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Thursday, 27 February 2014

खुशियों से दूरी

अपने आसपास के 'बेरूखे माहौल' को देखकर अक्सर यह सवाल मेरे जहन में कुलबुलाहट मचाता है कि क्या खुशियों ने हमने दूरी बना ली है या फिर हमहीं खुशियों की 'शीतल छाया' से दूर भागने लगे हैं? खुशियां हमसे छींटकर न जाने कहां, किस राह चली गई हैं? हम अपनी ही खुशियों को सहज और संवार नहीं पा रहे। दुख, चिंता, क्षोभ और भय का काला घेरा निरंतर हम पर गहराता चला जा रहा है। ऐसे भयंकर अवसादों के बीच हमने खुद को कुछ ऐसा सुप्त-सा बना लिया है कि हममें इन सब से लड़ने-भिड़ने की अब शक्ति ही नहीं बची है। जैसे हम अपनी जिंदगी और चल रहे संघर्षों से हार चुके हैं। न हमारे पास नया कुछ सुनाने को है न रचने को। जी केवल इसीलिए रहे हैं क्योंकि हमें वक्त को काटना है। तो क्या मान लिया जाए कि जिंदगी केवल वक्त काटने के लिए है, नया कुछ करने या बेहतर सोचने के लिए नहीं?

देखा गया है कि जिंदगी की मुश्किलों से हारे और हताश हुए लोगों के बीच निराशा की लकीरें कुछ ज्यादा ही गहरी हो जाती हैं। 'अब सब कुछ खत्म' की तर्ज पर वे बिना कुछ सोचे-समझे चल पड़ते हैं। माना कि मुश्किलें परेशान करती हैं। अथाह दुख देती हैं। कभी-कभी मन के भीतर इस कदर ऊब-सी भर देती हैं कि जीने तक की इच्छा समाप्त हुई सी जान पड़ती है। बस यहीं से शुरूआत होती है हमारी अवसाद में घिरते चले जाने और खुशियों से दूर होते जाने की। जबकि मुश्किलों के साथ संघर्ष करते हुए भी हम अपनी बची-कुची खुशियों के दम पर खुद को खुश रख सकते हैं। जिंदगी को संघर्ष और परेशानी के बावजूद थोड़ा सुकून दे सकते हैं। लेकिन नहीं हमारा 'नकारात्मक दृष्टिकोण' हमें ऐसा करने से रोकता रहता है। चीजों को जहां पर सहज बनाया जाना चाहिए वहां पर तरह-तरह के मानसिक विरोधाभास पैदा करता रहता है। वैचारिकता को नष्ट कर कुतर्कों में ढकेलता रहता है। और हम अपने धैर्य का दामन छोड़ शून्य में चलते चले जाते हैं। शून्य को अपना हमसफर बना लेते हैं। भूल जाते हैं कि अंधेरे के बीच से ही उजाले की किरन भी निकलती है।

लगता है खुशियां अब ईद का चांद सरीखी हो गई हैं हमारे लिए। जब चांद दिख जाता है, खुशी मिल जाती है। फिर उसके बाद मातम ही मातम। दरअसल, यह सब अपने-अपने सोचने और समझने का ढंग है कि हम अपनी खुशियों, मुश्किलों और संघर्षों को किस तरह से जीते व झेलते हैं। कुछ की आदत होती है तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी खुशियों को यथावत रखने की और कुछ मुश्किलों के समक्ष ऐसे समर्पण कर देते हैं मानों जिंदगी का अब कोई अर्थ ही न बचा हो! वे तो थोड़ी-बहुत मुश्किलों से भी पहाड़ जैसे परेशान हो जाते हैं। न कभी सकारात्मक सोचते हैं न ही करने की कोशिश करते हैं। अगर मुश्किलों और संघर्षों के आगे हमारे क्रांतिकारियों ने हार मान ली होती तो शायद आज हम आजाद मुल्क की खुली हवा में सांस नहीं ले रहे होते। यह आजादी हमें कितनी मुश्किलों और संघर्षों के बाद हासिल हुई है, इसे 'हारे हुए लोग' क्या जानें? उन महान क्रांतिकारियों ने तो तमाम कठिनाईयों के बीच भी आजादी की उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा था।

हम अपनी जिंदगी को जितना अधिक सीमित करते चले जाएंगे, हमसे जुड़ी चीजें भी उतनी ही सीमित होती चली जाएंगी। जिंदगी का हर एक पल हर एक एहसास के साथ जरूरी है। गहरे मायने रखता है। जिंदगी में अगर 'एहसास' नहीं तो फिर यह किस काम की! हमारी जिंदगी पर जितना हक मुश्किलों का है उतना ही खुशियों का भी। अब यह निर्भर हम पर करता है कि हम किसको कितना खुद पर हावी होने देते हैं। किससे कहां तक पार पाने या किसको कितना पास लाने में सफल होते हैं। मगर इन सब के वास्ते सकारात्मक दृष्टिकोण बेहद जरूरी है। चीजों के प्रति बिना सकारात्मकता हुए कुछ हासिल नहीं हो सकता।

