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Monday, 29 June 2015

प्यारेलाल की मलाईकुल्फी

प्यारेलाल। सचमूच वो प्यारेलाल ही हैं। लंबा-चौड़ा कद। हमेशा हंसता-मुस्कुराता चेहरा। तीखी और कड़क आवाज 'मलाई...कुल्फी'। मिनट भर में ढेरों बच्चे उनके आसपास। अंकल दो वाली मुझे... पांच वाली मुझे। दस वाली मुझे। बच्चों के बीच हल्की-फुल्की 'धींगा-मुश्ती'। फिर सब 'मस्त'। प्यारेलाल भी खुश। बच्चों को मलाईकुल्फी खिलाके, अक्सर उनके चेहरे को देखो, तो लगता कि वो अंदर से कितना खुश और संतुष्ट हैं। उन्हें और उनके इर्द-गिर्द मौजूद बच्चों को देखकर प्रायः मुझे अपना बचपन याद आ जाता है।

कल ही की तो बात थी, जब हम खुद बच्चे थे। प्यारेलाल हमारे स्कूल के पास ही खड़े होते थे, छुट्टी के बाद गली में आ जाया करते थे। हम उनकी मलाईकुल्फी के इतने 'दीवाने' की स्कूल में तो खाते ही थे, जब गली में आते तब भी जरूरत खाते। प्यारेलाल को फिर से एक मौका मिल जाता था, हम बच्चों को देखकर खुश होने का। उनकी आंखों में 'चमक' बढ़ जाती थी। आवाज में और सुरीला-सा कड़कपन आ जाता था। मलाई...कुल्फी (कुल्फी की आवाज बहुत धीमे से आती थी)।

मजे की बात यह है कि प्यारेलाल अब भी आते हैं। अब थोड़ा उम्रदराज हो गए हैं। मगर आवाज में कड़कपन अब भी कायम है। हमारी गली भी बदल गई है। पर है करीब ही। प्यारेलाल अक्सर दोपहर में ही आते हैं। उस वक्त मैं तो दफ्तर में होता हूं। उनकी मलाईकुल्फी को 'मिस' भी करता हूं पर 'सुकून' इस बात का रहता है कि मेरी बेटियां उसी चाव से उनकी मलाईकुल्फी को खाती हैं। वो भी प्यारेलाल की मलाईकुल्फी की उतनी ही दीवानी हैं, जितना कि मैं।

पिछले इतवार प्यारेलाल जब गली में आए इत्तेफाक से मैं घर में ही मौजूद था। उनकी वही कड़क मलाई...कुल्फी की आवाज को सुनते ही तुरंत दौड़ गया, उनसे मलाईकुल्फी लेने। प्यारेलाल का वही हंसता-मुस्कुराता चेहरा देखकर तबीयत एकदम उनकी 'मलाईकुल्फी' की माफिक हो गई। उनको देखते ही पूछा- 'कैसे हो प्यारेलाल...? ठीक हूं बाबूजी...' प्यारेलाल अपनी चिरपरिचित मुस्कान में बोले। मैंने कहा- 'अमां, प्यारेलाल मैं 'बाबूजी' कब से हो गया? मैं तुम्हारे लिए आज भी वही हूं, जो आज से तीस साल पहले था। तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारी मलाईकुल्फी के स्वाद ने ऐसा दीवाना बना रखा है कि आज भी दूर नहीं हुआ हूं।' प्यारेलाल ज्यादा कुछ बोले नहीं। बस मुस्कुरा भर दिए। मैं भी बिटिया के साथ मलाईकुल्फी लेकर घर में आ गया।

यह सही है कि मेरा प्यारेलाल से कोई रिश्ता-नाता नहीं मगर फिर भी हमारे बीच 'स्वाद' और 'स्नेह' का एक ऐसा रिश्ता है, जो हर रिश्ते से कहीं अधिक बड़ा है। एकदम- प्यारेलाल की मलाईकुल्फी और उनकी निश्चल हंसी-मुस्कुराहट जैसा। हफ्ते में एक दफा दोपहर में उनकी मलाई...कुल्फी वाली आवाज ही सुनने को मिल जाए तो महसूस होता है कि मैं फिर से तीस साल पहले के अपने बचपन में पहुंच गया हूं। वही स्कूल। वही हम सब दोस्त। वही दोपहर। वही ठेला। वही चाट वाले पंडितजी (हमेशा मुस्कुराते हुए)। दुखद यह रहा कि पिछले जाड़ों में पंडितजी चल बसे। पर उनकी चाट का स्वाद जीभ पर आज भी बना हुआ है।

