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Saturday, 12 October 2013

अलविदा! भगवान

चित्र साभारः गूगल
प्यारे सचिन,
देखते ही देखते चौबीस साल हवा हो गए। तुम सोलह की उम्र में बतौर खिलाड़ी खेलने आए थे और चालीस की उम्र में बतौर भगवान विदा हो रहे हो। एक खिलाड़ी को भगवान का दर्जा पाते मैंने कम ही देखा-सुना है। लेकिन हमारे मुल्क में यह इसलिए संभव है क्योंकि व्यक्तिपूजा में हमारा घोर विश्वास है। व्यक्तिपूजा के कारण हम खिलाड़ी या अभिनेता को इस हद तक महान बना देते हैं कि उसके समक्ष सबकुछ बौना या नीरस नजर आता है।

इधर, जब से तुम्हारे संन्यास की खबर आम हुई है, हर तरफ विधवा विलाप-सा चल रहा है। हर किसी की जुबान पर आश्चर्य का सा भाव है। मायूसी में कुछ स्तब्ध हैं, तो कुछ महिमामंडन में लगे हैं। और महिमामंडन भी ऐसा कि अब कान पकने लगे हैं। सचिन ने संन्यास का ऐलान क्या कर दिया, मानो कहीं किसी पर बिजली गिर गई हो।

जरा खबरिया चैनलों को देखो। कल तलक उनकी बहस का केंद्र आसाराम के पाप थे, अब तुम्हारा संन्यास है। ऐंकर जाने कहां-कहां से खोज-खाजकर तुम पर केंद्रित वो-वो चीजें दिखा और बता रहा है, जो हम सब पहले भी देख चुके हैं। हर बड़े से बड़े नेता, अभिनेता, खिलाड़ी की राय ली जा रही है। प्राइम टाइम पर चर्चा हो रही है। मतलब, जितने मुंह, उतना महिमामंडन। सचिन के संन्यास की टीआरपी का लाभ हर चैनल लेने में लगा है।

प्यारे सचिन, ऐसा मुझे कभी याद नहीं पड़ता, जब तुमने खुद के भगवान बनाए जाने पर जरा-सा भी विरोध या रोष जतलाया हो। या तुमने कभी खुलकर कहा हो कि मैं सिर्फ खिलाड़ी हूं, भगवान नहीं। लेकिन मैं जानता हूं कि तुम भगवान के खिलाफ न जा सकते हो, न बोल सकते। क्योंकि तुम स्वयं कथित भगवान सत्य साईं के भक्त हो। अंध-आस्था के शिकार तुम भी उत्ता ही हो, जित्ता कि हर बड़ा नेता-अभिनेता-उद्योगपति होता है। फिर भला तुम्हें खुद को भगवान कहे या माने जाने पर क्यों और कैसे आपत्ति हो सकती है?

दरअसल, प्यारे सचिन, तुम क्रिकेट के खिलाड़ी से कहीं ज्यादा बाजार और विज्ञापनों के आइकन रहे हो। बाजार ने तुम्हें भुनाया है। और विज्ञापनों के जरिए तुमने उसका एहसान चुकाया है। ठीक यही स्थिति धोनी और विराट कोहली के साथ है। चाहे कभी मैदान पर तुम न चल पाए हो मगर विज्ञापनों में खूब चले हो। शायद इसीलिए बाजार नहीं चाहता कि तुम रिटायर हो।

बाजार ने ही तो तुम्हारे वास्ते भगवान का रक्षा कवच दिया है, ताकि तुम्हारे भक्त केवल तुम्हारी भक्ति में तल्लीन रहें।

कहने वाले कह रहे हैं कि यह वक्त तुम्हारी आलोचना का नहीं है। यह वक्त सिर्फ तुम्हारे भगवानत्त्व को एन्जॉय करने का है। तुम्हें ऐसी विदाई दी जाए, जैसी शायद कभी डोन ब्रेडमैन को भी न मिली हो। लेकिन प्यारे सचिन, मैं तो सवाल उठाऊंगा। आलोचना के जरिए अपनी बात भी रखूंगा। तुम भगवान हो तो क्या...।

हालांकि न मैंने कभी भगवान को देखा है न मिला हूं पर अंदाजा लगा सकता हूं कि वो भी तुमसे जलता अवश्य होगा। क्योंकि घर के मंदिरों के आलों में मूल भगवानों के साथ-साथ मैंने तुम्हारी तस्वीर को भी देखा है। खिलाड़ी के प्रति इत्ती व्यक्तिपूजा कमाल है प्यारे सचिन वाकई कमाल।

बहरहाल, क्रिकेट के मैदान से अब तुम्हारी विदाई का समय है और साथ-साथ 200वें टेस्ट में शतक लगाने की उम्मीदें भी बहुत हैं। शतक लगाना न लगाना तुम्हारे हाथ है, लेकिन नए खिलाड़ियों को केवल खिलाड़ी बने रहने का ही पाठ पढ़ाना, भगवान बनने का नहीं। क्योंकि इंसान जब भगवान का कद पा लेता है, तो बौना हो जाता है।

फिर भी मेरी कोई बात अगर तुम्हें चुभी हो तो उसे यह समझकर ध्यान में रखना कि लोकतंत्र में आलोचना करना हर किसी का अधिकार है।

