Translate

Friday, 14 August 2015

आजादी बनाम डिस्काउंट

आजादी के मायने अब थोड़ा बदल गए हैं। आजादी देश पर मर-मिटने की नहीं, आजादी किस्म-किस्म के प्रॉडेक्ट पर 'डिक्साउंट' पाने की है। आजादी बाजार के साथ, बाजार के लिए खड़े होने की है। कंपनियां आजादी वाले दिन दिल में देश के प्रति कुछ कर गुजरने का उत्साह नहीं जगातीं बल्कि उनके प्रॉडेक्ट पर इतने-इतने का डिक्साउंट मिल रहा है, यह बताती हैं। वो भी अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन छापकर।

बाजार ने हर पर्व और त्यौहार को 'उत्सव' में बदल दिया है। बाजार कहता है, आप पर्व और त्यौहार के 'मूल' में न जाएं, उसे महज एक 'उत्सव' मानकर 'सेलिब्रेट' करें। पर्व और त्यौहार को सेलिब्रेट कर आप सीधा बाजार से जुड़ेंगे। बाजार में डिस्काउंट लिए तैयार खड़ी कंपनियों से जुड़ेंगे। महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि किस देशभक्त ने देश के लिए क्या किया, महत्त्वपूर्ण अब यह है कि कौन सी कंपनी अपने किस प्रॉडेक्ट पर कितने का डिस्काउंट और किसके साथ क्या-क्या फ्री दे रही है। आजादी जीत की नहीं, फ्री-डिस्काउंट पाने की है।

ऑन-लाइन स्टोर्स ने बाजार की लत को हम पर और अधिक प्रभावी बनाया है। 15 अगस्त के आस-पास तमाम ऑन-स्टोर्स अपने यहां तरह-तरह के डिस्काउंट लिए तैयार रहते हैं। सभी पर 'मेगा-सेल' लगती है। प्रत्येक प्रॉडेक्ट पर इतना-इतना डिस्काउंट पेश किया जाता है कि मन बिन 'ललचाए' रह ही नहीं पाता। उस वक्त शायद हम यह भूल जाते हैं कि हम मिली आजादी का जश्न नहीं बल्कि दिए गए डिस्काउंट का लाभ उठाने को बेताब हैं। तब हमारे लिए यह अहसास भी मायने नहीं रखता कि देश की आजादी की खातिर शहीद होने वाले किस क्रांतिकारी ने क्या-क्या किया था, कैसे-कैसे कष्ट उठाए थे, अंगरेजी सरकार के कौन-कौन से जुलम सहे थे। हमारा ध्यान तो केवल डिस्काउंट की आजादी ऑन-लाइन पाने पर रहता है। कुछ लोग इसे ही अपनी आजादी का वास्तविक हक मानते हैं।

इसमें सारा दोष बाजार का भी नहीं है। दरअसल, हम कदर 'आत्मकेंद्रित' से हो गए हैं कि हमें न बाहर, न आस-पास, न इतिहास की चीजें दिखाई ही नहीं देतीं। हम खुद में ही सिमटे रहना चाहते हैं। या फिर जो हमें बाजार बता या दिखा देता है, उसे ही 'सच' मान लेते हैं। क्योंकि आज की तारीख में हमारे कद से कहीं ज्यादा बड़ा कद तो बाजार का है। बाजार के कद ने हमें न केवल अपने घर में बल्कि इतिहास में भी 'बौना' बना डाला है।

तमाम तरह की आजादियों को लेकर बातें तो बहुत होती हैं किंतु जब कुछ कर गुजरने की बारी आती है, सब अपने-अपने घरों में यों घुस बैठ जाते हैं, जैसे सबकुछ ठीक चल रहा है। जिस व्यवस्था को हम रात-दिन गरियाते हैं, फिर उसी से समझौता भी कर लेते हैं। कहने में कोई हर्ज नहीं कि हम प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस पर शहीदों के मार्ग पर चलने का संकल्प ही 'झूठा' लेते हैं। हमारे अंदर उतना साहस ही नहीं कि हम शहीदों के दिखाए-बताए मार्ग पर चल सकें। या उन जैसा बनने की कोशिश भी कर सकें। क्योंकि अगर हम शहीदों के जैसा बनने की कोशिश करेंगे तो बाजार और डिस्काउंट दोनों से दूर हो जाएंगे। शहीदों का मार्ग कठिन ही नहीं बहुत कठिन है। तब ही तो गाहे-बगाहे होने वाले आंदोलन महज 'खानापूर्ति' बनकर ही रह जाते हैं।

बेशक बाजार हमारे भीतर खरीद-बेच का 'जोश' तो पैदा कर सकता है मगर आजाद होने का नहीं। हां, डिस्काउंट पर आजाद होने के वहां तमाम चांस हैं। बाजार की डिमांड के मुताबिक चलेंगे तो हर तरह के फायदे का लाभ उठा पाएंगे। बाजार इसीलिए तो हर वक्त इस फिराक में रहता है कि अपने कस्मटर को कैसे लुभा सके। कस्टमर को लुभाने का डिस्काउंट या फ्री से बेहतर कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता।

इसे दुर्भाग्य कह लें या बद-किस्मती कि अब हमारे बच्चे भी हमसे आजादी का मतलब नहीं पूछते। 15 अगस्त पर देश की आजादी की बात लगभग न के बराबर ही करते हैं। वो बात करते हैं, 15 अगस्त पर मिलने वाले तरह-तरह के डिस्काउंट की। किस प्रॉडेक्ट के साथ क्या फ्री है, इसकी। बाजार के वर्चस्व ने आजादी के अर्थ को ही बदलकर रख दिया है। आजादी अब इतिहास और बाजार हकीकत हो गया है। बाजार के आगे कंपनी के डिस्काउंट को चूज करने की आजादी रह गई है बस।

कहने में शर्म कैसी कि हमें 15 अगस्त का इंतजार 'फ्री-डिस्काउंट' पाने के लिए ही रहता है शायद।

