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Friday, 27 March 2015

और भी गम हैं दुनिया में क्रिकेट के सिवा

आखिरकार, ऑस्ट्रेलिया ने इंडिया को सातवीं दफा टंगड़ी मार ही दी। सातवीं जीत का स्वाद नहीं चखने दिया। चारों खाने चित्त कर, सामान बांधकर घर वापस भेज दिया। इतने दिनों से जिस 'बड़ी जीत' की 'उम्मीद' लगाए क्रिकेट-प्रेमी बैठे थे, खाक में मिल गई। होता है.. होता है.. बड़े-बड़े खेल में बड़ी-बड़ी बातें होती रहती हैं। खेल में कब किसका पलड़ा भारी पड़ जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। खेल तो खेल है।

इंडियन टीम को मिली हार के बाद अब चुटकुलों और आलोचनाओं का दौर शुरू हो चुका है। हर कोई अपने-अपने हिसाब और तरीके से इंडियन टीम की हार व खिलाड़ियों के प्रदर्शन को डिफाइन कर रहा है। लेकिन भक्त टाइप लोगों को न इंडियन टीम की आलोचना पसंद आ रही है न बनने वाले चुटकुले। वे तो हार को भी डिफेंड कर जस्टीफाई कर रहे हैं। कह रहें- 'एक हार से कुछ न होता जी, पिछले छह मैच तो जीते ही थे। कृपया, आलोचना न करें।'
वाह जी वाह यह खूब रही। कल तक जब जीत रहे थे तो हम सब तारीफ कर रहे थे, आज जब अपनी गलतियों से हारे हैं तो आलोचना भी न करें। न जी न ये हमसे न होगा। आलोचना तो होगी और जमकर होगी। ऐसे नहीं चलेगा कि मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू-थू।

देखा था, कप्तान धोनी भी मैदान पर किसी को उंगुली दिखाते देखे गए थे। यानी, कैप्टन कूल भी गुस्से में थे। यह हार का गुस्सा था या आलोचना का कहना कठिन है। अक्सर देखा है, क्रिकेट में जब हार मिलती है, जब चेहरे ऐसे ही बिगड़ जाते हैं। अपनी खामियों से पि़ड छुड़ाने के लिए ऐसी हरकतें उचित नहीं।

हम भी अजीब हैं, पता नहीं क्यों इंडियन टीम से इतनी भारी-भरकम उम्मीदें पाल लेते हैं कि जिन्हें बेचारे पूरा भी नहीं कर पाते। इतने दिनों से इन उम्मीदों का पार चढ़ाने में खबरिया चैनलों ने जो भूमिका निभाई है, उस पर गुस्सा कम हंसी अधिक आती है। क्रिकेट को खेल नहीं रहने दिया, युद्ध का मैदान बना दिया। तरह-तरह के देश-भक्ति युक्त नारे, किस्म-किस्म के गाने, अजीब-अजीब सी बातें-हरकतें। एक दफा को तो लग रहा था कि पूरा माहौल ही जोक और जोकर-मंडली में तब्दील हो चुका है। हैरान हो रही थी, पुराने इज्जतदार क्रिकेटरों को भी ऐसी बेहूदगियों का हिस्सा बनता देखकर।
जब हार गए तो सबके चेहरे यों लटक गए थे मानो सब के सब गणित के पर्चे में फेल हो गए हों। अमां, जब जीत पर खिलखिला सकते हो तो हार को बर्दाशत करना भी सीखो। क्योंकि हर दिन होत न एक समान। न भूलें, क्रिकेट को धर्म और बाजार में तब्दील मीडिया ने ही किया है।

क्रिकेट पहले भी हुआ करता था, पहले भी खिलाड़ी खेला करते थे लेकिन इतना उन्माद और बुखार नहीं होता था। उन्मादी उत्साह के बीच शायद हम यह भूल जाते हैं कि क्रिकेट महज एक खेल है, कॉमोडिटी नहीं। जब खेल या चीज कॉमोडिटी में बदल जाती है फिर वो बाजार का हिस्सा हो जाती है। फिर उसकी सारी चीजें बाजार से ही तय होती हैं। यकीनन, क्रिकेट अब बाजार है। धर्म, भगवान, पैसा, प्यार, शौहरत, आस्था, उत्साह, उन्माद सब कुछ है इसमें।

सौ बात की एक बात, हार को सहन न कर पाना सबसे बड़ी हार कहलाती है। हम क्रिकेट में ही हारे हैं, देश नहीं। देश से बढ़कर खेल नहीं हो सकता। एक तरफ जहां किसान लगातार आत्महत्याएं करने को मजबूर हैं, दूसरी तरफ हमारा मीडिया हमें क्रिकेट की चाशनी परोस रहा है। कितना दुखद है यह सब देखना। किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, बात उस पर नहीं, बहस यह हो रही है कि इंडियन टीम क्यों और कैसे हार गई। पता नहीं हमारे खबरिया चैनल कब अपने 'बचपने' से बाहर आकर 'जिम्मेदार' बनने का प्रयास करेंगे? किसान की आत्महत्या से कहीं ज्यादा जरूर उनके लिए क्रिकेट की हार है। कमाल है...।

