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Sunday, 5 October 2014

व्यंग्य और आज का समय

चित्र साभारः गूगल
व्यंग्य का जिक्र चले और हरिशंकर परसाई पर बात न हो, ऐसा संभव नहीं। व्यंग्य ने हरिशंकर परसाई से बहुत कुछ सीखा, जाना और समझा है। व्यंग्य में विचार, प्रगतिशीलता और गंभीरता का पुट हरिशंकर परसाई की ही देन है। दरअसल, व्यंग्य को हम निहायत 'कोरी विधा' मानते हैं। हम मानते हैं कि व्यंग्य केवल 'हंसी का फुव्वारा' भर है। व्यंग्य का एकमात्र उद्देश्य हंसना-हंसाना-खिलखिलाना ही है। लेकिन ऐसा नहीं है। व्यंग्य 'कटाक्ष' का 'आईना' है। व्यंग्य में कटाक्ष विचार, प्रगतिशीलता और गंभीरता के साथ पैदा होता है। बल्कि इसका प्रयोग हरिशंकर परसाई और किट्टू जैसे बड़े व्यंग्यकारों ने बखूबी किया है। व्यंग्य महज हा-हा, ही-ही, हू-हू सरीखा मंचीय हास्य-कवि सम्मेलन नहीं है।

साहित्य की तमाम विधाओं में से एक व्यंग्य भी है। मगर साहित्यकार व्यंग्य पर न के बराबर बात करते हैं। वे या तो आलोचना के उतार-चढ़ाव पर छाती कूटते रहते हैं या फिर कविता-कहानी के 'ऐसा होना चाहिए और ऐसा नहीं होना चाहिए' पर दादागिरी झाड़ते रहते हैं। हैरानी तब होती है, जब हरिशंकर परसाई और उनकी व्यंग्य-विधा को पसंद करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार भी परसाई या व्यंग्य पर तब ही बात करते हैं, जब कोई ऐसा 'अवसर' हो। बिना 'अवसर' न साहित्य न राजनीति न समाज में कोई किसी को 'याद' नहीं करना चाहता है। इसीलिए 'अवसरवाद' आज हमारे समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है। 'अवसर' के लिए तो इंसान 'गधे को भी बाप' बनाने से नहीं चूकता।

मगर किसी के याद करने या न करने से न फर्क परसाई के लेखकीय महत्त्व को पड़ता है न व्यंग्य-विधा को। परसाई अपना काम कर गए और व्यंग्य निरंतर अपने काम करने में लगा है। व्यंग्य न कभी किसी के रोके रुका है न किसी के टोके ठहरा। व्यंग्य ने अपनी बुनियाद अपने व्यंग्य-लेखकों के दम पर मजबूत की है नाकि किसी अलां-फलां आलोचक-समीक्षक के रहमो-करम पर।

मुझे व्यंग्य एक ऐसी सशक्त विधा नजर आती है, जिसमें आप किसी बात का रोना (साहित्य की अन्य विधाओं की तरह) नहीं रोते। रोने पर भी आप इतना मस्त होकर लिखते हैं कि सामने वाला निश्चित मुस्कुरा जाए। वातावरण को हल्का और हंस-मुख बनाए रखना- अपने कटाक्ष के साथ- ही तो व्यंग्य और व्यंग्यकार का उद्देश्य है। फिर भी अगर आप व्यंग्य में रोने के स्वभाव को बनाए रखना चाहते हैं तो बनाए रहिए, आपकी मर्जी। हां, आलोचना आदि में जरूर आपको कोई पूछ ले।

व्यंग्य की अहम खासियत यह है कि व्यंग्य कभी ठहरता नहीं। व्यंग्य लगातार बेखटक चलता और आगे बढ़ता रहता है। नए-नए लोग, नए पाठक, नए व्यंग्यकार, नए शब्द, नए संदर्भ जुड़ते जाते हैं और व्यंग्य अपनी धार पर सवार रास्ता तय करता रहता है। व्यंग्य को अगर आप ठहरा देंगे या पुराने समय में बार-बार लौटने को कहेंगे तो यह- मेरे विचार में- व्यंग्य के साथ सबसे बड़ा 'अन्याय' होगा। व्यंग्य से आप बीते वक्त की टोह तो ले सकते हैं किंतु पीछे लौटने को नहीं कह सकते।