मुश्किलों और दुखों के साथ जिंदगी को बोझ मानने वालों से मेरा बस इतना ही कहना है कि न हारो न ही अवसाद को ओढ़ो बस हर स्थिति में खुशी-खुशी संघर्ष करते रहो। देखना नकारात्मकता का दर्द खुद ही उड़न-छू हो जाएगा। यह समय खुशियों को दूर भागने का नहीं, उन्हें कैसे भी अपने करीब बनाए रखने का है, ताकि हम जिंदगी के सफर का साथ यूंही निभाते रहें। हर तरह की खुशियां जरूरी हैं। न भूलें छोटी-छोटी खुशियों को समेटकर ही बड़ी खुशियां बनती हैं।

Wednesday, 26 February 2014

ठहरा हुआ मार्क्सवाद

चित्र साभारः गूगल
कभी-कभी घोषित प्रगतिशील मार्क्सवादियों से बहस या तर्क करते वक्त बड़ी कोफत सी होती है। मार्क्सवादियों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अपने आगे किसी की चलने नहीं देते। न ही किसी को कुछ समझते हैं। आपका रूतबा उनकी निगाह में, तब तक ठीक बना रहता है, जब तक आपकी सहमति उनकी कथित प्रगतिशील विचारधारा के साथ बनी रहती है, लेकिन जहां भी आपने उनके मत पर असहमति प्रकट की, वे आपको ‘दृष्टिपंथी‘ या ‘संघी‘ घोषित करने में जरा भी वक्त नहीं लगाएंगे। पलभर में आपको अपना दुश्मन मान बैठेंगे। कह सकते हैं कि मार्क्सवादियों की निगाह में हर वो व्यक्ति संघी या फासिस्ट है, जो उनकी विचारधारा से असहमति रखता है।

दरअसल, मार्क्सवादी लोग विचारधारा को अपनी बपौती समझते हैं। उनका शुरू से यह मत रहा है कि दुनिया या समाज के भीतर जब भी, जो भी विचार जाए, उनके रास्ते होकर ही जाए। उनका ये भी मानना है कि बस एक अकेला मार्क्सवाद ही है, जो दुनिया को ‘बेहतर तरीके‘ से समझ और बदल सकता है। समाज में क्रांति ला सकता है। यानी अगर मार्क्सवाद को अपना लिया, तो समझो जीवन सफल हो गया। अगर वादों के सहारे ही जीवन सफल हो रहे होते या दुनिया बदल रही होती या क्रांतियों का संचार हो रहा होता, तो आज हमारे समक्ष यह विकट समय भी न होता! तब समय कुछ और होता और इंसान भी कुछ और। लेकिन वे तो हमेशा इसी कोशिश में लगे रहे कि किसी भी तरह से बस उनका वाद स्थापित होना चाहिए। वाद को स्थापित करने की चिंता जितनी मार्क्सवादियों को सताती रहती है, उनती ही दक्षिणपंथियों को भी। एक तरफ दक्षिणपंथी अपनी अंध-आस्थाओं से बाहर नहीं निकल पाए हैं, तो मार्क्सवादी अपनी घोषित प्रगतिशीलताओं से। वाद की इस लड़ाई में जन की भूमिका क्या रहनी चाहिए, इसकी फिक्र दोनों में से किसी को नहीं।

समय और परिस्थितियों के हिसाब से जिस तरह चीजें और विचारधाएं बदलती हैं, मार्क्सवादियों ने खुद को नहीं बदला। मार्क्सवाद ठस का ठस रहा। वही पूंजीवाद का विरोध। वही बाजार के खिलाफ कुतर्क। वही सत्ताओं के साथ समझौते। दशकों पहले जो मार्क्स कह और बता गए, मार्क्सवादी उसे ही ‘अंतिम सत्य‘ माने बैठे हैं और अब तक वही रटे चले जा रहे हैं। वे इस हकीकत को मानने-समझने को तैयार ही नहीं कि समय के साथ मार्क्स के सिद्धांत अब पुराने पड़ चुके हैं। उन सिद्धांतों में अब कोई दम-खम नहीं बचा है। पिटी-पिटाई लकीर को पिटते चले जाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला।

यह बात समझ से परे है कि आखिर क्यों मार्क्सवादी रह-रहकर पूंजीवाद और बाजार के विरोध में आन खड़े होते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि पूंजीवाद और बाजार हमारे समय की दो बड़ी अहम हकीकतें हैं। इन हकीकतों से आप चाहकर भी नजरें नहीं चुरा सकते। आज हमें विचारधाराएं कम, बाजार और पूंजीवाद अधिक चला रहे हैं। क्या करें यह दौर ही ऐसा है। आखिर ऐसे कितने मार्क्सवादी होंगे, जिन्होंने पूंजीवाद के विरोध में खड़े होकर भी पूंजी से अपना रिश्ता बनाए नहीं रखा है? ऐसे कितने मार्क्सवादी होंगे, जो बाजार के विरोधी होने के बावजूद अपने घर-परिवार में बाजार का सहारा नहीं लते है? बाजार आज हमारे बीच बहुत बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है। फिर बाजार से इतनी नफरत क्यों?