Monday, 29 June 2015

प्यारेलाल की मलाईकुल्फी

प्यारेलाल। सचमूच वो प्यारेलाल ही हैं। लंबा-चौड़ा कद। हमेशा हंसता-मुस्कुराता चेहरा। तीखी और कड़क आवाज 'मलाई...कुल्फी'। मिनट भर में ढेरों बच्चे उनके आसपास। अंकल दो वाली मुझे... पांच वाली मुझे। दस वाली मुझे। बच्चों के बीच हल्की-फुल्की 'धींगा-मुश्ती'। फिर सब 'मस्त'। प्यारेलाल भी खुश। बच्चों को मलाईकुल्फी खिलाके, अक्सर उनके चेहरे को देखो, तो लगता कि वो अंदर से कितना खुश और संतुष्ट हैं। उन्हें और उनके इर्द-गिर्द मौजूद बच्चों को देखकर प्रायः मुझे अपना बचपन याद आ जाता है।

कल ही की तो बात थी, जब हम खुद बच्चे थे। प्यारेलाल हमारे स्कूल के पास ही खड़े होते थे, छुट्टी के बाद गली में आ जाया करते थे। हम उनकी मलाईकुल्फी के इतने 'दीवाने' की स्कूल में तो खाते ही थे, जब गली में आते तब भी जरूरत खाते। प्यारेलाल को फिर से एक मौका मिल जाता था, हम बच्चों को देखकर खुश होने का। उनकी आंखों में 'चमक' बढ़ जाती थी। आवाज में और सुरीला-सा कड़कपन आ जाता था। मलाई...कुल्फी (कुल्फी की आवाज बहुत धीमे से आती थी)।

मजे की बात यह है कि प्यारेलाल अब भी आते हैं। अब थोड़ा उम्रदराज हो गए हैं। मगर आवाज में कड़कपन अब भी कायम है। हमारी गली भी बदल गई है। पर है करीब ही। प्यारेलाल अक्सर दोपहर में ही आते हैं। उस वक्त मैं तो दफ्तर में होता हूं। उनकी मलाईकुल्फी को 'मिस' भी करता हूं पर 'सुकून' इस बात का रहता है कि मेरी बेटियां उसी चाव से उनकी मलाईकुल्फी को खाती हैं। वो भी प्यारेलाल की मलाईकुल्फी की उतनी ही दीवानी हैं, जितना कि मैं।

पिछले इतवार प्यारेलाल जब गली में आए इत्तेफाक से मैं घर में ही मौजूद था। उनकी वही कड़क मलाई...कुल्फी की आवाज को सुनते ही तुरंत दौड़ गया, उनसे मलाईकुल्फी लेने। प्यारेलाल का वही हंसता-मुस्कुराता चेहरा देखकर तबीयत एकदम उनकी 'मलाईकुल्फी' की माफिक हो गई। उनको देखते ही पूछा- 'कैसे हो प्यारेलाल...? ठीक हूं बाबूजी...' प्यारेलाल अपनी चिरपरिचित मुस्कान में बोले। मैंने कहा- 'अमां, प्यारेलाल मैं 'बाबूजी' कब से हो गया? मैं तुम्हारे लिए आज भी वही हूं, जो आज से तीस साल पहले था। तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारी मलाईकुल्फी के स्वाद ने ऐसा दीवाना बना रखा है कि आज भी दूर नहीं हुआ हूं।' प्यारेलाल ज्यादा कुछ बोले नहीं। बस मुस्कुरा भर दिए। मैं भी बिटिया के साथ मलाईकुल्फी लेकर घर में आ गया।

यह सही है कि मेरा प्यारेलाल से कोई रिश्ता-नाता नहीं मगर फिर भी हमारे बीच 'स्वाद' और 'स्नेह' का एक ऐसा रिश्ता है, जो हर रिश्ते से कहीं अधिक बड़ा है। एकदम- प्यारेलाल की मलाईकुल्फी और उनकी निश्चल हंसी-मुस्कुराहट जैसा। हफ्ते में एक दफा दोपहर में उनकी मलाई...कुल्फी वाली आवाज ही सुनने को मिल जाए तो महसूस होता है कि मैं फिर से तीस साल पहले के अपने बचपन में पहुंच गया हूं। वही स्कूल। वही हम सब दोस्त। वही दोपहर। वही ठेला। वही चाट वाले पंडितजी (हमेशा मुस्कुराते हुए)। दुखद यह रहा कि पिछले जाड़ों में पंडितजी चल बसे। पर उनकी चाट का स्वाद जीभ पर आज भी बना हुआ है।

शायद इसीलिए बचपन की यादें बहुत अच्छी होती हैं। समय-असमय हमसे टकराकर हमें पुनः मौका देती हैं, उन दिनों, उन यादों, उन बातों में लौटने का।

देखिए न, कल तक स्वाद और स्नेह का रिश्ता प्यारेलाल का मेरे साथ था, आज वही मेरी बेटियों के साथ है। मेरी तरह दोपहर में उन्हें भी इंतजार रहता है, प्यारेलाल के आने और मलाईकुल्फी खाने का। चाहे जैसा ही सही रिश्ते का कायम रहना जरूरी है। ताकि संबंधों में 'तरावट' बनी रहे। मैं दावे के साथ कह सकता हूं, बाजार में मिलने वाली तमाम प्रकार की आइसक्रीमों के मुकाबले हमारे प्यारेलाल की मलाईकुल्फी आज भी लाजवाब है। बल्कि लाजवाब से कहीं बढ़के।

प्यारेलाल की अब उम्र भले ही हो चली है पर उनकी आवाज में कड़कपन और मलाईकुल्फी में अपनापन अब भी कायम है। इसीलिए तो वो हमारे 'पियारे प्यारेलाल' हैं।

