Translate

Saturday, 7 September 2013

बहादुर सुष्मिता के बहाने

चित्रः- साभार- गूगल
'संघर्ष' स्त्री का दूसरा नाम है। समाज में स्त्री हर स्तर पर अपने वजूद की खातिर संघर्षरत है। जितना संघर्ष वो घर-परिवार के बीच रहकर कर रही है, उतना ही बाहर निकल कर भी। साथ ही, स्त्री के संघर्ष से लेखन का क्षेत्र भी जुदा नहीं है। हमारे मध्य ऐसी बहुत-सी लेखिकाएं हैं, जिन्होंने अपने लेखकिए-संघर्ष के बूते न केवल समाज बल्कि स्त्री-वर्ग के साथ-साथ लेखन को भी बहुत कुछ दिया है। निरंतर दे रही हैं। स्त्री ने अपने लेखन में तमाम तरह के अपने संघर्ष, अपनी लड़ाई को अभिव्यक्ति दी है। कई दफा इन अभिव्यक्तियों को पढ़कर रौंटे तक खड़े हो जाते हैं।

समाज, पितृसत्ता, पुरुष-वर्चस्व से स्त्री लगातार लड़ रही है। यह कमाल बात है कि स्त्री ने लड़कर कभी हार नहीं मानी। कहा जा सकता है कि स्त्री के भीतर लड़ने व संघर्ष करते रहने का माआदा पुरुष से कहीं ज्यादा है।

शायद यही वजह है कि आज हमारे बीच तसलीमा नसरीन और सुष्मिता बनर्जी जैसी 'बोल्ड लेखिकाएं' हैं। लेकिन यह दुखद है कि सुष्मिता बनर्जी अब हमारे बीच नहीं रहीं। पिछले दिनों सुष्मिता को अपने लेखन, संघर्ष और विरोध की वजह से तालिबान की गोली का शिकार होना पड़ा। लेकिन यह मत समझिए कि तालिबान की गोली ने सुष्मिता या उसके विरोध को खत्म कर दिया। खत्म न सुष्मिता हुई है न उसका विरोध। वो किसी न किसी रूप में हमारे बीच मौजूद है। यह हार तालिबान की है। उसके कट्टरपंथ की है।

तालिबानी कट्टरपंथ के खिलाफ खड़ी होकर सुष्मिता ने हमारे समक्ष एक नजीर पेश की है। सुष्मिता ने परवाह न तालिबानियों की धमकियों की, न उनकी गोली की। सुष्मिता पर 'जघन्य चरित्र' की महिला होने का इलजाम जब तालिबानियों ने लगया गया था, तब उसने हाथ में बंदूक थामकर उनसे पूछा था कि 'मेरे चरित्र की किस जघन्यता का सुबूत मिला है तुमको? मेरे चरित्र, मेरे अधिकार का फैसला करने वाले तुम होते कौन हो?' अपनी चरित्र रक्षा की खातिर तालिबान-कम-पुरुष वर्चस्व के विरूद्ध सुष्मिता का बंदूक उठाना, साबित करता है, कि वो किस जीवट की महिला थी।

एक ऐसी महिला जिसने तालिबान के अत्याचारों का जीवन के अंतिम क्षणों तक डट कर मुकाबला किया। जो हारी नहीं बल्कि न हारने के बोल्ड मायने हमारे सामने प्रस्तुत कर गई।

अपनी बहुचर्चित पुस्तक काबुलीवालार बंगाली बऊ में सुष्मिता लिखती है, 'मुझे इस तरह देखकर कमरे में मौजूद सभी की मुझ पर नजर पड़ी। मैंने मशीनगन का रुख तालिबान की ओर किया। संख्या में कुल पांच तालिबान थे। वे कैसे मूर्खतापूर्ण, मूक दृष्टि से अस्फुट स्वर में एक-दूसरे से बोले, दा सी आई? यानी ये क्या कर रही है?

'क्या कर रही हूं, समझ नहीं पा रहे हो? तुम लोग समझते क्या हो? मनमर्जी, सबके नाम पर झूठा कलंक लगाकर उनकी हत्या करोगे? मैं तुम लोगों को मौका नहीं दूंगी। मैं तुम्हारे हाथों नहीं मरूंगी। पहले मैं तुम लोगों को मारूंगी, फिर खुद को खुद ही गोली मारूंगी।'

यकीनन, तालिबान के सामने इतने साहस के साथ खड़े होना सुष्मिता के ही बस की बात थी।

औरत अगर हर जुलम सह सकती है, तो वक्त आने पर उसका माकूल जवाब भी दे सकती है। औरत कमजोर नहीं। औरत खुद को मशीनगन से अधिक खतरनाक बना सकती है। अपनी इज्जत व अधिकारों के लिए सुष्मिता का संघर्ष, समूची स्त्री-जाति के लिए मिसाल है।

यही वजह है कि सुष्मिता और तसलीमा जैसी बोल्ड स्त्रियां परंपरावादियों एवं यथास्थितिवादियों की निगाह में हर पल चुभती रहती हैं। तसलीमा पर भी बेशक तरह-तरह के इलजाम लगाए जाते रहे हैं, किंतु ज्यादती के खिलाफ न दबना उसकी फितरत बन गई है।

हिंदी लेखन में ऐसी कितनी लेखिकाएं हैं, जो तसलीमा या सुष्मिता के आसपास भी खड़ी हो पाती हैं!

सुष्मिता बनर्जी का हमारे बीच न रहना, यकीनन दुखद है, मगर किसी न किसी सूरत, संघर्ष और लड़ाई के रूप में वो हमारे बीच आज भी मौजूद है। और हमेशा रहेगी। सुष्मिता का पुरुष-वर्चस्व के विरूद्ध संघर्ष यों जाया नहीं जाएगा, फिर कोई और सुष्मिता उठ खड़ी होगी, यथास्थितिवादियों से लोहा लेने के लिए।

सलाम सुष्मिता।

2 comments:

  1. बहुत अच्छा लिखा।
    सुष्मिता के बहाने ब्लॉग लिखना फ़िर से शुरु करने के लिये बधाई।
    आशा है कि ’हथौड़ा’ नियमित चलता रहेगा।

    ReplyDelete
  2. thankx

    anshumalee jee ka number email ker sakta hain
    jjitanshu@yahoo.com

    ReplyDelete