मार्क्सवादियों ने अजीब-सी जिद पाल रखी है कि बाजार और पूंजीवाद भी उनकी विचारधारा के हिसाब से चले। या फिर यह सब खत्म हो जाए। वे बाजार और पूंजीवाद को समाजवादी बनाना चाहते हैं। जबकि वे यह नहीं जानते कि बाजार और पूंजीवाद शुरू से ही समाजवादी रहे हैं। आखिर ऐसा कौन-सा गुनाह कर दिया है, बाजार और पूंजीवाद ने जो मार्क्सवादियों की विचारधाराओं पर खरे नहीं उतर पाते? शुक्र मनाइए कि बाजार ने ही हमें समाज के बीच साधे रखा है। समाज के बीच पूंजी का संचार सिर्फ बाजार के सहारे ही बढ़ा है। दो-तीन दशक में ही बाजार ने समाज के बीच तमाम तरह के बदलाव ला दिए, जो दशकों पुराना मार्क्सवाद अब तक न ला सका।

सवाल यह है कि मार्क्सवाद अब कहां लोकप्रिय रहा है? युवा पीढ़ी तो ढंग से न मार्क्सवाद की परिभाषा जानती है न ही मार्क्स को। दरअसल, इसमें गलती युवाओं की नहीं, उन कट्टर मार्क्सवादियों की है, जो मार्क्सवाद को उसकी जटिलताओं से बाहर निकालना ही नहीं चाहते। न ही चाहते हैं कि वे वैचारिक स्तर पर आधुनिक बने। हां, उत्तर-आधुनिकता का कंबल जरूर उन्होंने उस पर डाल दिया है, ताकि सब कुछ ढका-ढका ठीक-ठाक लगे। आज के समय में मार्क्सवाद की वैचारिक जटिलताओं के साथ आप युवाओं से यह आह्वन करें कि वे बाजार और पूंजी का साथ छोड़ दें, भला यह कैसे संभव हो सकता है?

युवा पीढ़ी जिन सपनों को हकीकत में बदलना चाहती है, उससे मार्क्सवाद ही क्या दुनिया का कोई भी वाद अपनी सहमति नहीं जतला सकता। युवा पीढ़ी की दुनिया, उनकी इच्छाएं, उनकी सोच का नजरिया इन तमाम ठहरे हुए वादों से बहुत अलग है। माना कि विचारधाराएं अपनी महत्ता रखती हैं, लेकिन वे न रोटी दिला सकती हैं न ही तकनीक के साथ चल सकती हैं। फिर सदियों पुरानी विचारधाराओं या वादों में बदलते समय के साथ अगर कोई बदलाव नहीं हो रहा, तो उससे मुक्ति ही बेहतर विकल्प है। मार्क्सवादी बुद्धिजीवि भले ही मार्क्सवाद को समाज और दुनिया के लिए बेहतर बताएं, लेकिन ऐसी बेहतरी से भी क्या हासिल, जो हमें युगों पीछे धकेल दे।

हाशिए पर पड़ा मार्क्सवाद किसी वर्ग का सहारा नहीं बन सकता। मार्क्सवाद को बदलना ही होगा। उसे समय के साथ अपनी विचारधाराओं और सिद्धांतों पर पुनर्रविचार करना ही होगा। अभी भी वक्त है ठहरे हुए मार्क्सवाद को पुनः ऊर्जावान और अधिक लचीला बनाने की। बाकी उनकी मर्जी।

Friday, 21 February 2014

सीरियस होना कैंसर से ज्यादा घातक

ध्यान नहीं पड़ता कि अंतिम दफा मैं कब 'सीरियस' हुआ था? क्यों सीरियस हुआ था? किसलिए सीरियस हुआ था? कहां सीरियस हुआ था? सीरियस होना दरअसल एक 'बीमारी' की तरह है। और, मैं यह कभी नहीं चाहूंगा कि मैं सीरियस होकर 'सीरियसली बीमारी' हो-बन जाऊं। मेरा मानना है, सीरियसली बीमार होना कैंसर से कहीं ज्यादा घातक बीमारी है। मगर फिर भी लोग सीरियस होते हैं। बहुत-से तो दिन के चौबीस घंटे ही सीरियस रहते हैं। और कमाल बात यह है कि वे खुद नहीं जानते कि सीरियस क्यों और किस बात पर हैं, लेकिन सीरियस रहते हैं। बेवजह ही अपने जीवन को सीरियसनेस के हवाले किए रहते हैं। सामने वाले से बात भी ऐसे करते हैं, मानो सीरियसनेस ने उन्हें इस कदर अपनी बाहों में जकड़ रखा है, जिससे वे मुक्त होना ही नहीं चाहते।

मैंने जीवन में तमाम ऐसे सीरियसखोरों को देखा है, जिनके माथे हर वक्त गंभीरता व चिंता की लकीरों से भरे होते हैं। चेहरे पर सीरियसनेस की 'मुरदई' छाई रहती है। मुंह से आवाज भी ऐसे निकालते हैं, जैसे सीरियसनेस के मारे शब्द जबान की नली में कहीं फंसे पड़े हों। कईयों की तो चाल ही सीरियस होती है। वे चलते नहीं केवल घिसटते हैं। ऐसे सीरियसखोरों को जिंदगी की रंगीनीयत और ताजगी से कोई मतलब नहीं होता। उन्हें यह भी मालूम नहीं होता कि जिंदगी में कितना कुछ कितनी तेजी से निरंतर अदल-बदल रहा है। वे हर नई तकनीक से दूर भागते हैं।

