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Thursday, 11 December 2014

मंगल पर कदम और कुंडली का भ्रमजाल

एक लेख में कहीं पढ़ा था- 'कुंडली की बात अगर आती भी है तो मां-बाप को इसकी फिक्र करने की क्या जरूरत है? इसे मिलाने या न मिलाने का फैसला क्यों न शादी करने वालों पर ही छोड़ दिया जाए?'

अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो यह फैसला, निश्चित ही, न केवल हमारे बल्कि समाज के लिए भी बड़ी मिसाल साबित होगा। दरअसल, कुंडली या गोत्र मिलान की चाह दो शादी करने वालों को इतनी नहीं होती, जितना उनके मां-बाप को। चाहे लव-मैरीज हो या अरेंजड कुंडली का दखल दोनों जगह रहता है। बिना कुंडली के शादी करने या करवाने को हम 'पाप' मानते हैं। लड़के-लड़की के बीच चाहे 36 गुण मिलें या 30 मगर गुण अवश्य मिलने चाहिए। गुण न मिलने पर हम लड़के-लड़की को एक-दूसर के प्रति 'अभिशाप' समझ लेते हैं। अगर मामला दोनों में से किसी के 'मंगली' होने का हो तब तो कहना ही क्या! फिर तो ऐसे-ऐसे बेसिरपैर के तर्क पेश किए जाते हैं, जिन्हें सुनकर लगता ही नहीं कि हम 21वीं सदी के बेहद आधुनिक तकनीकी युग में रह रहे हैं। या, हमने अभी हाल मंगल पर कदम रखा है।

क्या कुंडली का महत्त्व दो दिलों-रिश्तों के प्रेम से भी बढ़कर है? मंगली होने के दोष निवारण के लिए कैसे और क्या-क्या धार्मिक-अंधविश्वासी उपाय किए जाते हैं, इसे हम कुछ साल पहले अभिषेक और एश्वर्या के विवाह के दौरान देख चुके हैं। ऐसा ही कुछ अक्सर हमें सुनने-पढ़ने को भी मिलता रहता है।

क्या आपको नहीं लगता कि जैसे-जैसे हम नई सदी की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे और अधिक कूपमंडूक-अंधविश्वासी होते चले जा रहे हैं। कोई या कैसा भी वैवाहिक कार्य बिना कुंडली और बिना धार्मिक रीति-रिवाजों के संपन्न ही नहीं होता। सबसे हास्यास्पद यह है कि कोई ज्योतिषि यह नहीं कहता और न किसी कुंडली में यह लिखा होता है कि 'दहेज' का लेने-देने दोनों पक्षों के बीच नहीं होना चाहिए। जितनी जड़ परंपरा कुंडली की है, उतनी ही दहेज की भी। लेकिन बड़े-बड़े पढ़े-लिखे परिवार इस बाबत मौन साधे रहते हैं। उनका लक्ष्य केवल कुंडली मिलान होता है, दोनों के बीच प्रेम कितना रहेगा, इस पर शायद ही कोई विचार करता हो।

जिन्हें ऐसा लगता है कि विवाह के बीच प्रेम से कहीं ज्यादा मायने कुंडली रखती है तो गलत है। आपसी प्रेम और विश्वास ही विवाह का आधारस्तंभ है नाकि कुंडली। कुंडली हमारे समाज का 'यथास्थितिवादी विकार' है। यह संबंधों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा करता है। कुंडली कलचर ने सबसे ज्यादा नुकसान लड़कियों का किया है। जिस लड़की की कुंडली नहीं मिलती, उसके खिलाफ तरह-तरह के सवाल उठने लगते हैं। समाज में न जाने ऐसे कितने ही अच्छे-अच्छे रिश्ते इस कुंडलीबाजी के चक्कर में बनते-बनते टूट जाते हैं।

निरंतर तकनीकी रूप से आधुनिक होते समाज के बीच कुंडली की परंपरा 'कलंक' समान है। ऐसा आधुनिक समाज भी भला किस काम का, जिसमें आधुनिकता कपड़ों और तकनीक में तो नजर आए मगर परंपरागत रूढ़ियां बरकरार रहें। जहां प्रेम से ज्यादा जरूरी कुंडली को माना-समझा जाए। जहां सिर्फ गुणों के आधार पर रिश्ते बने और न मिलने पर तोड़ दिए जाएं।

एक तरफ हम मंगल पर जा पहुंचे हैं और दूसरी तरफ अभी भी कुंडली के 'प्रपंच' में उलझे हुए हैं। इस बात की क्या 'गारंटी' है कि कुंडली मिल जाने के बाद भी, तलाक नहीं होता? या पारिवारिक और वैचारिक मतभेद नहीं पैदा होते? केवल गुण-गोत्रों का मिलान ही विवाह की दशा-दिशा तय नहीं करता। यह प्रेम और विश्वास के आधार पर तय होती है। विवाह का भविष्य न ज्योतिषी बता सकते हैं या कोई कुंडली।

कुंडली जैसी शोशेबाजियों के खिलाफ समाज के आधुनिक और प्रगतिशील परिवारों को आगे आना होगा। समाज के भीतर ऐसी मिसाल कयाम करनी होगी, जिसमें ऐसी रूढ़ियों-धार्मिक आस्थाओं को सिरे से खारिज किया जाए। जहां विवाह के मायने कुंडली से नहीं प्रेम से तय हों।

बेशक ऐसे समाज का होना-बनना थोड़ा मुश्किल है मगर नामुंकिन नहीं। युवा पीढ़ी अपनी प्रगतिशील सोच-विचार के आधार इन रूढ़ियों से खुद अपने परिवारों को बाहर निकाल सकती है। नहीं तो हम ऐसे ही कुंडली के भ्रम में उलझ ज्योतिषियों की दुकानें मोटे दामों के दम पर चलाते-चलवाते रहेंगे।

Thursday, 16 October 2014

ऑन-लाइन शापिंग का बढ़ता बाजार

चित्र साभारः गूगल
ऑन-लाइन शापिंग का बाजार इन दिनों अपने चरम पर है। लोगों का रूझान भी दिन-प्रति-दिन ऑन-लाइन शापिंग की तरफ बढ़ता जा रहा है। खुदरा बाजार की तरह लोग अब ऑन-लाइन बाजार से भी खरीद-फरोख्त करने लगे हैं। तर्क है- कम कीमत, समय की बचत, गुणवत्ता की गारंटी, समय-समय पर आने वाले ऑफर्स का लाभ।

दरअसल, ऑल-लाइन बाजार का सारा दारोमदार 'ऑफर्स' पर टिका है। नए-नए ऑफर्स ग्राहकों को 'आकर्षित' तो कर ही रहे हैं, साथ-साथ बाजार में 'प्रतिस्पर्द्धा' के बने रहने की डिमांड भी मजबूत कर रहे हैं। जिस पोर्टल पर जितने ज्यादा ऑफर, उससे उतना ही लाभ। इन ऑफर्स पर जितना फायदा ग्राहकों को मिलता है, उसे कहीं ज्यादा इ-शापिंग पोर्टलस को भी।

अभी हाल एक बड़े ऑन-लाइन शापिंग पोर्टल फ्लिपकार्ट ने जिस तरह से द बिग बिलियन डे ऑफर निकाला, उसने न केवल अन्य इ-शापिंग पोर्टलस बल्कि खुदरा बाजार की बेचैनी को भी काफी बढ़ा दिया है।फ्लिपकार्ट ने महासेल ऑफर के तहत दस घंटे में तकरीबन छह सौ करोड़ रुपए के ऑडर पाए। साथ ही फ्लिपकार्ट से ग्राहकों की नाराजगियां भी खूब रहीं। ग्राहकों को ऑफर का जो लाभ मिलना चाहिए था, नहीं मिल सका। कहीं रेट में अंतर रहा तो कई दफा अधिक लोड के चलते वेब साइट ही क्रेश कर गई। हालांकि फ्लिपकार्ट ने ग्राहकों को इ-मेल भेजकर उन्हें हुई असुविधा के लिए माफी मांगी है, साथ ही कमाई का अच्छा रिकार्ड भी बनाया है।

एक फ्लिपकार्ट ही नहीं, इस त्योहारी-सीजन में, स्नैपडील, अमेजॉन,होमशॉप 18 जैसे तमाम ऑन-लाइन इ-शापिंग पोर्टलस ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह के ऑफर्स सजाए बैठे हैं। ग्राहक भी अपनी सुविधानुसार इन पोर्टलस से खरीददारी कर रहे हैं। जब इतनी तरह के सस्ते ऑफर्स मिलेंगे तो भला कौन खरीददारी नहीं करेगा? यों भी, हम भारतीय ग्राहक हमेशा इस तलाश में रहते हैं कि कहां, किस बाजार में क्या सस्ता मिल रहा है। तब ही तो हमारे बाजार सस्ते का ऑफर देकरगांधी जयंती, वेलेंटाइन डे, मदर्स डे, फादर्स डे या फिर दीवाली को भुनाना नहीं छोड़ते।

ऑनलाइन शापिंग पोर्टलस अब भविष्य के नहीं बल्कि वर्तमान के सफल बाजार बनकर उभर रहे हैं। खुदरा बाजार में बिकने वाला शायद ही ऐसा कोई आइटम हो जो यहां न खरीदा-बेचा जाता हो। सुई से लेकर कार तक यहां मौजूद है खरीद-बेच के लिए। ऑलेक्स पर आप कुछ भी बेच सकते हैं और बहुत आसानी से।

बाजार आज हमारे समय की जरूरत बन गया है। बाजार के बिना इंसानी जिंदगी की कल्पना असहज-सी लगती है। भले ही आप बाजार से कितनी भी असहमति क्यों न जतला लें, इससे बाजार की सेहत पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। बाजार निरंतर बहुत तेजी गति से हमारे आसपास फैलता जा रहा है। बाजार का यह फैलाव केवल बड़े शहरों तक ही नहीं छोटे शहरों और कुछ हद तक गांवों में भी असर जमाने लगा है। इंटरनेट ने न केवल इ-शापिंग मार्केट बल्कि सोशल नेटवर्किंग के सहारे भी विज्ञापन के बाजार बहुत ही क्रांतिकारी रूप से बढ़ाया है। कंपनियां अब सोशल नेटवर्किंग साइट के सहारे अपने उत्पादों का विज्ञापन कर ग्राहकों के बीच पैठ जमा रही हैं। मतलब, ग्राहक उनकी नजरों से बचकर कहीं जाना नहीं चाहिए। वे उसे अपने तरीके से लुभा ही लेती हैं। कंपनियां भी खुश और ग्राहक भी।

इ-शापिंग के मद्देनजर यह धारणा भी हमारे बीच बनने लगी है कि इससे रिटेल (खुदरा) दुकानदारों का भविष्य चौपट हो जाएगा। जब सब कुछ ऑन-लाइन स्टोर्स पर ही बिकने या खरीदा जाने लगगे तो खुदरा दुकानदारों के पास कौन आएगा? इस धारण में भावनात्मक भाव ही अधिक है, सच्चाई बेहद कम। साफ सीधी-सी बात है, बाजार में वही टिका रह सकता है, जिसके पास क्वालिटी हो। अपने प्रॉडेक्ट को बेचने का तरीका आते हो। आज के जमाने का ग्राहक बहुत होशियार है। वो किसी भी चीज को- चाहे ऑनलाइन या रिटेल- काफी ठोक-बजाने के बाद ही खरीदता-बेचता है। ऐसे में जिसके पास क्वालिटी होगी वो ही जम पाएगा और जो हेरा-फेरा करेगा खारिज कर दिया जाएगा।

एक दुकान के खुलने से दूसरी दुकान बंद नहीं होती। दुकानें सबकी चलती हैं। यह बात अलग है कि कम या ज्यादा। बाजार ने हमें दुकानें चलाने के वो-वो मस्त फंडे बतला दिए हैं कि सबकुछ खरीदा-बेचा जा सकता है। आज की तारीख में हाशिए पर केवल वही है, जो बाजार की परिभाषा को नहीं समझ पा रहा। या अपने आदर्शवाद के चलते बाजार को पानी पी-पीकर कोस रहा है। न किसी के कोसने न ठुकराने से बाजार की सेहत पर कोई असर होने वाला नहीं। बाजार हमारे बीच अपनी जड़ों को मजबूत कर चुका है। अच्छा है न, बाजार के सहारे हम कम से कम खरीदना-बेचना और सस्ते ऑफर का लाभ तो उठा रहे हैं। बेफालतू के आदर्शवाद में अगर हिलगे रहेंगे तो ज्यादा देर नहीं लगेगी हाशिए पर जाने में।

ऑन-लाइन बाजार अब हमारे समय की हकीकत बन चुका है। इसे स्वीकारें। और यहां आने वाले महा-ऑफर्स का लाभ उठाएं। इसी में मजा है। हां, 'नक्कालों' से जरूर सावधान रहें।

Sunday, 5 October 2014

व्यंग्य और आज का समय

चित्र साभारः गूगल
व्यंग्य का जिक्र चले और हरिशंकर परसाई पर बात न हो, ऐसा संभव नहीं। व्यंग्य ने हरिशंकर परसाई से बहुत कुछ सीखा, जाना और समझा है। व्यंग्य में विचार, प्रगतिशीलता और गंभीरता का पुट हरिशंकर परसाई की ही देन है। दरअसल, व्यंग्य को हम निहायत 'कोरी विधा' मानते हैं। हम मानते हैं कि व्यंग्य केवल 'हंसी का फुव्वारा' भर है। व्यंग्य का एकमात्र उद्देश्य हंसना-हंसाना-खिलखिलाना ही है। लेकिन ऐसा नहीं है। व्यंग्य 'कटाक्ष' का 'आईना' है। व्यंग्य में कटाक्ष विचार, प्रगतिशीलता और गंभीरता के साथ पैदा होता है। बल्कि इसका प्रयोग हरिशंकर परसाई और किट्टू जैसे बड़े व्यंग्यकारों ने बखूबी किया है। व्यंग्य महज हा-हा, ही-ही, हू-हू सरीखा मंचीय हास्य-कवि सम्मेलन नहीं है।

