Translate

Saturday, 12 October 2013

अलविदा! भगवान

चित्र साभारः गूगल
प्यारे सचिन,
देखते ही देखते चौबीस साल हवा हो गए। तुम सोलह की उम्र में बतौर खिलाड़ी खेलने आए थे और चालीस की उम्र में बतौर भगवान विदा हो रहे हो। एक खिलाड़ी को भगवान का दर्जा पाते मैंने कम ही देखा-सुना है। लेकिन हमारे मुल्क में यह इसलिए संभव है क्योंकि व्यक्तिपूजा में हमारा घोर विश्वास है। व्यक्तिपूजा के कारण हम खिलाड़ी या अभिनेता को इस हद तक महान बना देते हैं कि उसके समक्ष सबकुछ बौना या नीरस नजर आता है।

इधर, जब से तुम्हारे संन्यास की खबर आम हुई है, हर तरफ विधवा विलाप-सा चल रहा है। हर किसी की जुबान पर आश्चर्य का सा भाव है। मायूसी में कुछ स्तब्ध हैं, तो कुछ महिमामंडन में लगे हैं। और महिमामंडन भी ऐसा कि अब कान पकने लगे हैं। सचिन ने संन्यास का ऐलान क्या कर दिया, मानो कहीं किसी पर बिजली गिर गई हो।

जरा खबरिया चैनलों को देखो। कल तलक उनकी बहस का केंद्र आसाराम के पाप थे, अब तुम्हारा संन्यास है। ऐंकर जाने कहां-कहां से खोज-खाजकर तुम पर केंद्रित वो-वो चीजें दिखा और बता रहा है, जो हम सब पहले भी देख चुके हैं। हर बड़े से बड़े नेता, अभिनेता, खिलाड़ी की राय ली जा रही है। प्राइम टाइम पर चर्चा हो रही है। मतलब, जितने मुंह, उतना महिमामंडन। सचिन के संन्यास की टीआरपी का लाभ हर चैनल लेने में लगा है।

प्यारे सचिन, ऐसा मुझे कभी याद नहीं पड़ता, जब तुमने खुद के भगवान बनाए जाने पर जरा-सा भी विरोध या रोष जतलाया हो। या तुमने कभी खुलकर कहा हो कि मैं सिर्फ खिलाड़ी हूं, भगवान नहीं। लेकिन मैं जानता हूं कि तुम भगवान के खिलाफ न जा सकते हो, न बोल सकते। क्योंकि तुम स्वयं कथित भगवान सत्य साईं के भक्त हो। अंध-आस्था के शिकार तुम भी उत्ता ही हो, जित्ता कि हर बड़ा नेता-अभिनेता-उद्योगपति होता है। फिर भला तुम्हें खुद को भगवान कहे या माने जाने पर क्यों और कैसे आपत्ति हो सकती है?

दरअसल, प्यारे सचिन, तुम क्रिकेट के खिलाड़ी से कहीं ज्यादा बाजार और विज्ञापनों के आइकन रहे हो। बाजार ने तुम्हें भुनाया है। और विज्ञापनों के जरिए तुमने उसका एहसान चुकाया है। ठीक यही स्थिति धोनी और विराट कोहली के साथ है। चाहे कभी मैदान पर तुम न चल पाए हो मगर विज्ञापनों में खूब चले हो। शायद इसीलिए बाजार नहीं चाहता कि तुम रिटायर हो।

बाजार ने ही तो तुम्हारे वास्ते भगवान का रक्षा कवच दिया है, ताकि तुम्हारे भक्त केवल तुम्हारी भक्ति में तल्लीन रहें।

कहने वाले कह रहे हैं कि यह वक्त तुम्हारी आलोचना का नहीं है। यह वक्त सिर्फ तुम्हारे भगवानत्त्व को एन्जॉय करने का है। तुम्हें ऐसी विदाई दी जाए, जैसी शायद कभी डोन ब्रेडमैन को भी न मिली हो। लेकिन प्यारे सचिन, मैं तो सवाल उठाऊंगा। आलोचना के जरिए अपनी बात भी रखूंगा। तुम भगवान हो तो क्या...।

हालांकि न मैंने कभी भगवान को देखा है न मिला हूं पर अंदाजा लगा सकता हूं कि वो भी तुमसे जलता अवश्य होगा। क्योंकि घर के मंदिरों के आलों में मूल भगवानों के साथ-साथ मैंने तुम्हारी तस्वीर को भी देखा है। खिलाड़ी के प्रति इत्ती व्यक्तिपूजा कमाल है प्यारे सचिन वाकई कमाल।

बहरहाल, क्रिकेट के मैदान से अब तुम्हारी विदाई का समय है और साथ-साथ 200वें टेस्ट में शतक लगाने की उम्मीदें भी बहुत हैं। शतक लगाना न लगाना तुम्हारे हाथ है, लेकिन नए खिलाड़ियों को केवल खिलाड़ी बने रहने का ही पाठ पढ़ाना, भगवान बनने का नहीं। क्योंकि इंसान जब भगवान का कद पा लेता है, तो बौना हो जाता है।

फिर भी मेरी कोई बात अगर तुम्हें चुभी हो तो उसे यह समझकर ध्यान में रखना कि लोकतंत्र में आलोचना करना हर किसी का अधिकार है।

अलविदा! भगवान।