अलविदा! भगवान।

Sunday, 15 September 2013

समाज और लड़कियां

चित्र साभारः गूगल
मुझे नहीं मालूम यह समाज खुद को आधुनिक या प्रगतिशील किसलिए कहता है। जबकि लड़कियों के प्रति आचरण और व्यवहार में यह खुद को अब भी दकियानूसी बनाए हुए है। उनकी स्वतंत्रता व उनकी उन्मुक्ता से भय खाता है। उन पर किस्म-किस्म की बंदिशें इसलिए ताने रहता है, ताकि वे प्रतिकार या प्रतिवाद न करें। प्रायः लड़कियों को हदों में रहने की हिदायतें देता यह समाज मुझे 16वीं-17वीं सदी का 'क्रूर शासक' नजर आता है।

सवाल यह है कि हद की सीमाओं का पालन केवल लड़कियां ही क्यों करें? यह बोझ उनके सिर पर ही क्यों है कि वे समाज-ससुराल, घर-परिवार, दफ्तर-सिनेमा हर जगह शुचिता और नैतिकता का पल्लू कसकर थामे रहें? इसी समाज के मध्य कुछ ऐसे बे-चरित्र भी हैं, जिन्हें लड़की का पल्लू सरकना किसी दिव्य-दर्शन से कम नहीं लगता। लड़कियों को नैतिकता का पाठ यही वर्ग सबसे अधिक पढ़ाता है। इस मायने में डर्टी पिक्चर ऐसे ही बे-चरित्रों के चरित्र की उजली परतें हमारे समाने उधेड़ती है। फिर भी कहा यही जाता है कि चरित्र लड़की का खराब है।

यह खुशफहमी कितनी अजीब है कि समाज के भीतर बढ़ता बलात्कार या यौन-हिंसा का ग्राफ सिर्फ लड़कियों के पहनावे और बे-परवाह आचरण के कारण है। मतलब, लड़कियां जो-जैसा पहन रही हैं, वो सब भद्दा और अश्लील है। लड़कियों के पहनावे के संदर्भ में, समाज का एक अति-कुंठित वर्ग उन्हें अश्लील मानता है और हम सब उनकी बे-गैरत मानसिकता का खामोशी से समर्थन भी कर देते हैं। वाह...! दरअसल, यह पहनावा-दोष ही लड़कियों के लिए अश्लीलता और शालीनता के मिथक गढ़ता है।

खुद को आधुनिक व प्रगतिशील कहता समाज आज भी अश्लीलता और शालीनता में फर्क नहीं कर पाया है। शालीनता को छोड़िए, अश्लीलता के बारे में उसके तर्क ऐसे हैं, जिन पर सिर्फ अपना सिर धुना जा सकता है। अश्लीलता से डरा समाज इतना दब्बू है कि उसे जरा खुली या उन्मुक्त व्यवहार की लड़की क्षण भर में अश्लील लगने लगती है। वो उसके खिलाफ तरह-तरह के गैर-मुनासिब फतवे दे डालता है। फतवों को सुनकर अक्सर यही लगता है कि हम अब भी कितना बंद समाज हैं। जबकि अश्लीलता कुछ नहीं होती। महज हमारे देखने-समझने के नजरिए का फर्क होता है। हर खुली या उघड़ी चीज अश्लील नहीं होती।

और फिर हम अब उस दौर में नहीं रह रहे हैं, जहां चीजें दकियानूसी स्थापनाओं-परंपराओं के तहत तय की जाती थीं। तब लड़कियों के घर से बाहर निकलने को ही खराब माना जाता था। उनकी हदें घर-परिवार को संभालने या चुल्हा-चाकरी करने तक ही महदूद थीं। शिक्षा का हक उन्हें नहीं था। लेकिन अपने दम पर लड़कियों ने खुद को बदला। सीमाएं-दीवारें-हदें लांघी। रुग्ण परंपराओं को तोड़ा। बंजर स्थापनाओं से खुद को मुक्त किया। यह सब सिर्फ एक दिन या एक रात में नहीं हो गया। इस सब बदलाव के लिए स्त्री-समाज ने बहुत नहीं बल्कि बहुत ज्यादा संघर्ष किया है। और यह संघर्ष अब भी जारी है।

अफसोस इस बात है कि लड़कियों का यह संघर्ष समाज के एक वर्ग के आंख की किरकिरी बना हुआ है। यह वर्ग न उन्हें उन्मुक्त देखना चाहता, न आधुनिक। इसीलिए अक्सर यह अपनी ऐसी-ऐसी स्थापनाएं प्रस्तुत करता है, जिसे सुनकर गुस्सा नहीं तरस आता है।

अभी हाल एक महाशय बोले हैं कि वे अपनी लड़की को जिंदा फूंक देते अगर वो रात में देर से घर लौटती या किसी पुरुष के साथ संबंध बनाती। जनाब ने कितनी सरलता से अपनी तानाशाही को अपनी बेटी पर लाद दिया। उसे जिंदा ही मार दिया, उस पर अपना अविश्वास जतला कर। साथ ही, यह भी बतला दिया कि उनके वास्ते बेटी का सीमाएं लांघना मौत के अतिरिक्त कुछ नहीं। कितना गर्व हुआ होगा बेटी को अपने पिता की अश्लील विचारधारा को जानकर!