शायद इसीलिए बचपन की यादें बहुत अच्छी होती हैं। समय-असमय हमसे टकराकर हमें पुनः मौका देती हैं, उन दिनों, उन यादों, उन बातों में लौटने का।

देखिए न, कल तक स्वाद और स्नेह का रिश्ता प्यारेलाल का मेरे साथ था, आज वही मेरी बेटियों के साथ है। मेरी तरह दोपहर में उन्हें भी इंतजार रहता है, प्यारेलाल के आने और मलाईकुल्फी खाने का। चाहे जैसा ही सही रिश्ते का कायम रहना जरूरी है। ताकि संबंधों में 'तरावट' बनी रहे। मैं दावे के साथ कह सकता हूं, बाजार में मिलने वाली तमाम प्रकार की आइसक्रीमों के मुकाबले हमारे प्यारेलाल की मलाईकुल्फी आज भी लाजवाब है। बल्कि लाजवाब से कहीं बढ़के।

प्यारेलाल की अब उम्र भले ही हो चली है पर उनकी आवाज में कड़कपन और मलाईकुल्फी में अपनापन अब भी कायम है। इसीलिए तो वो हमारे 'पियारे प्यारेलाल' हैं।

Sunday, 14 June 2015

असहमतियां मंजूर नहीं

समय बदलता है तो सबकुछ बदलता है। विचार, व्यवहार, सरोकार सब। खासकर, विचारों की अभिव्यक्ति के प्लेटफोर्म पर हम पहले से ज्यादा 'खुले' हैं। स्वतंत्र विचारों के दम पर चीजों-बातों को और 'जीवंत' बनाया है। साहित्य, कला, फिल्म, फैशन, रचना और रचनाकार के भीतर भी बदलाव आए हैं।
कल तक जो बातें साहित्य और समाज के भीतर 'वर्जित' थीं, आज प्रमुखता से सामने आ रही हैं। कला के क्षेत्र में भी यही हुआ है। खुलेपन के नाम पर फिल्मों ने तो पूरे परिदृश्य को ही बदल डाला है। अब यहां कुछ भी वर्जित नहीं, सब जायज और स्वीकार्य है। फैशन के रंग-ढंग भी उम्मीद से कुछ ज्यादा ही बदल चुके हैं। बदलेंगे भी क्योंकि यह 21वीं सदी का दौर है। इस दौर में फैशन के नाम पर 'खुलापन' अधिक है। और उतना ही खुलापन उन लोगों की जुबान में भी है, जो इस फैशनेबल खुलेपन को पसंद नहीं करते।

लेकिन किसी के पसंद करने या न करने से क्या होता है, बदलते समय को रोकना असंभव है। रोका जाना चाहिए भी नहीं। अगर हम बदलेंगे नहीं तो फिर नई चीजें, बातें, अर्थ, संदर्भ, परिभाषाएं कैसे जाने-समझ पाएंगे। बदलाव को 'इग्नोर' कर आप मन ही मन कितना ही 'खुश' हो लें लेकिन बहुत ही जल्द 'हाशिए' पर डाल दिए जाएंगे। समय और समाज का यही नियम है।

तमाम चीजों और बातों में बदलाव आने के बाद भी, ऐसा मुझे लगता है, कि असहमति में बदलाव अब भी उतना नहीं आ पाया है, जितना दरकार थी। असहमतियों और असहमति रखने वालों को कुछ अजीब-सी निगाहों से देखा जाता है। सामाजिक जीवन के साथ-साथ सोशल नेटवर्किंग प्लेटफोर्म पर भी असहमतियां 'टैबू' की तरह काम करती हैं। किसी से असहमति प्रकट करने का मतलब है, अपना राशन-पानी बंद करवाना।

कभी-कभी बिल्कुल समझ नहीं आता कि हम असहमतियों के लेकर इतना असहज से क्यों हो जाते हैं? क्या हमारी अक्ल, हमारी सोच के दायरे इस कदर 'सीमित' हो चुके हैं, जिनमें असहमति का बाल आते ही, दरारें पड़ना शुरू हो जाती हैं? क्या हम नहीं चाहते कि हमें कोई हमारी खामी- असहमत होते हुए- बताए? क्या असहमतियां गाली से भी बड़ी हो गई हैं कि सहन नहीं की जा सकतीं?