Sunday, 14 June 2015

असहमतियां मंजूर नहीं

समय बदलता है तो सबकुछ बदलता है। विचार, व्यवहार, सरोकार सब। खासकर, विचारों की अभिव्यक्ति के प्लेटफोर्म पर हम पहले से ज्यादा 'खुले' हैं। स्वतंत्र विचारों के दम पर चीजों-बातों को और 'जीवंत' बनाया है। साहित्य, कला, फिल्म, फैशन, रचना और रचनाकार के भीतर भी बदलाव आए हैं।
कल तक जो बातें साहित्य और समाज के भीतर 'वर्जित' थीं, आज प्रमुखता से सामने आ रही हैं। कला के क्षेत्र में भी यही हुआ है। खुलेपन के नाम पर फिल्मों ने तो पूरे परिदृश्य को ही बदल डाला है। अब यहां कुछ भी वर्जित नहीं, सब जायज और स्वीकार्य है। फैशन के रंग-ढंग भी उम्मीद से कुछ ज्यादा ही बदल चुके हैं। बदलेंगे भी क्योंकि यह 21वीं सदी का दौर है। इस दौर में फैशन के नाम पर 'खुलापन' अधिक है। और उतना ही खुलापन उन लोगों की जुबान में भी है, जो इस फैशनेबल खुलेपन को पसंद नहीं करते।

लेकिन किसी के पसंद करने या न करने से क्या होता है, बदलते समय को रोकना असंभव है। रोका जाना चाहिए भी नहीं। अगर हम बदलेंगे नहीं तो फिर नई चीजें, बातें, अर्थ, संदर्भ, परिभाषाएं कैसे जाने-समझ पाएंगे। बदलाव को 'इग्नोर' कर आप मन ही मन कितना ही 'खुश' हो लें लेकिन बहुत ही जल्द 'हाशिए' पर डाल दिए जाएंगे। समय और समाज का यही नियम है।

तमाम चीजों और बातों में बदलाव आने के बाद भी, ऐसा मुझे लगता है, कि असहमति में बदलाव अब भी उतना नहीं आ पाया है, जितना दरकार थी। असहमतियों और असहमति रखने वालों को कुछ अजीब-सी निगाहों से देखा जाता है। सामाजिक जीवन के साथ-साथ सोशल नेटवर्किंग प्लेटफोर्म पर भी असहमतियां 'टैबू' की तरह काम करती हैं। किसी से असहमति प्रकट करने का मतलब है, अपना राशन-पानी बंद करवाना।

कभी-कभी बिल्कुल समझ नहीं आता कि हम असहमतियों के लेकर इतना असहज से क्यों हो जाते हैं? क्या हमारी अक्ल, हमारी सोच के दायरे इस कदर 'सीमित' हो चुके हैं, जिनमें असहमति का बाल आते ही, दरारें पड़ना शुरू हो जाती हैं? क्या हम नहीं चाहते कि हमें कोई हमारी खामी- असहमत होते हुए- बताए? क्या असहमतियां गाली से भी बड़ी हो गई हैं कि सहन नहीं की जा सकतीं?

फैशन, कपड़ों-लत्तों, विचार, व्यवहार में बदलाव अगर हो रहा है तो फिर असहमति का दायरा इतना सीमित क्यों होता चला जा रहा है। 21वीं सदी के दौर में जब लोगों को आपस में असहमतियों के वास्ते लड़ते-झगड़ते या बैर रखते देखता हूं तो वाकई अफसोस होता है। लगता ही नहीं कि हम 21वीं सदी की दहलीज पर खड़े हैं।

असहमति का सबसे अधिक ग्राफ राजनीति के क्षेत्र में गिरा है। जो नेता हैं, उनकी बात समझ में आती है। लेकिन जो नेता नहीं हैं, केवल पाठक या लेखक हैं, उनके बीच भी असहमति की खाई इतनी गहरी है कि आपस में मिलना असंभव। हर कोई पार्टी और नेता का प्रशंसक नहीं बल्कि 'भक्त' बना बैठा है। अपने आका के खिलाफ कुछ भी (कुछ भी) कहा या लिखा बर्दाशत नहीं। ठीक भगवानों जैसी स्थिति।

सोशल नेटवर्किंग ने बेशक हमारे संबंधों को बहुत 'विस्तार' दिया है। एक-दूसरे के करीब लाया है मगर राजनीति ने यहां भी 'कबाड़ा' कर रखा है। सिर्फ राजनीतिक असहमतियों के ही कारण न जाने ऐसे कितने लोग हैं, जो यहां से चले जाने को अभिशप्त हैं। उनकी राजनीति असहमतियों पर जो प्रतिक्रियाएं आती हैं, उनमें भाषा का लोचा तो होता ही है, व्यक्तिगत भी बहुत कुछ होता है। जिसे किसी भी आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

इतने एडवांसड प्लेटफोर्म पर ऐसी ओछी हरकतें और मानसिकताएं हमारी असहमति की अभिव्यक्ति को तो दबा ही रही हैं, साथ-साथ दिमागी तौर पर खोखला भी करती जा रही हैं। जब हमारे बीच से एक-दूसरे के प्रति वैचारिक असहमतियां ही खत्म हो जाएंगी फिर क्या फायदा ऐसे सोशल नेटवर्क का। फिर तो यह बेकार ही है। यहां आना अपना टाइम बर्बाद करना है।

चीजें दिन-ब-दिन गड़बड़ा रही हैं। असहमतियां निरंतर हमसे दूर होती जा रही हैं। असहमतियों की शक्ल में गालियां ही ज्यादा हैं।

बदलते समय में असहमति के क्षेत्र में इतना ठहराव, सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम यह कैसे 'दब्बू समाज' बनते जा रहे हैं, जहां असहमति के स्वीकार्य में बदलाव अभी भी नहीं आ पाया है।

Sunday, 7 June 2015

तसलीमा की उपेक्षा क्यों

हालांकि ट्वीट कर तसलीमा नसरीन ने यह साफ कर दिया है कि 'हालात सामान्य होते ही वे भारत लौट आएंगी।' यह सुकून भरी खबर है। मगर सबसे अधिक 'दुर्भाग्यपूर्ण' है उनका विषम परिस्थितियों में भारत छोड़कर अमेरिका जाना। यह कितना अजीब है कि अमेरिका ने तसलीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली और हम इतने बड़े लोकतांत्रिक देश होते हुए भी 'चुप' रहे। तसलीमा को जाने दिया। न सरकार, न मंत्री, न प्रधानमंत्री की तरफ से तसलीमा की सुरक्षा या उन्हें रोक लेने संबंधी कोई बयान नहीं आया। क्या कट्टरपंथी ताकतें हम पर इस कदर हावी हैं कि हम उनके समक्ष हथियार डाल देते हैं। एक लेखिका को यों ही चले जाने देते हैं।