बेशक परसाई हमारे समय के एक महान व्यंग्यकार थे और हमेशा ही रहेंगे। किंतु परसाई को ही व्यंग्य का आदि-अंत मान लेना भी उचित नहीं। यह तो परसाई का सरासर 'महिमामंडन' हो जाएगा। जिस महिमामंडन के खिलाफ परसाई ने इतना कुछ लिखा-कहा है। यों भी, परसाई को किसी से अपने महिमामंडन की जरूरत नहीं। परसाई को- चाहे व्यंग्य के क्षेत्र का हो या न हो- हर कोई जानता है। बहुत संभव है, हर किसी ने परसाई को पढ़ा भी हो। (ज्यादा या कम; यह अलग बात है)। लेकिन यह कह देना कि 'परसाई को वे लोग सबसे कम जानते हैं, जो धड़ाधड़ व्यंग्य लिख रहे हैं', मैं इसे नहीं मानता। हर लेखक के पास इतना 'कॉमनसेंसे' जरूर होता है कि वो अपने या बीते समय के लेखक को जाने-पहचाने और पढ़े। हां, अपवाद हर कहीं हो सकते हैं। लेकिन साहित्य या लेखन की गाड़ी केवल अपवादों से नहीं चलती।

हमें यह मानना पड़ेगा कि व्यंग्य लेखन अब परसाई, शरद जोशी, किट्टू के समय से बहुत आगे निकल चुका है। तब के व्यंग्यकारों ने अपने समय को अपने हिसाब से पेश किया और आज का व्यंग्यकार अपने हिसाब से कर रहा है। तब के समय को अब के समय से जोड़ना या मीनमेख निकालना, बेवकूफी ही कहलाएगी। समय न किसी की कलम के साथ रुका है न रुकेगा। समय का काम लगातार चलते रहने है। यही काम लेखक का भी होना चाहिए। जो बीत गया सो बीत गया। हम वर्तमान में जी रहे हैं तो फिर क्यों न आज की बात करें। मंजिलें आगे देखने-बढ़ने से ही मिला करती हैं, पीछे देखने से नहीं।

यह बात सही है कि अब व्यंग्य में जोखिम लेने का चलन लगभग खत्म सा हो गया है। (परसाई ने तो अपने व्यंग्य लेखन में न जाने कितने ही जोखिम लिए, ठीक मुक्तिबोध की तरह)। न केवल अपने मित्रों बल्कि आलोचकों की भी खूब खरी-खोटी सुनी। मगर अपने लेखन की धार को बरकरार रखा। हां, उनके लेखन से सहमति या असहमति हो सकती है परंतु उनके लेखन को हम 'अनदेखा' कतई नहीं कर सकते। करना चाहिए भी नहीं।

अब व्यंग्य तो क्या लेख (राजनीतिक या साहित्यिक) में भी 'जोखिम' लेने का साहस खत्म-सा हो गया है। स्पष्ट कहूं, अखबार-पत्र-पत्रिकाएं (अपवादों को छोड़कर) भी जोखिम लेने से बचती हैं। जहां व्यंग्य की धार थोड़ी तेज होती दिखी नहीं कि तुरंत अपनी संपादकीय समझदारी (?) दिखा दी। कभी-कभी व्यंग्य पर इस कदर जोर-आजमाइश की जाती है कि पता नहीं लग पाता, चेहरा किसका है, वाजू किसका।

भले ही अखबार या पत्रिकाएं तेज-तर्रार व्यंग्य छापने से बच रही हों पर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर व्यंग्य खूब खुलकर लिखा जा रहा है। खासकर, वन-लाइन ने तो व्यंग्य की दशा-दिशा ही बदलकर रख दी है। कम शब्दों और वाक्यों का व्यंग्य कहीं ज्यादा मारक साबित हो रहा है आज। टि्वटर पर मात्र 140 शब्दों का व्यंग्य पढ़ने का मजा ही कुछ और है।