सच बताऊं, मैं इस टाइप के सीरियसखोरों से कोसों दूर रहता हूं। न उन्हें अपने करीब फटकने देता हूं, न खुद उनके करीब जाता हूं। क्योंकि मुझे सीरियस लोगों और खामखां की सीरियसनेस से बेहद नफरत है। सीरियसनेस जिंदगी के हर हंसीन और मस्त पलों को 'बदरंग' कर देती है।

हां, यह सच है कि जिंदगी में सुख-दुख लगे रहते हैं। जिंदगी में जितनी मात्रा में सुख हैं, उससे कहीं ज्यादा मात्रा में दुख। लेकिन हम केवल सुखों के साथ ही हंसते-मुस्कुराते हैं और दुखों के आते ही इतना हताश-परेशान हो जाते हैं कि जैसे अब सबकुछ 'समाप्त'।

किंतु मेरा सोचना-मानना इससे इतर है- जिंदगी में हम जितनी प्रफुल्लता के साथ सुखों का स्वागत करते हैं, उतने साहस के साथ दुखों के साथ संघर्ष क्यों नहीं कर पाते? दुख के आगे इतना सीरियस क्यों हो जाते हैं? जबकि दुख जिंदगी में हमें सीरियस करने नहीं बल्कि हर स्तर पर हमारी परीक्षा लेने आते हैं। जो दुख की इस परीक्षा में पास हो जाते हैं, वे 'सिकंदर' कहलाते हैं, और जो हार जाते हैं, वे 'डरपोक'।

देखो प्यारे, जिंदगी सीरियस होने का नहीं बल्कि खुलकर जीने का नाम है। उसी तरह से खुलकर जीने का, जिस तरह से फिल्म आनंद में आनंद जिया था। आनंद ने मृत्यु के अंतिम क्षणों तक हंसी और पॉजटीविटी का साथ नहीं छोड़ा। मरा भी तो सीरियस होकर नहीं बल्कि 'बिंदास जीवटता' के साथ। ओशो का चिंतन भी हमें हमेशा खुश और मस्त रहने को ही कहता है। ओशो ने तो सीरियस जीवन को सबसे खराब माना है। ओशो के नजरिए में तो मृत्यु भी एक 'उत्सव' की तरह है।

बहरहाल, दूसरों की तो नहीं जानता पर हां मैं अपनी जिंदगी को सीरियसनेस की गुलासी से सदैव मुक्त रखना चाहता हूं। वहां पर भी, जब दुख मेरे करीब हों। और वहां पर भी, जब मैं मृत्यु के करीब। कल को अगर मुझे जिंदगी का साथ छोड़ना पड़े तो कम से कम यह दाग मेरे साथ न जाए कि मैं बेहद सीरियसली चल गया। जाऊं तो ऐसे जाऊं कि अड़ोसी-पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार, लेखक-साहित्यकार, दुश्मन-दोस्त मुझ पर फक्र करें।

सीरियसनेस को बीमारी बनाने से बचें। और जो इस बीमारी में गहरे फंसे हुए हैं, वे जल्द से जल्द इस काल-कोठरी से बाहर निकल आएं। क्योंकि जिंदगी 'जिंदा-दिली' का नाम है, सीरियसली 'सीरियस' होकर रहने का नहीं। क्या समझे प्यारे...।

Wednesday, 19 February 2014

इस्तीफा तो बहाना था, भागना जिम्मेवारी से था

चित्र साभारः गूगल
जिनको अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे (या कहूं नौटंकी) पर दुखी या गंभीर होना है, वे शौक से हों। हो सके तो अरविंद केजरीवाल को 'शहीद' का दर्जा भी दे लें। या फिर उन पर कोई वीर रस प्रधान कविता भी लिख दें। फिर भी, इससे न अरविंद केजरीवाल का कद ऊंचा होगा, न उन्हें समझदार राजनीतिज्ञ की श्रेणी में ही रखा जाएगा। दरअसल, जिस प्रकार की राजनीति या आंदोलन अरविंद केजरीवाल ने की है, उसमें परिपक्वता नहीं, अराजकता ही देखने को मिली है। अपनी ऐंठ के दम पर न केवल राजनीति बल्कि लोकतंत्र को भी वे अपना गुलाम बनाए रखना चाहते हैं। वे यही चाहते हैं कि जनता केवल उन्हें ही ठीक, उन्हें ही ईमानदार, उन्हें ही पवित्र माने; बाकी सब को बेईमान या चोर। देश और राजनीति के बीच केवल उन्हीं की पार्टी जीवित रहे बाकी सब समाप्त हो जाएं। क्योंकि केवल वे ही ईमानदारी की राजनीति करते हैं, बाकी सब देश के दुश्मन हैं।

दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर उन्होंने बहादुरी का नहीं, कायरता का ही परिचय दिया है। मु्द्दों से भागकर और गद्दी को न संभाल पाने की हताशा ने उन्हें सबसे आसान रास्ता चुनने को विवश किया- इस्तीफा देकर। इस इस्तीफे ने जनता को ठगा है। उसके साथ न्याय नहीं किया है।

दरअसल, अरविंद केजरीवाल के भीतर महान होने की बहुत जल्दी है। महान होने के लिए चाहे उन्हें कुछ भी करना पड़े, करेंगे। दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना, जन-मुद्दों के तहत नहीं, बल्कि खुद को महान घोषित करवाने के लिए था। आप ने मुद्दे ही ऐसे चुने थे, जिन पर जनता तुरंत लड्डू होकर वोट दे दे। आप ने जनता के वोटों का इस्तेमाल जनता के लिए नहीं केवल अपने राजनीति भविष्य और महत्त्वाकांक्षाओं के लिए किया। न न करते-करते पहले अपनी दुश्मन नंबर एक पार्टी से समझौता कर समर्थन लिया, सरकारी सुविधाओं का जमकर लाभ उठाया और फिर जब बाद में गद्दी संभाल पाने में दिक्कतें पेश आने लगीं, तो एक जरा-सी बात पर इस्तीफा दे दिया। अरविंद केजरीवाल का यह इस्तीफा बेवजह था। उनमें अगर राजनीति करने का दम नहीं, तो फिर यहां आए किसलिए हैं। राजनीति में लफ्फबाजियां थोड़े ही दिन की मेहमान होती हैं मान्यवर। जनता जब जवाब मांगती है, तो अच्छे-अच्छे नेता की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है।

मानाकि जनलोकपाल कानून जरूरी है। मगर उससे पहले जो वायदे जनता से किए थे आप ने, कम से कम उसे तो निभाते। यह मत समझिए कि बिजली सस्ती या पानी मुफ्त कर आपने कोई किला जीत लिया। या ऑडिट का शगुफा छोड़कर कोई अनोखा काम कर दिया। भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार का हल्ला काटकर, दरअसल, आप लगातार जन-मुद्दों से भागती रही। जबकि मालूम उसे भी था कि किए गए वायदों को पूरा कर पाना उसके बस की बात नहीं। लेकिन क्या कीजिएगा, जब सत्ता और कुर्सी का लालच मन में आ जाए।

आप ने 49 दिन में ठीक वही किया, जो अब तलक तमाम राजनीति दल करते आए हैं। हो सकता है, आप के प्रेमियों को आप के भीतर-बाहर अलग तरह की राजनीति नजर आई हो, लेकिन मुझे यह कोरी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से ज्यादा कुछ नहीं लगी। आप ने न केवल राजनीति बल्कि लोकतंत्र को भी मजाक बनाकर रख दिया। अरविंद केजरीवाल में लोगों को नेता की नहीं, मनोरंजन की छवि दिखाई देने लगी। सारी नैतिकताओं की जिम्मेवारी आप वालों से दूसरों के लिए छोड़ दी और खुद अनैतिकता की राजनीति करके अपनी पीठ थपथपाते रहे। सोमनाथ भारती को पद से न हटाकर आप ने गलत का ही बचाव किया।

अरविंद केजरीवाल को समझना चाहिए, राजनीति बेमतलब के धरना-प्रदर्शनों या बच्चों का खेल नहीं है। राजनीति में कई दफा खुद को साबित करने के लिए बहुत-सी कठिनाईयों का सामना भी करना पड़ता है। ऐसा थोड़े होता है कि एक मुद्दे पर बात नहीं बनी, तो तुरत-फुरत में इस्तीफा देकर, चोर दरवाजे से निकल लिए। अगर आप में विपक्ष से मुद्दों पर लड़ने का नैतिक साहस नहीं, तो राजनीति में न आइए। किसी मंदिर में बैठकर ध्यान-भजन-कीर्तन कीजिए। कांठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है, बार-बार नहीं। जनता आप से अधिक समझदार है। सब देख रही है। सब समझ भी रही है। और साथ-साथ, आपकी राजनीति चाहतों को भी पहचान रही है। दुनिया में एक होशियार आप ही नहीं हैं मान्यवर और भी हैं।

आप का असली मकसद 2014 के चुनाव हैं। जनता को तो इसीलिए बरगला लिया था, ताकि सहानुभूति बटोरी जा सके। अगर जनता की इतनी परवाह आप को थी, तो अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफे से पहले जनता की राय क्यों नहीं ली? और क्यों नहीं राय मांगी जनता से आप के बीस चुनावी उम्मीदवारों के लिए? मतलब, जहां अपनी गोट फंसे वहां जनता की राय का बहाना बनाकर साफ बच लो। और जहां राजनीति का मक्कखन चखने की बारी आए, जनता को चाय में से मक्खी समझ बाहर निकल दो। यह राजनीति बढ़िया है आपकी।

बहरहाल, चुनाव दूर नहीं। पता चल जाएगा दिखावटी ईमानदारियों और सादगियों में कितना दम है और कितने बे-दम।

Monday, 10 February 2014

'आप' ने अब तक क्या बदला?

