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Wednesday, 14 December 2016

आइए, नोटबंदी के बहाने विरोध-विरोध खेलें

जब लोगों के पास करने को कुछ खास नहीं होता, तब वे विरोध-प्रदर्शन करते हैं। खूब, खूब, खूब विरोध करते हैं। सड़क से लेकर संसद तक विरोध की नदियां बहा देते हैं। विरोध की उस नदी में न जाने कितने चले आते हैं, अपने-अपने हाथ-पैर-मुंह धोने। हालांकि कईयों को यह तक पता नहीं होता कि विरोध का असली मकसद या मुद्दा क्या है लेकिन तब भी वो विरोध करने में ऐसे जुट जाते हैं मानो विरोध करना उनका ‘खानदानी पेशा’ रहा हो।

मैं जब भी किसी विरोध करने वाले व्यक्ति, पार्टी या संगठन को देखता हूं, मेरी पहली निगाह उनके चेहरों पर जाकर टिक जाती है। कहते हैं, जुबान अगर कुछ न बोले चेहरा सबकुछ बोल देता है। हल्की मुस्कुराहट लिए उनके चेहरे विरोध की पोल क्षणभर में खोल देते हैं। जो चीखें या आवाजें उनके हलक से निकलती हैं, चेहरे तक आते-आते उल्लास में बदल जाती हैं। वे जब विरोधी टाइप नारे लगा रहे होते हैं, तब भी उनके चेहरे उनके नारों के विपरित ही रिएक्ट करते हैं।

लेकिन यहां उनके चेहरों को पढ़ने को कोशिश कोई नहीं करना चाहता। देखने वालों को उनका सिर्फ विरोध नजर आता है। सिर्फ विरोध। विरोध के मायने न उसे करने वाले समझते हैं, न देखने वाले। यों भी हमारे यहां विरोध के लिए विरोध करने की परंपरा पुरानी रही है। कुछ लोग इसलिए भी विरोध करने सड़कों पर निकल आते हैं ताकि टीवी चैनलों के कैमरों पर उनके चेहरे चमचमाते रहें। वे दरअसल डिजाइनर टाइप विरोधी होते हैं।

अभी हाल विरोधी दलों का सरकार और नोटबंदी के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन चैनलों पर देख रहा था। विरोध वे कर रहे थे, शर्म मुझे खुद पर आ रही थी। कि, हाय! ये मैंने किन-किन एलिट विरोधियों को चुनकर संसद में भेज दिया। वे जब आपस में चेन बना रहे थे, तब जरा उनके चेहरों के हाव-भाव पर गौर फरमाइएगा, सब के सब चिंता-मुक्त थे। हल्की-फुल्की हंसी-ठिठोली सबके चेहरों पर तैर रही थी। मानो- वे विरोध के लिए नहीं बल्कि जनता को अपनी ‘हंसोड़ आत्ममुग्धताएं’ दिखलाने के लिए सड़क पर उतरे हों।

इस वक्त प्रत्येक विरोधी की चिंता में जनता की परेशानी है। यहां तक, चंद बुद्धिजीवि भी जनता की परेशानियों से बेहद आहत हैं। नेता या सांसद तो तब भी सड़क पर आकर विरोध-विरोध खेल लेते हैं किंतु बुद्धिजीवि न के बराबर ही सड़कों पर उतरते हैं। इधर जब से बुद्धिजीवियों ने ‘फेसबुक’ और ‘टि्वटर’ को अपने विरोध का औजार बनाया है, तब से वे अपना विरोध वहीं से जतलाते रहते हैं। चंद बुद्धिजीवि नोटबंदी के खिलाफ शाब्दिक विरोध तो खूब जता रहे हैं मगर इनमें से एक भी जनता की मदद की खातिर उनकी जगह खुद लाइनों में जाकर लगने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। भला ऐसे विरोध का क्या मतलब कि ऊपर-ऊपर से ही फां-फूं करते रहो।

चूंकि सोशल मीडिया पर ‘शाब्दिक विरोध’ करना अब ‘फैशन’ बन चुका है तो सब के सब कथित विरोधी मिल-जुलकर विरोध-विरोध खेल रहे हैं। उनमें थोड़ी-बहुत हिरस इस बात की भी है कि ‘तेरा विरोध मेरे विरोध से ज्यादा क्रांतिकारी कैसे!’