यह सही है कि तसलीमा इतने सालों से भारत में ही हैं। भारत सरकार उन्हें सुरक्षा भी दिए हुए है। लेकिन इस दफा उनके जाने पर कहीं किसी तरह की सुगबुगाहट का न होना, सवाल तो खड़े करता ही है।

साथ-साथ इतने बड़े-बड़े प्रगतिशील-वामपंथी संगठन व लेखक भी तसलीमा मामले पर चुप्पी साधे रहे। तसलीमा के पक्ष में किसी बड़े लेखक संगठन का कोई बयान नहीं आया है। न ही किसी बड़े लेखक-साहित्यकार ने कुछ लिखा। जब लेखकों का ही लेखक के प्रति यह रवैया है फिर सरकार से क्या उम्मीद की जा सकती है?

नक्सलवादियों की चिंता में निरंतर 'चिंताग्रस्त' रहने वाली अरूधंती राय भी चुप हैं। कहीं कोई लेख, कोई बयान नहीं। कमाल है।

कहना न होगा, वैसे, तसलीमा के मामले में सबसे अधिक 'उपेक्षित रोल' हिंदी के लेखकों-साहित्यकारों ने निभाया है। बहुत हुआ तो दिल्ली में हस्ताक्षर अभियान चला लिया या कहीं कोई छोटा-सा बयान जारी कर दिया। फिर डिब्बा गोल। वामपंथी लेखकों और संगठन की तो पूछिए ही मत। जो वामपंथी सरकार तब तसलीमा को सुरक्षा नहीं दे पाई, उसे देश से बाहर निकलवा दिया, उसके साहित्य तक पर रोक लगवा दी, उनसे भला क्या सहयोग की उम्मीद की जा सकती है? यही, तसलीमा की जगह अगर कोई वामपंथी या प्रगतिशील लेखक-साहित्यकार होता, फिर देखते, अब तक सरकार, मंत्री, प्रधानमंत्री के खिलाफ जाने क्या-क्या कह डाला होता। बयान जारी हो जाता। मीटिगें जुट जातीं। हो सकता है, कुछ कथित क्रांतिकारी टाइप लेखक-साहित्यकार सड़कों पर भी उतर आते। चूंकि वो तसलीमा नसरीन है, इसलिए क्यों कुछ कहे या बोलेंगे?

इससे रत्तीभर इंकार नहीं किया जा सकता कि तसलीमा पर जब भी भारत में हमला हुआ है, कथित बड़े लेखक-साहित्यकार यों ही चुप रहे हैं। शायद बहुत से लेखक-साहित्यकार तसलीमा को लेखिका मानते ही न हों।

अपने जाने कितने ही लेखों में तसलीमा ने वामपंथियों व वामपंथी संगठनों की अपने प्रति 'उपेक्षा' को खूब रेखांकित किया है। यह सच भी है।

लेकिन लेखकों का एक लेखक के प्रति इतना उपेक्षापूर्ण व्यवहार हैरानी की बात है। ये लोग तो तब भी चुप रहे थे, जब अभी कुछ समय पहले रायपुर (शंकर नगर चौक) में भगत सिंह की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किया गया था। हां, हाल में कहीं (जगह का नाम भूल रहा हूं) लेनिन की प्रतिमा को जब नुकसान पहुंचाया गया, तब वामपंथियों को गहरा सदमा लगा। कितना दोगलापन।

बेशक तसलीमा के लेखन से जितनी चाहे 'असहमतियां' हों लेकिन जिस तरह का निरंत संघर्षमय जीवन उन्होंने जिया है, वो तारीफ-ए-काबिल है। एक महिला होकर इतने हमले और अपमान झेलते रहना बड़ी बात है। किसी दबाव में आकर अपने विचार या विचारधारा से समझौता न करना भी कोई आसान बात नहीं।

हम चाहते हैं कि तसलीमा हमारे ही मुल्क में रहें। बात जहां तक उन्हें सुरक्षा देने की है तो सरकार को देनी ही चाहिए। पर लेखकों या लेखक संगठनों से तसलीमा के पक्ष में कोई उम्मीद करना, बेईमानी ही होगी।

Monday, 1 June 2015

मोबाइल और संवाद

ऐसा न जाने मैं कितनी ही दफा कर चुका हूं। महीने-दो महीने के अंतराल पर अपने मोबाइल में से वाट्सएप और मैसेंजर एप्स को हटा देता हूं। इन दोनों एप्स को जब हटता हूं तब 'निर्णय' लेता हूं कि आगे अब दोबारा इन्हें नहीं डालूंगा! बस बहुत हुआ। आपसी संवाद का जरिया अब एप्स नहीं आमने-समाने की बातचीत ही रहेगी। लेकिन कुछ समय बाद मुझे खुद ही इनकी 'जरूरत' फिर से महसूस होने लगती है और वापस डाल लेता हूं। हालांकि वापस मोबाइल में डालते वक्त तय यही करता हूं कि डाल तो रहा हूं मगर इस्तेमाल न के बराबर ही करूंगा। भला ऐसा भी संभव हुआ है कहीं?

दरअसल, मोबाइल की दुनिया ने हमें इस कदर अपनी 'जकड़' में लिया है कि हम चाहकर भी उससे या किस्म-किस्म की ऐप्स से पीछा नहीं छुड़ा पाते। अगर खुद पीछा छुड़ाने की कोशिश करो भी तो लोग 'मजबूर' कर देते हैं उसके साथ बने रहने के लिए। गजब यह है कि अब कोई (अपवादों को छोड़के) आमने-सामने संवाद या बातचीत करना ही नहीं चाहता। न किसी के पास एक-दूसरे से मिलने को समय है न ही इच्छा। मोबाइल ने संवाद और रिश्तों की दुनिया को किस्म-किस्म की ऐप्स में सिमेटकर रख दिया है।

