाई नहीं अस्थाई है। इसका तो पल में शोला, पल में माशा वाला हिसाब है। जरा-सी छींक आने पर तो यह ताश के पत्तों की मानिंद बिखर जाता है।

तो फिर हम यह कैसे मान लें वित्तमंत्री द्वारा दी गई कथित आर्थिक सहायता लंबे समय तक टिकी रह पाएगी? वर्तमान में बैंकों की अंदरूनी हालत से भला कौन परिचित नहीं!

अर्थव्यवस्था में लाए गए मजबूत सुधारों से ही देश के जनमानस को संबल मिल पाएगा। विकास का सपना भी तभी सार्थकता पाएगा। अगर वाकई अर्थव्यवस्था में अंदरखाने कुछ गड़बड़ है तो उसे अवश्य ही सुधारा जाना चाहिए। आर्थिक बूस्टर तो महज बहाना भर हैं बेचैन दिल को तसल्ली देने के लिए। न सेंसेक्स की चाल ही देश की अर्थव्यवस्था का भाग्य तय कर सकती है। किसान, खेत और रेजगार कि तरफ सरकार को देखना ही होगा। अर्थव्यवस्था के प्रमुख टूल तो ये ही हैं।

हवा में उड़ते संकल्प

हर रोज हम कितनी तरह के संकल्प लेते हैं, इस बारे में शायद ठीक से हमें भी नहीं पता होगा! किसी मुद्दे पर जब सब संकल्प ले रहे होते हैं तो फॉर्मिल्टी निभाने के लिए हम भी लाइन में लग जाते हैं। अखबारों में लगभग हर रोज छपने वाली तस्वीरों में भीड़ नजर आती है जो संकल्प की मुद्रा में हाथों को आगे किए एकसाथ बुदबुदाती है। उनमें से ज्यादातर चेहरों पर मुस्कान यों छाई रहती है मानो कोई 'मेगा शो' टाइप चल रहा हो।

लिए गए संकल्पों में से कितने या कितनों को हम पूरा कर पाते हैं बताने की जरूरत नहीं। आजकल साफ-सफाई के प्रति जिस तरह से संकल्पों की बाढ़-सी आई हुई है, यह देखकर अच्छा तो बहुत लग रहा है लेकिन संकल्प की अंतिम लाइन खत्म होते ही सबकुछ हवा-हवाई सा ही नजर आता है। अपने-अपने घरों में पहुंचते ही लोग सबकुछ भूल जाते हैं। कूड़े का वैसे ही दुरपयोग शुरू कर देते हैं जैसा अब तक करते चले आए हैं। मैं यह कतई नहीं कह रहा कि प्रत्येक ऐसा ही कर रहा है, मगर न करने वालों की संख्या फिर भी बहुत कम है।

प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छ्ता की अलख जब से जलाई गई है तब से साफ-सफाई के नाम पर हल्ला तो बहुत हो रहा है, मसलन; नेताओं का झाड़ूएं पकड़े नजर आना, अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बनना, टीवी पर आते बड़े-बड़े सेलिब्रिटियों के विज्ञापन, आयोजनों में सफाई-पर्यावरण पर जोर आदि, तिस पर भी जमीनी हकीकत भाषणों से काफी भिन्न है। हमारी सोच में स्वच्छता, साफ-सफाई अब भी दोयम स्थान पर ही है।
प्रदूषण के प्रति हमारा नजरिया अब भी गंभीर नहीं। अगर हम वाकई इन बेहद जरूरी मसलों के प्रति गंभीर या संवेदनशील होते तो हाल में आये- सर्वोच्च न्यायालय के दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री संबंधी रोक पर सोशल मीडिया पर, आदेश के खिलाफ इतना उबल नहीं रहे होते। चेतन भगत जैसे मशहूर लेखक को अपना सख्त एतराज जताने के लिए ट्वीट नहीं करना पड़ता।

जबकि गए साल दीवाली पर दिल्ली में प्रदूषण की दुश्वारियां दिल्लीवाले खूब झेल चुके हैं। एक तरफ पटाखों से फैली धुंध तो दूसरी तरफ धुंआ उगलते वाहनों का जोर कि सांस लेना भी मुश्किल। फिर भी, हम न्यायालय के आदेश के विरोध में कुछ भी कहे-लिखे जा रहे हैं। कुछ टिप्पणियों को पढ़-सुनकर तो ऐसा लग रहा है मानो न्यायालय ने त्यौहार मनाने पर ही रोक लगा दी हो! विशेषकर यह रोक पटाखों बिक्री पर है न कि छोड़ने पर। अगर हम पर्यावरण और स्वच्छता के प्रति अपनी जरा भी जिम्मेदारी समझते हैं तो ऐसा कदापि नहीं करेंगे।

हां, यह सही है कि इस व्यवसाय से छोटे-बड़े कारोबारियों की रोजी-रोटी जुड़ी है। दीवाली पर वे भी अपने कारोबार से चार पैसे कमाने की मंशा रखते हैं। किंतु वर्तमान में पर्यावरण और प्रदूषण की जो हालत है देश में- वो कहीं ज्यादा भयावह है।

यों भी हमनें त्योहारों के पारंपरिक और व्यहवारिक महत्त्व को तो लगभग त्याग ही दिया है। आज त्यौहार का मतलब या तो ऑनलाइन खरीददारी है या फिर बेमतलब का शोर-शराबा। हमने खुद ही गंदगी कर-करके अपने त्योहारों के स्वास्थ्य को बिगाड़ कर रख दिया है। यही वजह है कि न्यायालय को बीच में दखल देना पड़ा।

जब हम ही अपने पर्यावरण और संकल्प के प्रति सजग नहीं होंगे फिर ऐसा भी एक दिन आएगा जब हमारे पास केवल पछतावे के अतिरिक्त कुछ नहीं रह जाएगा। हालांकि पछतावा तो हमें अभी भी होना चाहिए निरंतर बढ़ते प्रदूषण और स्वच्छता के प्रति बेरुखी को लेकर लेकिन चेत हम अब भी नहीं रहे हैं। प्रकृति के संतुलन को बिगाड़े चले जा रहे हैं हम। फिर रोना यह रो रहे हैं कि अक्टूबर में भी इतनी गर्मी का एहसास क्यों हो रहा है?

चाहे घर-बाहर की स्वच्छता हो या प्रदूषण से निजात पाना हो, ये सब करना हम-आपको मिलकर ही है। तो क्या यह बेहतर न होगा कि हम न्यायालय के पटाखों की बिक्री संबंधी आदेश का पालन और स्वागत करें नाकि सोशल मीडिया पर पहुंचकर तरह-तरह के एतराज जताएं। देश, समाज और नागरिकों के स्वास्थ्य का ख्याल हमारे-आपके हाथों में हैं, जैसा चाहें बना या बिगाड़ लें।