चित्र साभार- गूगल
आम आदमी पार्टी (आप) के बहाने निरंतर बदलाव की बात कही जा रही है। हर कोई आप में राजनीति, समाज और व्यवस्था का 'स्वर्ण भविष्य' तलाश रहा है। सब, अपवादों को छोड़कर, यह माने बैठे हैं कि केवल आप ही बदलाव व अलग तरह की राजनीति देश को दे सकती है। अलग तरह की राजनीति का तो पता नहीं लेकिन हां आप के हाव-भाव से 'तानाशाही' किस्म की राजनीति का मंजर खूब देखने-सुनने को मिल रहा है। आप की तानाशाही किस्म की राजनीति में जनता के मुद्दों पर ध्यान कम, अपने-अपने निजी व राजनीतिक हितों को साधने-संवारने पर जोर अधिक दिया जा रहा है। दिल्ली में बिजली-पानी सस्ती या मुफ्त कर देने भर से ही वे यह समझने लग गए हैं कि उन्होंने न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश का दिल 'जीत' लिया है। जबकि देश केवल दिल्ली नहीं है। न ही राजनीति केवल दिल्ली तक सीमित है।

बेशक, आप-भक्तों को लगता हो कि एक महीने से ज्यादा समय में आप ने दिल्ली में बहुतेरे बदलाव कर दिए। चलिए मान लेते हैं कि बदलाव हुए हैं, किंतु ये बदलाव दिखाई क्यों नहीं दे रहे? बदलावों पर 'जुबानी खेल' क्यों खेला जा रहा है? बदलाव के बहाने सिर्फ अपनी पीठ ही क्यों थपथपाई जा रही है? जबकि हकीकत यह है कि आप में न दिल्ली, न देश में बदलाव लाने की ताकत ही नहीं है। आप में बदलाव का रास्ता 'अराजकता' की बंद गलियों से होकर गुजरता है।

बेफालतू के धरना-प्रदर्शन या भाषाई ऐंठ से देश या समाज नहीं चलता मान्यवर अरविंद केजरीवालजी। अक्सर आपकी यह जिद्द किसी बच्चे की जिद्द सरीखी लगती है कि अगर मुझे यह नहीं मिला, तो मैं धरने पर बैठ जाऊंगा या आंदोलन करूंगा। इसका क्या मतलब है? आप राजनीति करने आए हैं या धरना-प्रदर्शन के जरिए अराजकता फैलाने।

बदलाव की बात तो तब हो, जब आप के पास कोई 'वैचारिक-दृष्टि' हो। आप एक विचार-विहीन दल ('एनजीओ'- कहना ज्यादा मुनासिब होगा) है। इसीलिए वे प्रत्येक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक मुद्दे पर तर्क-वितर्क को महत्त्व देने के वजाए कुतर्क ही ज्यादा करते हैं। लगता ही नहीं कि यह किसी राजनीतिक दल की प्रतिक्रिया है। और, दावा इस बात का करते हैं कि हम दूसरे दलों को राजनीति सीखाने आए हैं। वाह! आप से अपनी राजनीति संभल नहीं रही, दूसरों को राजनीति सिखाने का दम भर रहे हैं। इसी ऐंठ ने आप को तानाशाही किस्म के राजनीति दल में तब्दील कर दिया है।

साथ-साथ, आप में अपने खिलाफ असहमति को सुनने का माआदा नहीं है। इसीलिए आप वालों को हर वो शख्स किसी न किसी राजनीतिक दल या नेता का 'एजेंट' नजर आता है, जो आप की तानाशाही नीतियों-नियमों के खिलाफ लिखता-बोलता है। फिर भी, आप के सदस्य यह कहते नहीं थकते कि हममें हर असहमति, हर आलोचना को सुनने का साहस है। अगर साहस होता तो हर बार प्रेस-कॉन्फ्रेंस करके अरविंद केजरीवाल बात-बात पर अपनी सफाईयां पेश नहीं कर रहे होते। अपनी ईमानदारी के 'मीडियाई प्रदर्शन' में न लगे होते।

गौरतलब है, अब उन्हें मीडिया में भी खोट नजर आने लगी है। मीडिया भी उन्हें बिका हुआ लगने लगा है। कल तक यही मीडिया जब आप को हीरो बनाए हुए था, अरविंद केजरीवाल में 'क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व' को दिखला रहा था, आप के धरने पर जमा भीड़ पर उत्साहित हो रहा था, तब किसी आप वाले को मीडिया में कहीं कोई खामी या खराबी नजर नहीं आई। हर आप वाला बेताब रहता था कि किसी तरह चैनलों पर हमारे चेहरे चमकते रहें। समूचे मीडिया का समर्थन हमें ही मिलता रहे। इस तिकड़म का फायदा पाकर ही अरविंद केजरीवाल ने ईमानदारी का मुखौटा पहना और आप के बहाने चेहरा-प्रदर्शन करते रहे। लेकिन इधर कुछ मीडिया वालों ने आप पर जरा निगाहें टेढ़ी कीं, तो उन्हें मीडिया बिका हुआ लगने लगा। अमुख-प्रमुख पार्टी का एजेंट नजर आने लगा। यह अच्छा है। मीठा-मीठा गप-गप, कड़वा-कड़वा थू-थू।