कभी किसी की खैरियत भी लेनी हो तो वाट्सएप करके पूछ लो या फिर स्काइप-हैंगआउट पर बात करके। देखते ही देखते हम खुद में इस कदर सीमित होकर रह गए हैं कि बाहरी दुनिया से संबंध-रिश्ते न के बराबर कर लिए हैं। खाली टाइम को काटने का जरिया अब किताबें या आपसी मेल-जोल नहीं सिर्फ मोबाइल है।

मोबइल की बीमारी से ऐसा नहीं कि बड़े ही ग्रस्त हैं, धीरे-धीरे कर यह बीमारी बच्चों में भी आती जा रही है। यों तो बच्चों को अपने कोर्स की भारी-भरकम किताबों से ही फुर्सत नहीं मिलती, लेकिन जब मिलती है, तब उनके हाथ में भी मोबइल का खिलौना ही होता है। मोबाइल से खेलकर वे अपना मन बहलाते हैं। अगर मोबाइल से छूटे तो कार्टून नेटवर्क में रम जाते हैं। बच्चों के पारंपरिक खेल अब इतिहास बनकर रह गए हैं। मैंने अक्सर ऐसे मां-बापों को अपने बच्चों की तारीफ करते सुना है कि हमारा ढाई-तीन साल का बच्चा भी मोबाइल की सारी ऐप्स हमसे ज्यादा अच्छे से चला लेता है। दरअसल, बच्चों को भी मोबाइल की दुनिया में धकेलने में हम मां-बाप का भी बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन इसे हम स्वीकार नहीं करेंगे।

धीरे-धीरे कर अब रिश्ते भी मोबाइल सरीखे होते जा रहे हैं। चूंकि रिश्तों में संवाद बचा नहीं, दूरियां और व्यस्तताएं इस कदर बढ़ गई हैं कि अक्सर हमें खुद से ही संवाद किए हफ्तों-महीनों बीत जाते हैं। हमारे बीच सुख-दुख को आपस में मिल-बैठकर बांटने का जो जज्बा कभी हुआ करता था, अब वो निरंतर छीजता जा रहा है। हम सब ने अपनी-अपनी अलग दुनिया बना ली है, बस उसी में अपने मोबाइल के साथ खुश रहते हैं। और जब दुखी होते हैं तो फेसबुक या टि्वटर पर स्टेटस अपडेट कर कुछ 'लाइक' और 'कमेंट' पाकर 'संतोष' कर लेते हैं। कि, आभासी संसार भी हमारी चिंता किया करता है। क्या खूब है कि अब हमें अपनों की चिंता किए जाने से कहीं बढ़कर आभारी संसार द्वारा चिंता किया जाना लगता है। मरने-जीने की खबर रिश्तेदारों को बाद में दी जाती है, पहले फेसबुक का स्टेटस अपडेट होता है।

मोबाइल-संस्कृति ने हमें इस कदर 'आत्मकेंद्रित' कर दिया है कि रात को सोते समय भी हमें घंटी बजने या मैसेज का आभास होता है। जिस तेजी से मोबाइल की दुनिया बदल रही है, उतनी ही तेजी से हम उसके भीतर समाहित होते जा रहे हैं। अगर मोबाइल पास है तो सबकुछ पास है।

दोष दूसरों को ही क्यों दू, मोबाइल के चार्म से मैं खुद को भी कहां बचा पाया हूं। समय-असमय मोबाइल से दूर रहने की प्रतिज्ञा खुद-ब-खुद टूट जाती है। शायद यही वजह है कि मोबाइल के सागर में संवाद कहीं गुम-सा हो गया है।

Monday, 27 April 2015

अब रोकर क्या फायदा हुजूर

वो रोए। खूब रोए। फफ्क-फफ्क के रोए। टीवी पर रोए। सारी दुनिया ने उनका रोना देखा। वो जब रो रहे थे, तब उनका एक हाथ सीने पर था मगर चेहरे पर चश्मा नहीं था। शायद आंसूओं के सैलाब में चश्मा कहीं बह गया हो। या चश्मे ने ही यह तय कर लिया हो कि अब मुझे इस चेहरे पर नहीं रहना।

बहरहाल, उनका रोना मुझे जरा भी 'संवेदी' नहीं लगा। न मैंने उनके रोने को दिल से रोना माना, न उनकी रूलाई पर अपनी संवेदना व्यक्त की।

जब वो टीवी पर दहाड़े मारकर रो रहे थे, मुझे रह-रहकर गजेंद्र के परिवार (खासकर उसके बच्चों) का ख्याल आ रहा था। क्या और कैसी गुजर रही होगी गजेंद्र के बच्चों पर? आगे उनका भविष्य कैसा रहेगा? बच्चे अपने पिता से अब कैसे किसी चीज के वास्ते जिद कर पाएंगे? कैसी पत्नी अपने 'मन की बात' और माता-पिता-बहन अपना 'प्यार' उसको दे पाएंगे?

लेकिन उन्होंने सोचा कि उनके 'रो देने' या उनके 'माफी' मांग लेने भर से गजेंद्र के परिवार के साथ जुड़े सारे दुख खत्म हो जाएंगे। सब, सबकुछ सामान्य हो जाएगा। आठ लाख का चैक पकड़वाकर अपनी जिम्मेदारियों और गुनाह से मुक्त हो जाएंगे। वाह! वाकई कित्ते भोले हैं न। जैसे समाज-राजनीति-मानवता का सारा ज्ञान उन्हीं के पास है। बाकी सब या तो भीड़ है या फिर भेड़चाल।

अभी तलक तो आपने राजनीति को ही 'तमाशा' बनाया था लेकिन इस कांड के बाद से तो आपने 'इंसानीयत' को भी तमाशे में तब्दील कर दिया है। वहां मंच पर मौजूद हर कोई गजेंद्र को पेड़ से लटकने की कोशिश करते देख रहा था लेकिन रैली और भाषण जारी था। उसे नहीं रोक सकते थे क्योंकि वो आम आदमी के लिए था। अरे, क्या फायदा ऐसे भाषण या रैलियों से जिसमें आम आदमी की गर्दन में ही फांसी का फंदा डलवाकर, दूर से मजे लिए जाएं। 'लटक गया', 'लटक गया' का स्लोगन गाया जाए। ऐसी राजनीति करने से तो बेहतर है कि राजनीति में आया ही न जाए।