साहित्य की तमाम विधाओं में से एक व्यंग्य भी है। मगर साहित्यकार व्यंग्य पर न के बराबर बात करते हैं। वे या तो आलोचना के उतार-चढ़ाव पर छाती कूटते रहते हैं या फिर कविता-कहानी के 'ऐसा होना चाहिए और ऐसा नहीं होना चाहिए' पर दादागिरी झाड़ते रहते हैं। हैरानी तब होती है, जब हरिशंकर परसाई और उनकी व्यंग्य-विधा को पसंद करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार भी परसाई या व्यंग्य पर तब ही बात करते हैं, जब कोई ऐसा 'अवसर' हो। बिना 'अवसर' न साहित्य न राजनीति न समाज में कोई किसी को 'याद' नहीं करना चाहता है। इसीलिए 'अवसरवाद' आज हमारे समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है। 'अवसर' के लिए तो इंसान 'गधे को भी बाप' बनाने से नहीं चूकता।

मगर किसी के याद करने या न करने से न फर्क परसाई के लेखकीय महत्त्व को पड़ता है न व्यंग्य-विधा को। परसाई अपना काम कर गए और व्यंग्य निरंतर अपने काम करने में लगा है। व्यंग्य न कभी किसी के रोके रुका है न किसी के टोके ठहरा। व्यंग्य ने अपनी बुनियाद अपने व्यंग्य-लेखकों के दम पर मजबूत की है नाकि किसी अलां-फलां आलोचक-समीक्षक के रहमो-करम पर।

मुझे व्यंग्य एक ऐसी सशक्त विधा नजर आती है, जिसमें आप किसी बात का रोना (साहित्य की अन्य विधाओं की तरह) नहीं रोते। रोने पर भी आप इतना मस्त होकर लिखते हैं कि सामने वाला निश्चित मुस्कुरा जाए। वातावरण को हल्का और हंस-मुख बनाए रखना- अपने कटाक्ष के साथ- ही तो व्यंग्य और व्यंग्यकार का उद्देश्य है। फिर भी अगर आप व्यंग्य में रोने के स्वभाव को बनाए रखना चाहते हैं तो बनाए रहिए, आपकी मर्जी। हां, आलोचना आदि में जरूर आपको कोई पूछ ले।

व्यंग्य की अहम खासियत यह है कि व्यंग्य कभी ठहरता नहीं। व्यंग्य लगातार बेखटक चलता और आगे बढ़ता रहता है। नए-नए लोग, नए पाठक, नए व्यंग्यकार, नए शब्द, नए संदर्भ जुड़ते जाते हैं और व्यंग्य अपनी धार पर सवार रास्ता तय करता रहता है। व्यंग्य को अगर आप ठहरा देंगे या पुराने समय में बार-बार लौटने को कहेंगे तो यह- मेरे विचार में- व्यंग्य के साथ सबसे बड़ा 'अन्याय' होगा। व्यंग्य से आप बीते वक्त की टोह तो ले सकते हैं किंतु पीछे लौटने को नहीं कह सकते।

बेशक परसाई हमारे समय के एक महान व्यंग्यकार थे और हमेशा ही रहेंगे। किंतु परसाई को ही व्यंग्य का आदि-अंत मान लेना भी उचित नहीं। यह तो परसाई का सरासर 'महिमामंडन' हो जाएगा। जिस महिमामंडन के खिलाफ परसाई ने इतना कुछ लिखा-कहा है। यों भी, परसाई को किसी से अपने महिमामंडन की जरूरत नहीं। परसाई को- चाहे व्यंग्य के क्षेत्र का हो या न हो- हर कोई जानता है। बहुत संभव है, हर किसी ने परसाई को पढ़ा भी हो। (ज्यादा या कम; यह अलग बात है)। लेकिन यह कह देना कि 'परसाई को वे लोग सबसे कम जानते हैं, जो धड़ाधड़ व्यंग्य लिख रहे हैं', मैं इसे नहीं मानता। हर लेखक के पास इतना 'कॉमनसेंसे' जरूर होता है कि वो अपने या बीते समय के लेखक को जाने-पहचाने और पढ़े। हां, अपवाद हर कहीं हो सकते हैं। लेकिन साहित्य या लेखन की गाड़ी केवल अपवादों से नहीं चलती।

हमें यह मानना पड़ेगा कि व्यंग्य लेखन अब परसाई, शरद जोशी, किट्टू के समय से बहुत आगे निकल चुका है। तब के व्यंग्यकारों ने अपने समय को अपने हिसाब से पेश किया और आज का व्यंग्यकार अपने हिसाब से कर रहा है। तब के समय को अब के समय से जोड़ना या मीनमेख निकालना, बेवकूफी ही कहलाएगी। समय न किसी की कलम के साथ रुका है न रुकेगा। समय का काम लगातार चलते रहने है। यही काम लेखक का भी होना चाहिए। जो बीत गया सो बीत गया। हम वर्तमान में जी रहे हैं तो फिर क्यों न आज की बात करें। मंजिलें आगे देखने-बढ़ने से ही मिला करती हैं, पीछे देखने से नहीं।

यह बात सही है कि अब व्यंग्य में जोखिम लेने का चलन लगभग खत्म सा हो गया है। (परसाई ने तो अपने व्यंग्य लेखन में न जाने कितने ही जोखिम लिए, ठीक मुक्तिबोध की तरह)। न केवल अपने मित्रों बल्कि आलोचकों की भी खूब खरी-खोटी सुनी। मगर अपने लेखन की धार को बरकरार रखा। हां, उनके लेखन से सहमति या असहमति हो सकती है परंतु उनके लेखन को हम 'अनदेखा' कतई नहीं कर सकते। करना चाहिए भी नहीं।

अब व्यंग्य तो क्या लेख (राजनीतिक या साहित्यिक) में भी 'जोखिम' लेने का साहस खत्म-सा हो गया है। स्पष्ट कहूं, अखबार-पत्र-पत्रिकाएं (अपवादों को छोड़कर) भी जोखिम लेने से बचती हैं। जहां व्यंग्य की धार थोड़ी तेज होती दिखी नहीं कि तुरंत अपनी संपादकीय समझदारी (?) दिखा दी। कभी-कभी व्यंग्य पर इस कदर जोर-आजमाइश की जाती है कि पता नहीं लग पाता, चेहरा किसका है, वाजू किसका।

भले ही अखबार या पत्रिकाएं तेज-तर्रार व्यंग्य छापने से बच रही हों पर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर व्यंग्य खूब खुलकर लिखा जा रहा है। खासकर, वन-लाइन ने तो व्यंग्य की दशा-दिशा ही बदलकर रख दी है। कम शब्दों और वाक्यों का व्यंग्य कहीं ज्यादा मारक साबित हो रहा है आज। टि्वटर पर मात्र 140 शब्दों का व्यंग्य पढ़ने का मजा ही कुछ और है।

नई पीढ़ी के व्यंग्यकार अपने नए तरीकों के साथ व्यंग्य कह और लिख रहे हैं। न केवल अपने समय बल्कि खुद से भी मुठभेड़ कर रहे हैं। व्यंग्य अपनी पारंपरिक भाषा से काफी हद तक बाहर निकल आया है। भारी शब्दों और कहन का बोझ घटा है। आज के व्यंग्य में 'ग्लैमर' भी है 'नॉटिनेस' भी है और 'चेंज' भी। आज के समय में व्यंग्य को आप कोरे विचार या साहित्यिक कलेवर के हिसाब से नहीं चला सकते। आज के समय का व्यंग्य युवा (यूथ) को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है। यही वजह है कि आज के व्यंग्य में 'हिंग्लिश' का पुट अधिक नजर आता है। जोकि जरा बुरा भी नहीं है। चाहकर भी परसाई या जोशी की भाषा में अब व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता। व्यंग्य उस दौर और पीढ़ी से बहुत आगे निकल गया है।

तो, क्यों न आज के समय के व्यंग्य-लेखन को सहर्ष स्वीकार किया जाए। परसाई या जोशी की पीढ़ी ने अपने समय में श्रेष्ठ व्यंग्य लिखे- इसमें दोराय नहीं- अब जो नए लोग लिख रहे हैं, उसे भी स्वीकार कीजिए न। समय के साथ शब्द-परिवेश-भाव-विचार सब बदलता है तो फिर लेखक या लेखन क्यों न बदले? आज का समय बाजार का है। अगर बाजार की मांग के मुताबिक व्यंग्य लिखा जा रहा है और कमाई का जरिया बना हुआ है तो क्या हर्ज है? कमाना कौन नहीं चाहता यहां।

बहरहाल, मेरा हरिशंकर परसाई और उस पीढ़ी के तमाम बड़े व्यंग्यकारों के प्रति पूर्ण आदर है। साथ-साथ, नए युवा व्यंग्यकारों के प्रति उतना ही प्रेम भी। पुरानी पीढ़ी अपनी वरिष्ठता के साथ अपनी जगह रहे। और अगर कर सकती है तो नए युवा लेखकों का उत्साह बढ़ाए।

बदलते वक्त और जमाने को जिसने अपना लिया यहां वही बचा रह पाएगा। वरना, बजाते रहिए अपनी ढपली आप और सुनाते रहिए अपना राग आप। यह दुनिया और समय अपनी गति यों ही तेजी से चलते रहेंगे।

Friday, 26 September 2014

मंगल और विज्ञान

चित्र साभारः गूगल
यह कोई नई बात नहीं है, इससे पहले भी तरह-तरह के बेतुके तर्क दे-देकर विज्ञान को खारिज करने की तमाम कोशिशें होती रही हैं। विज्ञान को धर्म और पौराणिक स्थापनाओं के सहारे 'बौना' बनाया जाता रहा है। हर वैज्ञानिक खोज या उपलब्धि को किसी न किसी 'बेढ़ंगे तर्क' के आधार पर ज्योतिष या देवी-देवता से जोड़ दिया जाता रहा है। जबकि विज्ञान इन सब 'यथास्थितिवादी स्थापनाओं' और तर्कें से बिल्कुल परे है। विज्ञान के अपने तर्क हैं। जिनका सिर्फ वैज्ञानिक आधार है, धार्मिक नहीं।

इधर, लगातार देख-पढ़ रहा हूं मंगल अभियान की सफलता के बहाने तमाम प्रकार के धार्मिक और देवी-देवता तुल्य तर्क प्रस्तुत किए जा रहे हैं। ऐसा मनवाने के प्रयास हो रहे हैं कि मंगल अभियान की सफलता का आधार वैज्ञानिक कम धार्मिक या पौराणिक ज्यादा है। ज्योतिषियों के अपने तर्क हैं और धर्म-रक्षकों के अपने। हर कोई (सरकार और नेता सहित) इस फिराक में हैं कि मंगल अभियान की सफलता का श्रेय खुद ले ले। ताज्जुब है कि इस नितांत वैज्ञानिक सफलता पर भी हमारे यहां राजनीति हावी है।

लेकिन यह मंगल-जीत किसी धर्म, देवी-देवता, ज्योतिष-पुराण आदि की नहीं, सिर्फ और सिर्फ इसरो के वैज्ञानिकों की मेहनत का सफल नतीजा है। इस कामयाबी का पूरा श्रेय इसरो के तमाम वैज्ञानिकों को ही जाता है। इतने कम बजट में इतनी बड़ी जीत, सोचकर भी अकल्पनीय जैसा लगता है। लेकिन यह संभव हुआ है। और हमारे होनहार वैज्ञानिकों ने इसे कर दिखाया है। साफ शब्दों में कहूं, विज्ञान एक बार फिर से सफल रहा है, अपने अस्तित्व को पूरी दुनिया के समक्ष बनाए रखने में।

मंगल पर जीवन, खनिज आदि की खोज बहुत सारे रहस्यों और संभावनाओं को हमारे सामने ला पाएगी। और यह केवल वैज्ञानिक आधार पर ही संभव हो सकता है। किसी धार्मिक आयोजन करने या देवी-देवता के यान को मंगल पर भेजकर न वहां जीवन का पता चल सकता है न ग्रह से संबंधित रहस्यों का। हां, ज्योतिषिय आधार पर (मंगल-शनि-बृहस्पति आदि) जो भी तर्क या बातें हमारे सामने आ रही हैं, उनका आस्थागत या धार्मिक आधार चाहे जो हो किंतु विज्ञान के तर्कें से यह कोसों दूर हैं। आस्था आप किसी भी चीज में जतला सकते हैं मगर उसके पक्ष में ठोस वैज्ञानिक तर्क नहीं प्रस्तुत कर सकते। क्योंकि होते ही नहीं हैं।

21वीं सदी में हमारे समाज का और भी अधिक धार्मिक होते जाना साफ बताता है कि हम कहीं न कहीं अपने आप को असुरक्षित-सा महसूस करते हैं। इसीलिए अ-वैज्ञानिक किस्म के पाखंडों पर निरंतर विश्वास करते रहते हैं। पढ़े-लिखे समाज को जब भी धर्म या ईश्वरों की शरण में नतमस्तक होते देखता हूं, मानने का मन ही नहीं करता कि ये सब पढ़े-लिखे हैं। यही वजह है कि हमारे यहां बाबाओं और अंधविश्वास का बाजार लगातार फल-फूल रहा है।

बहरहाल, इसरो, मंगलयान और वैज्ञानिकों की सफलता का अवश्य स्वागत कीजिए मगर इसको धार्मिक तर्क-वितर्क से न जोड़िए। विज्ञान को विज्ञान की बने रहने दीजिए। धार्मिक आस्थाओं का घालमेल विज्ञान-सम्मत खोजों में न कीजिए।

Thursday, 7 August 2014

बचपन और चाचा चौधरी का साथ

चित्र साभारः गूगल
बचपन इंसान की जिंदगी का सबसे 'खूबसूरत समय' होता है। एक तरह से जिंदगी की शुरूआत ही बचपन से होती है। थोड़ा-बहुत पढ़ने-लिखने का सिलसिला भी यहीं से शुरू होता है। बचपन की ऐसी कुछ शुरूआत, एक मेरी ही नहीं, हर किसी की रही है। बचपन के साथ गुजारी कुछ बातें, गाहे-बगाहे, याद आ ही जाती हैं। इस बहाने एक बार फिर से मन 'बचपन की स्मृतियों' में खो सा जाता है। यों भी, हमें हमारे बचपन को कभी भूलना नहीं चाहिए। याद करते रहना चाहिए ताकि बड़प्पन 'बोझ' न लगे।