नई पीढ़ी के व्यंग्यकार अपने नए तरीकों के साथ व्यंग्य कह और लिख रहे हैं। न केवल अपने समय बल्कि खुद से भी मुठभेड़ कर रहे हैं। व्यंग्य अपनी पारंपरिक भाषा से काफी हद तक बाहर निकल आया है। भारी शब्दों और कहन का बोझ घटा है। आज के व्यंग्य में 'ग्लैमर' भी है 'नॉटिनेस' भी है और 'चेंज' भी। आज के समय में व्यंग्य को आप कोरे विचार या साहित्यिक कलेवर के हिसाब से नहीं चला सकते। आज के समय का व्यंग्य युवा (यूथ) को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है। यही वजह है कि आज के व्यंग्य में 'हिंग्लिश' का पुट अधिक नजर आता है। जोकि जरा बुरा भी नहीं है। चाहकर भी परसाई या जोशी की भाषा में अब व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता। व्यंग्य उस दौर और पीढ़ी से बहुत आगे निकल गया है।

तो, क्यों न आज के समय के व्यंग्य-लेखन को सहर्ष स्वीकार किया जाए। परसाई या जोशी की पीढ़ी ने अपने समय में श्रेष्ठ व्यंग्य लिखे- इसमें दोराय नहीं- अब जो नए लोग लिख रहे हैं, उसे भी स्वीकार कीजिए न। समय के साथ शब्द-परिवेश-भाव-विचार सब बदलता है तो फिर लेखक या लेखन क्यों न बदले? आज का समय बाजार का है। अगर बाजार की मांग के मुताबिक व्यंग्य लिखा जा रहा है और कमाई का जरिया बना हुआ है तो क्या हर्ज है? कमाना कौन नहीं चाहता यहां।

बहरहाल, मेरा हरिशंकर परसाई और उस पीढ़ी के तमाम बड़े व्यंग्यकारों के प्रति पूर्ण आदर है। साथ-साथ, नए युवा व्यंग्यकारों के प्रति उतना ही प्रेम भी। पुरानी पीढ़ी अपनी वरिष्ठता के साथ अपनी जगह रहे। और अगर कर सकती है तो नए युवा लेखकों का उत्साह बढ़ाए।

बदलते वक्त और जमाने को जिसने अपना लिया यहां वही बचा रह पाएगा। वरना, बजाते रहिए अपनी ढपली आप और सुनाते रहिए अपना राग आप। यह दुनिया और समय अपनी गति यों ही तेजी से चलते रहेंगे।

2 comments:

  1. पुराने स्थापित ब्रांडों के सहारे कई दुकानें अब तक चल रही हैं। पुरानों का नाम लेकर नयी दुकानें चमक रही हैं, चमकने दें। सबको जीने-खाने का हक है। पाठक और वक्त ही अंतिम फैसला करता है, यह बात ध्यान रखने योग्य है। कई बुजुर्ग अपनी नाकामी को परसाई की आड़ लेकर छिपाते हैं।

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  2. बढिया है। चकाचक!

    आपका लेख ज्ञानरंजन की के लेख "कौन कितना जानता है परसाई को" http://fursatiya.blogspot.in/2014/10/blog-post_63.html में उनकी कही बात 'परसाई को वे लोग सबसे कम जानते हैं, जो धड़ाधड़ व्यंग्य लिख रहे हैं' की प्रतिक्रिया में लिखा गया है।

    यह लेख सन 1997 के आसपास लिखा गया था, परसाई जी के निधन के बाद। लेखक के अपने मत हैं। अपने हिसाब से ग्रहण किया जाये उसे। सबको अपनी बात कहने का हक है।

    बाकी जैसा आपने लिखा बहुत कुछ बदला है परसाई जी के समय से। वे व्यंग्य को ’स्पिरिट’ माने थे जो किसी भी विधा में हो सकती है। आपके हिसाब से यह व्यंग्य एक विधा है। परसाई जी के व्यंग्य के बारे में विचार इस लेख में बांचिये। http://fursatiya.blogspot.in/2006/08/blog-post_19.html






























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