गजब यह है कि बुद्धिजीवि-प्रगतिशील बिरादरी को आप का व्यवहार जायज दिख रहा है। उन्हें आप और अरविंद केजरीवाल में विचार और परिवर्तन की राजनीति महसूस हो रही है। आप की तारिफ में प्रगतिशील बुद्धिजीवि चिकने-चिकने लेख लिख रहे हैं। चैनलों की बहसों में अरविंद केजरीवाल को 'राजनीति का महानायक' घोषित करने पर तुले हैं। इस वक्त बुद्धिजीवियों को आप से बेहतर और ईमानदार दूसरा कोई नजर ही नहीं आ रहा।

आप की बटरिंग में लगे बुद्धिजीवियों को लग रहा है कि शायद इस बहाने उन्हें भी अपनी 'राजनीतिक महत्त्वाकाक्षाओं' को साधने-संवारने का मौका मिल जाए। नेता बनने का शौक किसे नहीं होता। अब तो कई जाने-माने पत्रकार भी आप की गोद में जाकर बैठ गए हैं। अब उन्हें आप के अलावा सब बेईमान लगते हैं। बात-बात में ईमानदारी का गाना ऐसे गाते हैं, मानों दुनिया में एक अकेले ईमानदार आप वाले ही हैं।

बुद्धिजीवियों को बड़ी मिर्ची लगी थी, जब चेतन भगत ने आप को 'आइम-गर्ल' के नाम से नवाजा था। तब चेतन भगत बाजार के लेखक और उनका लेखन दो-कौड़ी का हो गया था। वैसे भी, हिंदी के बुद्धिजीवि-लेखक-साहित्यकार चेतन भगत से अपना छत्तीस का आंकड़ा रखते हैं। शायद उनके भीतर खुद चेतन भगत न बन पाने का मलाल रहता हो।

आम आदमी के नाम पर पार्टी खड़ी करके आप वालों ने आम आदमी को ही 'ठेंगा' दिखा दिया है। तब ही तो बात बिजली-पानी से आगे बढ़ नहीं पा रही। दिल्ली में सरकारी काम कम, घुड़कीबाजी ज्यादा हो रही है। कभी धरने की धमकी तो कभी इस्तीफे की धमकी। इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री महोदय शहादत का सेहरा फ्री में अपने सिर पर बांधना चाहते हैं। आप का जनलोकपाल न हुआ चूं-चूं का मुरब्बा हो गया। जैसे जनलोकपाल के आ जाने से समूचा तंत्र सुधर जाएगा। सब के सब ईमानदार होकर आप में शामिल हो जाएंगे। अरविंदजी, अगर आप से दिल्ली की गद्दी नहीं संभल पा रही तो छोड़ क्यों नहीं देते? खामखां, इस्तीफे की धमकी देकर जनता को क्यों बरगला रहे हैं? यह क्यों नहीं मान लेते कि आप राजनीति में नहीं तानाशाही में विश्वास रखते हैं। अगर जन-हित के लिए ही राजनीति में आए होते, तो ऐंठ से नहीं शालीनता से गद्दी संभाले होते।

सच तो यह है कि आम आदमी को न आप ने कुछ दिया और न ही उसे अब तलक अन्य राजनीति दलों से कुछ मिला। आम आदमी तो बस 'वोट बैंक' के रूप में ही इस्तेमाल हुआ है- हो रहा है। हर दल, हर नेता अपने-अपने राजनीतिक हितों को बनाने में लगा हुआ है। जनता की चिंता किसे है। जिनसे जनता ने थोड़ी बहुत उम्मीद रखी भी थी, वे जिद्द और धरने की उद्दंडता से बाहर ही नहीं निकल पाए हैं। बदलाव या परिवर्तन कहीं नहीं हुआ है, फिर भी जिन आप समर्थक बुद्धिजीवियों को ऐसा लगता है, उनकी सोच-बुद्धि पर मुझे सिर्फ 'तरस' आता है।

Saturday, 8 February 2014

तसलीमा नसरीन होने के मायने

चित्रः साभार- गूगल
फिलहाल, यह दावा तो नहीं करूंगा कि मैंने तसलीमा नसरीन को बहुत पढ़ा है। पर जितना भी पढ़ा है, वो बहुत से कम भी नहीं है। एक लेखक के लेखन की 'वैचारिक प्रतिबद्धता' को समझने के लिए यह जरूरी नहीं कि उसे बहुत पढ़ा जाए, कम पढ़कर भी हम उस लेखक को जान-पहचान सकते हैं। बेशक, तसलीमा के लेखन में 'भाषाई सुंदरता' या 'शाब्दिक अठखेलियां' न हों, फिर भी, तसलीमा का लेखन न केवल प्रभावित करता है बल्कि दिमाग की मांस-पेशियों को झंकझोर कर रख देता है। तसलीमा को पढ़ते हुए कई दफा यह ख्याल मन में आता है कि इतना तेज और स्पष्ट कोई लेखिका कैसे लिख सकती है! खासकर, धर्म और कट्टरवादी मानसिकता के खिलाफ।