मुझे लड़कियों का खुला होना उतना अश्लील नहीं लगता, जितना उन पर तरह-तरह के बंधन थोपने वाले लोग अश्लील लगते हैं। बेहद अश्लील लगते हैं वो विचार, वो मान्यताएं, वो स्थापनाएं, वो परंपराएं, वो सांस्कृतिक-सामाजिक ताना-बाना जहां लड़कियों-स्त्रियों को जबरन दबाकर रखा जाता है। क्या हर प्रकार की नैतिकता-आदर्शवादिता-व्यवहारिकता का अकेला ठेका केवल लड़कियों ने ही ले रखा है? क्या अपने बारे में निर्णय लेने का उन्हें कोई हक नहीं? बलात्कार या यौन-हिंसा लड़कियों के पहनावे से नहीं बल्कि पुरुष की 'कुंठित मानसिकता' की वजह से होते हैं। कभी-कभी लगता है कि हम आधुनिक या प्रगतिशील नहीं, एक बेहद कुंठित समाज बनकर रह गए हैं। जहां सेक्स भूख है और स्त्री कॉमोडिटी।

बहरहाल, इस बीच बलात्कारियों को फांसी दिए जाने के फैसले से एक उम्मीद जागी तो है, लेकिन यह उम्मीद कब तलक अपनी दृढ़ता पर कायम रह पाती है, देखना बाकी है। हालांकि फांसी को अंतिम विकल्प मान लेना, केवल इसलिए बेवकूफी कही जाएगी क्योंकि मानसिकता का बदलना भी बेहद जरूरी है। हम मानसिकता को न बदलें, यौन-हिंसाएं होती रहें और अपराधी को फांसी पर चढ़ाया जाता रहे, उससे भी तो चीजें ठहर-सी जाएंगी। क्यों न ठहराव को पाटकर एक नया रास्ता बनाया जाए, बे-खौफ होकर चलने का।

आधुनिक और प्रगतिशील समाज हम तब नहीं हो सकते, जब तक अपनी सोच-व्यवहार-मानसिकता में बदलाव न लाएं। लड़कियों पर सामाजिक या पारिवारिक बंदिशें न थोपकर उन्हें उन्मुक्त जीवन जीने दें, अपने फैसलों को लेने का।

Thursday, 12 September 2013

यथास्थितिवादी दायरों से बाहर आती हिंदी

चित्र साभारः गूगल
हिंदी दिवस के बहाने या (ना) बहाने जब भी हमने हिंदी पर बात की उसके प्रति हमेशा तरह-तरह की चिंताएं ही जाहिर की हैं। दरअसल, हिंदी के प्रति ये चिंताएं चिंताएं नहीं ‘आत्मप्रलाप‘ हैं, जिसे मंच और पन्नों पर व्यक्त करने की हमें आदत-सी हो गई है। आज भी हम हिंदी को उस बहू की तरह देखना व रखना चाहते हैं, जो लंबा-सा घूंघट ताने रहे, स्थापित मर्यादाओं में रहे, बड़े-बूढ़ों की चाकरी करे और प्रत्येक सामाजिक व वैश्विक बदलाव से दूरी बनाकर रखे। बावजूद इसके हिंदी के चिंताधारियों का कहना यही रहता है कि हिंदी गतिशील बने। आप हिंदी को गतिशील होते भी देखना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि हिंदी मध्ययुगीन वातावरण से बाहर भी न निकले। वाह! क्या गतिशील तर्क है आपका!

जहां जिस परिवेश में भाषा और इंसान समय की मांग के मुताबिक नहीं बदलते वहां विकास के दायरे बेहद सीमित होते हैं। बदलाव से बिगड़ने का खतरा उन्हें हर पल सताता रहता है। जबकि वह इस तथ्य को नहीं समझना चाहते है कि बदलाव बिगाड़ता नहीं बल्कि यथास्थितिवाद के दायरों को तोड़ने की ताकत रखता है। कहने या लिखने में शर्म कैसी कि हिंदी के प्रति हमारा नजरिया प्रगतिशील कम यथास्थितिवादी ज्यादा है। और, यह यथास्थितिवाद इस हद तक बढ़ चुका है कि हम हिंदी के हिंग्लिश होने, बाइलैंग्यूल होने, एसएमएस होने, शब्दों में अधिक खुला होने आदि-इत्यादि से इस कदर घबराने लगे हैं कि जब और जहां मौका मिलता है हिंदी के प्रति चिंता जताने बैठ जाते हैं। यकीन करें हिंदी के चिंताधारियों की चिंताएं भी अब यथास्थितिवाद की श्रेणी में आ चुकी हैं।

यह बात हम मानते हैं कि हिंदी भाषा अब पहले जैसी नहीं रही। लेकिन उससे क्या? अगर पहले जैसी रह भी लेती, तो इस बात की क्या गारंटी थी कि तब भी उस पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाए जाते? आज के समय के हिसाब से कई मायनों में यह ठीक भी है कि हिंदी अब पहले जैसी ठस्स नहीं है। हिंदी अपने परिवेश अपने रंग-ढंग अपने आकार-प्रकार में काफी बदल चुकी है। और, इसे बदला भी चाहिए। आज का युवा जिस तरह की हिंदी को बोलता व लिखता है, उसमें पुराने वक्त जैसे दोहराव नहीं होते। मतलब की पढ़ाई की भाषा यह होनी चाहिए, अर्जी लिखने की भाषा यह और रचनात्मक्ता की भाषा यह। जबकि युवा वर्ग के पास भाषा को लेकर ‘चाहिए‘ जैसी रुढ़ अवधारणाएं नहीं बल्कि स्पष्टबयानी है। भाषा वही भली है जिसे हम और सामने वाला ढंग से समझ व जान सके। अगर हिंदी युवाओं के तौर-तरीकों के हिसाब से बदल व बढ़ रही है, तो इसमें किसी को क्यों और किसलिए एतराज होना चाहिए? भाषा पर हम किसी प्रकार का जोर कायम नहीं कर सकते।