फैशन, कपड़ों-लत्तों, विचार, व्यवहार में बदलाव अगर हो रहा है तो फिर असहमति का दायरा इतना सीमित क्यों होता चला जा रहा है। 21वीं सदी के दौर में जब लोगों को आपस में असहमतियों के वास्ते लड़ते-झगड़ते या बैर रखते देखता हूं तो वाकई अफसोस होता है। लगता ही नहीं कि हम 21वीं सदी की दहलीज पर खड़े हैं।

असहमति का सबसे अधिक ग्राफ राजनीति के क्षेत्र में गिरा है। जो नेता हैं, उनकी बात समझ में आती है। लेकिन जो नेता नहीं हैं, केवल पाठक या लेखक हैं, उनके बीच भी असहमति की खाई इतनी गहरी है कि आपस में मिलना असंभव। हर कोई पार्टी और नेता का प्रशंसक नहीं बल्कि 'भक्त' बना बैठा है। अपने आका के खिलाफ कुछ भी (कुछ भी) कहा या लिखा बर्दाशत नहीं। ठीक भगवानों जैसी स्थिति।

सोशल नेटवर्किंग ने बेशक हमारे संबंधों को बहुत 'विस्तार' दिया है। एक-दूसरे के करीब लाया है मगर राजनीति ने यहां भी 'कबाड़ा' कर रखा है। सिर्फ राजनीतिक असहमतियों के ही कारण न जाने ऐसे कितने लोग हैं, जो यहां से चले जाने को अभिशप्त हैं। उनकी राजनीति असहमतियों पर जो प्रतिक्रियाएं आती हैं, उनमें भाषा का लोचा तो होता ही है, व्यक्तिगत भी बहुत कुछ होता है। जिसे किसी भी आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

इतने एडवांसड प्लेटफोर्म पर ऐसी ओछी हरकतें और मानसिकताएं हमारी असहमति की अभिव्यक्ति को तो दबा ही रही हैं, साथ-साथ दिमागी तौर पर खोखला भी करती जा रही हैं। जब हमारे बीच से एक-दूसरे के प्रति वैचारिक असहमतियां ही खत्म हो जाएंगी फिर क्या फायदा ऐसे सोशल नेटवर्क का। फिर तो यह बेकार ही है। यहां आना अपना टाइम बर्बाद करना है।

चीजें दिन-ब-दिन गड़बड़ा रही हैं। असहमतियां निरंतर हमसे दूर होती जा रही हैं। असहमतियों की शक्ल में गालियां ही ज्यादा हैं।

बदलते समय में असहमति के क्षेत्र में इतना ठहराव, सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम यह कैसे 'दब्बू समाज' बनते जा रहे हैं, जहां असहमति के स्वीकार्य में बदलाव अभी भी नहीं आ पाया है।

Sunday, 7 June 2015

तसलीमा की उपेक्षा क्यों

हालांकि ट्वीट कर तसलीमा नसरीन ने यह साफ कर दिया है कि 'हालात सामान्य होते ही वे भारत लौट आएंगी।' यह सुकून भरी खबर है। मगर सबसे अधिक 'दुर्भाग्यपूर्ण' है उनका विषम परिस्थितियों में भारत छोड़कर अमेरिका जाना। यह कितना अजीब है कि अमेरिका ने तसलीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली और हम इतने बड़े लोकतांत्रिक देश होते हुए भी 'चुप' रहे। तसलीमा को जाने दिया। न सरकार, न मंत्री, न प्रधानमंत्री की तरफ से तसलीमा की सुरक्षा या उन्हें रोक लेने संबंधी कोई बयान नहीं आया। क्या कट्टरपंथी ताकतें हम पर इस कदर हावी हैं कि हम उनके समक्ष हथियार डाल देते हैं। एक लेखिका को यों ही चले जाने देते हैं।

यह सही है कि तसलीमा इतने सालों से भारत में ही हैं। भारत सरकार उन्हें सुरक्षा भी दिए हुए है। लेकिन इस दफा उनके जाने पर कहीं किसी तरह की सुगबुगाहट का न होना, सवाल तो खड़े करता ही है।

साथ-साथ इतने बड़े-बड़े प्रगतिशील-वामपंथी संगठन व लेखक भी तसलीमा मामले पर चुप्पी साधे रहे। तसलीमा के पक्ष में किसी बड़े लेखक संगठन का कोई बयान नहीं आया है। न ही किसी बड़े लेखक-साहित्यकार ने कुछ लिखा। जब लेखकों का ही लेखक के प्रति यह रवैया है फिर सरकार से क्या उम्मीद की जा सकती है?

