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Sunday, 11 January 2015

साहित्य और पाठक को क्या मिल रहा है?

चाहे रायपुर के बहाने कह लीजिए या फिर रायपुर साहित्य महोत्सव के बरक्स; विवादों-बहस-मुबाहिसों का दौर फिलहाल अभी 'थमा' नहीं है। यह सिलसिला अनवरत जारी है। फेसबुक पर यदा-कदा अब भी कुछ स्टेटस पढ़ने को मिल ही जाते हैं। एकाध अखबारों में इस मुद्दे पर लेख भी आए हैं पर बहस का माहौल नहीं बन सका। (या फिर बनाने दिया ही न गया हो...!)

फिलहाल, विवाद पर बहस 'जनसत्ता' में चल रही है। दो खेमों (एक- जाने वाले और दूसरे- न जाने वाले) में इस-उस पर 'तौहमतें' लगाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। दोनों तरफ के खेमें वाले जाने न जाने के बहाने खुद को खूब 'जस्टिफाई' कर रहे हैं। तमाम तरह के बड़े-बड़े वैचारिक और प्रतिबद्धतायुक्त उदाहरण पेश किए जा रहे हैं। कुछ से पार्टनर की पालिटिक्स का हिसाब मांगा जा रहा है तो कुछ से वैचारिक क्रांतियों का जमा-हासिल। मतलब, कभी किसी जमाने में एक समान विचारधारा में एक साथ रहे लोग, अब विपरीत प्रकार के धड़ों या खेमों में बंट गए हैं। कृपया, इस विवाद में विचार या वैचारिक प्रतिबद्धता की बात न कीजिएगा क्योंकि अब उसका साहित्य में कोई 'खास महत्त्व' नहीं रह गया है। बस एक प्रकार की जिद है कि कैसे अपने को चढ़ाना है और दूसरे को गिराना। वामपंथ या मार्क्सवाद अब गुजरे जमाने की बातें हुईं। दक्षिणपंथ के पहाड़ ने वामपंथ के ऊंट को अपने नीचे दबा लिया है। लेकिन जो अपनी सत्ता या विचारधारा से असहमतियों और प्रगतिशील सोच के चलते नहीं दबे हैं, उन्हें अलग-थलग सा कर दिया है।

बेशक रायपुर साहित्य महोत्सव पर अंगुलियां उठाइए, विरोध कीजिए, आलोचना कीजिए लेकिन ये सब करने से पहले, तय कर लीजिए कि कहीं, गाहे-बगाहे, आप भी उसका हिस्सा तो नहीं! विरोध की सीढ़ी पर चढ़कर साहित्य में 'स्पेस' बनाती कॉरपोरेट-संस्कृति पर बहस तो हो रही है किंतु विरोध में सबसे आगे वही लोग हैं, जो किसी न किसी तरीके से खुद भी उसी कॉरपोरेट-संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन, उन्हें अपना 'कॉरपोरेटवाद' तो 'न्याय' एवं 'तर्कसंगत' लगता है किंतु साहित्य और साहित्यकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

आज हम जिस समय और समाज के बीच रह रहे हैं, सच्ची-सच्ची बतलाइएगा, उसमें ऐसा कौन-सा हिस्सा या व्यक्ति नहीं है, जिस पर कॉरपोरेट-संस्कृति की छाया न हो। हम सब कहीं न कहीं, किसी न किसी मुकाम पर कॉरपोरेट-संस्कृति का हिस्सा बने हुए हैं। बाजार के जिस बढ़ते प्रभाव का विरोध हम पानी पी-पीकर करते हैं, उसी बाजार को हम हर रोज, हर पल, हर क्षेत्र में न केवल देख रहे हैं बल्कि खुद जी भी रहे हैं। फिर भी, खुद पर प्रगतिशीलता का लेबल चिपकाए रहने की जिद में कथित विचारशील लोग बाजार का विरोध कर रहे हैं। जबकि हर सुविधा उन्हें बाजार से ही चाहिए। ऐसे 'दोगले विरोध' का क्या मतलब है?