चिंताधारियों की बड़ी समस्या बाजार भी है। बाजार को आगे रख वे हिंदी के बाजारू होने पर गाहे-बगाहे भी चिंतित होते रहते हैं। बाजार के सहारे बढ़ती हिंदी उन्हें खतरा जान पड़ती है। जबकि हकीकत यह है कि बाजार और हिंदी एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं। जहां बाजार है वहां हिंदी है। हिंदी के बगैर आप बाजार के स्थापित होने की कल्पना तक नहीं कर सकते। देश-विदेश के बीच आज हिंदी की जो भी डिमांड है, उसे कहीं न कहीं बाजार के आधार पर ही जगह मिली है।

बाजार भी यह अच्छी तरह से समझ चुका है कि हिंदी के बगैर उसकी गाड़ी चल पाना मुश्किल है। यह हिंदी की ताकत का ही नतीजा है कि आज फिल्मों और विज्ञापनों में जिस भाषाई विविधता का असर हमें दिखाई देता है, उसका संबंध सीधा बाजार से ही है। बेशक वहां भाषा के उच्चारण भिन्न हैं। पर हैं तो सहज ही न। मतलब हमें भाषा के विस्तार पाने से होना चाहिए। अब वो किस रूप, किस तरह और किस माध्यम से विस्तार पा रही है, इस पर दीदारेजी करना बेकार ही है। गौरतलब है, बाजार अंग्रेजी में बोल या दिखाकर अपना उत्पाद उतनी संख्या में नहीं बेच सकता जितना की हिंदी के माध्यम से। बाजार व समुदाय के इंट्रस्ट की खातिर अगर इसमें कुछ रापचिक से बदलाव भी करने पड़ें तो चलेगा क्योंकि बाजार के बीच खड़ा वही रह सकता है, जिसके पास विविधताएं हों। इस संदर्भ में अगर बाजार और हिंदी, हिंदी और बाजार एक दूसरे को ये सुविधाएं दे रहे हैं तो इसमें हर्ज ही क्या है?

इंटरनेट, मोबाइल व सोशल नेटवर्किंग जैसे माध्यमों ने हिंदी के मान-सम्मान को बढ़ाया ही है कम नहीं किया। आज इंटरनेट और फेसबुक जैसे माध्यमों पर सबसे ज्यादा हिंदी लिखी व पढ़ी जाती है। और, यह हर्ष का विषय है कि इसमें युवाओं की भागीदारी सबसे अधिक है। बेशक अगर वे फेसबुक या एसएमएस के बहाने हिंदी के शब्दों को संक्षिप्त कर लिख रहे हैं, तो इसमें गलत ही क्या है? कैसे भी सही हमारी भाषा तो बढ़ ही रही है न।

समय बदल चुका है। इस बदलते समय में अगर शुक्ल या द्विवेदी युगीन भाषा पर लेक्चर छाड़ने लग जाएंगे तो इसे यहां कोई नहीं सुनना पसंद करेगा। लद चुके हैं ठस्स हिंदी के चलन के जमाने। यह आम बोलचाल की हल्की, मस्त और ग्लैमरस हिंदी है। यह फेसबुक, एसएमएस, ट्वीटर, मोबाइल की हिंदी है। कम शब्दों में खुद को अभिव्यक्त करती हिंदी है। यह मॉड-हिंदी है। चिंताधारियों के चाहने पर भी यह हिंदी अब नहीं बंधने वाली।

हिंदी दिवस पर घिसी-पिटी चिंताओं व खतरों से बाहर आकर हमें हिंदी के इस बदलते रूप-स्वरूप पर बात करनी चाहिए। उसे आत्मसात करना चाहिए। भाषा को आप जितना और जहां तक बदलेंगे वो आपको उतना ही लुत्फ देगी। आज के समय की हिंदी कुछ ऐसी ही है।

Tuesday, 10 September 2013

समाज की भूमिका

चित्र साभारः गूगल
समाज को समझना टेढ़ी खीर है। समाज कभी किसी मुद्दे पर एक राय नहीं होता। समाज की राय समय-दर-समय, परिस्थिति-दर-परिस्थिति बदलती रहती है। यह जरूरी नहीं कि जो हमारी निगाह में सही हो, समाज की भी हो। सही-गलत का फैसला समाज अपने हिसाब से करता है। लेकिन एक मत फिर भी नहीं हो पाता।

एक मत न हो पाना समाज की फितरत है। कुछ मायनों में यह ठीक इसलिए है, क्योंकि यहीं से रास्ता निकलता है, आपसी संवाद-बहस और सहमति-असहमति का। जिस समाज के बीच संवाद-बहस की भरपूर गुंजाइश रहती है, वो सही मायनों में 'प्रगतिशील समाज' होता है। प्रगतिशील समाज आपस में न लड़ता है, न झगड़ता। न ही मुद्दों से घबराकर हटने-बचने का प्रयास करता है। प्रगतिशील समाज संवाद स्थापित करता है। बहस करता है। और निष्कर्ष निकालता है।