विरोध करने का यही सुख है, जब-जहां मौका लगे विरोध करने निकल पड़ो। वो तो गनीमत इतनी रही है कि किसी ने अभी तक मोमबत्तियां हाथों में थामकर विरोध-प्रदर्शन नहीं किया। वरना, यहां तो मोमबत्तियों के बहाने भी विरोधी अपने चेहरे चमका ही लेते हैं।

महीनों से ‘डिनायल मोड’ में पड़े विपक्ष के लिए जनता की परेशानी विरोध का अच्छा अवसर लेकर आई है। जबकि अस्सी फीसद जनता सरकार के फैसले पर अपनी ‘सहमति’ व्यक्त कर चुकी है। हां, उन्हें दिक्कतें तमाम हो रही हैं। बहुतों ने अपनी जानें भी गवाईं हैं, फिर भी, लोग लाइनों में इस विश्वास, इस उम्मीद के साथ डटे हैं कि यह सूरत बदलनी चाहिए। यों भी देश, समाज, राजनीति, सरकार का भविष्य मुठ्ठीभर विपक्षी या कथित बुद्धिजीवि तय नहीं कर सकते, इसे जनता को ही तय करना होता है। हर दफा जीत जनता की ही होती है। आशा है, इस दफा भी जनता ही जीतेगी।

फिर भी, जिन्हें विरोध-विरोध खेलना है शौक से खेलें। पर जनता को न बहकाएं।

Saturday, 26 November 2016

फिदेल कास्त्रो और कॉमरेडो के आंसू

विश्व के बड़े क्रांतिकारी कम्यूनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो नहीं रहे। 90 साल की लंबी पार खेलकर अंततः उन्होंने दुनिया को ‘अलविदा’ बोल दिया। कास्त्रो के न रहने पर क्यूबा और उसके नागरिकों के गम का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। क्यूबा के वो पूर्व राष्ट्रपति ही नहीं बल्कि एक प्रकार से उनके ‘गॉडफादर’ थे। उनका सारा संघर्ष क्यूबा और वहां के नागरिकों की आजादी को समर्पित रहा था। इस लिहाज से क्यूबा के लोगों का अपने नेता की मौत पर ‘दुखी’ होना लाजिमी है।

लेकिन मैं यह नहीं समझ पा रहा कि फिदेल कास्त्रो के न रहने पर हमारे देश के कॉमरेड क्यों इतने मोटे-मोटे आंसू बहा रहे हैं। उनकी मातमी सूरतों को देखकर ऐसा लग रहा है मानो उन्हीं के बीच का कोई बड़ा नेता उनसे बिछड़ गया हो। तमाम कॉमरेडों की फेसबुक पोस्टों, टीवी पर बयानों को पढ़-सुन चुका हूं, सब के सब कास्त्रो के गम में इतने गमजदा हैं कि जुबान तालू से चिपकी-चिपकी जा रही है।

कॉमरेडो के इतनी तदाद में बहाए गए आंसू मुझसे देखे नहीं जा रहे तो सोचा थोड़ा-बहुत महान कम्यूनिस्ट फिदेल कास्त्रो के विषय में पढ़ ही लिया जाए। कास्त्रो के बारे में नेट पर कुछ पढ़ा-जाना। कास्त्रो का जीवन-संघर्ष बहुत बड़ा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन 17 साल तक बतौर प्रधानमंत्री और 32 साल तक बतौर राष्ट्रपति रहकर उन्होंने राजनीतिक तौर पर अपने देश और वहां के नागरिकों को अपना ‘बंधक’ ही बनाए रखा। क्या इतने सालों में उन्हें राजनीति में एक भी ऐसा चेहरा नजर नहीं आया, जिसे वे देश की बागडोर सौंप सकें?

दरअसल, देश के नागरिकों पर नेताओं का ‘एकछत्र राज’ ऐसे ही ‘तानाशाही’ के रंग मजबूत करता है। उन्हें हर दफा यही लगता है कि उनसे ‘बेहतर’ कोई नहीं। सो, अपने तौर-तरीकों से देश और जनता को हांकते रहते हैं। याद रखें, हमेशा एक ही विचार या व्यक्ति न केवल देश बल्कि वहां की जनता के लिए भी ‘खतरनाक’ साबित हो सकता है। फिर कम्यूनिस्ट जिस विचार को लेकर चलते हैं वहां सिवाय पूंजीवाद के विरोध, आधुनिकता को शक की निगाह से देखने, विपरित विचारधारा से हद दरजे की नफरत करने के अलावा कुछ नहीं। कास्त्रो का वैचारिक रंग-ढंग भी कुछ ऐसा ही था। जिस प्रकार हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां ‘परिवारवाद’ की शिकार हैं कास्त्रो भी थे। अगर नहीं होते तो अपने बाद अपने भाई राउल कास्त्रो को क्यूबा की सत्ता क्यों सौंपते? क्या कास्त्रो के पास अपने भाई के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं था?

यह जानना भी कितना ‘हास्यास्पद’ है कि कास्त्रो ने अमेरिका के सबसे बड़े ‘दुश्मन’ रह चुके सोवियत यूनियन से- केवल अपने फायदे के लिए- दोस्ती गांठी। उन्होंने सोवियत यूनियन को अमेरिका के खिलाफ क्यूबा में परमाणु मिसाइल बेस बनाने की जगह भी दी, जिसे बाद में अमेरिका-सोवियत यूनियन आपसी समझौते के आधार पर हटा दिया गया। पर, यह वाकया इतिहास में तो दर्ज हो ही गया न कि कास्त्रो अपने निज हित के लिए कुछ भी कर सकते थे। यों भी, हमने देखा है कम्यूनिस्ट बिरादरी अमेरिका से कथित तौर पर ‘नफरत’ ही करती है मगर अपने परिवार का कोई सदस्य अगर वहां नौकरी करने जाता है तो उसे रोकते भी नहीं। आखिर यह किस टाइप का अमेरिका-विरोध है आपका मिस्टर कॉमरेड?