यह कहना मुश्किल है कि बचपन का हर किस्सा, हर हिस्सा मुझे अब याद है। हां, कुछ याद है और कुछ काल के गाल में समा चुका है। लेकिन जो स्मृतियों में जिंदा है, उसे ही अक्सर याद कर लिया करता हूं। बहुत 'सुकून' मिलता है।

यह बचपन का वो दौर था जब हल्का-हल्का पढ़ना-लिखना शुरू ही किया था। तब स्कूल में पढ़ाई ऐसी नहीं हुआ करती थी, जैसी कि आज है। काफी कुछ 'बेफिक्री' रहती थी पढ़ाई और स्कूल के प्रति। मन करता था पढ़ लेते थे, नहीं करता था या तो पतंग उड़ाते, गिल्ली-डंडा खेलते या फिर प्राण चचा की कॉमिक्स के संग-साथ समय काटते। तब एक दफा स्कूल की किताबें भले ही न मिलें, इतनी चिंता नहीं रहती थी, पर हां चाचा चौधरी को पढ़े बिना- अपनी पढ़ाई जरूर अधूरी लगती थी।

वो गर्मियों की दोपहर और चाचा चौधरी के साथ-साथ लोटपोट समां बांधे रहते थे। एक कॉमिक्स के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथी, मतलब क्रेज खत्म ही नहीं होता था- कॉमिक्स-दर-कॉमिक्स पढ़ते रहने का। और, चाचा चौधरी और साबू के प्रति इतना लगाव था कि कभी-कभी खुद में दोनों को ही महसूस कर लिया करता था। "चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है", तब कंप्यूटर का जिक्र दिल में इतना उतावलानापन पैदा करता कि बार-बार यही प्रश्न उठता कि आखिर यह कंप्यूटर क्या बला है? और हमें कहीं दिखाई क्यों नहीं देता? हां, एक बहुत हल्की-सी प्रतिछाया कंप्यूटर की (टीवी की तरह) दिमाग में स्थापित हुई थी। तब शायद कहीं सुनने को मिला गया हो, कंप्यूटर के बारे में।

लेकिन चाचा चौधरी के कॉमिक्स पढ़ने की दीवानगी दिलो-दिमाग पर हर समय तारी रहती थी। यहां तक कि कभी-कभार चाचा चौधरी को हम क्लास में (चुपके से) भी पढ़ लिया करते थे। गाहे-बगाहे चाचा चौधरी के तमाम चरित्रों को आपस में ही जीते थे। कोई साबू हो जाता, कोई रमन, कोई राका, कोई पिंकी, कोई श्रीमतीजी...।

चाचा चौधरी को पढ़ने की जो बेकरारी मन में निरंतर बनी रहती थी- वो तो थी ही- पर उससे ज्यादा रहती थी किराए पर लाकर पढ़ने की। साथ-साथ यह प्रतिस्पर्धा भी कि कौन कितने कॉमिक्स दिन भर में पढ़ लेता है? कौन दुकानदार किससे कितना किराया वसूलता है? जब जेब में पैसे नहीं होते थे तब चाचा चौधरी को दोस्तों से उधार मांगकर पढ़ा करता था। या कभी जब पैसे ज्यादा हुए तो खरीद लिया। मगर किराए पर लाकर और उधार मांगकर पढ़ने का लुत्फ ही कुछ और था।

हां, बचपन से बड़प्पन में आते-आते शौक और मनोरंजन के तरीके अवश्य बदले किंतु चाचा चौधरी और लोटपोट का क्रेज फिर भी बना रहा। चूंकि बड़प्पन बड़ी अजीब चीज होती है सो चाचा चौधरी के बीच अन्य (दूसरी) किताबों के ग्लैमर ने भी जगह बनानी शुरू कर दी। फिर पता नहीं कब मैं चाचा चौधरी के दौर से गुजरते-गुजरते फैंटसी और प्लेबॉय के दौर में चला गया। फिर कुछ जिम्मेवारी बड़े क्लास में होने की भी साथ-साथ चलती रही। हां, इन सबके बीच से निकलकर जब भी समय मिलता तो चाचा चौधरी, लोटपोट, चंपक को जरूर पढ़ता था। लगता था, दिलो-दिमाग फिर से बचपन की मस्तियों में जा रमा है। वही और उतना ही आनंद आ रहा है।

खैर, समय तो समय होता है। उसे न पकड़ा जा सकता है न बांधा। बचपन का दौर बीता और हम बड़े हो लिए (शायद कुछ ज्यादा ही)। सोचो तो अभी भी यही लगता है कि हम बड़े क्यों हुए? क्यों बच्चे बनकर बचपन में ही नहीं रह पाए? चाचा चौधरी और साबू के साथ अपनी जिंदगी के खुशनुमा लम्हों को और क्यों नहीं जी-गुजार पाए? फिर लगता है, जो समय हमने अपने बचपन में जी लिया वो शायद सबसे यादगार था और हमेशा ही रहेगा। ऐसा हर किसी के जीवन में होता आया है।

हां, प्राण चचा के जाने की खबर सुनकर दिल उदास जरूर हुआ किंतु मायूस नहीं। मायूस होता भी क्यों... क्योंकि प्राण चचा के चाचा चौधरी सरीखे चरित्र जो हमेशा हमारे साथ रहेंगे। अपने कार्टूनों में प्राण चचा ने हमको जो जीवंत जीवन और खूबसूरत बचपन दिया उसे कभी भूलाया नहीं जा सकता। सच में, वो हमारे समय और आज के दौर के सबसे बड़े 'हीरो' हैं, और हमेशा रहेंगे।

अलविदा प्राण चचा

Saturday, 19 July 2014

हिंदी भाषा पर बहस के बरक्स

चित्र साभारः गूगल
हिंदी भाषा पर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। लेकिन इस दफा की बहस साहित्यिक कम राजनीतिक ज्यादा है। राजनीतिक हलकों में हिंदी को एक भाषा के तौर पर नहीं बल्कि अपनी-अपनी राजनैतिक गोटियां फिट करने के नजरिए से ही देखा जा रहा है। कहा जा रहा है- चूंकि प्रधानमंत्री हिंदी-प्रेमी हैं इसीलिए हिंदी को सरकारी कामों के साथ-साथ बोलचाल व पठन-पाठन में भी खूब महत्त्व दिया जाए। अपने संसदीय संबोधन से लेकर भूटान यात्रा तक में हिंदी का ही प्रयोग किया। यह अच्छी पहल के साथ-साथ बात भी है। हमारा अपनी भाषा से न केवल साहित्यिक बल्कि राजनीतिक जुड़ाव भी बेहद जरूर है। जबकि पिछली सरकारों और मंत्रियों का ज्यादातर लगाव अंगरेजी के प्रति काफी नजदीकी रहा है।

लेकिन हिंदी को लेकर इस वक्त जो बहस चल रही है, वो बेहद खराब रास्ते पर है। हिंदी को लागू करने का फरमान एक तरह से तानाशाही जैसा लग रहा है। हिंदी पर अंगरेजी का खतरा बताते हुए, अंगरेजी भाषा से दूरी बरतने को कह जा रहा है। यह सही नहीं है। क्योंकि समाज, साहित्य और राजनीति में जितना महत्त्व हिंदी का है, उत्ता ही अंगरेजी का भी। आप किसी भाषा को दोयम बताते हुए, न उसे खारिज कर सकते हैं, न उसके प्रति पूर्वाग्रह पाल सकते। यह ठीक है कि हमारे देश का एक बड़ा तबका हिंदी लिखता-बोलता-पढ़ता है पर साथ-साथ अंगरेजी बोलने-लिखने-पढ़ने वाले भी कम नहीं। जिसको जिस भाषा में अपनी अभिव्यक्ति सहज-सरल लगती है, वो उसमें बोलेगा भी और लिखे-पढ़ेगा भी।

भाषा की अपनी स्वतंत्रता होती है। उसे न किन्हीं दायरों में बांधा जा सकता है न ही किसी व्यक्ति तक महदूद किया जा सकता।

मुझको तो अक्सर यह सुनना-पढ़ना ही बड़ा अजीब-सा लगता है कि हिंदी भाषा हमारी मां है। और अंगरेजी भाषा सौतन। हिंदी को मां मान लेने से क्या हम भाषा के प्रति पूर्णता निष्ठावान हो जाते हैं। या फिर अंगरेजी को सौतन कह लेने से उसे असर को कम कर देते हैं। नहीं.. नहीं.. ऐसा कुछ नहीं होता। जो लोग भी ऐसा कहते हैं, वो, दरअसल, भाषाओं के भ्रम में ही जी रहे होते हैं।

भाषा को भाषा ही बने रहने दीजिए। भाषा को भी अगर आस्थागत प्रतीकों में ढाल दिया जाएगा तो फिर भगवान और भाषा के बीच फर्क ही क्या रह जाएगा?

हिंदी भाषा के बहाने आज जिस तरह की राजनीति कवायदें चल रही हैं, उनका सीधा-सा मकसद भाषा को दूसरे पर थोपने जैसा है। हिंदी में कार्य-व्यवहार अच्छी बात है किंतु तानाशाह बनकर नहीं। दक्षिण की तरफ से विरोध के स्वर उठ ही चुके हैं। ये पहले भी उठते रहे हैं। वे अपनी भाषा के बीच दूसरी किसी भाषा को आने नहीं देना चाहते। खासकर हिंदी को वहां काफी हेय दृष्टि से देखा जाता है। ठीक है, आप हिंदी को नहीं अपना सकते परंतु उसके प्रति घृणा का नजरिया तो मत रखिए। कम से कम उन्हें तो हिंदी बोलने ही दीजिए, जिनका वहां इसके प्रति रूझान है। आप अपनी भाषा के साथ खुश रहिए, हम हमारी भाषा के साथ खुश रहने दीजिए। फिर कैसा झगड़ा और कैसा विवाद।

जब हिंदी भाषा पर बात और बहस चल ही रही है, यहां यह साफ कर देना भी जरूरी होगा कि हिंदी को न कोई खतरा अंगरेजी से है न बाजार से। हिंदी अपने दम पर अंगरेजी और बाजार दोनों से लोहा लेने का हौसला रखती है। जबकि सच तो यह है कि अंगरेजी ने अपनी हालत पतली होता देख, हिंदी से हाथ मिलाया है। अंगरेजी- चाहे व्यवहार, चाहे बोलचाल, चाहे शिक्षा, चाहे साहित्य, चाहे राजनीति- किसी भी क्षेत्र में बिना हिंदी का सहारा लिए नहीं चल-बढ़ सकती। लगभग यही स्थिति बाजार की भी है। बाजार के लिए हिंदी जरूरी है। और विज्ञापन का बाजार बिना हिंदी चल ही नहीं सकता। अंगरेजी और बाजार के बीच हिंदी अपनी शानदार-जानदार उपस्थिति दर्ज करवाए हुए है।

हिंदी निरंतर बढ़ रही है। फिर भी जिन्हें हिंदी के सिकुड़ने या बाजार की आंधी में उड़ जाने का दुख है, वे पहले खुद अपने गिरेबान में झांककर देखें कि उन्होंने अब तक हिंदी के लिए क्या खास किया है। बेवजह हिंदी को लेकर यहां-वहां दुखड़ा रोते रहने वाले ही, दरअसल, इसके सबसे बड़े दुश्मन हैं। जैसे- बात-बेबात धर्म खतरे में आ जाता है, वैसे ही हिंदी को भी समझते हैं।

हिंदी हर प्रकार के खतरे से परे एक मस्त जिंदगी जी रही है। हालांकि उसे नई सरकार से उम्मीदें बहुत हैं पर तानाशाही के बल पर नहीं। आप भाषा को साथ लेकर चलने को तो कह सकते हैं मगर थोपने को नहीं।

तो कृपया हिंदी को थोपिए नहीं। हां उस पर बहस या बात अवश्य कर सकते हैं।

Friday, 4 July 2014

दीपिका, तुम वाकई सेक्सी हो

चित्र साभारः गूगल
वाह दीपिका, तुमने कमाल कर दिया। दुनिया की सबसे सेक्सी महिला होने का खिताब पाकर तुमने सेक्सी की परिभाषा ही बदलकर रख दी। जिस सेक्सी शब्द पर अब तक महिलाएं अगल-बगल झांकने को विवश हो जाती थीं, उनमें तुमने नए 'साहस' का संचार किया है। तुमने खुद स्वीकारा भी है कि मुझे सेक्सी शब्द पर एतराज नहीं बल्कि गर्व है। सेक्सी होने का नजरिया केवल शारीरिक सुंदरता नहीं बल्कि दिमागी प्रखरता भी है। जिसे अंगरेजी में सेंस ऑफ ह्यूमर कहा जाता है।

आज के इतने खुले जमाने में सेक्स या सेक्सी शब्द अब शर्माने या घबराने के प्रयाय नहीं रह गए हैं। बहुत तेजी से हमारा समाज इन शब्दों को स्वीकार करने के साथ-साथ अपने भीतर जगह भी दे रहा है। लेकिन ऐसा वही समाज और लोग कर पा रहे हैं, जो वाकई दिमागी और मानसिक तौर पर खुले व्यवहार के आदी हैं। जिन्हें न स्थापित परंपराओं में विश्वास है, न यथास्थितिवाद के ढकोसलों पर यकीन। जिनके लिए स्त्री की स्वतंत्रता उसके सामाजिक-पारिवारिक संघर्ष के साथ-साथ देह की आजादी पर भी साफ रहती है। जो स्त्री को केवल दायरों में सीमित करके नहीं बल्कि व्यापक परिपेक्ष्य में देखना चाहते हैं।

स्त्री के सेक्सी होने में कोई बुराई नहीं। सेक्सी होना स्त्री का हक है। जिस तरह पुरुष खुद को 'हैंडसम' कहलवा कर खुश हो सकता है फिर स्त्री 'सेक्सी' क्यों नहीं? सेक्सी के मायने केवल शरीर नहीं बल्कि दिमाग और मन के भीतर की सुंदरता भी है। हम दरअसल यह स्वीकार करने में घबराते हैं कि स्त्री केवल शरीर से सेक्सी हो सकती है दिमाग से नहीं। ले-देकर स्त्री का शरीर ही सेक्स और सेक्सी का प्रयाय बना दिया जाता है।