लेकिन समाज उस वक्त बेहद खतरनाक हो जाता है, जब वो फतवे देना शुरू कर दे। फतवों से न समाज चलता है, न न्याय-व्यवस्था। फतवे समाज को तोड़कर उस अंधे कुंए मे धकेल देते हैं, जहां अंधकार के सिवाय कुछ नहीं होता। बेशक, हमारे और समाज के बीच मत-विभाजन रहे परंतु संवाद की जगह भी साथ-साथ बनी रहनी चाहिए।

इधर लगातार देखने-सुनने में आ रहा है कि हमारे और समाज के मध्य दूरियां बढ़ती जा रही हैं। जहां हमारी सहमति है, वहां समाज की नहीं। और जहां समाज की सहमति है, वहां हमारी नहीं। न हम समाज से संवाद बना पा रहे हैं और न समाज हमसे। सहमति-असहमति का यह दुश्चक्र तरह-तरह के विवादों को ही जन्म दे रहा है।

मुझे लगता है, हमारे और समाज के मध्य बनी विभाजन की यह रेखा शायद इसलिए भी और चौड़ी हुई है, क्योंकि युवा पीढ़ी पुराने समाज के साथ एडजस्ट करने में खुद को संतुष्ट नहीं पाती। वो उस समाज के साथ जाना नहीं चाहती, जहां पाबंदियां अधिक हैं, आजादी बहुत कम। जहां यथास्थितिवाद अधिक है, नया रंग-ढंग बहुत कम।

कह सकते हैं, पुराने और नए समाज की युवा पीढ़ी की सोच में बहुत फर्क है। अगर यह फर्क न होता, तो लिव-इन (सह-जीवन) जैसे मुद्दों पर इतनी बहस न होकर, एक आम स्वीकृति बनती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वक्त के बदलने के साथ-साथ हमारे बीच और आसपास बहुत कुछ बदला है। रहन-सहन के साथ-साथ रिश्ते भी बदले हैं। रिश्तों में आया यह बदलाव बे-वजह इसलिए भी नहीं है क्योंकि इसमें जिंदगी के वो अर्थ भी शामिल हैं, जिन पर कभी हम बात करने से कतराते थे। आज लिव-इन या लेसबियन संबंध उतने ही आम हैं, जितना कि हंसना-बोलना।

बेशक, यह नए तरह और तरीके के संबंध हैं, जहां सेक्स के प्रति खुलापन अधिक है। लेकिन यह खुलापन किसी दबाव या झिझक का मोहताज नहीं है। यहां जो है, सो है। यह शादी जैसी 'सनातन परंपरा' से बिल्कुल अलग है। संबंधों के आधार पर समझदारी है। हां, बहुत से लोगों को इस समझदारी में पाश्चात-संस्कृति की बू आती है। लेकिन शादी के बंधन में बंधकर भी कौन सा कोई भारतीय-संस्कृति की मान्यताओं-स्थापनाओं को ढंग से निभा पा रहा है। विवाद और टूटन वहां भी है। क्या नहीं...?

हर सदी, हर दशक में समाज और लोगों को बदलना पड़ता है। जो बदलाव के साथ एडजस्ट कर लेते हैं, वे जीवन एवं संबंधों को निभा ले जाते हैं। और जो नहीं कर पाते, वे बदलाव पर जलने-भुनभुनाने के अतिरिक्त कुछ ज्यादा नहीं कर पाते। एक दिन खुद ही हाशिए पर चले जाते हैं। क्य बेहतर यह न हो कि बदलते वक्त के साथ समाज अपनी भूमिका में भी बदलाव लाए। नई पीढ़ी को समझे। सह-जीवन को मान्यता दे। फिर भी अगर जो सह-जीवन को नहीं चला पाते, उनको दुतकारने के वजाए, आपस में सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करे।

समाज अगर अपनी भूमिका को समझे, तब बहुत सारी चीजों का हल संभव है। प्रगतिशील समाज बदलते वक्त के साथ चलता है, नाकि ठहरता। हमें ठहरा हुआ समाज नहीं, 'प्रगतिशील समाज' बनना है।

Sunday, 8 September 2013

संबंधों का साहित्य

चित्र साभारः गूगल
सिर्फ समाज ही नहीं, साहित्य में भी संबंध बड़ा महत्त्व रखते हैं। संबंधों के सहारे मेल-मिलाप व बातचीत को साधा जाता है। बहुत-सी चीजों का आदान-प्रदान होता है। संबंधों को अनाम रिश्तों में ढालकर स्वार्थों को सिद्ध किया जाता है। हालांकि साहित्य में पहले स्वार्थसिद्धि को उपेक्षित रखा जाता था, लेकिन इसे अब अहम व्यवहार के रूप में स्वीकार कर लिया गया है।

कहते हैं, समय परिवर्तनशील होता है। और साहित्य के भीतर भी परिवर्तन की यह प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए। यदि यह परिवर्तन रचनात्मकता के क्षेत्र में हो, तो भला किसे ऐतराज हो सकता है। केवल संबंधों के सहारे ही चीजें अगर बनतीं-बिगड़तीं हैं, तो स्थिति शोचनीय हो जाती है।

राजनीति की तरह साहित्य में भी गुटबाजी की परंपरा खूब असर दिखा रही है। दिल्ली, जोकि राजनीति के साथ-साथ साहित्य का बड़ा गढ़ बन चुका है, में भी साहित्यकारों के मध्य विकसीत होती 'साहित्यिक गुटबाजी' ने संबंधों और स्वार्थों के नए कीर्तिमान स्थापित कर डाले हैं।

