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Saturday, 19 July 2014

हिंदी भाषा पर बहस के बरक्स

चित्र साभारः गूगल
हिंदी भाषा पर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। लेकिन इस दफा की बहस साहित्यिक कम राजनीतिक ज्यादा है। राजनीतिक हलकों में हिंदी को एक भाषा के तौर पर नहीं बल्कि अपनी-अपनी राजनैतिक गोटियां फिट करने के नजरिए से ही देखा जा रहा है। कहा जा रहा है- चूंकि प्रधानमंत्री हिंदी-प्रेमी हैं इसीलिए हिंदी को सरकारी कामों के साथ-साथ बोलचाल व पठन-पाठन में भी खूब महत्त्व दिया जाए। अपने संसदीय संबोधन से लेकर भूटान यात्रा तक में हिंदी का ही प्रयोग किया। यह अच्छी पहल के साथ-साथ बात भी है। हमारा अपनी भाषा से न केवल साहित्यिक बल्कि राजनीतिक जुड़ाव भी बेहद जरूर है। जबकि पिछली सरकारों और मंत्रियों का ज्यादातर लगाव अंगरेजी के प्रति काफी नजदीकी रहा है।

लेकिन हिंदी को लेकर इस वक्त जो बहस चल रही है, वो बेहद खराब रास्ते पर है। हिंदी को लागू करने का फरमान एक तरह से तानाशाही जैसा लग रहा है। हिंदी पर अंगरेजी का खतरा बताते हुए, अंगरेजी भाषा से दूरी बरतने को कह जा रहा है। यह सही नहीं है। क्योंकि समाज, साहित्य और राजनीति में जितना महत्त्व हिंदी का है, उत्ता ही अंगरेजी का भी। आप किसी भाषा को दोयम बताते हुए, न उसे खारिज कर सकते हैं, न उसके प्रति पूर्वाग्रह पाल सकते। यह ठीक है कि हमारे देश का एक बड़ा तबका हिंदी लिखता-बोलता-पढ़ता है पर साथ-साथ अंगरेजी बोलने-लिखने-पढ़ने वाले भी कम नहीं। जिसको जिस भाषा में अपनी अभिव्यक्ति सहज-सरल लगती है, वो उसमें बोलेगा भी और लिखे-पढ़ेगा भी।

भाषा की अपनी स्वतंत्रता होती है। उसे न किन्हीं दायरों में बांधा जा सकता है न ही किसी व्यक्ति तक महदूद किया जा सकता।

मुझको तो अक्सर यह सुनना-पढ़ना ही बड़ा अजीब-सा लगता है कि हिंदी भाषा हमारी मां है। और अंगरेजी भाषा सौतन। हिंदी को मां मान लेने से क्या हम भाषा के प्रति पूर्णता निष्ठावान हो जाते हैं। या फिर अंगरेजी को सौतन कह लेने से उसे असर को कम कर देते हैं। नहीं.. नहीं.. ऐसा कुछ नहीं होता। जो लोग भी ऐसा कहते हैं, वो, दरअसल, भाषाओं के भ्रम में ही जी रहे होते हैं।

भाषा को भाषा ही बने रहने दीजिए। भाषा को भी अगर आस्थागत प्रतीकों में ढाल दिया जाएगा तो फिर भगवान और भाषा के बीच फर्क ही क्या रह जाएगा?

हिंदी भाषा के बहाने आज जिस तरह की राजनीति कवायदें चल रही हैं, उनका सीधा-सा मकसद भाषा को दूसरे पर थोपने जैसा है। हिंदी में कार्य-व्यवहार अच्छी बात है किंतु तानाशाह बनकर नहीं। दक्षिण की तरफ से विरोध के स्वर उठ ही चुके हैं। ये पहले भी उठते रहे हैं। वे अपनी भाषा के बीच दूसरी किसी भाषा को आने नहीं देना चाहते। खासकर हिंदी को वहां काफी हेय दृष्टि से देखा जाता है। ठीक है, आप हिंदी को नहीं अपना सकते परंतु उसके प्रति घृणा का नजरिया तो मत रखिए। कम से कम उन्हें तो हिंदी बोलने ही दीजिए, जिनका वहां इसके प्रति रूझान है। आप अपनी भाषा के साथ खुश रहिए, हम हमारी भाषा के साथ खुश रहने दीजिए। फिर कैसा झगड़ा और कैसा विवाद।