हार गए तो हार गए इसमें अफसोस या मातम कैसा? हां जिन वजहों से हारे हैं, उन पर 'आत्ममंथन' तो बनता है। थोड़ा मीडिया को भी सोचना चाहिए कि क्रिकेट ही सबकुछ नहीं, और भी गम हैं दुनिया में क्रिकेट के सिवा।

Wednesday, 4 March 2015

आप के बीच घमासान

एक 'विचार' और 'उद्देश्यविहीन' राजनीतिक दल का 'हश्र' क्या और कैसा होता है, इसे आम आदमी पार्टी (आप) के भीतर चल रहे हालिया घमासान को देखकर अच्छे से समझा जा सकता है। पार्टी के भीतर सदस्यों के 'अहम' इस कदर बढ़े हुए है कि कोई किसी की बात सुनना नहीं चाहता।

योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल के बीच 'विचार' से कहीं ज्यादा 'अहम' के 'मतभेद' हैं। अहम के कारण ही पार्टी दो धड़ों में बंट गई है। हर कोई अपने-अपने कद की लड़ाई लड़ता हुआ दिख रहा है। लेकिन अरविंद केजरीवाल 'आप' के भीतर-बाहर न योगेंद्र यादव, न प्रशांत भूषण दोनों में से किसी का भी कद बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते। 'आप' के भीतर-बाहर अरविंद केजरीवाल अपनी 'पोजिशन' ठीक वैसी ही बनाए रखना चाहते हैं कि जैसी कि नरेंद्र मोदी भाजपा में। यानी, एक व्यक्ति, एकछत्र राज। जो वो करें बस वही ठीक। बाकी सब बेकार।

यहां सबसे अधिक 'हास्यास्पद' यह है कि अरविंद केजरीवाल को हर बात देर से ही पता चलती है। अगर योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के व्यवहार या कामों को लेकर उनकी नाराजगी या असहमतियां थीं तो क्या इनका पता उन्हें पहले से नहीं था? क्या वो यह नहीं जानते थे कि पार्टी के भीतर सदस्यों के बीच कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। वैसे सुनते तो यही हैं कि अरविंद केजरीवाल और 'आप' का 'सोशल नेटवर्किंग' प्लेटफार्म बहुत तगड़ा है। न केवल देश बल्कि पूरे विश्व की हर बात की हर खबर उन्हें रहती है! कभी रहे बड़े पत्रकार भी अब 'आप' से जुड़े हुए हैं। मीडिया के भीतर भी उनका अच्छा दबदबा है। फिर भी योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की मंशा को भांप नहीं पाए। बात हजम नहीं होती।

भले ही अरविंद केजरीवाल पार्टी के भीतर मचे घमासान को लेकर व्यथित हों लेकिन एक न एक दिन यह तो होना ही था। होता भी क्यों नहीं, जब आप राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं ही इतनी ऊंची-ऊंची पाल लेंगे। अपने और अपनी पार्टी के आगे किसी को कुछ समझेंगे नहीं फिर यह तो होगा। जो पार्टी अपने सदस्यों के बीच लोकतंत्र को बचाकर नहीं रख सकी फिर भला उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो देश के लोकतंत्र को संभाल पाने का माआदा रखती है।

'आप' शुरू से ही 'वन-मैन शो' पर निर्भर और केंद्रित रही है। यही वजह है कि उसे केजरीवाल से बढ़कर किसी अन्य का बढ़ता कद बर्दाशत नहीं। 'आप' के भीतर मची कद-प्रतिष्ठा की लड़ाई से जनता का कितना नुकसान हो रहा है, इसका एहसास केजरीवाल को शायद नहीं होगा। जिस पार्टी ने पहाड़ जितने वायदे दिल्ली की जनता से कर डाले हैं, उन्हें पूरा करने के बजाय वो अपने ही सदस्यों के पचड़े में उलझी हुई है। कुछ लीटर पानी मुफ्त करवाकर शायद केजरीवाल यह समझ रहे हैं कि उन्होंने 'जग' जीत लिया। जिस 'अहंकार' का उपदेश पिछले दिनों उन्होंने भाजपा और कांग्रेस को दिया था, आज खुद उनकी पार्टी उसी अहंकार की शिकार है। इस अहंकार की गिरफ्त से अगर 'आप' नहीं निकली तो एक दिन उसका 'हश्र' भी भाजपा-कांग्रेस जैसा ही होगा। क्योंकि लोकतंत्र में जनता से बढ़कर और बढ़ा कोई नहीं होता।