देखिए, साहित्य में अब आपकी पहचान का सबब आपकी रचनाएं नहीं बल्कि जोड़-जुगाड़ से सधने वाले संबंध होते हैं। यहां पुरस्कार और सम्मान रचनात्मक योग्यता पर नहीं दिए-दिलवाए जाते बल्कि आपकी पहुंच और संबंधों की गरमाहट यह काम करती है। योग्यता का बोझ तो वे ढोते हैं, जिनका यहां कोई 'गॉडफादर' नहीं होता। वैसे, साहित्य में भी फिल्मी दुनिया की तरह कम से कम एक 'गॉडफादर' का होना इसलिए आवश्यक है, ताकि छपने-छपवाने व पुरस्कारों के लेने-देने की प्रक्रिया बनी रहे सके। गॉडफादर के होने का एक बड़ा फायदा तो यही मिलता है कि वे लाभ के सौदे करवाने में माहिर होते हैं।

आप मानें न मानें लेखकों-साहित्यकारों का भी अपना एक बाजार होता है। इस बाजार में लेखकों-साहित्यकारों की हैसियत के मुताबिक संबंधों के मूल्य तय होते हैं। किंतु यहां विचारधारा कोई मायने नहीं रखती। आप दक्षिणपंथी हों या वामपंथी कोई फर्क नहीं पड़ता। आपको बस बाजार के अनुरूप होना चाहिए। बाजार हर रोज नई-नई संभावनाएं पैदा करता है। फिर लेखक अगर किसी ऊंचे प्रकाशक-संपादक से जुड़ा है, तो कहना ही क्या। साल में दो-चार नई पुस्तकों का प्रकाशन और समाचारपत्र में नियमित एक स्तंभ लगभग तय जानिए।

नाहक ही प्रेमचंद, रेणु, मुक्तिबोध, मटियानी, नागार्जुन जैसे लेखकों ने गंभीर साहित्य रचा। इससे उन्हें मिला क्या, सिर्फ नाम! अपने रहते उन्हें अपनी गंभीर रचनाओं के 'वाजिब दाम' तक तो मिल न सके। उनके बहाने अर्थ-लाभ तो उनके कथित प्रकाशकों ने ही कमाया। और साहित्यकारों ने उनसे अपने संबंध मजबूत कर कुछ अपना भला भी किया।

इस चिंता को फिलहाल बिसरा दें कि हमारा साहित्य किस और कैसी दिशा में जा रहा है। वो जहां जा रहा है, जाने दें। इस-उस के साथ बस अपने निजी संबंधों को मजबूत किए रहें ताकि दुकान चलती रहे। क्योंकि संबंध हैं, तो सुविधाएं हैं।

सहमति-असहमति के बीच

चित्र साभारः गूगल
पहले उनसे मेरा अच्छा संवाद था। विभिन्न मुद्दों पर अक्सर वाद-संवाद का सिलसिला हम दोनों के बीच चला करता था। वो एक हिंदी दैनिक में स्तंभ लिखा करते थे और मैं उस पर अक्सर अपनी प्रतिक्रिया दिया करता था। चूंकि हमारी विचारधारा आपस में मेल खाती थी, इसलिए उनके लेखों पर असहमति या प्रतिवाद की स्थिति कभी पैदा नहीं हुई। बावजूद इसके उनमें एक आदत थी, अपने विरूद्ध किसी भी असहमति को न सुनने की, जो बदस्तूर आज भी है।

पाठकों के प्रशंसात्मक पत्रों में कुछ पत्र ऐसे भी होते थे, जिनमें उनके लेखों से असहमति जताई गई होती थी। अपनी चिर-परिचित शैली में वह उन पत्रों का जवाब नहीं देते थे। बस, यही कहकर बात को खत्म कर देते थे कि फलां पाठक बेवकूफ है, उसे कुछ नहीं पता। प्राय: उनका ऐसा व्यवहार मुझको अखरता था पर कभी उनसे अपनी बात को कहने का साहस नहीं कर पाता था।

मगर यह एकतरफा सिलसिला हमारे बीच ज्यादा दिनों तक चल नहीं सका। अपनी बात को इस तरह से रोके रखना, मेरे लिए अधिक संभव न था। अंतत: एक दिन पत्र की शक्ल में उनसे अपनी बात, अपनी असहमति को मैंने लिख ही दिया। यह कतई जरूरी नहीं कि समान विचारधारा होने के बावजूद आप सामने वाले से किसी मुद्दे या बात पर असहमत नहीं हो सकते। हो सकते हैं। क्योंकि संबंध अपनी जगह हैं और सहमति-असहमति अपनी जगह।  

हालांकि उनसे अपनी असहमति को मैंने कह तो दिया मगर उसका परिणाम यह हुआ कि जनाब ने न मेरी असहमति का उत्तर दिया, न ही मुझसे किसी प्रकार का संवाद या संबंध रखा। खैर, उनसे यों संबंध टूट जाने का मुझे रत्तीभर अफसोस इसलिए भी नहीं हुआ, क्योंकि जिस व्यक्ति के अंदर अपनी असहमति को सुनने-बर्दाशत करने का साहस नहीं, वो भला अपनी विचारधारा पर कैसे दृढ़ रह सकता है! 