जब हिंदी भाषा पर बात और बहस चल ही रही है, यहां यह साफ कर देना भी जरूरी होगा कि हिंदी को न कोई खतरा अंगरेजी से है न बाजार से। हिंदी अपने दम पर अंगरेजी और बाजार दोनों से लोहा लेने का हौसला रखती है। जबकि सच तो यह है कि अंगरेजी ने अपनी हालत पतली होता देख, हिंदी से हाथ मिलाया है। अंगरेजी- चाहे व्यवहार, चाहे बोलचाल, चाहे शिक्षा, चाहे साहित्य, चाहे राजनीति- किसी भी क्षेत्र में बिना हिंदी का सहारा लिए नहीं चल-बढ़ सकती। लगभग यही स्थिति बाजार की भी है। बाजार के लिए हिंदी जरूरी है। और विज्ञापन का बाजार बिना हिंदी चल ही नहीं सकता। अंगरेजी और बाजार के बीच हिंदी अपनी शानदार-जानदार उपस्थिति दर्ज करवाए हुए है।

हिंदी निरंतर बढ़ रही है। फिर भी जिन्हें हिंदी के सिकुड़ने या बाजार की आंधी में उड़ जाने का दुख है, वे पहले खुद अपने गिरेबान में झांककर देखें कि उन्होंने अब तक हिंदी के लिए क्या खास किया है। बेवजह हिंदी को लेकर यहां-वहां दुखड़ा रोते रहने वाले ही, दरअसल, इसके सबसे बड़े दुश्मन हैं। जैसे- बात-बेबात धर्म खतरे में आ जाता है, वैसे ही हिंदी को भी समझते हैं।

हिंदी हर प्रकार के खतरे से परे एक मस्त जिंदगी जी रही है। हालांकि उसे नई सरकार से उम्मीदें बहुत हैं पर तानाशाही के बल पर नहीं। आप भाषा को साथ लेकर चलने को तो कह सकते हैं मगर थोपने को नहीं।

तो कृपया हिंदी को थोपिए नहीं। हां उस पर बहस या बात अवश्य कर सकते हैं।

Friday, 4 July 2014

दीपिका, तुम वाकई सेक्सी हो

चित्र साभारः गूगल
वाह दीपिका, तुमने कमाल कर दिया। दुनिया की सबसे सेक्सी महिला होने का खिताब पाकर तुमने सेक्सी की परिभाषा ही बदलकर रख दी। जिस सेक्सी शब्द पर अब तक महिलाएं अगल-बगल झांकने को विवश हो जाती थीं, उनमें तुमने नए 'साहस' का संचार किया है। तुमने खुद स्वीकारा भी है कि मुझे सेक्सी शब्द पर एतराज नहीं बल्कि गर्व है। सेक्सी होने का नजरिया केवल शारीरिक सुंदरता नहीं बल्कि दिमागी प्रखरता भी है। जिसे अंगरेजी में सेंस ऑफ ह्यूमर कहा जाता है।

आज के इतने खुले जमाने में सेक्स या सेक्सी शब्द अब शर्माने या घबराने के प्रयाय नहीं रह गए हैं। बहुत तेजी से हमारा समाज इन शब्दों को स्वीकार करने के साथ-साथ अपने भीतर जगह भी दे रहा है। लेकिन ऐसा वही समाज और लोग कर पा रहे हैं, जो वाकई दिमागी और मानसिक तौर पर खुले व्यवहार के आदी हैं। जिन्हें न स्थापित परंपराओं में विश्वास है, न यथास्थितिवाद के ढकोसलों पर यकीन। जिनके लिए स्त्री की स्वतंत्रता उसके सामाजिक-पारिवारिक संघर्ष के साथ-साथ देह की आजादी पर भी साफ रहती है। जो स्त्री को केवल दायरों में सीमित करके नहीं बल्कि व्यापक परिपेक्ष्य में देखना चाहते हैं।

