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Monday, 27 April 2015

अब रोकर क्या फायदा हुजूर

वो रोए। खूब रोए। फफ्क-फफ्क के रोए। टीवी पर रोए। सारी दुनिया ने उनका रोना देखा। वो जब रो रहे थे, तब उनका एक हाथ सीने पर था मगर चेहरे पर चश्मा नहीं था। शायद आंसूओं के सैलाब में चश्मा कहीं बह गया हो। या चश्मे ने ही यह तय कर लिया हो कि अब मुझे इस चेहरे पर नहीं रहना।

बहरहाल, उनका रोना मुझे जरा भी 'संवेदी' नहीं लगा। न मैंने उनके रोने को दिल से रोना माना, न उनकी रूलाई पर अपनी संवेदना व्यक्त की।

जब वो टीवी पर दहाड़े मारकर रो रहे थे, मुझे रह-रहकर गजेंद्र के परिवार (खासकर उसके बच्चों) का ख्याल आ रहा था। क्या और कैसी गुजर रही होगी गजेंद्र के बच्चों पर? आगे उनका भविष्य कैसा रहेगा? बच्चे अपने पिता से अब कैसे किसी चीज के वास्ते जिद कर पाएंगे? कैसी पत्नी अपने 'मन की बात' और माता-पिता-बहन अपना 'प्यार' उसको दे पाएंगे?

लेकिन उन्होंने सोचा कि उनके 'रो देने' या उनके 'माफी' मांग लेने भर से गजेंद्र के परिवार के साथ जुड़े सारे दुख खत्म हो जाएंगे। सब, सबकुछ सामान्य हो जाएगा। आठ लाख का चैक पकड़वाकर अपनी जिम्मेदारियों और गुनाह से मुक्त हो जाएंगे। वाह! वाकई कित्ते भोले हैं न। जैसे समाज-राजनीति-मानवता का सारा ज्ञान उन्हीं के पास है। बाकी सब या तो भीड़ है या फिर भेड़चाल।

अभी तलक तो आपने राजनीति को ही 'तमाशा' बनाया था लेकिन इस कांड के बाद से तो आपने 'इंसानीयत' को भी तमाशे में तब्दील कर दिया है। वहां मंच पर मौजूद हर कोई गजेंद्र को पेड़ से लटकने की कोशिश करते देख रहा था लेकिन रैली और भाषण जारी था। उसे नहीं रोक सकते थे क्योंकि वो आम आदमी के लिए था। अरे, क्या फायदा ऐसे भाषण या रैलियों से जिसमें आम आदमी की गर्दन में ही फांसी का फंदा डलवाकर, दूर से मजे लिए जाएं। 'लटक गया', 'लटक गया' का स्लोगन गाया जाए। ऐसी राजनीति करने से तो बेहतर है कि राजनीति में आया ही न जाए।

दिल बहुत व्यथित और उदास है। हम, हममें से कोई भी गजेंद्र तो क्या किसी भी आत्महत्या करते किसान को अभी तलक नहीं बचा पाया है। सब अपने-अपने तरीके से राजनीति का घिनौना खेल खेलने में लगे हैं। बहुत ज्यादा हुआ तो संवेदना जुटाने के लिए सरेआम रो देते हैं। लेकिन रोने से किसी मरे हुए गजेंद्र या किसान को वापस नहीं लाया जा सकता हुजूर।

और थोड़े बहुत दिनों बाद आपके लिए सबकुछ सामान्य हो जाएगा। फिर आपको अपने ही आंसू याद नहीं रहेंगे। लेकिन गजेंद्र का परिवार हर पल, हर कहीं, हर मोड़ पर आपसे यह सवाल जरूर पूछेगा कि आखिर गजेंद्र की गलती क्या थी?