अक्सर यह प्रश्न मुझको परेशान किए रहता है कि असहमति को सुनते ही हम इतना आग-बबूला क्यों हो जाते हैं? हम जितना सम्मान सहमति को देते हैं, क्या उतना असहमति को नहीं दे सकते? जिस प्रकार सहमति का महत्त्व है, उसी प्रकार असहमति का भी। किसी से किसी मुद्दे पर असहमति जतलाना उसे गाली देना नहीं बल्कि अपनी सोच-विचारधारा को उसके समक्ष रखना है।

अफसोस, असहमति को हम अपनी 'इज्जत पर बट्टा' मानकर उसकी स्वीकारोक्ति मात्र से ही घबरा जाते हैं। न जाने कितने ऐसे संबंध असहमति के चलते टूटे हैं। अव्वल तो अब लोगों के बीच संवाद रहा ही नहीं, बचा-खुचा जो है भी, वो असहमति की भेंट चढ़ जाता है। 

लेकिन किसी गलत बात या मुद्दे पर खामोश रहना भी तो सही नहीं है। दो व्यक्तियों के मध्य लाख असहमति हो परंतु संवाद की गरिमा तो बनी ही रहनी चाहिए। यह जरूरी भी है। 

असहमति संवाद का एक बेहतरीन माध्यम है, ऐसा मेरा मानना है। जिस बिंदू पर हम स्वयं से सहमत हों, कोई जरूरी नहीं कि दूसरा भी हमसे उतना ही सहमत हो। कहीं न कहीं, किसी न किसी बिंदू पर वो हमसे या हमारी विचारधारा से असहमत हो सकता है। यह उसका 'वैचारिक हक' है। हमारा यह फर्ज है कि हम उसकी असहमति को सुने और जवाब भी दें। 

दरअसल, सहमति-असहमति के बीच चलने वाला यह सिलसिला आगे एक बेहतर संवाद को जन्म दे सकता है, अगर हम चाहें तो। हमारे बीच सहमति-असहमति का बने रहना इसलिए भी जरूरी है ताकि संवाद बना रह सके।

जहां तक सवाल हिंदी साहित्य में संवाद और असहमति की गुंजाइश का है, तो कहने में कोई शर्म नहीं, कि यहां वो अब खत्म-सा हो गया है। क्या लेखक, क्या साहित्यकार, क्या संपादक सभी अपनी-अपनी असहमतियों के प्रति इस कदर कुंठित-से हो गए हैं, कि वो पाठक से अपनी आत्मप्रशंसा के अतिरिक्त कुछ सुनना नहीं चाहते। हमारे बीच ऐसे कई बड़े लेखक-साहित्यकार-संपादक मौजूद हैं, जिन्हें अपने विरूद्ध किसी भी असहमति को सुनने का साहस नहीं।

साहित्य में चलने वाली अधिकतर बहसों में असहमतियों को दबाया जाता है। उस पर तर्क यह दिया जाता है कि हम साहित्य को बेकार की बहसों-असहमतियों का मंच नहीं बनाना चाहते। असल में, वे साहित्य को केवल अपनी निजी सहमतियों एवं आत्मप्रशंसाओं का मंच बनाए रखना चाहते हैं ताकि उनके कुबने बचे रह सकें। कुनबे बनाने-बचाने-तोड़ने में हिंदी के साहित्यकार कितना आगे हैं, किसी से छिपा नहीं।   

हो सकता है, कुछ प्रगतिशील इस सत्य पर जरूर नाक-भौं सिकोड़ें मगर असहमति के स्वीकार का जितना साहस मैंने कथाकार शैलेश मटियानी में देखा, ऐसा कम ही सुनने को मिलता है। मटियानीजी से मेरा जरा-बहुत ही पत्र-संवाद रहा। ज्यादातर संवाद उनसे विचारधारात्मक असहमति पर ही केंद्रित हुआ करते थे और वे सभी का बेहद सम्मान और तर्क के साथ मुझको जवाब भी देते थे। उन्हें कभी किसी मसले पर भुनभुनाते या बौखलाते कम से कम मैंने तो नहीं देखा। मगर फिर भी प्रगतिशीलों ने उन्हें इस कारण हमेशा हाशिए पर डाले रखा, क्योंकि वे उनकी 'राष्ट्रवादी विचारधारा' से सहमत नहीं थे। उनकी विचारधारा से असहमति अपनी जगह है, लेकिन इस कारण संवाद ही न रखना अ-वैचारिक कृत्य है।

वे लेखक-साहित्यकार जो अपनी रचनाओं का गुणगान करते नहीं थकते, उन्हें अपने भीतर अपनी असहमति को सुनने-पढ़ने-पचाने का साहस भी अवश्य पैदा करना चाहिए ताकि इस बहाने हमारे और उनके बीच संवाद की निरंतरता और गरिमा बनी रह सके। बिना असहमति न संवाद हो सकता है न बहस।