स्त्री के सेक्सी होने में कोई बुराई नहीं। सेक्सी होना स्त्री का हक है। जिस तरह पुरुष खुद को 'हैंडसम' कहलवा कर खुश हो सकता है फिर स्त्री 'सेक्सी' क्यों नहीं? सेक्सी के मायने केवल शरीर नहीं बल्कि दिमाग और मन के भीतर की सुंदरता भी है। हम दरअसल यह स्वीकार करने में घबराते हैं कि स्त्री केवल शरीर से सेक्सी हो सकती है दिमाग से नहीं। ले-देकर स्त्री का शरीर ही सेक्स और सेक्सी का प्रयाय बना दिया जाता है।

लेकिन मैं इस स्थापना को नहीं मानता। स्त्री जितना शरीर से सेक्सी हो सकती है उतना ही अपने विचार, दिमाग और व्यवहार में भी। यह हकीकत है कि सौंदर्य प्रतियोगिताओं में केवल स्त्री की फिगर को नहीं, साथ-साथ उसके दिमाग एवं संप्रेषण की क्षमता को भी देखा-परखा जाता है। कई और भी आयाम होते हैं, जिनके आधार पर स्त्री को विश्व की सुंदरतम महिला का खिताब दिया जाता है।

यह सच है दीपिका, तुम्हारे फिगर में वो जादू है, जिसमें सेक्सी होने का प्रत्येक गुण मौजूद है। यों तो, हर स्त्री के भीतर सेक्सी छवि होती है किंतु कुछ ही ऐसी होती हैं, जिनका लुक वाकई सेक्सी ही होता है। दुर्भाग्य से, हमारे यहां स्त्री के सेक्सी होनी की उम्र-सी निर्धारित कर दी गई है। अमूमन देखा-सुना-पढ़ा यही गया है कि शादी होते ही स्त्री की सेक्सी छवि समाज के साथ उसके परिवार एवं पति को भी बूढ़ी लगने लगती है। फिल्मी दुनिया में ऐसी तमाम अदाकराएं हैं, जिनकी शादी के बाद उनका 'सेक्सी लुक' दुनिया और समाज की निगाह में ध्वस्त होता चला गया। हालांकि उन्होंने कोशिश बहुत की फिर से अपने सेक्सी लुक में आने की, लेकिन हम ही उन्हें स्वीकार नहीं कर पाए। कारण साफ है, हमारी नजरें हर वक्त जवान फिगर देखते रहने की आदी जो हो गई हैं। सेक्सी के मामले में हम कमर से ऊपर की स्त्री को ही देखना पसंद करते हैं।

बावजूद इसके नई पीढ़ी की लड़कियां सेक्स और सेक्सी होने के दकियानूसी मिथकों को अगर तोड़ रही हैं, तो उनका स्वागत अवश्य ही किया जाना चाहिए। बहुत मायनों में सनी लियोनी ने सेक्सी या हॉट होने के स्थापित मिथकों को तोड़ कर रख दिया है। यही वजह है कि कुछ स्थापित बड़ी हीरोइनों में सनी के खुलेपन को लेकर खदबदाहट सी पैदा होने लगी है। 21वीं सदी की दुहाई देने वाले हम अब भी सनी लियोनी के सेक्सी खुलापन को स्वीकार कर पाने में हिचकिचाहट सी महसूस करते हैं। जबकि उसके लिए यह सब आम बात है।

बहरहाल, दीपिका तुमने दुनिया की सेक्सी महिला बनकर बने-बनाए दायरों को तोड़ा है, तुम्हें दिल से बधाई। तुम्हारे बहाने, सेक्सी होना स्त्री के लिए 'गंदी बात' का नहीं, बल्कि 'गर्व का प्रतीक' बना है। स्त्री का यह गर्व बरकरार रहे।