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Monday, 1 June 2015

मोबाइल और संवाद

ऐसा न जाने मैं कितनी ही दफा कर चुका हूं। महीने-दो महीने के अंतराल पर अपने मोबाइल में से वाट्सएप और मैसेंजर एप्स को हटा देता हूं। इन दोनों एप्स को जब हटता हूं तब 'निर्णय' लेता हूं कि आगे अब दोबारा इन्हें नहीं डालूंगा! बस बहुत हुआ। आपसी संवाद का जरिया अब एप्स नहीं आमने-समाने की बातचीत ही रहेगी। लेकिन कुछ समय बाद मुझे खुद ही इनकी 'जरूरत' फिर से महसूस होने लगती है और वापस डाल लेता हूं। हालांकि वापस मोबाइल में डालते वक्त तय यही करता हूं कि डाल तो रहा हूं मगर इस्तेमाल न के बराबर ही करूंगा। भला ऐसा भी संभव हुआ है कहीं?

दरअसल, मोबाइल की दुनिया ने हमें इस कदर अपनी 'जकड़' में लिया है कि हम चाहकर भी उससे या किस्म-किस्म की ऐप्स से पीछा नहीं छुड़ा पाते। अगर खुद पीछा छुड़ाने की कोशिश करो भी तो लोग 'मजबूर' कर देते हैं उसके साथ बने रहने के लिए। गजब यह है कि अब कोई (अपवादों को छोड़के) आमने-सामने संवाद या बातचीत करना ही नहीं चाहता। न किसी के पास एक-दूसरे से मिलने को समय है न ही इच्छा। मोबाइल ने संवाद और रिश्तों की दुनिया को किस्म-किस्म की ऐप्स में सिमेटकर रख दिया है।

कभी किसी की खैरियत भी लेनी हो तो वाट्सएप करके पूछ लो या फिर स्काइप-हैंगआउट पर बात करके। देखते ही देखते हम खुद में इस कदर सीमित होकर रह गए हैं कि बाहरी दुनिया से संबंध-रिश्ते न के बराबर कर लिए हैं। खाली टाइम को काटने का जरिया अब किताबें या आपसी मेल-जोल नहीं सिर्फ मोबाइल है।

मोबइल की बीमारी से ऐसा नहीं कि बड़े ही ग्रस्त हैं, धीरे-धीरे कर यह बीमारी बच्चों में भी आती जा रही है। यों तो बच्चों को अपने कोर्स की भारी-भरकम किताबों से ही फुर्सत नहीं मिलती, लेकिन जब मिलती है, तब उनके हाथ में भी मोबइल का खिलौना ही होता है। मोबाइल से खेलकर वे अपना मन बहलाते हैं। अगर मोबाइल से छूटे तो कार्टून नेटवर्क में रम जाते हैं। बच्चों के पारंपरिक खेल अब इतिहास बनकर रह गए हैं। मैंने अक्सर ऐसे मां-बापों को अपने बच्चों की तारीफ करते सुना है कि हमारा ढाई-तीन साल का बच्चा भी मोबाइल की सारी ऐप्स हमसे ज्यादा अच्छे से चला लेता है। दरअसल, बच्चों को भी मोबाइल की दुनिया में धकेलने में हम मां-बाप का भी बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन इसे हम स्वीकार नहीं करेंगे।

धीरे-धीरे कर अब रिश्ते भी मोबाइल सरीखे होते जा रहे हैं। चूंकि रिश्तों में संवाद बचा नहीं, दूरियां और व्यस्तताएं इस कदर बढ़ गई हैं कि अक्सर हमें खुद से ही संवाद किए हफ्तों-महीनों बीत जाते हैं। हमारे बीच सुख-दुख को आपस में मिल-बैठकर बांटने का जो जज्बा कभी हुआ करता था, अब वो निरंतर छीजता जा रहा है। हम सब ने अपनी-अपनी अलग दुनिया बना ली है, बस उसी में अपने मोबाइल के साथ खुश रहते हैं। और जब दुखी होते हैं तो फेसबुक या टि्वटर पर स्टेटस अपडेट कर कुछ 'लाइक' और 'कमेंट' पाकर 'संतोष' कर लेते हैं। कि, आभासी संसार भी हमारी चिंता किया करता है। क्या खूब है कि अब हमें अपनों की चिंता किए जाने से कहीं बढ़कर आभारी संसार द्वारा चिंता किया जाना लगता है। मरने-जीने की खबर रिश्तेदारों को बाद में दी जाती है, पहले फेसबुक का स्टेटस अपडेट होता है।

मोबाइल-संस्कृति ने हमें इस कदर 'आत्मकेंद्रित' कर दिया है कि रात को सोते समय भी हमें घंटी बजने या मैसेज का आभास होता है। जिस तेजी से मोबाइल की दुनिया बदल रही है, उतनी ही तेजी से हम उसके भीतर समाहित होते जा रहे हैं। अगर मोबाइल पास है तो सबकुछ पास है।

दोष दूसरों को ही क्यों दू, मोबाइल के चार्म से मैं खुद को भी कहां बचा पाया हूं। समय-असमय मोबाइल से दूर रहने की प्रतिज्ञा खुद-ब-खुद टूट जाती है। शायद यही वजह है कि मोबाइल के सागर में संवाद कहीं गुम-सा हो गया है।

1 comment:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जयंती - बालकृष्ण भट्ट और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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