Saturday, 7 September 2013

बहादुर सुष्मिता के बहाने

चित्रः- साभार- गूगल
'संघर्ष' स्त्री का दूसरा नाम है। समाज में स्त्री हर स्तर पर अपने वजूद की खातिर संघर्षरत है। जितना संघर्ष वो घर-परिवार के बीच रहकर कर रही है, उतना ही बाहर निकल कर भी। साथ ही, स्त्री के संघर्ष से लेखन का क्षेत्र भी जुदा नहीं है। हमारे मध्य ऐसी बहुत-सी लेखिकाएं हैं, जिन्होंने अपने लेखकिए-संघर्ष के बूते न केवल समाज बल्कि स्त्री-वर्ग के साथ-साथ लेखन को भी बहुत कुछ दिया है। निरंतर दे रही हैं। स्त्री ने अपने लेखन में तमाम तरह के अपने संघर्ष, अपनी लड़ाई को अभिव्यक्ति दी है। कई दफा इन अभिव्यक्तियों को पढ़कर रौंटे तक खड़े हो जाते हैं।

समाज, पितृसत्ता, पुरुष-वर्चस्व से स्त्री लगातार लड़ रही है। यह कमाल बात है कि स्त्री ने लड़कर कभी हार नहीं मानी। कहा जा सकता है कि स्त्री के भीतर लड़ने व संघर्ष करते रहने का माआदा पुरुष से कहीं ज्यादा है।

शायद यही वजह है कि आज हमारे बीच तसलीमा नसरीन और सुष्मिता बनर्जी जैसी 'बोल्ड लेखिकाएं' हैं। लेकिन यह दुखद है कि सुष्मिता बनर्जी अब हमारे बीच नहीं रहीं। पिछले दिनों सुष्मिता को अपने लेखन, संघर्ष और विरोध की वजह से तालिबान की गोली का शिकार होना पड़ा। लेकिन यह मत समझिए कि तालिबान की गोली ने सुष्मिता या उसके विरोध को खत्म कर दिया। खत्म न सुष्मिता हुई है न उसका विरोध। वो किसी न किसी रूप में हमारे बीच मौजूद है। यह हार तालिबान की है। उसके कट्टरपंथ की है।

तालिबानी कट्टरपंथ के खिलाफ खड़ी होकर सुष्मिता ने हमारे समक्ष एक नजीर पेश की है। सुष्मिता ने परवाह न तालिबानियों की धमकियों की, न उनकी गोली की। सुष्मिता पर 'जघन्य चरित्र' की महिला होने का इलजाम जब तालिबानियों ने लगया गया था, तब उसने हाथ में बंदूक थामकर उनसे पूछा था कि 'मेरे चरित्र की किस जघन्यता का सुबूत मिला है तुमको? मेरे चरित्र, मेरे अधिकार का फैसला करने वाले तुम होते कौन हो?' अपनी चरित्र रक्षा की खातिर तालिबान-कम-पुरुष वर्चस्व के विरूद्ध सुष्मिता का बंदूक उठाना, साबित करता है, कि वो किस जीवट की महिला थी।

एक ऐसी महिला जिसने तालिबान के अत्याचारों का जीवन के अंतिम क्षणों तक डट कर मुकाबला किया। जो हारी नहीं बल्कि न हारने के बोल्ड मायने हमारे सामने प्रस्तुत कर गई।

अपनी बहुचर्चित पुस्तक काबुलीवालार बंगाली बऊ में सुष्मिता लिखती है, 'मुझे इस तरह देखकर कमरे में मौजूद सभी की मुझ पर नजर पड़ी। मैंने मशीनगन का रुख तालिबान की ओर किया। संख्या में कुल पांच तालिबान थे। वे कैसे मूर्खतापूर्ण, मूक दृष्टि से अस्फुट स्वर में एक-दूसरे से बोले, दा सी आई? यानी ये क्या कर रही है?

'क्या कर रही हूं, समझ नहीं पा रहे हो? तुम लोग समझते क्या हो? मनमर्जी, सबके नाम पर झूठा कलंक लगाकर उनकी हत्या करोगे? मैं तुम लोगों को मौका नहीं दूंगी। मैं तुम्हारे हाथों नहीं मरूंगी। पहले मैं तुम लोगों को मारूंगी, फिर खुद को खुद ही गोली मारूंगी।'

यकीनन, तालिबान के सामने इतने साहस के साथ खड़े होना सुष्मिता के ही बस की बात थी।

औरत अगर हर जुलम सह सकती है, तो वक्त आने पर उसका माकूल जवाब भी दे सकती है। औरत कमजोर नहीं। औरत खुद को मशीनगन से अधिक खतरनाक बना सकती है। अपनी इज्जत व अधिकारों के लिए सुष्मिता का संघर्ष, समूची स्त्री-जाति के लिए मिसाल है।

यही वजह है कि सुष्मिता और तसलीमा जैसी बोल्ड स्त्रियां परंपरावादियों एवं यथास्थितिवादियों की निगाह में हर पल चुभती रहती हैं। तसलीमा पर भी बेशक तरह-तरह के इलजाम लगाए जाते रहे हैं, किंतु ज्यादती के खिलाफ न दबना उसकी फितरत बन गई है।

हिंदी लेखन में ऐसी कितनी लेखिकाएं हैं, जो तसलीमा या सुष्मिता के आसपास भी खड़ी हो पाती हैं!

सुष्मिता बनर्जी का हमारे बीच न रहना, यकीनन दुखद है, मगर किसी न किसी सूरत, संघर्ष और लड़ाई के रूप में वो हमारे बीच आज भी मौजूद है। और हमेशा रहेगी। सुष्मिता का पुरुष-वर्चस्व के विरूद्ध संघर्ष यों जाया नहीं जाएगा, फिर कोई और सुष्मिता उठ खड़ी होगी, यथास्थितिवादियों से लोहा लेने के लिए।

सलाम सुष्मिता।