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Saturday, 12 April 2014

बदलते समय के साथ भाषा को भी बदलना चाहिए

भाषा किसी लेखक, किसी साहित्यकार, किसी बुद्धिजीवि, किसी भाषाविद या संप्रदाय की गुलाम नहीं होती। न भाषा को किन्हीं स्थापित दायरों में बांधकर रखा जा सकता है। भाषा का स्वभाव स्वतंत्र होता है। और स्वतंत्र ही रहना चाहिए। भाषा जितनी स्वतंत्र रहेगी, उतना ही विकसित होगी।

साहित्य में सबसे अधिक सवाल हिंदी भाषा के चाल-चलन पर उठाए जाते हैं। हर समय बस यही रोना मचा रहता है कि अंगरेजी हिंदी का अहित कर रही है। या फिर हिंदी के साथ प्रयुक्त होने वाली हिंग्लिश को बुरा-भला कहा जाता है। तर्क दिया जाता है- हिंग्लिश ने हिंदी भाषा के बीच घुसपैठ कर भाषा की पवित्रता को नष्ट कर दिया है। क्या वाकई ऐसा है? क्या हिंग्लिश हिंदी भाषा के स्वभाव, उसकी महत्ता को खत्म कर रही है? फिलहाल, जो कथित हिंदी-प्रेमी साहित्यकार या भाषाविद ऐसा मानते हैं, मानें, पर मैं ऐसा कतई नहीं मानता।

हिंदी भाषा के साथ अगर अंगरेजी के शब्द प्रयोग किए जा रहे हैं या हिंदी को हिंग्लिश की शक्ल में लिखा-बोला जा रहा है, तो इसमें हर्ज ही क्या है? यह बदलते जमाने की भाषा है। इस भाषा में नई तरह की ताजगी और बनावट है। यह नई पीढ़ी, नए जमाने की भाषा है। साथ-साथ, अगर यही भाषा साहित्य या शब्दकोश में भी प्रयोग की जा रही है, तो इतनी परेशानी क्यों?

यह जरूरी नहीं कि जो-जैसा साहित्य जिस भाषा में पुराने या वरिष्ठ साहित्यकारों-कहानीकारों ने लिखा, युवा पीढ़ी भी वैसा ही लिखे। वो भी उन जमे-जमाए, ठस्स शब्दों का ही प्रयोग करे, जैसा उनके पूर्वजों ने किया था। यह तो एक प्रकार का यथास्थितिवाद कहलाएगा। समय के साथ-साथ जैसा परिवर्तन मनुष्य के स्वभाव या रहन-सहन में आता है, ठीक ऐसा भाषा में भी आना चाहिए। उस जमाने के साहित्यकारों ने तब की प्रचलित भाषा में लिखा, अब के आज की प्रचलित भाषा के हिसाब से लिख रहे हैं, फिर किंतु-परंतु किसलिए?

दरअसल, ओम थानवी के लेख 'वर्धा के समावेशी' (जनसत्ता, 2 मार्च, 2014) को पढ़ने के बाद मुझे तो यही लगा कि वे हिंदी भाषा या शब्दकोश में अंगरेजी (हिंग्लिश) के प्रयोग को खतरनाक मानते हैं। खतरानक मानने की तमाम वजहें हालांकि उन्होंने गिनाई भी हैं लेकिन आज के टेक्नोओरियंटीड टाइम में ऐसी वजहों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। यह उनकी यथास्थितिवादी सोच है भाषा के प्रति।