मानिए या न मानिए अब साहित्य भी बाजार और कॉरपोरेट-क्लचर का ही हिस्सा बनता जा रहा है। मुझे मालूम है, ऐसा बहुत से लोग नहीं मानेंगे मगर यह 'सत्य' है। बाजार और कॉरपोरेट-क्लचर को खारिज कर समाज तो छोड़िए अब आप साहित्य में भी नहीं रह सकते। रायपुर के बहाने भी- 'जनसत्ता' में छपे कुछ लेखों में- कॉरपोरेट संस्कृति-साहित्य-मीडिया आदि का जिक्र तो आया है, पर साथ-साथ विरोध में कई तरह के दोहराव और बिखराव भी देखने को मिले हैं।

सबसे अधिक 'हास्यास्पद' तर्क ये हैं कि अगर दक्षिणपंथी सरकार होने के बावजूद हम उसमें चले गए, लिफाफा ले लिया, हाथ मिला लिया, मंच पर चढ़कर अपनी बात 'प्रमुखता' से कह दी तो ऐसा कौन-सा 'गुनाह' कर दिया? आखिर 'जीत' तो हमारी ही हुई न! न जी न बिल्कुल गुनाह नहीं किया- एकदम ठीक किया। करना भी यही चाहिए था। लेकिन, मुझको बस इतना बतला दीजिए कि फिर आपके इस शाब्दिक और भाषाई (दक्षिणपंथी) विरोध का क्या अर्थ-मतलब रह जाता है? आपने तो सत्ता के सम्मुख अपनी विचारधारा, अपने सिद्धांत, अपनी नैतिकता तक को 'गिरवी' रख दिया। उस वाम-प्रगतिशील विचारधारा को भी, जिस पर आपको उतना ही नाज था, जितना भक्तों को अपने ईश्वर पर रहता है। मगर रायपुर में बिछे नर्म गद्दों पर बैठकर यह कथित नाज आखिर कहां गायब को गया, मान्यवर?

रायपुर में आपने अपनी बात प्रमुखता जरूर रखी हो पर वो 'नक्कारखाने में तूती' जितनी ही रही। जब कुछ जगहों से विरोध हुआ तो तर्क दे दिया कि ऐसे तो क्या हम कहीं जाएंगे नहीं? कहीं किसी से मिलेंगे नहीं? कब तलक इस-उस का 'बहिष्कार' करते रहेंगे। खुद को जबरन जस्टिफाई करने के लिए ये तर्क बहुत अच्छे हैं।

अंत में, बस इतना और बतला दीजिए, कि इन विरोधनुमा प्रतिक्रियाओं, आपसी मन-मुटावों, लंबे-चौड़े जस्टिफिकेशनों, बहसों आदि से साहित्य और पाठकों को क्या 'खास हासिल' हुआ? उन्हें किस विचारधारा, किस रचनात्मकता, किस कलाकर्म से आपने रू-ब-रू करवाया? क्या पाठक सिर्फ आपके आपसी बेतुके विवादों-बहसों को पढ़ने के लिए है? क्या वो अखबार या पत्रिका इसलिए खरीदता कि आपके जस्टिफिकेशनों को पढ़ सके?

बुरा न मानिएगा, हिंदी साहित्य और साहित्यकार के लगातार हाशिए पर खिसकते जाने का सबसे बड़ा कारण ये 'बोसीदा बहसें' ही हैं। जिनमें आपसी हिसाब-किताब चुकता करने के अलावा कुछ भी 'गंभीर' या 'रचनात्मक' नहीं होता।

इस बिखरते और लगातार हाशिए पर सिमटते साहित्य और विचार को बचाइए, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं पर कायम रहिए- नहीं तो आगे आने वाली पीढ़ी जब आपसे हिसाब मांगेगी फिर आपके पास कुछ नहीं होगा उन्हें देने को। बाकी आपकी मर्जी।