नक्सलवादियों की चिंता में निरंतर 'चिंताग्रस्त' रहने वाली अरूधंती राय भी चुप हैं। कहीं कोई लेख, कोई बयान नहीं। कमाल है।

कहना न होगा, वैसे, तसलीमा के मामले में सबसे अधिक 'उपेक्षित रोल' हिंदी के लेखकों-साहित्यकारों ने निभाया है। बहुत हुआ तो दिल्ली में हस्ताक्षर अभियान चला लिया या कहीं कोई छोटा-सा बयान जारी कर दिया। फिर डिब्बा गोल। वामपंथी लेखकों और संगठन की तो पूछिए ही मत। जो वामपंथी सरकार तब तसलीमा को सुरक्षा नहीं दे पाई, उसे देश से बाहर निकलवा दिया, उसके साहित्य तक पर रोक लगवा दी, उनसे भला क्या सहयोग की उम्मीद की जा सकती है? यही, तसलीमा की जगह अगर कोई वामपंथी या प्रगतिशील लेखक-साहित्यकार होता, फिर देखते, अब तक सरकार, मंत्री, प्रधानमंत्री के खिलाफ जाने क्या-क्या कह डाला होता। बयान जारी हो जाता। मीटिगें जुट जातीं। हो सकता है, कुछ कथित क्रांतिकारी टाइप लेखक-साहित्यकार सड़कों पर भी उतर आते। चूंकि वो तसलीमा नसरीन है, इसलिए क्यों कुछ कहे या बोलेंगे?

इससे रत्तीभर इंकार नहीं किया जा सकता कि तसलीमा पर जब भी भारत में हमला हुआ है, कथित बड़े लेखक-साहित्यकार यों ही चुप रहे हैं। शायद बहुत से लेखक-साहित्यकार तसलीमा को लेखिका मानते ही न हों।

अपने जाने कितने ही लेखों में तसलीमा ने वामपंथियों व वामपंथी संगठनों की अपने प्रति 'उपेक्षा' को खूब रेखांकित किया है। यह सच भी है।

लेकिन लेखकों का एक लेखक के प्रति इतना उपेक्षापूर्ण व्यवहार हैरानी की बात है। ये लोग तो तब भी चुप रहे थे, जब अभी कुछ समय पहले रायपुर (शंकर नगर चौक) में भगत सिंह की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किया गया था। हां, हाल में कहीं (जगह का नाम भूल रहा हूं) लेनिन की प्रतिमा को जब नुकसान पहुंचाया गया, तब वामपंथियों को गहरा सदमा लगा। कितना दोगलापन।

बेशक तसलीमा के लेखन से जितनी चाहे 'असहमतियां' हों लेकिन जिस तरह का निरंत संघर्षमय जीवन उन्होंने जिया है, वो तारीफ-ए-काबिल है। एक महिला होकर इतने हमले और अपमान झेलते रहना बड़ी बात है। किसी दबाव में आकर अपने विचार या विचारधारा से समझौता न करना भी कोई आसान बात नहीं।

हम चाहते हैं कि तसलीमा हमारे ही मुल्क में रहें। बात जहां तक उन्हें सुरक्षा देने की है तो सरकार को देनी ही चाहिए। पर लेखकों या लेखक संगठनों से तसलीमा के पक्ष में कोई उम्मीद करना, बेईमानी ही होगी।

Monday, 1 June 2015

मोबाइल और संवाद

ऐसा न जाने मैं कितनी ही दफा कर चुका हूं। महीने-दो महीने के अंतराल पर अपने मोबाइल में से वाट्सएप और मैसेंजर एप्स को हटा देता हूं। इन दोनों एप्स को जब हटता हूं तब 'निर्णय' लेता हूं कि आगे अब दोबारा इन्हें नहीं डालूंगा! बस बहुत हुआ। आपसी संवाद का जरिया अब एप्स नहीं आमने-समाने की बातचीत ही रहेगी। लेकिन कुछ समय बाद मुझे खुद ही इनकी 'जरूरत' फिर से महसूस होने लगती है और वापस डाल लेता हूं। हालांकि वापस मोबाइल में डालते वक्त तय यही करता हूं कि डाल तो रहा हूं मगर इस्तेमाल न के बराबर ही करूंगा। भला ऐसा भी संभव हुआ है कहीं?