थानवीजी लिखते हैं- 'विभूतिनारायण राय को संस्कृत से चिढ़ और अंगरेजी से मोह क्यों है? मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि भाषा के मामले में वे एक विकृत सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं।' क्या थानवीजी बताएंगे, आज के जमाने में कितने लोग संस्कृत पढ़ते-बोलते हैं? अपने ही अखबार 'जनसत्ता' में अब तक कितने लेख उन्होंने संस्कृत में या संस्कृत भाषा पर छापे हैं? क्या वे अपने फेसबुक या टि्वटर के स्टेटस संस्कृत में लिखना पसंद करेंगे? कितने स्कूल, कितने विश्वविद्यालय संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने पर जोर दे रहे हैं? न न मैं संस्कृत के महत्त्व पर सवाल नहीं उठा रहा, यकीनन संस्कृत एक समृद्ध भाषा है। लेकिन अफसोस अब चलन में नहीं है। न अब कोई संस्कृत पढ़ना चाहता है, न ही पढ़वाना। जमाने की रफ्तार में संस्कृत बहुत पीछे छूट गई है हुजूर।

और हां अंगरेजी से मोह रखना कोई अपराध तो नहीं थानवीजी। हजारों लोग रखते हैं। हिंदी पढ़ने-लिखने वाले भी रखते हैं। अंगरेजी पढ़ने वाले हिंदी के प्रति मोह रखते हैं। इसमें हिंदी भाषा को खारिज करने वाली बात कहां से आ गई। हर भाषा, चाहे वो हिंदी हो या अंगरेजी या तमिल हो या उर्दू, सबका अपना महत्त्व है। अपनी प्रतिष्ठा है।

हर रोज सैकड़ों शब्द हिंदी-अंगरेजी (हिंग्लिश) के हमारी बोल-चाल, लिखत-पढ़त में आ रहे हैं। अगर ये शब्दकोश में शामिल हो रहे हैं, तो गलत क्या है?

भाषा में प्रयोग निरंतर होते रहने चाहिए। प्रयोग नहीं होंगे तो भाषा जड़ हो जाएगी। उसमें ताजगी बनी नहीं रहेगी। आज फेसबुक, टि्वटर, व्ह्टसएप की भाषा ही चलन और प्रयोग में है। यही अगर हिंदी साहित्य या शब्दकोश में आ रही है, तो इसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।

Saturday, 5 April 2014

चुनाव में वामपंथ कहां है?

चुनाव में वामपंथ कहां है! बहुत चाहता हूं कि यह विचार दिमाग में न आए। लेकिन फिर भी किसी न किसी बहाने आ ही जाता है। विचार को आप रोक नहीं सकते। विचार स्वतंत्र होता है- कहीं भी आने-जाने के लिए। मगर यह विचार कुछ ऐसा है, जो न केवल मुझे 'परेशान' करता है बल्कि सवाल भी पूछता है। मैं जानता हूं कि इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है। और न ही वामपंथियों के पास है। फिर भी सवाल जायज है।

पूरे चुनावी परिदृश्य पर वामपंथ का 'असर' कहीं नजर नहीं आ रहा। न कोई वामपंथी चुनावी सभा करते दिखाई दे रहा है न व्यक्तिकेंद्रित राजनीति पर 'प्रतिवाद' करते। ऐसा लग रहा है मानो वामपंथियों ने 'हथियार' डाल दिए हैं! तो क्या हम यह मान लें कि अब राजनीति वामपंथियों के बस की बात नहीं रही? या फिर वामपंथियों ने खुद को 'हाशिए' पर धकेल कर अपना 'अंत' खुद ही कर लिया है?

जिस तरह का राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक माहौल है देश के भीतर, ऐसे में वामपंथियों की 'भूमिका' मुख्य होनी चाहिए थी। उन्हें आगे बढ़कर न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी अपनी बात जोरदार तरीके से रखनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा होता कहीं कुछ न दिखाई देता है न सुनाई। पता नहीं किस दुनिया में विचरण कर रहे हैं कॉमरेड लोग? और न जाने क्यों 'अकेला' छोड़ दिया है वामपंथ को?