लेकिन मैं इस स्थापना को नहीं मानता। स्त्री जितना शरीर से सेक्सी हो सकती है उतना ही अपने विचार, दिमाग और व्यवहार में भी। यह हकीकत है कि सौंदर्य प्रतियोगिताओं में केवल स्त्री की फिगर को नहीं, साथ-साथ उसके दिमाग एवं संप्रेषण की क्षमता को भी देखा-परखा जाता है। कई और भी आयाम होते हैं, जिनके आधार पर स्त्री को विश्व की सुंदरतम महिला का खिताब दिया जाता है।

यह सच है दीपिका, तुम्हारे फिगर में वो जादू है, जिसमें सेक्सी होने का प्रत्येक गुण मौजूद है। यों तो, हर स्त्री के भीतर सेक्सी छवि होती है किंतु कुछ ही ऐसी होती हैं, जिनका लुक वाकई सेक्सी ही होता है। दुर्भाग्य से, हमारे यहां स्त्री के सेक्सी होनी की उम्र-सी निर्धारित कर दी गई है। अमूमन देखा-सुना-पढ़ा यही गया है कि शादी होते ही स्त्री की सेक्सी छवि समाज के साथ उसके परिवार एवं पति को भी बूढ़ी लगने लगती है। फिल्मी दुनिया में ऐसी तमाम अदाकराएं हैं, जिनकी शादी के बाद उनका 'सेक्सी लुक' दुनिया और समाज की निगाह में ध्वस्त होता चला गया। हालांकि उन्होंने कोशिश बहुत की फिर से अपने सेक्सी लुक में आने की, लेकिन हम ही उन्हें स्वीकार नहीं कर पाए। कारण साफ है, हमारी नजरें हर वक्त जवान फिगर देखते रहने की आदी जो हो गई हैं। सेक्सी के मामले में हम कमर से ऊपर की स्त्री को ही देखना पसंद करते हैं।

बावजूद इसके नई पीढ़ी की लड़कियां सेक्स और सेक्सी होने के दकियानूसी मिथकों को अगर तोड़ रही हैं, तो उनका स्वागत अवश्य ही किया जाना चाहिए। बहुत मायनों में सनी लियोनी ने सेक्सी या हॉट होने के स्थापित मिथकों को तोड़ कर रख दिया है। यही वजह है कि कुछ स्थापित बड़ी हीरोइनों में सनी के खुलेपन को लेकर खदबदाहट सी पैदा होने लगी है। 21वीं सदी की दुहाई देने वाले हम अब भी सनी लियोनी के सेक्सी खुलापन को स्वीकार कर पाने में हिचकिचाहट सी महसूस करते हैं। जबकि उसके लिए यह सब आम बात है।

बहरहाल, दीपिका तुमने दुनिया की सेक्सी महिला बनकर बने-बनाए दायरों को तोड़ा है, तुम्हें दिल से बधाई। तुम्हारे बहाने, सेक्सी होना स्त्री के लिए 'गंदी बात' का नहीं, बल्कि 'गर्व का प्रतीक' बना है। स्त्री का यह गर्व बरकरार रहे।

Monday, 30 June 2014

असहमति की गुंजाइश

चित्र साभारः गूगल
अजीब-सी बात हैय न समाज न साहित्य में आप किसी से असहमत नहीं हो सकते। असहमत होने का मतलब है हुक्का-पानी बंद। असहमति को इतनी बुरी निगाह से देखा जाने लगा है कि संवाद की हर गुंजाइश खत्म-सी होती जा रही है। समाज और साहित्य के लोगों से सहमत होकर बस उनकी तारीफों के पुल बांधते रहिए तब तो ठीक है, लेकिन उनके खिलाफ जरा-भी असहमति को प्रकट मत होने दीजिए क्योंकि कब, कौन, कहां, किस बात का बुरा मान जाए। बुरा मानने को लोग अब अपना 'चरित्र हनन' जैसा समझने लगे हैं।

भला यह कैसे संभव है कि इतने विशाल समाज और वैचारिक साहित्य के बीच कहीं कोई असहमति का स्वर न उठे। समाज में हर तरह के लोग मौजूद हैं। सबकी अपनी अलग-अलग विचारधाराएं हैं। इनमें से कुछ का स्वभाव सहमति का रहता है तो कुछ का असहमति का। सहमति को सुनना-समझना-जानना उतना ही जरूर है, जितना कि असहमति को। समाज के लोगों के बीच जब तक असहमति को सुनने का धैर्य नहीं होगा, समाजिकता भला कैसे बची रहेगी। कैसे हम यह यकीन कर पाएंगे कि केवल समाने वाला ही सही है बाकी सब गलत। गलत को गलत साबित करने के लिए असहमति का होना जरूरी है।

साहित्य को हम विचार की दुनिया कहते-मानते आए हैं। साहित्य में विचार की प्रसांगिकता टिकी ही सहमति और असहमति के बल पर है। अब अगर साहित्य में भी असहमति को गैर-वाजिब समझा जाएगा तो फिर संवाद की तो संभावना ही समाप्त हो जाएगी। साहित्य विचार के साथ-साथ सहमति-असहमति की भी समान छूट देता है। सहमति-असहमति को साधने में संवाद महत्तवपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन जिस तरह से साहित्यिक लोगों के मध्य संवाद का रिश्ता सीमित होता जा रहा है, यह बेहद दुखद है। सहमति के साहित्य को तो सब अपनना चाहते हैं परंतु असहमति के साहित्य को कोई अपनाना नहीं चाहता। साहित्य और विचार पर असहमति प्रकट करने वालों से संबंध यों खत्म कर लिए जाते हैं मानो हम आपके हैं कौन!

आखिर यह कैसे संभव है कि साहित्य में जो कुछ भी लिखा या कहा जा रहा है सब ठीक ही है। सब पर सहमति बनाकर ही चलना चाहिए। अगर सब ठीक है तो फिर संवाद की जगह और असहमति की गुंजाइश ही कहां बचती है। फिर तो सहमति और बे-खतरे का साहित्य ही रचते रहिए, तारीफें करते और सुनते रहिए। मगर ऐसा करके क्या हम साहित्य के बीच बने रहने वाले संवाद और असहमति के रिश्ते को कायम रख पाएंगे? जरा बताएं...।

मैं जानता हूं कि असहमति के अपनी तरह के खतरे हैं। इन खतरों को मोल लेना हर किसी के बूते की बात भी नहीं। किंतु इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि हम असहमति से कन्नी काटने लग जाएं। एक बेहतर संवाद के माध्यम को ही बे-असर कर दें।

हां, यह सही है कि अक्सर असहमति के स्वर थोड़े ऊंचे अवश्य हो जाते हैं लेकिन इससे क्या...? इस बहाने बहरे कानों को कम से कम सुनाई तो दे जाता है। सहमति के साथ-साथ असहमति की हकीकत को तो वे जान-समझ पाते हैं। यों, देखा जाए असहमति का अपना ही मजा है। पर इस मजे का लाभ उठा खुशमिजाज लोग ही पाते हैं। अपने खिलाफ चलने वाले असहमतियों के वाणों से डरकर भागना कायरता का प्रतीक है। कम से कम साहित्यकार-लेखक को तो इसे समझना चाहिए।

प्रायः बहुत कुछ ऐसा पढ़ने को मिलता रहता है, जहां असहमति की संभवना बन जाती है। गाहे-बगाहे अपनी असहमतियों को जतलाता भी रहता हूं। लेकिन ज्यादातर मामलों में मैंने महसूस किया है कि असहमति पर असहजता बहुत जल्दी हावी हो जाती है। असहमति के प्रकाश में आते ही संबंधों पर अंधकार के बादल गहराते चले जाते हैं। माना कि वो बहुत बड़े लेखक, बहुत बड़े साहित्यकार, बहुत बड़े संपादक, बहुत बड़े समाजशास्त्री हैं किंतु असहमति का जिक्र आते ही सारा का सारा बड़प्पन धूल में मिल जाता है। संवाद खत्म हो जाता है। प्रगतिशीलता धरी की धरी रह जाती है। फिर न विचार का कोई महत्व रह जाता है न वैचारिकता का।

बहरहाल, बात जो भी हो मगर असहमति की गुंजाइश तो बनी ही रहनी चाहिए। समाज और साहित्य के बीच अगर असहमति की गुंजाइश बनी रहेगी तो धैर्य और विचार का रिश्ता भी आपस में जुड़ा रहेगा। इसीलिए बेहतर संवाद को बनाए रखने के लिए असहमतियां जरूरी हैं।

Saturday, 12 April 2014

बदलते समय के साथ भाषा को भी बदलना चाहिए

भाषा किसी लेखक, किसी साहित्यकार, किसी बुद्धिजीवि, किसी भाषाविद या संप्रदाय की गुलाम नहीं होती। न भाषा को किन्हीं स्थापित दायरों में बांधकर रखा जा सकता है। भाषा का स्वभाव स्वतंत्र होता है। और स्वतंत्र ही रहना चाहिए। भाषा जितनी स्वतंत्र रहेगी, उतना ही विकसित होगी।

साहित्य में सबसे अधिक सवाल हिंदी भाषा के चाल-चलन पर उठाए जाते हैं। हर समय बस यही रोना मचा रहता है कि अंगरेजी हिंदी का अहित कर रही है। या फिर हिंदी के साथ प्रयुक्त होने वाली हिंग्लिश को बुरा-भला कहा जाता है। तर्क दिया जाता है- हिंग्लिश ने हिंदी भाषा के बीच घुसपैठ कर भाषा की पवित्रता को नष्ट कर दिया है। क्या वाकई ऐसा है? क्या हिंग्लिश हिंदी भाषा के स्वभाव, उसकी महत्ता को खत्म कर रही है? फिलहाल, जो कथित हिंदी-प्रेमी साहित्यकार या भाषाविद ऐसा मानते हैं, मानें, पर मैं ऐसा कतई नहीं मानता।

हिंदी भाषा के साथ अगर अंगरेजी के शब्द प्रयोग किए जा रहे हैं या हिंदी को हिंग्लिश की शक्ल में लिखा-बोला जा रहा है, तो इसमें हर्ज ही क्या है? यह बदलते जमाने की भाषा है। इस भाषा में नई तरह की ताजगी और बनावट है। यह नई पीढ़ी, नए जमाने की भाषा है। साथ-साथ, अगर यही भाषा साहित्य या शब्दकोश में भी प्रयोग की जा रही है, तो इतनी परेशानी क्यों?

यह जरूरी नहीं कि जो-जैसा साहित्य जिस भाषा में पुराने या वरिष्ठ साहित्यकारों-कहानीकारों ने लिखा, युवा पीढ़ी भी वैसा ही लिखे। वो भी उन जमे-जमाए, ठस्स शब्दों का ही प्रयोग करे, जैसा उनके पूर्वजों ने किया था। यह तो एक प्रकार का यथास्थितिवाद कहलाएगा। समय के साथ-साथ जैसा परिवर्तन मनुष्य के स्वभाव या रहन-सहन में आता है, ठीक ऐसा भाषा में भी आना चाहिए। उस जमाने के साहित्यकारों ने तब की प्रचलित भाषा में लिखा, अब के आज की प्रचलित भाषा के हिसाब से लिख रहे हैं, फिर किंतु-परंतु किसलिए?

दरअसल, ओम थानवी के लेख 'वर्धा के समावेशी' (जनसत्ता, 2 मार्च, 2014) को पढ़ने के बाद मुझे तो यही लगा कि वे हिंदी भाषा या शब्दकोश में अंगरेजी (हिंग्लिश) के प्रयोग को खतरनाक मानते हैं। खतरानक मानने की तमाम वजहें हालांकि उन्होंने गिनाई भी हैं लेकिन आज के टेक्नोओरियंटीड टाइम में ऐसी वजहों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। यह उनकी यथास्थितिवादी सोच है भाषा के प्रति।

थानवीजी लिखते हैं- 'विभूतिनारायण राय को संस्कृत से चिढ़ और अंगरेजी से मोह क्यों है? मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि भाषा के मामले में वे एक विकृत सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं।' क्या थानवीजी बताएंगे, आज के जमाने में कितने लोग संस्कृत पढ़ते-बोलते हैं? अपने ही अखबार 'जनसत्ता' में अब तक कितने लेख उन्होंने संस्कृत में या संस्कृत भाषा पर छापे हैं? क्या वे अपने फेसबुक या टि्वटर के स्टेटस संस्कृत में लिखना पसंद करेंगे? कितने स्कूल, कितने विश्वविद्यालय संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने पर जोर दे रहे हैं? न न मैं संस्कृत के महत्त्व पर सवाल नहीं उठा रहा, यकीनन संस्कृत एक समृद्ध भाषा है। लेकिन अफसोस अब चलन में नहीं है। न अब कोई संस्कृत पढ़ना चाहता है, न ही पढ़वाना। जमाने की रफ्तार में संस्कृत बहुत पीछे छूट गई है हुजूर।

और हां अंगरेजी से मोह रखना कोई अपराध तो नहीं थानवीजी। हजारों लोग रखते हैं। हिंदी पढ़ने-लिखने वाले भी रखते हैं। अंगरेजी पढ़ने वाले हिंदी के प्रति मोह रखते हैं। इसमें हिंदी भाषा को खारिज करने वाली बात कहां से आ गई। हर भाषा, चाहे वो हिंदी हो या अंगरेजी या तमिल हो या उर्दू, सबका अपना महत्त्व है। अपनी प्रतिष्ठा है।

हर रोज सैकड़ों शब्द हिंदी-अंगरेजी (हिंग्लिश) के हमारी बोल-चाल, लिखत-पढ़त में आ रहे हैं। अगर ये शब्दकोश में शामिल हो रहे हैं, तो गलत क्या है?

भाषा में प्रयोग निरंतर होते रहने चाहिए। प्रयोग नहीं होंगे तो भाषा जड़ हो जाएगी। उसमें ताजगी बनी नहीं रहेगी। आज फेसबुक, टि्वटर, व्ह्टसएप की भाषा ही चलन और प्रयोग में है। यही अगर हिंदी साहित्य या शब्दकोश में आ रही है, तो इसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।

Saturday, 5 April 2014

चुनाव में वामपंथ कहां है?