दिल बहुत व्यथित और उदास है। हम, हममें से कोई भी गजेंद्र तो क्या किसी भी आत्महत्या करते किसान को अभी तलक नहीं बचा पाया है। सब अपने-अपने तरीके से राजनीति का घिनौना खेल खेलने में लगे हैं। बहुत ज्यादा हुआ तो संवेदना जुटाने के लिए सरेआम रो देते हैं। लेकिन रोने से किसी मरे हुए गजेंद्र या किसान को वापस नहीं लाया जा सकता हुजूर।

और थोड़े बहुत दिनों बाद आपके लिए सबकुछ सामान्य हो जाएगा। फिर आपको अपने ही आंसू याद नहीं रहेंगे। लेकिन गजेंद्र का परिवार हर पल, हर कहीं, हर मोड़ पर आपसे यह सवाल जरूर पूछेगा कि आखिर गजेंद्र की गलती क्या थी?

Friday, 27 March 2015

और भी गम हैं दुनिया में क्रिकेट के सिवा

आखिरकार, ऑस्ट्रेलिया ने इंडिया को सातवीं दफा टंगड़ी मार ही दी। सातवीं जीत का स्वाद नहीं चखने दिया। चारों खाने चित्त कर, सामान बांधकर घर वापस भेज दिया। इतने दिनों से जिस 'बड़ी जीत' की 'उम्मीद' लगाए क्रिकेट-प्रेमी बैठे थे, खाक में मिल गई। होता है.. होता है.. बड़े-बड़े खेल में बड़ी-बड़ी बातें होती रहती हैं। खेल में कब किसका पलड़ा भारी पड़ जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। खेल तो खेल है।

इंडियन टीम को मिली हार के बाद अब चुटकुलों और आलोचनाओं का दौर शुरू हो चुका है। हर कोई अपने-अपने हिसाब और तरीके से इंडियन टीम की हार व खिलाड़ियों के प्रदर्शन को डिफाइन कर रहा है। लेकिन भक्त टाइप लोगों को न इंडियन टीम की आलोचना पसंद आ रही है न बनने वाले चुटकुले। वे तो हार को भी डिफेंड कर जस्टीफाई कर रहे हैं। कह रहें- 'एक हार से कुछ न होता जी, पिछले छह मैच तो जीते ही थे। कृपया, आलोचना न करें।'
वाह जी वाह यह खूब रही। कल तक जब जीत रहे थे तो हम सब तारीफ कर रहे थे, आज जब अपनी गलतियों से हारे हैं तो आलोचना भी न करें। न जी न ये हमसे न होगा। आलोचना तो होगी और जमकर होगी। ऐसे नहीं चलेगा कि मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू-थू।

देखा था, कप्तान धोनी भी मैदान पर किसी को उंगुली दिखाते देखे गए थे। यानी, कैप्टन कूल भी गुस्से में थे। यह हार का गुस्सा था या आलोचना का कहना कठिन है। अक्सर देखा है, क्रिकेट में जब हार मिलती है, जब चेहरे ऐसे ही बिगड़ जाते हैं। अपनी खामियों से पि़ड छुड़ाने के लिए ऐसी हरकतें उचित नहीं।

हम भी अजीब हैं, पता नहीं क्यों इंडियन टीम से इतनी भारी-भरकम उम्मीदें पाल लेते हैं कि जिन्हें बेचारे पूरा भी नहीं कर पाते। इतने दिनों से इन उम्मीदों का पार चढ़ाने में खबरिया चैनलों ने जो भूमिका निभाई है, उस पर गुस्सा कम हंसी अधिक आती है। क्रिकेट को खेल नहीं रहने दिया, युद्ध का मैदान बना दिया। तरह-तरह के देश-भक्ति युक्त नारे, किस्म-किस्म के गाने, अजीब-अजीब सी बातें-हरकतें। एक दफा को तो लग रहा था कि पूरा माहौल ही जोक और जोकर-मंडली में तब्दील हो चुका है। हैरान हो रही थी, पुराने इज्जतदार क्रिकेटरों को भी ऐसी बेहूदगियों का हिस्सा बनता देखकर।
जब हार गए तो सबके चेहरे यों लटक गए थे मानो सब के सब गणित के पर्चे में फेल हो गए हों। अमां, जब जीत पर खिलखिला सकते हो तो हार को बर्दाशत करना भी सीखो। क्योंकि हर दिन होत न एक समान। न भूलें, क्रिकेट को धर्म और बाजार में तब्दील मीडिया ने ही किया है।

क्रिकेट पहले भी हुआ करता था, पहले भी खिलाड़ी खेला करते थे लेकिन इतना उन्माद और बुखार नहीं होता था। उन्मादी उत्साह के बीच शायद हम यह भूल जाते हैं कि क्रिकेट महज एक खेल है, कॉमोडिटी नहीं। जब खेल या चीज कॉमोडिटी में बदल जाती है फिर वो बाजार का हिस्सा हो जाती है। फिर उसकी सारी चीजें बाजार से ही तय होती हैं। यकीनन, क्रिकेट अब बाजार है। धर्म, भगवान, पैसा, प्यार, शौहरत, आस्था, उत्साह, उन्माद सब कुछ है इसमें।

सौ बात की एक बात, हार को सहन न कर पाना सबसे बड़ी हार कहलाती है। हम क्रिकेट में ही हारे हैं, देश नहीं। देश से बढ़कर खेल नहीं हो सकता। एक तरफ जहां किसान लगातार आत्महत्याएं करने को मजबूर हैं, दूसरी तरफ हमारा मीडिया हमें क्रिकेट की चाशनी परोस रहा है। कितना दुखद है यह सब देखना। किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, बात उस पर नहीं, बहस यह हो रही है कि इंडियन टीम क्यों और कैसे हार गई। पता नहीं हमारे खबरिया चैनल कब अपने 'बचपने' से बाहर आकर 'जिम्मेदार' बनने का प्रयास करेंगे? किसान की आत्महत्या से कहीं ज्यादा जरूर उनके लिए क्रिकेट की हार है। कमाल है...।

