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Monday, 30 June 2014

असहमति की गुंजाइश

चित्र साभारः गूगल
अजीब-सी बात हैय न समाज न साहित्य में आप किसी से असहमत नहीं हो सकते। असहमत होने का मतलब है हुक्का-पानी बंद। असहमति को इतनी बुरी निगाह से देखा जाने लगा है कि संवाद की हर गुंजाइश खत्म-सी होती जा रही है। समाज और साहित्य के लोगों से सहमत होकर बस उनकी तारीफों के पुल बांधते रहिए तब तो ठीक है, लेकिन उनके खिलाफ जरा-भी असहमति को प्रकट मत होने दीजिए क्योंकि कब, कौन, कहां, किस बात का बुरा मान जाए। बुरा मानने को लोग अब अपना 'चरित्र हनन' जैसा समझने लगे हैं।

भला यह कैसे संभव है कि इतने विशाल समाज और वैचारिक साहित्य के बीच कहीं कोई असहमति का स्वर न उठे। समाज में हर तरह के लोग मौजूद हैं। सबकी अपनी अलग-अलग विचारधाराएं हैं। इनमें से कुछ का स्वभाव सहमति का रहता है तो कुछ का असहमति का। सहमति को सुनना-समझना-जानना उतना ही जरूर है, जितना कि असहमति को। समाज के लोगों के बीच जब तक असहमति को सुनने का धैर्य नहीं होगा, समाजिकता भला कैसे बची रहेगी। कैसे हम यह यकीन कर पाएंगे कि केवल समाने वाला ही सही है बाकी सब गलत। गलत को गलत साबित करने के लिए असहमति का होना जरूरी है।

साहित्य को हम विचार की दुनिया कहते-मानते आए हैं। साहित्य में विचार की प्रसांगिकता टिकी ही सहमति और असहमति के बल पर है। अब अगर साहित्य में भी असहमति को गैर-वाजिब समझा जाएगा तो फिर संवाद की तो संभावना ही समाप्त हो जाएगी। साहित्य विचार के साथ-साथ सहमति-असहमति की भी समान छूट देता है। सहमति-असहमति को साधने में संवाद महत्तवपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन जिस तरह से साहित्यिक लोगों के मध्य संवाद का रिश्ता सीमित होता जा रहा है, यह बेहद दुखद है। सहमति के साहित्य को तो सब अपनना चाहते हैं परंतु असहमति के साहित्य को कोई अपनाना नहीं चाहता। साहित्य और विचार पर असहमति प्रकट करने वालों से संबंध यों खत्म कर लिए जाते हैं मानो हम आपके हैं कौन!

आखिर यह कैसे संभव है कि साहित्य में जो कुछ भी लिखा या कहा जा रहा है सब ठीक ही है। सब पर सहमति बनाकर ही चलना चाहिए। अगर सब ठीक है तो फिर संवाद की जगह और असहमति की गुंजाइश ही कहां बचती है। फिर तो सहमति और बे-खतरे का साहित्य ही रचते रहिए, तारीफें करते और सुनते रहिए। मगर ऐसा करके क्या हम साहित्य के बीच बने रहने वाले संवाद और असहमति के रिश्ते को कायम रख पाएंगे? जरा बताएं...।

मैं जानता हूं कि असहमति के अपनी तरह के खतरे हैं। इन खतरों को मोल लेना हर किसी के बूते की बात भी नहीं। किंतु इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि हम असहमति से कन्नी काटने लग जाएं। एक बेहतर संवाद के माध्यम को ही बे-असर कर दें।

हां, यह सही है कि अक्सर असहमति के स्वर थोड़े ऊंचे अवश्य हो जाते हैं लेकिन इससे क्या...? इस बहाने बहरे कानों को कम से कम सुनाई तो दे जाता है। सहमति के साथ-साथ असहमति की हकीकत को तो वे जान-समझ पाते हैं। यों, देखा जाए असहमति का अपना ही मजा है। पर इस मजे का लाभ उठा खुशमिजाज लोग ही पाते हैं। अपने खिलाफ चलने वाले असहमतियों के वाणों से डरकर भागना कायरता का प्रतीक है। कम से कम साहित्यकार-लेखक को तो इसे समझना चाहिए।

प्रायः बहुत कुछ ऐसा पढ़ने को मिलता रहता है, जहां असहमति की संभवना बन जाती है। गाहे-बगाहे अपनी असहमतियों को जतलाता भी रहता हूं। लेकिन ज्यादातर मामलों में मैंने महसूस किया है कि असहमति पर असहजता बहुत जल्दी हावी हो जाती है। असहमति के प्रकाश में आते ही संबंधों पर अंधकार के बादल गहराते चले जाते हैं। माना कि वो बहुत बड़े लेखक, बहुत बड़े साहित्यकार, बहुत बड़े संपादक, बहुत बड़े समाजशास्त्री हैं किंतु असहमति का जिक्र आते ही सारा का सारा बड़प्पन धूल में मिल जाता है। संवाद खत्म हो जाता है। प्रगतिशीलता धरी की धरी रह जाती है। फिर न विचार का कोई महत्व रह जाता है न वैचारिकता का।

बहरहाल, बात जो भी हो मगर असहमति की गुंजाइश तो बनी ही रहनी चाहिए। समाज और साहित्य के बीच अगर असहमति की गुंजाइश बनी रहेगी तो धैर्य और विचार का रिश्ता भी आपस में जुड़ा रहेगा। इसीलिए बेहतर संवाद को बनाए रखने के लिए असहमतियां जरूरी हैं।