तमाम राजनीतिक दलों के बीच एक वामपंथी दल ही ऐसा है, जिसके पास अपने 'विचार' हैं, दृष्टि है, सोच है, मगर अफसोस अब यह वाद बे-वाद होकर रह गया है। वामपंथ के विचारों को जनता के बीच ले जाने का शायद समय ही नहीं है वाम दलों के पास? एक समस्या यह भी है कि बदलते वक्त के साथ वामपंथी दलों ने अपने विचारों को बदलने की कोशिश कभी नहीं की। वाम दल आज भी अपने उन्हीं पुराने विचारों से जुड़े हैं। नए को अपने भीतर आने की जगह ही नहीं देते। उसी पुराने ढर्रे पर चलकर न आप जनता से जुड़ सकते हैं न ही राष्ट्रीय राजनीति से। हम मानते हैं कि विचारों के साथ वामपंथ ने लंबा सफर तय किया है लेकिन बदलना भी जरूरी है। मैं यह नहीं कह रहा कि वामपंथी दल अपने विचारों से 'बिल्कुल कट' जाएं पर समय के साथ उन्हें इतना 'लचीला' तो बनाएं ही ताकि युवा वर्ग इससे जुड़ सके। आज कितने युवा वामपंथ को समझते-जानते हैं? जिस तरह का युवा वर्ग का टेस्ट है, उसमें वामपंथ कहीं फिट नहीं बैठता।

यह सही है कि अब चुनावों में 'धन-बल' और 'व्यक्ति-विशेष' की भूमिका तेजी बढ़ती जा रही है। इसका सबसे अधिक नुकसान जनता को ही हो रहा है। हर बार की तरह चुनावों में 'हवाई घोषणाएं' तो हो जाती हैं किंतु उनका 'पालन' नहीं होता। घोषणापत्रों में तमाम बड़ी-बड़ी बातें तो दर्ज हो जाती हैं पर वे घोषणापत्र से बाहर नहीं निकल पातीं। ठगी अंततः जनता ही जाती है। कहने को कह-मान लीजिए हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं फिर भी यहां चलती नेता और राजनीतिक दलों की ही है। ऐसे में वामपंथ का हस्ताक्षेप आवश्यक हो जाता है। परिदृश्य पर कोई दल तो ऐसा होना चाहिए, जो जनता के प्रति वादे नहीं अपनी 'प्रतिबद्धता' जाहिर करे। जो कहे, वो करके भी दिखाए।

बीच में ऐसी कुछ संभावनाएं 'आप' (आम आदमी पार्टी) में नजर आईं थीं लेकिन अब वो भी 'व्यक्ति' और 'मीडिया' केंद्रित हो गई है। आंदोलनों की परंपरा को आप ने 'अराजकता' में तब्दील कर दिया। अरविंद केजरीवाल के चेहरे पर से आम आदमी का मुखौटा तब ही उतर गया था, जब उन्होंने कांग्रेस के रहम पर अपनी सरकार बनाई थी और मात्र 49 दिनों में ही 'पस्त' होकर मैदान छोड़ भागे थे।

इन्हीं सब से वैचारिक एवं राजनीतिक प्रतिवाद और संघर्ष के लिए वामपंथ का केंद्र में रहना जरूरी हो जाता है। 'आप' (आम आदमी पार्टी) के पास विचार नहीं पर वाम के पास तो हैं। तब बहुत अफसोस हुआ था जब एक बड़े कॉमरेड नेता ने 'आप' की तारीफ यह कहते हुए की थी कि यह देश में बदलाव ला सकती है। आप के रहते देश-समाज-राजनीति में क्या बदलाव आए, शायद बताने की जरूरत नहीं।

जो हो लेकिन वामपंथ को पुनः राष्ट्रीय व क्षेत्रिय राजनीति में वापसी करनी ही होगी। वामपंथियों को 'नींद' से 'जागना' ही होगा। अगर वामपंथ और वामपंथी दल राजनीति एवं समाज के बीच से ऐसे ही 'खिसकते' रहे तो एक दिन 'गुमनामी के अंधेरे' में कहीं खो जाएंगे।