दरअसल, मोबाइल की दुनिया ने हमें इस कदर अपनी 'जकड़' में लिया है कि हम चाहकर भी उससे या किस्म-किस्म की ऐप्स से पीछा नहीं छुड़ा पाते। अगर खुद पीछा छुड़ाने की कोशिश करो भी तो लोग 'मजबूर' कर देते हैं उसके साथ बने रहने के लिए। गजब यह है कि अब कोई (अपवादों को छोड़के) आमने-सामने संवाद या बातचीत करना ही नहीं चाहता। न किसी के पास एक-दूसरे से मिलने को समय है न ही इच्छा। मोबाइल ने संवाद और रिश्तों की दुनिया को किस्म-किस्म की ऐप्स में सिमेटकर रख दिया है।

कभी किसी की खैरियत भी लेनी हो तो वाट्सएप करके पूछ लो या फिर स्काइप-हैंगआउट पर बात करके। देखते ही देखते हम खुद में इस कदर सीमित होकर रह गए हैं कि बाहरी दुनिया से संबंध-रिश्ते न के बराबर कर लिए हैं। खाली टाइम को काटने का जरिया अब किताबें या आपसी मेल-जोल नहीं सिर्फ मोबाइल है।

मोबइल की बीमारी से ऐसा नहीं कि बड़े ही ग्रस्त हैं, धीरे-धीरे कर यह बीमारी बच्चों में भी आती जा रही है। यों तो बच्चों को अपने कोर्स की भारी-भरकम किताबों से ही फुर्सत नहीं मिलती, लेकिन जब मिलती है, तब उनके हाथ में भी मोबइल का खिलौना ही होता है। मोबाइल से खेलकर वे अपना मन बहलाते हैं। अगर मोबाइल से छूटे तो कार्टून नेटवर्क में रम जाते हैं। बच्चों के पारंपरिक खेल अब इतिहास बनकर रह गए हैं। मैंने अक्सर ऐसे मां-बापों को अपने बच्चों की तारीफ करते सुना है कि हमारा ढाई-तीन साल का बच्चा भी मोबाइल की सारी ऐप्स हमसे ज्यादा अच्छे से चला लेता है। दरअसल, बच्चों को भी मोबाइल की दुनिया में धकेलने में हम मां-बाप का भी बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन इसे हम स्वीकार नहीं करेंगे।

धीरे-धीरे कर अब रिश्ते भी मोबाइल सरीखे होते जा रहे हैं। चूंकि रिश्तों में संवाद बचा नहीं, दूरियां और व्यस्तताएं इस कदर बढ़ गई हैं कि अक्सर हमें खुद से ही संवाद किए हफ्तों-महीनों बीत जाते हैं। हमारे बीच सुख-दुख को आपस में मिल-बैठकर बांटने का जो जज्बा कभी हुआ करता था, अब वो निरंतर छीजता जा रहा है। हम सब ने अपनी-अपनी अलग दुनिया बना ली है, बस उसी में अपने मोबाइल के साथ खुश रहते हैं। और जब दुखी होते हैं तो फेसबुक या टि्वटर पर स्टेटस अपडेट कर कुछ 'लाइक' और 'कमेंट' पाकर 'संतोष' कर लेते हैं। कि, आभासी संसार भी हमारी चिंता किया करता है। क्या खूब है कि अब हमें अपनों की चिंता किए जाने से कहीं बढ़कर आभारी संसार द्वारा चिंता किया जाना लगता है। मरने-जीने की खबर रिश्तेदारों को बाद में दी जाती है, पहले फेसबुक का स्टेटस अपडेट होता है।

मोबाइल-संस्कृति ने हमें इस कदर 'आत्मकेंद्रित' कर दिया है कि रात को सोते समय भी हमें घंटी बजने या मैसेज का आभास होता है। जिस तेजी से मोबाइल की दुनिया बदल रही है, उतनी ही तेजी से हम उसके भीतर समाहित होते जा रहे हैं। अगर मोबाइल पास है तो सबकुछ पास है।

दोष दूसरों को ही क्यों दू, मोबाइल के चार्म से मैं खुद को भी कहां बचा पाया हूं। समय-असमय मोबाइल से दूर रहने की प्रतिज्ञा खुद-ब-खुद टूट जाती है। शायद यही वजह है कि मोबाइल के सागर में संवाद कहीं गुम-सा हो गया है।