चुनाव में वामपंथ कहां है! बहुत चाहता हूं कि यह विचार दिमाग में न आए। लेकिन फिर भी किसी न किसी बहाने आ ही जाता है। विचार को आप रोक नहीं सकते। विचार स्वतंत्र होता है- कहीं भी आने-जाने के लिए। मगर यह विचार कुछ ऐसा है, जो न केवल मुझे 'परेशान' करता है बल्कि सवाल भी पूछता है। मैं जानता हूं कि इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है। और न ही वामपंथियों के पास है। फिर भी सवाल जायज है।

पूरे चुनावी परिदृश्य पर वामपंथ का 'असर' कहीं नजर नहीं आ रहा। न कोई वामपंथी चुनावी सभा करते दिखाई दे रहा है न व्यक्तिकेंद्रित राजनीति पर 'प्रतिवाद' करते। ऐसा लग रहा है मानो वामपंथियों ने 'हथियार' डाल दिए हैं! तो क्या हम यह मान लें कि अब राजनीति वामपंथियों के बस की बात नहीं रही? या फिर वामपंथियों ने खुद को 'हाशिए' पर धकेल कर अपना 'अंत' खुद ही कर लिया है?

जिस तरह का राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक माहौल है देश के भीतर, ऐसे में वामपंथियों की 'भूमिका' मुख्य होनी चाहिए थी। उन्हें आगे बढ़कर न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी अपनी बात जोरदार तरीके से रखनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा होता कहीं कुछ न दिखाई देता है न सुनाई। पता नहीं किस दुनिया में विचरण कर रहे हैं कॉमरेड लोग? और न जाने क्यों 'अकेला' छोड़ दिया है वामपंथ को?

तमाम राजनीतिक दलों के बीच एक वामपंथी दल ही ऐसा है, जिसके पास अपने 'विचार' हैं, दृष्टि है, सोच है, मगर अफसोस अब यह वाद बे-वाद होकर रह गया है। वामपंथ के विचारों को जनता के बीच ले जाने का शायद समय ही नहीं है वाम दलों के पास? एक समस्या यह भी है कि बदलते वक्त के साथ वामपंथी दलों ने अपने विचारों को बदलने की कोशिश कभी नहीं की। वाम दल आज भी अपने उन्हीं पुराने विचारों से जुड़े हैं। नए को अपने भीतर आने की जगह ही नहीं देते। उसी पुराने ढर्रे पर चलकर न आप जनता से जुड़ सकते हैं न ही राष्ट्रीय राजनीति से। हम मानते हैं कि विचारों के साथ वामपंथ ने लंबा सफर तय किया है लेकिन बदलना भी जरूरी है। मैं यह नहीं कह रहा कि वामपंथी दल अपने विचारों से 'बिल्कुल कट' जाएं पर समय के साथ उन्हें इतना 'लचीला' तो बनाएं ही ताकि युवा वर्ग इससे जुड़ सके। आज कितने युवा वामपंथ को समझते-जानते हैं? जिस तरह का युवा वर्ग का टेस्ट है, उसमें वामपंथ कहीं फिट नहीं बैठता।

यह सही है कि अब चुनावों में 'धन-बल' और 'व्यक्ति-विशेष' की भूमिका तेजी बढ़ती जा रही है। इसका सबसे अधिक नुकसान जनता को ही हो रहा है। हर बार की तरह चुनावों में 'हवाई घोषणाएं' तो हो जाती हैं किंतु उनका 'पालन' नहीं होता। घोषणापत्रों में तमाम बड़ी-बड़ी बातें तो दर्ज हो जाती हैं पर वे घोषणापत्र से बाहर नहीं निकल पातीं। ठगी अंततः जनता ही जाती है। कहने को कह-मान लीजिए हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं फिर भी यहां चलती नेता और राजनीतिक दलों की ही है। ऐसे में वामपंथ का हस्ताक्षेप आवश्यक हो जाता है। परिदृश्य पर कोई दल तो ऐसा होना चाहिए, जो जनता के प्रति वादे नहीं अपनी 'प्रतिबद्धता' जाहिर करे। जो कहे, वो करके भी दिखाए।

बीच में ऐसी कुछ संभावनाएं 'आप' (आम आदमी पार्टी) में नजर आईं थीं लेकिन अब वो भी 'व्यक्ति' और 'मीडिया' केंद्रित हो गई है। आंदोलनों की परंपरा को आप ने 'अराजकता' में तब्दील कर दिया। अरविंद केजरीवाल के चेहरे पर से आम आदमी का मुखौटा तब ही उतर गया था, जब उन्होंने कांग्रेस के रहम पर अपनी सरकार बनाई थी और मात्र 49 दिनों में ही 'पस्त' होकर मैदान छोड़ भागे थे।

इन्हीं सब से वैचारिक एवं राजनीतिक प्रतिवाद और संघर्ष के लिए वामपंथ का केंद्र में रहना जरूरी हो जाता है। 'आप' (आम आदमी पार्टी) के पास विचार नहीं पर वाम के पास तो हैं। तब बहुत अफसोस हुआ था जब एक बड़े कॉमरेड नेता ने 'आप' की तारीफ यह कहते हुए की थी कि यह देश में बदलाव ला सकती है। आप के रहते देश-समाज-राजनीति में क्या बदलाव आए, शायद बताने की जरूरत नहीं।

जो हो लेकिन वामपंथ को पुनः राष्ट्रीय व क्षेत्रिय राजनीति में वापसी करनी ही होगी। वामपंथियों को 'नींद' से 'जागना' ही होगा। अगर वामपंथ और वामपंथी दल राजनीति एवं समाज के बीच से ऐसे ही 'खिसकते' रहे तो एक दिन 'गुमनामी के अंधेरे' में कहीं खो जाएंगे।

Wednesday, 5 March 2014

आप की गुंडई

आम आदमी पार्टी (आप) के पास न विचार का हौसला है, न राजनीति की जमीन, न संघर्ष करने का बुता। बहस या तर्क से आप को नफरत है और न ही वे इसमें विश्वास रखते हैं। राजनीति में आने और जनता को बरगलाने के बहाने उनका एक मात्र उद्देश्य है, 'अराजकता फैलाना'। भाषाई और लाठी-डंडा युक्त अराजकता के दम पर ही वे देश और राजनीति के बीच अपनी जगह बनाने चाहते हैं। न वे देश के संविधान को मानते हैं, न किसी की इज्जत को महत्त्व देते हैं।

अभी दिल्ली और लखनऊ में आप के गुंडों ने जो गुंडई बरपाई उससे यह साफ हो गया कि आप मूलतः एक 'अराजक पार्टी' है। दावा वे बेशक खुद को ईमानदार या सादगीपंसद होने का करते रहें लेकिन विश्वास उनका मार-तोड़ में ही है। दूसरों के घरों पर पत्थर फेंकना उन्हें अच्छा लगता है लेकिन वही पत्थर जब उनके घरों पर आकर गिरते हैं, तो बौखला जाते हैं। मीडिया के सामने खुद को बेचारा और दूसरे को हिंसक घोषित करने लग जाते हैं। जो करते हैं मीडिया के आगे इसलिए करते हैं ताकि उनके चेहरे कैमरों पर चमक सकें। पब्लिसिटी हासिल हो सके। साथ-साथ, जनता को मूर्ख बना सकें।

अरविंद केजरीवाल ने अपने 49 दिन के कार्यकाल में सिवाय जनता को मूर्ख बनाने के और किया ही क्या? जो शख्स मात्र 49 दिनों में पीठ दिखाकर भाग गया, भला उसके बस की बात कहां है देश को संभाल पाना। आप या अरविंद केजरीवाल विरोध या धरने के बहाने सिर्फ अराजकता ही फैला सकते हैं, इससे ज्यादा करने को उनके पास कुछ है भी नहीं।

दरअसल, अरविंद केजरीवाल का गुजरात जाने का उद्देश्य जनता नहीं सिर्फ हंगामा खड़ा करना था। हंगामा खड़ा करके अन्य जगहों पर अपनी पार्टी की उद्दंडता को प्रदर्शित करना था। आखिर वे पढ़े-लिखे हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि आचार संहिता लागू होने के बाद वे देश के किसी भी कोने में कोई भी सभा या आयोजन नहीं कर सकते। मगर फिर भी उन्होंने गुरजात जाकर यह सब करने की नौटंकी की। और जब रोका गया तो मियां कहने लगे कि यह सब मुख्यमंत्री के कहने पर हो रहा है। वाह! क्या खूबसूरत तर्क दिया ईमानदारश्री ने।

जाहिर-सी बात है, जिस दल के नेता के पास ही सभ्यता का शऊर न हो उस दल के सदस्यों का तो फिर खुद ही मालिक। जहां तर्क नहीं होते, वहां व्यक्ति लाठी-डंडों के दम पर ही खुद को सही साबित करने की कोशिश किया करता है। आप वाले दरअसल देश में अब यही कर रहे हैं। लोकतंत्र का सत्यानाश करने का जैसे उन्होंने मन बना लिया है।

लेकिन लाठीं-डंडों के दम पर हासिल की गई पब्लिसिटी ज्यादा दूर या दिनों तलक साथ नहीं चल पाती। फिर जनता भी उसी तरह से जवाब देना शुरू कर देती है। और जब जनता खड़ी हो जाती है फिर तगड़े से तगड़े तोपचंद की सल्तनत को ढहते जरा भी समय नहीं लगता।

आप का मकसद न जनता की राजनीति करने का है न मुद्दों की, बेवजह सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही उसका मकसद है। जो पार्टी बेतुके-बेमतलब के मुद्दों पर धरना-प्रदर्शन करने बैठ जाए, उससे क्या उम्मीद की जा सकती है, कुछ सार्थक करने की। ऐसी हरकतें तो बेहद कमजोर और बुजदिल लोग किया करते हैं।

हो सकता है, अपनी हंगामा-पसंद छवि के बल पर आप जनता को बरगलाने में कुछ सफल हो जाए लेकिन ये नौटंकियां ज्यादा दिनों तलक नहीं चल पाएंगी। धीरे-धीरे कर अब जनता भी समझ रही है, आप के आचरण और अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को। जिस जनता ने आप को सिर पर बैठाया, वही जमीन पर भी गिरा सकती है। क्योंकि कांठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ा करती मियां।

Tuesday, 4 March 2014

'विचार' पर हावी होता 'वाद'

चित्र साभारः गूगल
यह सुनना थोड़ा अजीब-सा लगेगा लेकिन मुझे अब सच-सा लगने लगा है। कि, हम 'विचार' के नहीं 'वाद' के युग में रह रहे हैं। विचार की महत्ता हमारे बीच से धीरे-धीरे कर समाप्त-सी होती जा रही है। क्या समाज, क्या राजनीति, क्या साहित्य, लग ऐसा रहा है, कि इन्हें विचार के दम पर नहीं, सिर्फ वाद के दम पर चलाने की कोशिशें हो रही हैं। हर व्यक्ति, हर दल के पास अपना वाद है। और, अपने ही वाद के दम पर समाज, राजनीति और साहित्य को सुधारने की 'जिद्द' है। एक ऐसी जिद्द जिसका न सिर है न पैर। जिद्द में केवल 'अहंकार' है। लेकिन चाहे विचार हो या वाद; अहंकार के दम पर दोनों ही नहीं चल सकते। सहजता और सौम्यता दोनों के बीच जरूरी है।

यह सच है कि वाद की नींव विचार के आधार पर ही रखी गई थी। बिना विचार वाद लगभग बेमानी है। वाद चाहे राजनीति में स्थापित हो या साहित्य में, विचार का होना अवश्यक है। विचार वाद को समझने-समझाने का नजरिया और तर्क की महत्ता को जगाता है। यह विचार ही है, जिसके बल पर हम किसी व्यक्ति, दल या रचना को समझ पाते हैं। पता चलता है कि अमुख अपनी अभिव्यक्ति को किस नजरिए से पेश कर रहा है। उसका मंतव्य क्या और कैसा है।

मगर हम तो विचार को पीछे धकेल कर सिर्फ वाद की राजनीति में लग गए हैं। जोर दे-देकर कह-बताया जा रहा है कि केवल मेरा-तेरा इसका-उसका वाद ही सर्वश्रेष्ठ है, बाकी सब बेमानी। जबकि हम वाद की हठधर्मिता का हश्र मार्कस्वाद के बहाने देख चुके हैं। स्थिति यह है कि मार्क्सवाद केवल अपने ही वाद में सिमटकर रह गया है। मार्क्सवाद समाज से तो कटा ही, साथ-साथ राजनीति और साहित्य के मध्य भी बेगाना-सा बनकर रह गया।
वाद के यथास्थितिवाद ने ही मार्क्सवाद को अंदर तक तोड़कर विभाजित कर दिया है। अब हर मार्क्सवादी खुद को मार्क्स से बड़ा और बेहतर समझने लगा है। अपनी हर बात में वो बस यही जतलाने-बतलाने का प्रयास करता है कि हर कोई दुनिया, समाज, विचार, व्यवस्था, साहित्य, राजनीति को उसी नजरिए से देखे जैसा वह देख रहा है। यानी, विचार को दरकिनार कर हर जगह अपने वाद को स्थापित करने की जिद्द है।

मानते हैं कि इस बौराए समय में एक मार्क्सवादी विचारधारा ही है, जो सबसे अलग और प्रगतिशील है। उसमें शोषित और मजदूर वर्ग के लिए वो संवेदनाएं हैं, जो किसी भी वाद या विचार में नहीं। मार्क्सवादी विचारधारा समाज के साथ-साथ समाजवाद का भी ताना-बाना बुनती है। लेकिन दिक्कत मार्क्सवाद के साथ वहां पैदा होने लगती है, जब वाद में से विचार को पीछे धकेलकर सिर्फ व्यक्तिवाद ही प्रमुख हो जाता है। वाद और विचार के बीच जब व्यक्ति ही खुद को सबकुछ मानने-समझने लगता है, तब उस वाद और विचार की मौत निश्चित मानिए। दुर्भाग्य से, मार्क्सवाद के साथ भी यही हुआ है।

