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Friday, 14 August 2015

आजादी बनाम डिस्काउंट

आजादी के मायने अब थोड़ा बदल गए हैं। आजादी देश पर मर-मिटने की नहीं, आजादी किस्म-किस्म के प्रॉडेक्ट पर 'डिक्साउंट' पाने की है। आजादी बाजार के साथ, बाजार के लिए खड़े होने की है। कंपनियां आजादी वाले दिन दिल में देश के प्रति कुछ कर गुजरने का उत्साह नहीं जगातीं बल्कि उनके प्रॉडेक्ट पर इतने-इतने का डिक्साउंट मिल रहा है, यह बताती हैं। वो भी अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन छापकर।

बाजार ने हर पर्व और त्यौहार को 'उत्सव' में बदल दिया है। बाजार कहता है, आप पर्व और त्यौहार के 'मूल' में न जाएं, उसे महज एक 'उत्सव' मानकर 'सेलिब्रेट' करें। पर्व और त्यौहार को सेलिब्रेट कर आप सीधा बाजार से जुड़ेंगे। बाजार में डिस्काउंट लिए तैयार खड़ी कंपनियों से जुड़ेंगे। महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि किस देशभक्त ने देश के लिए क्या किया, महत्त्वपूर्ण अब यह है कि कौन सी कंपनी अपने किस प्रॉडेक्ट पर कितने का डिस्काउंट और किसके साथ क्या-क्या फ्री दे रही है। आजादी जीत की नहीं, फ्री-डिस्काउंट पाने की है।

ऑन-लाइन स्टोर्स ने बाजार की लत को हम पर और अधिक प्रभावी बनाया है। 15 अगस्त के आस-पास तमाम ऑन-स्टोर्स अपने यहां तरह-तरह के डिस्काउंट लिए तैयार रहते हैं। सभी पर 'मेगा-सेल' लगती है। प्रत्येक प्रॉडेक्ट पर इतना-इतना डिस्काउंट पेश किया जाता है कि मन बिन 'ललचाए' रह ही नहीं पाता। उस वक्त शायद हम यह भूल जाते हैं कि हम मिली आजादी का जश्न नहीं बल्कि दिए गए डिस्काउंट का लाभ उठाने को बेताब हैं। तब हमारे लिए यह अहसास भी मायने नहीं रखता कि देश की आजादी की खातिर शहीद होने वाले किस क्रांतिकारी ने क्या-क्या किया था, कैसे-कैसे कष्ट उठाए थे, अंगरेजी सरकार के कौन-कौन से जुलम सहे थे। हमारा ध्यान तो केवल डिस्काउंट की आजादी ऑन-लाइन पाने पर रहता है। कुछ लोग इसे ही अपनी आजादी का वास्तविक हक मानते हैं।

इसमें सारा दोष बाजार का भी नहीं है। दरअसल, हम कदर 'आत्मकेंद्रित' से हो गए हैं कि हमें न बाहर, न आस-पास, न इतिहास की चीजें दिखाई ही नहीं देतीं। हम खुद में ही सिमटे रहना चाहते हैं। या फिर जो हमें बाजार बता या दिखा देता है, उसे ही 'सच' मान लेते हैं। क्योंकि आज की तारीख में हमारे कद से कहीं ज्यादा बड़ा कद तो बाजार का है। बाजार के कद ने हमें न केवल अपने घर में बल्कि इतिहास में भी 'बौना' बना डाला है।

तमाम तरह की आजादियों को लेकर बातें तो बहुत होती हैं किंतु जब कुछ कर गुजरने की बारी आती है, सब अपने-अपने घरों में यों घुस बैठ जाते हैं, जैसे सबकुछ ठीक चल रहा है। जिस व्यवस्था को हम रात-दिन गरियाते हैं, फिर उसी से समझौता भी कर लेते हैं। कहने में कोई हर्ज नहीं कि हम प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस पर शहीदों के मार्ग पर चलने का संकल्प ही 'झूठा' लेते हैं। हमारे अंदर उतना साहस ही नहीं कि हम शहीदों के दिखाए-बताए मार्ग पर चल सकें। या उन जैसा बनने की कोशिश भी कर सकें। क्योंकि अगर हम शहीदों के जैसा बनने की कोशिश करेंगे तो बाजार और डिस्काउंट दोनों से दूर हो जाएंगे। शहीदों का मार्ग कठिन ही नहीं बहुत कठिन है। तब ही तो गाहे-बगाहे होने वाले आंदोलन महज 'खानापूर्ति' बनकर ही रह जाते हैं।

बेशक बाजार हमारे भीतर खरीद-बेच का 'जोश' तो पैदा कर सकता है मगर आजाद होने का नहीं। हां, डिस्काउंट पर आजाद होने के वहां तमाम चांस हैं। बाजार की डिमांड के मुताबिक चलेंगे तो हर तरह के फायदे का लाभ उठा पाएंगे। बाजार इसीलिए तो हर वक्त इस फिराक में रहता है कि अपने कस्मटर को कैसे लुभा सके। कस्टमर को लुभाने का डिस्काउंट या फ्री से बेहतर कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता।

इसे दुर्भाग्य कह लें या बद-किस्मती कि अब हमारे बच्चे भी हमसे आजादी का मतलब नहीं पूछते। 15 अगस्त पर देश की आजादी की बात लगभग न के बराबर ही करते हैं। वो बात करते हैं, 15 अगस्त पर मिलने वाले तरह-तरह के डिस्काउंट की। किस प्रॉडेक्ट के साथ क्या फ्री है, इसकी। बाजार के वर्चस्व ने आजादी के अर्थ को ही बदलकर रख दिया है। आजादी अब इतिहास और बाजार हकीकत हो गया है। बाजार के आगे कंपनी के डिस्काउंट को चूज करने की आजादी रह गई है बस।

कहने में शर्म कैसी कि हमें 15 अगस्त का इंतजार 'फ्री-डिस्काउंट' पाने के लिए ही रहता है शायद।