लेकिन तमाम जोखिमों के बावजूद तसलीमा ने धर्म, धार्मिक कट्टरता, विक्षिप्त मानिसकता पर न सिर्फ खुलकर लिखा बल्कि बोला भी है। इस 'बेबाकी' की कीमत तसलीमा को गाहे-बगाहे चुकानी भी पड़ी है। पिछले लगभग बीस सालों से तसलीमा अपने देश से बाहर निर्वासित-सी जिंदगी जीने को मजबूर है। जिंदगी में कई बार ऐसे मौके आए हैं, जब तसलीमा को अपने विरोधियों (या कहें दुश्मनों) का प्रत्यक्ष सामना करना पड़ा। तसलीमा को सिर कलम करने तक की धमकी कट्टपंथियों द्वारा मिल चुकी है।

मगर हर दुश्वारी में तसलीमा ने कभी किसी कट्टरपंथी दल या व्यक्ति विशेष से 'माफी' नहीं मांगी। अपनी बात पर कायम रही। और अपने विरोधियों से हमेशा यही बोला कि उन्हें बुरा-भला कहने से पहले एक दफा उन्हें ठंडे दिमाग से पढ़ा जाए। लेकिन बंद-दिमागों के पास इतना दिमाग नहीं होता कि वो विचार या रचनात्मकता की महत्ता को समझ सकें। उनका पेट तो सिर्फ विरोध करने-करवाने से ही भरता है।

हिंदी लेखन में जिस स्त्री-विमर्श पर हम अक्सर बल्लियों उछलते हैं या एकाध लेख या लेखिका के आधार पर ही इसे समूची स्त्री-जाति की आवाज कह-मान लेते हैं, उनके बीच तसलीमा नसरीन कहीं दिखाई नहीं देती। जबकि तसलीमा बांग्ला-लेखिका होने के साथ-साथ हिंदी की भी लेखिका है। भले ही उनके लेखों का अनुवाद हिंदी में आता हो। यों भी, लेखक का किसी भी भाषा का होना या न होना इतना मायने नहीं रखता जितना कि उसका लेखन।

असल में, आलोचना और समीक्षा की तरह ही हमने स्त्री-विमर्श को भी एक बने-बनाए दायरे में सिमेट दिया है। इसी 'सीमित दायरे' के भीतर रहकर स्त्री अपने विमर्श को करती रहती है। पुरुष को केंद्र में रखकर दो-चार क्रांतिकारी लेख लिख दिए जाते हैं। लेकिन धर्म को छूने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता। तसलीमा नसरीन की तरह हिंदी पट्टी की लेखिकाएं सीना तानकर यह नहीं कह पातीं कि स्त्री का सबसे अधिक नुकसान धर्म और धार्मिक नीतियों-परंपराओं-स्थापनाओं-कट्टरपंथियों ने ही सबसे अधिक किया है।

कहा तो यही जाता है कि हिंदी का स्त्री-विमर्श बेहद आधुनिक एवं प्रगतिशील है लेकिन इस आधुनिकता और प्रगतिशीलता की भी अपनी 'सीमित सीमाएं' हैं। क्या नहीं...?

अक्सर देखा गया है कि जब भी तसलीमा नसरीन पर किसी प्रकार का 'लेखकिए' या 'निजी संकट' आया है, अपवादों को छोड़कर, हिंदी की साहित्यिक व लेखकिए बिरादरी ने चुप्पी साधे रखी है। बहुत हुआ तो एहसान भर को हस्ताक्षर अभियान चला लिया गया। लेकिन उसका भी कोई फायदा नहीं।

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, तसलीमा नसरीन पर मुकदमा दर्ज हुए। लेकिन हिंदी जगत में सन्नाटा है। वे उत्तर-आधुनिक लेखिकाएं भी चुप हैं, जिन्हें प्रायः मैंने फेसबुक पर बेहद ऊंची-ऊंची बातें करते-लिखते पढ़ा है, जिनकी निगाह में विवाह संस्था का कोई मोल नहीं है, जो दिल्ली बलात्कार मामले में आग-बबूला हो गईं थीं, बलात्कारियों को फांसी की सजा देने का फतवा दे दिया था, जिनकी निगाह में पुरुष की हैसियत दौ-कौड़ी की भी नहीं हैं, वे सब की सब तसलीमा मामले में बिल्कुल चुप हैं। और तो और, वे 'प्रगतिशील बुद्धिजीवि' भी चुप हैं, जिन्हें अरविंद केजरीवाल के भीतर भगत सिंह जैसा क्रांतिकारी और लाल बहादुर शास्त्री जैसा सादगी-पसंद नेता नजर आता है।

बहरहाल, तसलीमा नसरीन पर बौद्धिक बुद्धिजीवियों, उत्तर-आधुनिक लेखिकाओं की चुप्पी बहुत कुछ कहती है। शायद यही वजह है कि हमारे हिंदी साहित्य जगत में एक भी तसलीमा नसरीन नहीं है। क्योंकि बहुत कठिन है तसलीमा नसीन होना! क्या नहीं...?