मार्क्सवाद के समक्ष इस वक्त सबसे बड़ा संकट अपनी जमीन और अस्तित्व को बचाने का है। जो मार्क्सवादी हमारे बीच हैं, उनमें ऐसा कोई उत्साह दिखाई नहीं देता, जिसके आधार पर यह लग सके कि वे मार्क्सवाद की जमीन को बचाने के प्रति गंभीर हैं। दरअसल, वे मार्क्सवादी बाद में, नेता पहले हैं। सत्ता का सुख उनकी प्राथमिकता है। न उनके सरोकार जनता के साथ हैं, न मजदूर वर्ग के। वे तलाश में हैं, कैसे भी दलगत राजनीति के बीच अपनी गोटियां फिट कर सकें। तब ही तो अब तीसरे मार्चे की सुगबुगाहटें सुनाई देने लगी हैं। कह जा रहा है- तीसरा मोर्चा केवल जन-सरोकारों की राजनीति करेगा। सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक ताकतों को दूर रखेगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि तीसरे मोर्चे में शामिल दलों ने क्या कभी सांप्रदायिक राजनीति नहीं की है? क्या उनके हाथ खून से नहीं रंगे हैं? और फिर यह कैसे संभव है कि तीसरे मोर्चे में विचार ही रहेगा, वाद हावी नहीं होगा? जबकि इसमें शामिल हर दल किसी न किसी वाद से प्रभावित है। साथ ही, दुखद यह भी है, कि वामपंथी भी तीसरे मोर्चे की जुगलबंदी में साथ हैं।

दरअसल, तीसरा मोर्चे कुछ नहीं सिर्फ 'शेखचिल्ली तस्ल्लियां' हैं। तीसरे मोर्चे से न भला जनता का होना है, न वामपंथी दल को।

कभी-कभी तो वामपंथी दल 'आप' की तारीफ भी इस तरह से करते हैं, मानो 'आप' ने बहुत बड़ा क्रांतिकारी काम किया हो, जनता या समाज के बीच।

मार्क्सवादियों को चाहिए कि वे पहले अपने घर को दुरुस्त करें फिर किसी दूसरी राह चलें। मार्क्सवाद और मार्क्सवादियों का यों निरंतर हाशिए पर चलते चले जाना 'आप' जैसे 'अवसरवादी-एनजीओनुमा पार्टी' की बुनियाद को ही मजबूत करेगा। जबकि देश-समाज-जनता को एक ऐसे मार्क्सवादी दल की दरकार है, जिसमें वाद नहीं, विचार प्रथामिकता में हो। और, जो केवल जनता के लिए ही 'सामाजिक राजनीति' करे। क्या कभी यह संभव हो सकेगा?

Thursday, 27 February 2014

खुशियों से दूरी

अपने आसपास के 'बेरूखे माहौल' को देखकर अक्सर यह सवाल मेरे जहन में कुलबुलाहट मचाता है कि क्या खुशियों ने हमने दूरी बना ली है या फिर हमहीं खुशियों की 'शीतल छाया' से दूर भागने लगे हैं? खुशियां हमसे छींटकर न जाने कहां, किस राह चली गई हैं? हम अपनी ही खुशियों को सहज और संवार नहीं पा रहे। दुख, चिंता, क्षोभ और भय का काला घेरा निरंतर हम पर गहराता चला जा रहा है। ऐसे भयंकर अवसादों के बीच हमने खुद को कुछ ऐसा सुप्त-सा बना लिया है कि हममें इन सब से लड़ने-भिड़ने की अब शक्ति ही नहीं बची है। जैसे हम अपनी जिंदगी और चल रहे संघर्षों से हार चुके हैं। न हमारे पास नया कुछ सुनाने को है न रचने को। जी केवल इसीलिए रहे हैं क्योंकि हमें वक्त को काटना है। तो क्या मान लिया जाए कि जिंदगी केवल वक्त काटने के लिए है, नया कुछ करने या बेहतर सोचने के लिए नहीं?

देखा गया है कि जिंदगी की मुश्किलों से हारे और हताश हुए लोगों के बीच निराशा की लकीरें कुछ ज्यादा ही गहरी हो जाती हैं। 'अब सब कुछ खत्म' की तर्ज पर वे बिना कुछ सोचे-समझे चल पड़ते हैं। माना कि मुश्किलें परेशान करती हैं। अथाह दुख देती हैं। कभी-कभी मन के भीतर इस कदर ऊब-सी भर देती हैं कि जीने तक की इच्छा समाप्त हुई सी जान पड़ती है। बस यहीं से शुरूआत होती है हमारी अवसाद में घिरते चले जाने और खुशियों से दूर होते जाने की। जबकि मुश्किलों के साथ संघर्ष करते हुए भी हम अपनी बची-कुची खुशियों के दम पर खुद को खुश रख सकते हैं। जिंदगी को संघर्ष और परेशानी के बावजूद थोड़ा सुकून दे सकते हैं। लेकिन नहीं हमारा 'नकारात्मक दृष्टिकोण' हमें ऐसा करने से रोकता रहता है। चीजों को जहां पर सहज बनाया जाना चाहिए वहां पर तरह-तरह के मानसिक विरोधाभास पैदा करता रहता है। वैचारिकता को नष्ट कर कुतर्कों में ढकेलता रहता है। और हम अपने धैर्य का दामन छोड़ शून्य में चलते चले जाते हैं। शून्य को अपना हमसफर बना लेते हैं। भूल जाते हैं कि अंधेरे के बीच से ही उजाले की किरन भी निकलती है।

लगता है खुशियां अब ईद का चांद सरीखी हो गई हैं हमारे लिए। जब चांद दिख जाता है, खुशी मिल जाती है। फिर उसके बाद मातम ही मातम। दरअसल, यह सब अपने-अपने सोचने और समझने का ढंग है कि हम अपनी खुशियों, मुश्किलों और संघर्षों को किस तरह से जीते व झेलते हैं। कुछ की आदत होती है तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी खुशियों को यथावत रखने की और कुछ मुश्किलों के समक्ष ऐसे समर्पण कर देते हैं मानों जिंदगी का अब कोई अर्थ ही न बचा हो! वे तो थोड़ी-बहुत मुश्किलों से भी पहाड़ जैसे परेशान हो जाते हैं। न कभी सकारात्मक सोचते हैं न ही करने की कोशिश करते हैं। अगर मुश्किलों और संघर्षों के आगे हमारे क्रांतिकारियों ने हार मान ली होती तो शायद आज हम आजाद मुल्क की खुली हवा में सांस नहीं ले रहे होते। यह आजादी हमें कितनी मुश्किलों और संघर्षों के बाद हासिल हुई है, इसे 'हारे हुए लोग' क्या जानें? उन महान क्रांतिकारियों ने तो तमाम कठिनाईयों के बीच भी आजादी की उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा था।

हम अपनी जिंदगी को जितना अधिक सीमित करते चले जाएंगे, हमसे जुड़ी चीजें भी उतनी ही सीमित होती चली जाएंगी। जिंदगी का हर एक पल हर एक एहसास के साथ जरूरी है। गहरे मायने रखता है। जिंदगी में अगर 'एहसास' नहीं तो फिर यह किस काम की! हमारी जिंदगी पर जितना हक मुश्किलों का है उतना ही खुशियों का भी। अब यह निर्भर हम पर करता है कि हम किसको कितना खुद पर हावी होने देते हैं। किससे कहां तक पार पाने या किसको कितना पास लाने में सफल होते हैं। मगर इन सब के वास्ते सकारात्मक दृष्टिकोण बेहद जरूरी है। चीजों के प्रति बिना सकारात्मकता हुए कुछ हासिल नहीं हो सकता।

मुश्किलों और दुखों के साथ जिंदगी को बोझ मानने वालों से मेरा बस इतना ही कहना है कि न हारो न ही अवसाद को ओढ़ो बस हर स्थिति में खुशी-खुशी संघर्ष करते रहो। देखना नकारात्मकता का दर्द खुद ही उड़न-छू हो जाएगा। यह समय खुशियों को दूर भागने का नहीं, उन्हें कैसे भी अपने करीब बनाए रखने का है, ताकि हम जिंदगी के सफर का साथ यूंही निभाते रहें। हर तरह की खुशियां जरूरी हैं। न भूलें छोटी-छोटी खुशियों को समेटकर ही बड़ी खुशियां बनती हैं।

Wednesday, 26 February 2014

ठहरा हुआ मार्क्सवाद

चित्र साभारः गूगल
कभी-कभी घोषित प्रगतिशील मार्क्सवादियों से बहस या तर्क करते वक्त बड़ी कोफत सी होती है। मार्क्सवादियों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अपने आगे किसी की चलने नहीं देते। न ही किसी को कुछ समझते हैं। आपका रूतबा उनकी निगाह में, तब तक ठीक बना रहता है, जब तक आपकी सहमति उनकी कथित प्रगतिशील विचारधारा के साथ बनी रहती है, लेकिन जहां भी आपने उनके मत पर असहमति प्रकट की, वे आपको ‘दृष्टिपंथी‘ या ‘संघी‘ घोषित करने में जरा भी वक्त नहीं लगाएंगे। पलभर में आपको अपना दुश्मन मान बैठेंगे। कह सकते हैं कि मार्क्सवादियों की निगाह में हर वो व्यक्ति संघी या फासिस्ट है, जो उनकी विचारधारा से असहमति रखता है।

दरअसल, मार्क्सवादी लोग विचारधारा को अपनी बपौती समझते हैं। उनका शुरू से यह मत रहा है कि दुनिया या समाज के भीतर जब भी, जो भी विचार जाए, उनके रास्ते होकर ही जाए। उनका ये भी मानना है कि बस एक अकेला मार्क्सवाद ही है, जो दुनिया को ‘बेहतर तरीके‘ से समझ और बदल सकता है। समाज में क्रांति ला सकता है। यानी अगर मार्क्सवाद को अपना लिया, तो समझो जीवन सफल हो गया। अगर वादों के सहारे ही जीवन सफल हो रहे होते या दुनिया बदल रही होती या क्रांतियों का संचार हो रहा होता, तो आज हमारे समक्ष यह विकट समय भी न होता! तब समय कुछ और होता और इंसान भी कुछ और। लेकिन वे तो हमेशा इसी कोशिश में लगे रहे कि किसी भी तरह से बस उनका वाद स्थापित होना चाहिए। वाद को स्थापित करने की चिंता जितनी मार्क्सवादियों को सताती रहती है, उनती ही दक्षिणपंथियों को भी। एक तरफ दक्षिणपंथी अपनी अंध-आस्थाओं से बाहर नहीं निकल पाए हैं, तो मार्क्सवादी अपनी घोषित प्रगतिशीलताओं से। वाद की इस लड़ाई में जन की भूमिका क्या रहनी चाहिए, इसकी फिक्र दोनों में से किसी को नहीं।

समय और परिस्थितियों के हिसाब से जिस तरह चीजें और विचारधाएं बदलती हैं, मार्क्सवादियों ने खुद को नहीं बदला। मार्क्सवाद ठस का ठस रहा। वही पूंजीवाद का विरोध। वही बाजार के खिलाफ कुतर्क। वही सत्ताओं के साथ समझौते। दशकों पहले जो मार्क्स कह और बता गए, मार्क्सवादी उसे ही ‘अंतिम सत्य‘ माने बैठे हैं और अब तक वही रटे चले जा रहे हैं। वे इस हकीकत को मानने-समझने को तैयार ही नहीं कि समय के साथ मार्क्स के सिद्धांत अब पुराने पड़ चुके हैं। उन सिद्धांतों में अब कोई दम-खम नहीं बचा है। पिटी-पिटाई लकीर को पिटते चले जाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला।

यह बात समझ से परे है कि आखिर क्यों मार्क्सवादी रह-रहकर पूंजीवाद और बाजार के विरोध में आन खड़े होते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि पूंजीवाद और बाजार हमारे समय की दो बड़ी अहम हकीकतें हैं। इन हकीकतों से आप चाहकर भी नजरें नहीं चुरा सकते। आज हमें विचारधाराएं कम, बाजार और पूंजीवाद अधिक चला रहे हैं। क्या करें यह दौर ही ऐसा है। आखिर ऐसे कितने मार्क्सवादी होंगे, जिन्होंने पूंजीवाद के विरोध में खड़े होकर भी पूंजी से अपना रिश्ता बनाए नहीं रखा है? ऐसे कितने मार्क्सवादी होंगे, जो बाजार के विरोधी होने के बावजूद अपने घर-परिवार में बाजार का सहारा नहीं लते है? बाजार आज हमारे बीच बहुत बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है। फिर बाजार से इतनी नफरत क्यों?

मार्क्सवादियों ने अजीब-सी जिद पाल रखी है कि बाजार और पूंजीवाद भी उनकी विचारधारा के हिसाब से चले। या फिर यह सब खत्म हो जाए। वे बाजार और पूंजीवाद को समाजवादी बनाना चाहते हैं। जबकि वे यह नहीं जानते कि बाजार और पूंजीवाद शुरू से ही समाजवादी रहे हैं। आखिर ऐसा कौन-सा गुनाह कर दिया है, बाजार और पूंजीवाद ने जो मार्क्सवादियों की विचारधाराओं पर खरे नहीं उतर पाते? शुक्र मनाइए कि बाजार ने ही हमें समाज के बीच साधे रखा है। समाज के बीच पूंजी का संचार सिर्फ बाजार के सहारे ही बढ़ा है। दो-तीन दशक में ही बाजार ने समाज के बीच तमाम तरह के बदलाव ला दिए, जो दशकों पुराना मार्क्सवाद अब तक न ला सका।

सवाल यह है कि मार्क्सवाद अब कहां लोकप्रिय रहा है? युवा पीढ़ी तो ढंग से न मार्क्सवाद की परिभाषा जानती है न ही मार्क्स को। दरअसल, इसमें गलती युवाओं की नहीं, उन कट्टर मार्क्सवादियों की है, जो मार्क्सवाद को उसकी जटिलताओं से बाहर निकालना ही नहीं चाहते। न ही चाहते हैं कि वे वैचारिक स्तर पर आधुनिक बने। हां, उत्तर-आधुनिकता का कंबल जरूर उन्होंने उस पर डाल दिया है, ताकि सब कुछ ढका-ढका ठीक-ठाक लगे। आज के समय में मार्क्सवाद की वैचारिक जटिलताओं के साथ आप युवाओं से यह आह्वन करें कि वे बाजार और पूंजी का साथ छोड़ दें, भला यह कैसे संभव हो सकता है?