हार गए तो हार गए इसमें अफसोस या मातम कैसा? हां जिन वजहों से हारे हैं, उन पर 'आत्ममंथन' तो बनता है। थोड़ा मीडिया को भी सोचना चाहिए कि क्रिकेट ही सबकुछ नहीं, और भी गम हैं दुनिया में क्रिकेट के सिवा।

Wednesday, 4 March 2015

आप के बीच घमासान

एक 'विचार' और 'उद्देश्यविहीन' राजनीतिक दल का 'हश्र' क्या और कैसा होता है, इसे आम आदमी पार्टी (आप) के भीतर चल रहे हालिया घमासान को देखकर अच्छे से समझा जा सकता है। पार्टी के भीतर सदस्यों के 'अहम' इस कदर बढ़े हुए है कि कोई किसी की बात सुनना नहीं चाहता।

योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल के बीच 'विचार' से कहीं ज्यादा 'अहम' के 'मतभेद' हैं। अहम के कारण ही पार्टी दो धड़ों में बंट गई है। हर कोई अपने-अपने कद की लड़ाई लड़ता हुआ दिख रहा है। लेकिन अरविंद केजरीवाल 'आप' के भीतर-बाहर न योगेंद्र यादव, न प्रशांत भूषण दोनों में से किसी का भी कद बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते। 'आप' के भीतर-बाहर अरविंद केजरीवाल अपनी 'पोजिशन' ठीक वैसी ही बनाए रखना चाहते हैं कि जैसी कि नरेंद्र मोदी भाजपा में। यानी, एक व्यक्ति, एकछत्र राज। जो वो करें बस वही ठीक। बाकी सब बेकार।

यहां सबसे अधिक 'हास्यास्पद' यह है कि अरविंद केजरीवाल को हर बात देर से ही पता चलती है। अगर योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के व्यवहार या कामों को लेकर उनकी नाराजगी या असहमतियां थीं तो क्या इनका पता उन्हें पहले से नहीं था? क्या वो यह नहीं जानते थे कि पार्टी के भीतर सदस्यों के बीच कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। वैसे सुनते तो यही हैं कि अरविंद केजरीवाल और 'आप' का 'सोशल नेटवर्किंग' प्लेटफार्म बहुत तगड़ा है। न केवल देश बल्कि पूरे विश्व की हर बात की हर खबर उन्हें रहती है! कभी रहे बड़े पत्रकार भी अब 'आप' से जुड़े हुए हैं। मीडिया के भीतर भी उनका अच्छा दबदबा है। फिर भी योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की मंशा को भांप नहीं पाए। बात हजम नहीं होती।

भले ही अरविंद केजरीवाल पार्टी के भीतर मचे घमासान को लेकर व्यथित हों लेकिन एक न एक दिन यह तो होना ही था। होता भी क्यों नहीं, जब आप राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं ही इतनी ऊंची-ऊंची पाल लेंगे। अपने और अपनी पार्टी के आगे किसी को कुछ समझेंगे नहीं फिर यह तो होगा। जो पार्टी अपने सदस्यों के बीच लोकतंत्र को बचाकर नहीं रख सकी फिर भला उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो देश के लोकतंत्र को संभाल पाने का माआदा रखती है।

'आप' शुरू से ही 'वन-मैन शो' पर निर्भर और केंद्रित रही है। यही वजह है कि उसे केजरीवाल से बढ़कर किसी अन्य का बढ़ता कद बर्दाशत नहीं। 'आप' के भीतर मची कद-प्रतिष्ठा की लड़ाई से जनता का कितना नुकसान हो रहा है, इसका एहसास केजरीवाल को शायद नहीं होगा। जिस पार्टी ने पहाड़ जितने वायदे दिल्ली की जनता से कर डाले हैं, उन्हें पूरा करने के बजाय वो अपने ही सदस्यों के पचड़े में उलझी हुई है। कुछ लीटर पानी मुफ्त करवाकर शायद केजरीवाल यह समझ रहे हैं कि उन्होंने 'जग' जीत लिया। जिस 'अहंकार' का उपदेश पिछले दिनों उन्होंने भाजपा और कांग्रेस को दिया था, आज खुद उनकी पार्टी उसी अहंकार की शिकार है। इस अहंकार की गिरफ्त से अगर 'आप' नहीं निकली तो एक दिन उसका 'हश्र' भी भाजपा-कांग्रेस जैसा ही होगा। क्योंकि लोकतंत्र में जनता से बढ़कर और बढ़ा कोई नहीं होता।

Sunday, 11 January 2015

साहित्य और पाठक को क्या मिल रहा है?

चाहे रायपुर के बहाने कह लीजिए या फिर रायपुर साहित्य महोत्सव के बरक्स; विवादों-बहस-मुबाहिसों का दौर फिलहाल अभी 'थमा' नहीं है। यह सिलसिला अनवरत जारी है। फेसबुक पर यदा-कदा अब भी कुछ स्टेटस पढ़ने को मिल ही जाते हैं। एकाध अखबारों में इस मुद्दे पर लेख भी आए हैं पर बहस का माहौल नहीं बन सका। (या फिर बनाने दिया ही न गया हो...!)

फिलहाल, विवाद पर बहस 'जनसत्ता' में चल रही है। दो खेमों (एक- जाने वाले और दूसरे- न जाने वाले) में इस-उस पर 'तौहमतें' लगाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। दोनों तरफ के खेमें वाले जाने न जाने के बहाने खुद को खूब 'जस्टिफाई' कर रहे हैं। तमाम तरह के बड़े-बड़े वैचारिक और प्रतिबद्धतायुक्त उदाहरण पेश किए जा रहे हैं। कुछ से पार्टनर की पालिटिक्स का हिसाब मांगा जा रहा है तो कुछ से वैचारिक क्रांतियों का जमा-हासिल। मतलब, कभी किसी जमाने में एक समान विचारधारा में एक साथ रहे लोग, अब विपरीत प्रकार के धड़ों या खेमों में बंट गए हैं। कृपया, इस विवाद में विचार या वैचारिक प्रतिबद्धता की बात न कीजिएगा क्योंकि अब उसका साहित्य में कोई 'खास महत्त्व' नहीं रह गया है। बस एक प्रकार की जिद है कि कैसे अपने को चढ़ाना है और दूसरे को गिराना। वामपंथ या मार्क्सवाद अब गुजरे जमाने की बातें हुईं। दक्षिणपंथ के पहाड़ ने वामपंथ के ऊंट को अपने नीचे दबा लिया है। लेकिन जो अपनी सत्ता या विचारधारा से असहमतियों और प्रगतिशील सोच के चलते नहीं दबे हैं, उन्हें अलग-थलग सा कर दिया है।