युवा पीढ़ी जिन सपनों को हकीकत में बदलना चाहती है, उससे मार्क्सवाद ही क्या दुनिया का कोई भी वाद अपनी सहमति नहीं जतला सकता। युवा पीढ़ी की दुनिया, उनकी इच्छाएं, उनकी सोच का नजरिया इन तमाम ठहरे हुए वादों से बहुत अलग है। माना कि विचारधाराएं अपनी महत्ता रखती हैं, लेकिन वे न रोटी दिला सकती हैं न ही तकनीक के साथ चल सकती हैं। फिर सदियों पुरानी विचारधाराओं या वादों में बदलते समय के साथ अगर कोई बदलाव नहीं हो रहा, तो उससे मुक्ति ही बेहतर विकल्प है। मार्क्सवादी बुद्धिजीवि भले ही मार्क्सवाद को समाज और दुनिया के लिए बेहतर बताएं, लेकिन ऐसी बेहतरी से भी क्या हासिल, जो हमें युगों पीछे धकेल दे।

हाशिए पर पड़ा मार्क्सवाद किसी वर्ग का सहारा नहीं बन सकता। मार्क्सवाद को बदलना ही होगा। उसे समय के साथ अपनी विचारधाराओं और सिद्धांतों पर पुनर्रविचार करना ही होगा। अभी भी वक्त है ठहरे हुए मार्क्सवाद को पुनः ऊर्जावान और अधिक लचीला बनाने की। बाकी उनकी मर्जी।

Friday, 21 February 2014

सीरियस होना कैंसर से ज्यादा घातक

ध्यान नहीं पड़ता कि अंतिम दफा मैं कब 'सीरियस' हुआ था? क्यों सीरियस हुआ था? किसलिए सीरियस हुआ था? कहां सीरियस हुआ था? सीरियस होना दरअसल एक 'बीमारी' की तरह है। और, मैं यह कभी नहीं चाहूंगा कि मैं सीरियस होकर 'सीरियसली बीमारी' हो-बन जाऊं। मेरा मानना है, सीरियसली बीमार होना कैंसर से कहीं ज्यादा घातक बीमारी है। मगर फिर भी लोग सीरियस होते हैं। बहुत-से तो दिन के चौबीस घंटे ही सीरियस रहते हैं। और कमाल बात यह है कि वे खुद नहीं जानते कि सीरियस क्यों और किस बात पर हैं, लेकिन सीरियस रहते हैं। बेवजह ही अपने जीवन को सीरियसनेस के हवाले किए रहते हैं। सामने वाले से बात भी ऐसे करते हैं, मानो सीरियसनेस ने उन्हें इस कदर अपनी बाहों में जकड़ रखा है, जिससे वे मुक्त होना ही नहीं चाहते।

मैंने जीवन में तमाम ऐसे सीरियसखोरों को देखा है, जिनके माथे हर वक्त गंभीरता व चिंता की लकीरों से भरे होते हैं। चेहरे पर सीरियसनेस की 'मुरदई' छाई रहती है। मुंह से आवाज भी ऐसे निकालते हैं, जैसे सीरियसनेस के मारे शब्द जबान की नली में कहीं फंसे पड़े हों। कईयों की तो चाल ही सीरियस होती है। वे चलते नहीं केवल घिसटते हैं। ऐसे सीरियसखोरों को जिंदगी की रंगीनीयत और ताजगी से कोई मतलब नहीं होता। उन्हें यह भी मालूम नहीं होता कि जिंदगी में कितना कुछ कितनी तेजी से निरंतर अदल-बदल रहा है। वे हर नई तकनीक से दूर भागते हैं।

सच बताऊं, मैं इस टाइप के सीरियसखोरों से कोसों दूर रहता हूं। न उन्हें अपने करीब फटकने देता हूं, न खुद उनके करीब जाता हूं। क्योंकि मुझे सीरियस लोगों और खामखां की सीरियसनेस से बेहद नफरत है। सीरियसनेस जिंदगी के हर हंसीन और मस्त पलों को 'बदरंग' कर देती है।

हां, यह सच है कि जिंदगी में सुख-दुख लगे रहते हैं। जिंदगी में जितनी मात्रा में सुख हैं, उससे कहीं ज्यादा मात्रा में दुख। लेकिन हम केवल सुखों के साथ ही हंसते-मुस्कुराते हैं और दुखों के आते ही इतना हताश-परेशान हो जाते हैं कि जैसे अब सबकुछ 'समाप्त'।

किंतु मेरा सोचना-मानना इससे इतर है- जिंदगी में हम जितनी प्रफुल्लता के साथ सुखों का स्वागत करते हैं, उतने साहस के साथ दुखों के साथ संघर्ष क्यों नहीं कर पाते? दुख के आगे इतना सीरियस क्यों हो जाते हैं? जबकि दुख जिंदगी में हमें सीरियस करने नहीं बल्कि हर स्तर पर हमारी परीक्षा लेने आते हैं। जो दुख की इस परीक्षा में पास हो जाते हैं, वे 'सिकंदर' कहलाते हैं, और जो हार जाते हैं, वे 'डरपोक'।

देखो प्यारे, जिंदगी सीरियस होने का नहीं बल्कि खुलकर जीने का नाम है। उसी तरह से खुलकर जीने का, जिस तरह से फिल्म आनंद में आनंद जिया था। आनंद ने मृत्यु के अंतिम क्षणों तक हंसी और पॉजटीविटी का साथ नहीं छोड़ा। मरा भी तो सीरियस होकर नहीं बल्कि 'बिंदास जीवटता' के साथ। ओशो का चिंतन भी हमें हमेशा खुश और मस्त रहने को ही कहता है। ओशो ने तो सीरियस जीवन को सबसे खराब माना है। ओशो के नजरिए में तो मृत्यु भी एक 'उत्सव' की तरह है।

बहरहाल, दूसरों की तो नहीं जानता पर हां मैं अपनी जिंदगी को सीरियसनेस की गुलासी से सदैव मुक्त रखना चाहता हूं। वहां पर भी, जब दुख मेरे करीब हों। और वहां पर भी, जब मैं मृत्यु के करीब। कल को अगर मुझे जिंदगी का साथ छोड़ना पड़े तो कम से कम यह दाग मेरे साथ न जाए कि मैं बेहद सीरियसली चल गया। जाऊं तो ऐसे जाऊं कि अड़ोसी-पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार, लेखक-साहित्यकार, दुश्मन-दोस्त मुझ पर फक्र करें।

सीरियसनेस को बीमारी बनाने से बचें। और जो इस बीमारी में गहरे फंसे हुए हैं, वे जल्द से जल्द इस काल-कोठरी से बाहर निकल आएं। क्योंकि जिंदगी 'जिंदा-दिली' का नाम है, सीरियसली 'सीरियस' होकर रहने का नहीं। क्या समझे प्यारे...।

Wednesday, 19 February 2014

इस्तीफा तो बहाना था, भागना जिम्मेवारी से था

चित्र साभारः गूगल
जिनको अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे (या कहूं नौटंकी) पर दुखी या गंभीर होना है, वे शौक से हों। हो सके तो अरविंद केजरीवाल को 'शहीद' का दर्जा भी दे लें। या फिर उन पर कोई वीर रस प्रधान कविता भी लिख दें। फिर भी, इससे न अरविंद केजरीवाल का कद ऊंचा होगा, न उन्हें समझदार राजनीतिज्ञ की श्रेणी में ही रखा जाएगा। दरअसल, जिस प्रकार की राजनीति या आंदोलन अरविंद केजरीवाल ने की है, उसमें परिपक्वता नहीं, अराजकता ही देखने को मिली है। अपनी ऐंठ के दम पर न केवल राजनीति बल्कि लोकतंत्र को भी वे अपना गुलाम बनाए रखना चाहते हैं। वे यही चाहते हैं कि जनता केवल उन्हें ही ठीक, उन्हें ही ईमानदार, उन्हें ही पवित्र माने; बाकी सब को बेईमान या चोर। देश और राजनीति के बीच केवल उन्हीं की पार्टी जीवित रहे बाकी सब समाप्त हो जाएं। क्योंकि केवल वे ही ईमानदारी की राजनीति करते हैं, बाकी सब देश के दुश्मन हैं।

दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर उन्होंने बहादुरी का नहीं, कायरता का ही परिचय दिया है। मु्द्दों से भागकर और गद्दी को न संभाल पाने की हताशा ने उन्हें सबसे आसान रास्ता चुनने को विवश किया- इस्तीफा देकर। इस इस्तीफे ने जनता को ठगा है। उसके साथ न्याय नहीं किया है।

दरअसल, अरविंद केजरीवाल के भीतर महान होने की बहुत जल्दी है। महान होने के लिए चाहे उन्हें कुछ भी करना पड़े, करेंगे। दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना, जन-मुद्दों के तहत नहीं, बल्कि खुद को महान घोषित करवाने के लिए था। आप ने मुद्दे ही ऐसे चुने थे, जिन पर जनता तुरंत लड्डू होकर वोट दे दे। आप ने जनता के वोटों का इस्तेमाल जनता के लिए नहीं केवल अपने राजनीति भविष्य और महत्त्वाकांक्षाओं के लिए किया। न न करते-करते पहले अपनी दुश्मन नंबर एक पार्टी से समझौता कर समर्थन लिया, सरकारी सुविधाओं का जमकर लाभ उठाया और फिर जब बाद में गद्दी संभाल पाने में दिक्कतें पेश आने लगीं, तो एक जरा-सी बात पर इस्तीफा दे दिया। अरविंद केजरीवाल का यह इस्तीफा बेवजह था। उनमें अगर राजनीति करने का दम नहीं, तो फिर यहां आए किसलिए हैं। राजनीति में लफ्फबाजियां थोड़े ही दिन की मेहमान होती हैं मान्यवर। जनता जब जवाब मांगती है, तो अच्छे-अच्छे नेता की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है।

मानाकि जनलोकपाल कानून जरूरी है। मगर उससे पहले जो वायदे जनता से किए थे आप ने, कम से कम उसे तो निभाते। यह मत समझिए कि बिजली सस्ती या पानी मुफ्त कर आपने कोई किला जीत लिया। या ऑडिट का शगुफा छोड़कर कोई अनोखा काम कर दिया। भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार का हल्ला काटकर, दरअसल, आप लगातार जन-मुद्दों से भागती रही। जबकि मालूम उसे भी था कि किए गए वायदों को पूरा कर पाना उसके बस की बात नहीं। लेकिन क्या कीजिएगा, जब सत्ता और कुर्सी का लालच मन में आ जाए।

आप ने 49 दिन में ठीक वही किया, जो अब तलक तमाम राजनीति दल करते आए हैं। हो सकता है, आप के प्रेमियों को आप के भीतर-बाहर अलग तरह की राजनीति नजर आई हो, लेकिन मुझे यह कोरी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से ज्यादा कुछ नहीं लगी। आप ने न केवल राजनीति बल्कि लोकतंत्र को भी मजाक बनाकर रख दिया। अरविंद केजरीवाल में लोगों को नेता की नहीं, मनोरंजन की छवि दिखाई देने लगी। सारी नैतिकताओं की जिम्मेवारी आप वालों से दूसरों के लिए छोड़ दी और खुद अनैतिकता की राजनीति करके अपनी पीठ थपथपाते रहे। सोमनाथ भारती को पद से न हटाकर आप ने गलत का ही बचाव किया।

अरविंद केजरीवाल को समझना चाहिए, राजनीति बेमतलब के धरना-प्रदर्शनों या बच्चों का खेल नहीं है। राजनीति में कई दफा खुद को साबित करने के लिए बहुत-सी कठिनाईयों का सामना भी करना पड़ता है। ऐसा थोड़े होता है कि एक मुद्दे पर बात नहीं बनी, तो तुरत-फुरत में इस्तीफा देकर, चोर दरवाजे से निकल लिए। अगर आप में विपक्ष से मुद्दों पर लड़ने का नैतिक साहस नहीं, तो राजनीति में न आइए। किसी मंदिर में बैठकर ध्यान-भजन-कीर्तन कीजिए। कांठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है, बार-बार नहीं। जनता आप से अधिक समझदार है। सब देख रही है। सब समझ भी रही है। और साथ-साथ, आपकी राजनीति चाहतों को भी पहचान रही है। दुनिया में एक होशियार आप ही नहीं हैं मान्यवर और भी हैं।

आप का असली मकसद 2014 के चुनाव हैं। जनता को तो इसीलिए बरगला लिया था, ताकि सहानुभूति बटोरी जा सके। अगर जनता की इतनी परवाह आप को थी, तो अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफे से पहले जनता की राय क्यों नहीं ली? और क्यों नहीं राय मांगी जनता से आप के बीस चुनावी उम्मीदवारों के लिए? मतलब, जहां अपनी गोट फंसे वहां जनता की राय का बहाना बनाकर साफ बच लो। और जहां राजनीति का मक्कखन चखने की बारी आए, जनता को चाय में से मक्खी समझ बाहर निकल दो। यह राजनीति बढ़िया है आपकी।

बहरहाल, चुनाव दूर नहीं। पता चल जाएगा दिखावटी ईमानदारियों और सादगियों में कितना दम है और कितने बे-दम।

Monday, 10 February 2014

'आप' ने अब तक क्या बदला?

चित्र साभार- गूगल
आम आदमी पार्टी (आप) के बहाने निरंतर बदलाव की बात कही जा रही है। हर कोई आप में राजनीति, समाज और व्यवस्था का 'स्वर्ण भविष्य' तलाश रहा है। सब, अपवादों को छोड़कर, यह माने बैठे हैं कि केवल आप ही बदलाव व अलग तरह की राजनीति देश को दे सकती है। अलग तरह की राजनीति का तो पता नहीं लेकिन हां आप के हाव-भाव से 'तानाशाही' किस्म की राजनीति का मंजर खूब देखने-सुनने को मिल रहा है। आप की तानाशाही किस्म की राजनीति में जनता के मुद्दों पर ध्यान कम, अपने-अपने निजी व राजनीतिक हितों को साधने-संवारने पर जोर अधिक दिया जा रहा है। दिल्ली में बिजली-पानी सस्ती या मुफ्त कर देने भर से ही वे यह समझने लग गए हैं कि उन्होंने न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश का दिल 'जीत' लिया है। जबकि देश केवल दिल्ली नहीं है। न ही राजनीति केवल दिल्ली तक सीमित है।

बेशक, आप-भक्तों को लगता हो कि एक महीने से ज्यादा समय में आप ने दिल्ली में बहुतेरे बदलाव कर दिए। चलिए मान लेते हैं कि बदलाव हुए हैं, किंतु ये बदलाव दिखाई क्यों नहीं दे रहे? बदलावों पर 'जुबानी खेल' क्यों खेला जा रहा है? बदलाव के बहाने सिर्फ अपनी पीठ ही क्यों थपथपाई जा रही है? जबकि हकीकत यह है कि आप में न दिल्ली, न देश में बदलाव लाने की ताकत ही नहीं है। आप में बदलाव का रास्ता 'अराजकता' की बंद गलियों से होकर गुजरता है।

बेफालतू के धरना-प्रदर्शन या भाषाई ऐंठ से देश या समाज नहीं चलता मान्यवर अरविंद केजरीवालजी। अक्सर आपकी यह जिद्द किसी बच्चे की जिद्द सरीखी लगती है कि अगर मुझे यह नहीं मिला, तो मैं धरने पर बैठ जाऊंगा या आंदोलन करूंगा। इसका क्या मतलब है? आप राजनीति करने आए हैं या धरना-प्रदर्शन के जरिए अराजकता फैलाने।

बदलाव की बात तो तब हो, जब आप के पास कोई 'वैचारिक-दृष्टि' हो। आप एक विचार-विहीन दल ('एनजीओ'- कहना ज्यादा मुनासिब होगा) है। इसीलिए वे प्रत्येक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक मुद्दे पर तर्क-वितर्क को महत्त्व देने के वजाए कुतर्क ही ज्यादा करते हैं। लगता ही नहीं कि यह किसी राजनीतिक दल की प्रतिक्रिया है। और, दावा इस बात का करते हैं कि हम दूसरे दलों को राजनीति सीखाने आए हैं। वाह! आप से अपनी राजनीति संभल नहीं रही, दूसरों को राजनीति सिखाने का दम भर रहे हैं। इसी ऐंठ ने आप को तानाशाही किस्म के राजनीति दल में तब्दील कर दिया है।

साथ-साथ, आप में अपने खिलाफ असहमति को सुनने का माआदा नहीं है। इसीलिए आप वालों को हर वो शख्स किसी न किसी राजनीतिक दल या नेता का 'एजेंट' नजर आता है, जो आप की तानाशाही नीतियों-नियमों के खिलाफ लिखता-बोलता है। फिर भी, आप के सदस्य यह कहते नहीं थकते कि हममें हर असहमति, हर आलोचना को सुनने का साहस है। अगर साहस होता तो हर बार प्रेस-कॉन्फ्रेंस करके अरविंद केजरीवाल बात-बात पर अपनी सफाईयां पेश नहीं कर रहे होते। अपनी ईमानदारी के 'मीडियाई प्रदर्शन' में न लगे होते।

गौरतलब है, अब उन्हें मीडिया में भी खोट नजर आने लगी है। मीडिया भी उन्हें बिका हुआ लगने लगा है। कल तक यही मीडिया जब आप को हीरो बनाए हुए था, अरविंद केजरीवाल में 'क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व' को दिखला रहा था, आप के धरने पर जमा भीड़ पर उत्साहित हो रहा था, तब किसी आप वाले को मीडिया में कहीं कोई खामी या खराबी नजर नहीं आई। हर आप वाला बेताब रहता था कि किसी तरह चैनलों पर हमारे चेहरे चमकते रहें। समूचे मीडिया का समर्थन हमें ही मिलता रहे। इस तिकड़म का फायदा पाकर ही अरविंद केजरीवाल ने ईमानदारी का मुखौटा पहना और आप के बहाने चेहरा-प्रदर्शन करते रहे। लेकिन इधर कुछ मीडिया वालों ने आप पर जरा निगाहें टेढ़ी कीं, तो उन्हें मीडिया बिका हुआ लगने लगा। अमुख-प्रमुख पार्टी का एजेंट नजर आने लगा। यह अच्छा है। मीठा-मीठा गप-गप, कड़वा-कड़वा थू-थू।

गजब यह है कि बुद्धिजीवि-प्रगतिशील बिरादरी को आप का व्यवहार जायज दिख रहा है। उन्हें आप और अरविंद केजरीवाल में विचार और परिवर्तन की राजनीति महसूस हो रही है। आप की तारिफ में प्रगतिशील बुद्धिजीवि चिकने-चिकने लेख लिख रहे हैं। चैनलों की बहसों में अरविंद केजरीवाल को 'राजनीति का महानायक' घोषित करने पर तुले हैं। इस वक्त बुद्धिजीवियों को आप से बेहतर और ईमानदार दूसरा कोई नजर ही नहीं आ रहा।

आप की बटरिंग में लगे बुद्धिजीवियों को लग रहा है कि शायद इस बहाने उन्हें भी अपनी 'राजनीतिक महत्त्वाकाक्षाओं' को साधने-संवारने का मौका मिल जाए। नेता बनने का शौक किसे नहीं होता। अब तो कई जाने-माने पत्रकार भी आप की गोद में जाकर बैठ गए हैं। अब उन्हें आप के अलावा सब बेईमान लगते हैं। बात-बात में ईमानदारी का गाना ऐसे गाते हैं, मानों दुनिया में एक अकेले ईमानदार आप वाले ही हैं।

बुद्धिजीवियों को बड़ी मिर्ची लगी थी, जब चेतन भगत ने आप को 'आइम-गर्ल' के नाम से नवाजा था। तब चेतन भगत बाजार के लेखक और उनका लेखन दो-कौड़ी का हो गया था। वैसे भी, हिंदी के बुद्धिजीवि-लेखक-साहित्यकार चेतन भगत से अपना छत्तीस का आंकड़ा रखते हैं। शायद उनके भीतर खुद चेतन भगत न बन पाने का मलाल रहता हो।

आम आदमी के नाम पर पार्टी खड़ी करके आप वालों ने आम आदमी को ही 'ठेंगा' दिखा दिया है। तब ही तो बात बिजली-पानी से आगे बढ़ नहीं पा रही। दिल्ली में सरकारी काम कम, घुड़कीबाजी ज्यादा हो रही है। कभी धरने की धमकी तो कभी इस्तीफे की धमकी। इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री महोदय शहादत का सेहरा फ्री में अपने सिर पर बांधना चाहते हैं। आप का जनलोकपाल न हुआ चूं-चूं का मुरब्बा हो गया। जैसे जनलोकपाल के आ जाने से समूचा तंत्र सुधर जाएगा। सब के सब ईमानदार होकर आप में शामिल हो जाएंगे। अरविंदजी, अगर आप से दिल्ली की गद्दी नहीं संभल पा रही तो छोड़ क्यों नहीं देते? खामखां, इस्तीफे की धमकी देकर जनता को क्यों बरगला रहे हैं? यह क्यों नहीं मान लेते कि आप राजनीति में नहीं तानाशाही में विश्वास रखते हैं। अगर जन-हित के लिए ही राजनीति में आए होते, तो ऐंठ से नहीं शालीनता से गद्दी संभाले होते।

सच तो यह है कि आम आदमी को न आप ने कुछ दिया और न ही उसे अब तलक अन्य राजनीति दलों से कुछ मिला। आम आदमी तो बस 'वोट बैंक' के रूप में ही इस्तेमाल हुआ है- हो रहा है। हर दल, हर नेता अपने-अपने राजनीतिक हितों को बनाने में लगा हुआ है। जनता की चिंता किसे है। जिनसे जनता ने थोड़ी बहुत उम्मीद रखी भी थी, वे जिद्द और धरने की उद्दंडता से बाहर ही नहीं निकल पाए हैं। बदलाव या परिवर्तन कहीं नहीं हुआ है, फिर भी जिन आप समर्थक बुद्धिजीवियों को ऐसा लगता है, उनकी सोच-बुद्धि पर मुझे सिर्फ 'तरस' आता है।

Saturday, 8 February 2014

तसलीमा नसरीन होने के मायने

चित्रः साभार- गूगल
फिलहाल, यह दावा तो नहीं करूंगा कि मैंने तसलीमा नसरीन को बहुत पढ़ा है। पर जितना भी पढ़ा है, वो बहुत से कम भी नहीं है। एक लेखक के लेखन की 'वैचारिक प्रतिबद्धता' को समझने के लिए यह जरूरी नहीं कि उसे बहुत पढ़ा जाए, कम पढ़कर भी हम उस लेखक को जान-पहचान सकते हैं। बेशक, तसलीमा के लेखन में 'भाषाई सुंदरता' या 'शाब्दिक अठखेलियां' न हों, फिर भी, तसलीमा का लेखन न केवल प्रभावित करता है बल्कि दिमाग की मांस-पेशियों को झंकझोर कर रख देता है। तसलीमा को पढ़ते हुए कई दफा यह ख्याल मन में आता है कि इतना तेज और स्पष्ट कोई लेखिका कैसे लिख सकती है! खासकर, धर्म और कट्टरवादी मानसिकता के खिलाफ।

लेकिन तमाम जोखिमों के बावजूद तसलीमा ने धर्म, धार्मिक कट्टरता, विक्षिप्त मानिसकता पर न सिर्फ खुलकर लिखा बल्कि बोला भी है। इस 'बेबाकी' की कीमत तसलीमा को गाहे-बगाहे चुकानी भी पड़ी है। पिछले लगभग बीस सालों से तसलीमा अपने देश से बाहर निर्वासित-सी जिंदगी जीने को मजबूर है। जिंदगी में कई बार ऐसे मौके आए हैं, जब तसलीमा को अपने विरोधियों (या कहें दुश्मनों) का प्रत्यक्ष सामना करना पड़ा। तसलीमा को सिर कलम करने तक की धमकी कट्टपंथियों द्वारा मिल चुकी है।

मगर हर दुश्वारी में तसलीमा ने कभी किसी कट्टरपंथी दल या व्यक्ति विशेष से 'माफी' नहीं मांगी। अपनी बात पर कायम रही। और अपने विरोधियों से हमेशा यही बोला कि उन्हें बुरा-भला कहने से पहले एक दफा उन्हें ठंडे दिमाग से पढ़ा जाए। लेकिन बंद-दिमागों के पास इतना दिमाग नहीं होता कि वो विचार या रचनात्मकता की महत्ता को समझ सकें। उनका पेट तो सिर्फ विरोध करने-करवाने से ही भरता है।

हिंदी लेखन में जिस स्त्री-विमर्श पर हम अक्सर बल्लियों उछलते हैं या एकाध लेख या लेखिका के आधार पर ही इसे समूची स्त्री-जाति की आवाज कह-मान लेते हैं, उनके बीच तसलीमा नसरीन कहीं दिखाई नहीं देती। जबकि तसलीमा बांग्ला-लेखिका होने के साथ-साथ हिंदी की भी लेखिका है। भले ही उनके लेखों का अनुवाद हिंदी में आता हो। यों भी, लेखक का किसी भी भाषा का होना या न होना इतना मायने नहीं रखता जितना कि उसका लेखन।

असल में, आलोचना और समीक्षा की तरह ही हमने स्त्री-विमर्श को भी एक बने-बनाए दायरे में सिमेट दिया है। इसी 'सीमित दायरे' के भीतर रहकर स्त्री अपने विमर्श को करती रहती है। पुरुष को केंद्र में रखकर दो-चार क्रांतिकारी लेख लिख दिए जाते हैं। लेकिन धर्म को छूने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता। तसलीमा नसरीन की तरह हिंदी पट्टी की लेखिकाएं सीना तानकर यह नहीं कह पातीं कि स्त्री का सबसे अधिक नुकसान धर्म और धार्मिक नीतियों-परंपराओं-स्थापनाओं-कट्टरपंथियों ने ही सबसे अधिक किया है।

कहा तो यही जाता है कि हिंदी का स्त्री-विमर्श बेहद आधुनिक एवं प्रगतिशील है लेकिन इस आधुनिकता और प्रगतिशीलता की भी अपनी 'सीमित सीमाएं' हैं। क्या नहीं...?

अक्सर देखा गया है कि जब भी तसलीमा नसरीन पर किसी प्रकार का 'लेखकिए' या 'निजी संकट' आया है, अपवादों को छोड़कर, हिंदी की साहित्यिक व लेखकिए बिरादरी ने चुप्पी साधे रखी है। बहुत हुआ तो एहसान भर को हस्ताक्षर अभियान चला लिया गया। लेकिन उसका भी कोई फायदा नहीं।

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, तसलीमा नसरीन पर मुकदमा दर्ज हुए। लेकिन हिंदी जगत में सन्नाटा है। वे उत्तर-आधुनिक लेखिकाएं भी चुप हैं, जिन्हें प्रायः मैंने फेसबुक पर बेहद ऊंची-ऊंची बातें करते-लिखते पढ़ा है, जिनकी निगाह में विवाह संस्था का कोई मोल नहीं है, जो दिल्ली बलात्कार मामले में आग-बबूला हो गईं थीं, बलात्कारियों को फांसी की सजा देने का फतवा दे दिया था, जिनकी निगाह में पुरुष की हैसियत दौ-कौड़ी की भी नहीं हैं, वे सब की सब तसलीमा मामले में बिल्कुल चुप हैं। और तो और, वे 'प्रगतिशील बुद्धिजीवि' भी चुप हैं, जिन्हें अरविंद केजरीवाल के भीतर भगत सिंह जैसा क्रांतिकारी और लाल बहादुर शास्त्री जैसा सादगी-पसंद नेता नजर आता है।

बहरहाल, तसलीमा नसरीन पर बौद्धिक बुद्धिजीवियों, उत्तर-आधुनिक लेखिकाओं की चुप्पी बहुत कुछ कहती है। शायद यही वजह है कि हमारे हिंदी साहित्य जगत में एक भी तसलीमा नसरीन नहीं है। क्योंकि बहुत कठिन है तसलीमा नसीन होना! क्या नहीं...?