बेशक रायपुर साहित्य महोत्सव पर अंगुलियां उठाइए, विरोध कीजिए, आलोचना कीजिए लेकिन ये सब करने से पहले, तय कर लीजिए कि कहीं, गाहे-बगाहे, आप भी उसका हिस्सा तो नहीं! विरोध की सीढ़ी पर चढ़कर साहित्य में 'स्पेस' बनाती कॉरपोरेट-संस्कृति पर बहस तो हो रही है किंतु विरोध में सबसे आगे वही लोग हैं, जो किसी न किसी तरीके से खुद भी उसी कॉरपोरेट-संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन, उन्हें अपना 'कॉरपोरेटवाद' तो 'न्याय' एवं 'तर्कसंगत' लगता है किंतु साहित्य और साहित्यकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

आज हम जिस समय और समाज के बीच रह रहे हैं, सच्ची-सच्ची बतलाइएगा, उसमें ऐसा कौन-सा हिस्सा या व्यक्ति नहीं है, जिस पर कॉरपोरेट-संस्कृति की छाया न हो। हम सब कहीं न कहीं, किसी न किसी मुकाम पर कॉरपोरेट-संस्कृति का हिस्सा बने हुए हैं। बाजार के जिस बढ़ते प्रभाव का विरोध हम पानी पी-पीकर करते हैं, उसी बाजार को हम हर रोज, हर पल, हर क्षेत्र में न केवल देख रहे हैं बल्कि खुद जी भी रहे हैं। फिर भी, खुद पर प्रगतिशीलता का लेबल चिपकाए रहने की जिद में कथित विचारशील लोग बाजार का विरोध कर रहे हैं। जबकि हर सुविधा उन्हें बाजार से ही चाहिए। ऐसे 'दोगले विरोध' का क्या मतलब है?

मानिए या न मानिए अब साहित्य भी बाजार और कॉरपोरेट-क्लचर का ही हिस्सा बनता जा रहा है। मुझे मालूम है, ऐसा बहुत से लोग नहीं मानेंगे मगर यह 'सत्य' है। बाजार और कॉरपोरेट-क्लचर को खारिज कर समाज तो छोड़िए अब आप साहित्य में भी नहीं रह सकते। रायपुर के बहाने भी- 'जनसत्ता' में छपे कुछ लेखों में- कॉरपोरेट संस्कृति-साहित्य-मीडिया आदि का जिक्र तो आया है, पर साथ-साथ विरोध में कई तरह के दोहराव और बिखराव भी देखने को मिले हैं।

सबसे अधिक 'हास्यास्पद' तर्क ये हैं कि अगर दक्षिणपंथी सरकार होने के बावजूद हम उसमें चले गए, लिफाफा ले लिया, हाथ मिला लिया, मंच पर चढ़कर अपनी बात 'प्रमुखता' से कह दी तो ऐसा कौन-सा 'गुनाह' कर दिया? आखिर 'जीत' तो हमारी ही हुई न! न जी न बिल्कुल गुनाह नहीं किया- एकदम ठीक किया। करना भी यही चाहिए था। लेकिन, मुझको बस इतना बतला दीजिए कि फिर आपके इस शाब्दिक और भाषाई (दक्षिणपंथी) विरोध का क्या अर्थ-मतलब रह जाता है? आपने तो सत्ता के सम्मुख अपनी विचारधारा, अपने सिद्धांत, अपनी नैतिकता तक को 'गिरवी' रख दिया। उस वाम-प्रगतिशील विचारधारा को भी, जिस पर आपको उतना ही नाज था, जितना भक्तों को अपने ईश्वर पर रहता है। मगर रायपुर में बिछे नर्म गद्दों पर बैठकर यह कथित नाज आखिर कहां गायब को गया, मान्यवर?

रायपुर में आपने अपनी बात प्रमुखता जरूर रखी हो पर वो 'नक्कारखाने में तूती' जितनी ही रही। जब कुछ जगहों से विरोध हुआ तो तर्क दे दिया कि ऐसे तो क्या हम कहीं जाएंगे नहीं? कहीं किसी से मिलेंगे नहीं? कब तलक इस-उस का 'बहिष्कार' करते रहेंगे। खुद को जबरन जस्टिफाई करने के लिए ये तर्क बहुत अच्छे हैं।

अंत में, बस इतना और बतला दीजिए, कि इन विरोधनुमा प्रतिक्रियाओं, आपसी मन-मुटावों, लंबे-चौड़े जस्टिफिकेशनों, बहसों आदि से साहित्य और पाठकों को क्या 'खास हासिल' हुआ? उन्हें किस विचारधारा, किस रचनात्मकता, किस कलाकर्म से आपने रू-ब-रू करवाया? क्या पाठक सिर्फ आपके आपसी बेतुके विवादों-बहसों को पढ़ने के लिए है? क्या वो अखबार या पत्रिका इसलिए खरीदता कि आपके जस्टिफिकेशनों को पढ़ सके?

बुरा न मानिएगा, हिंदी साहित्य और साहित्यकार के लगातार हाशिए पर खिसकते जाने का सबसे बड़ा कारण ये 'बोसीदा बहसें' ही हैं। जिनमें आपसी हिसाब-किताब चुकता करने के अलावा कुछ भी 'गंभीर' या 'रचनात्मक' नहीं होता।

इस बिखरते और लगातार हाशिए पर सिमटते साहित्य और विचार को बचाइए, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं पर कायम रहिए- नहीं तो आगे आने वाली पीढ़ी जब आपसे हिसाब मांगेगी फिर आपके पास कुछ नहीं होगा उन्हें देने को। बाकी आपकी मर्जी।