मैंने पढ़ा कि क्यूबा ने अभी भी उपभोक्तावाद, बाजार और पूंजीवाद से काफी दूरी बनाकर रखी है। आज जब पूरा विश्व बाजार और पूंजीवाद की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा है तब क्यूबा की सत्ता ने अपने नागरिकों को उससे वंचित कर रखा है। जबकि हकीकत यह है कि न किसी देश, न वहां की जनता की गाड़ी बिना बाजार और पूंजी के चल ही नहीं सकती। हालांकि बहुत से लिबरल टाइप लोग बाजार और पूंजी को टेढ़ी निगाह से देखते हैं पर उनका जीवन भी टिका इसी पर है। लेकिन क्यूबा का इन सब से दूर रहना साफ बताता है कि वहां एक किस्म की राजनीतिक (कम्यूनिस्ट) तानाशाही है।

कास्त्रो के बारे में एक धारणा यह भी है कि उनके 35 हजार से ज्यादा लड़कियों के साथ ‘सेक्स संबंध’ थे! यह कितना हास्यास्पद है कि यहां कॉमरेड लोग उनके जाने पर मोटे-मोटे आंसू तो बहा रहे हैं किंतु कास्त्रो की सेक्स लाइफ पर न कोई बात करना चाह रहा है न लिखना। क्यों? क्या डरते हैं कि महान कम्यूनिस्ट नेता का ‘अपमान’ न हो जाए? यह भी तो एक प्रकार की ‘स्वामी-भक्ति’ ही है अपने आका के प्रति। क्या नहीं?

कास्त्रो के चाहने वालो को थोड़ा बुरा जरूर लगेगा लेकिन सच यह है कि उनका सारा संघर्ष, सारी क्रांति उनके कथित सेक्स संबंधों के आगे ‘बौनी’ ही साबित होती है। साथ-साथ यह भी खोज का विषय बनना चाहिए कि कास्त्रो के इतने लड़कियों के साथ जो संबंध रहे वो कौन और किन परिवारों से ताल्लुक रखती थीं? क्या उनमें मजबूर या पीड़ित लड़कियां भी तो शामिल नहीं थीं? हां, यह सही है कि सेक्स हर व्यक्ति का निजी मसला होता है मगर जब वो पब्लिक डोमेन में आए फिर वो व्यक्तिगत नहीं रहता। फिर जिस तरह की कास्त्रो की सेक्स लाइफ रही, उस पर सवाल उठना लाजिमी है। मुझे तो ऐसा लगता है कि कास्त्रो का वामपंथ (समाजवाद) और सेक्सपंथ साथ-साथ चलता रहा।

हालांकि यहां जिक्र करना जरूर नहीं मगर जब बात चल रही है तो उल्लेख कर रहा हूं। महात्मा गांधी की सेक्स लाइफ के किस्से भी खासा चर्चिंत रहे। इसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग में किया भी है। चूंकि यह सब पुरुषों की सेक्स लाइफ (भले ही वे बाद में महान कम्यूनिस्ट नेता या राष्ट्रपिता क्यों न बन गए) से संबंधित था तो ज्यादा शोर-गुल नहीं हुआ। आम अवधारणा भी यही रही है कि सेक्स की सारी स्वतंत्रताएं पुरुषों के पास ही हैं। वहीं अगर कोई स्त्री इन सेक्स स्वतंत्रताओं को खुद अपनाने की कोशिश करती है तो उसे ‘चरित्रहीन’ करार दिया जाता है। उसकी इच्छाओं पर तमाम तरह के सवाल उठाए जाते हैं।

सनद रहे, जब मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपनी आत्मकथा में अपनी सेक्स लाइफ का जिक्र किया था तब कट्टरपंथियों के साथ भारत के कॉमरेडो को भी काफी मिर्ची लगी थी। काफी बुरा-भला कहा गया था तसलीमा को। जब तसलीमा ने सेमी-न्यूड तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली थी और खुद से छोटे एक युवा के साथ अपने अफेयर को पब्लिक किया था तब भी साहित्य-समाज में बहुत ‘हल्ला’ हुआ था। मुझे हैरानी है, तब एक भी कॉमरेड अपनी वैचारिक गुफाओं में से निकल सामने नहीं आया था तसलीमा का बचाव करने। ये बिरादरी तब भी खामोश थी, जब तसलीमा पर ‘फतवा’ जारी हुआ था और उन्हें पश्चिम बंगाल से देश निकाला दे दिया गया था। बड़े ही अजीब हैं हमारे देश के कॉमरेड। जहां बोलना चाहिए वहां बोलते नहीं। जबकि कास्त्रो की मौत पर ‘मातमजदा’ हैं!

साफ है, सेक्स के दायरे पुरुष के लिए कुछ और स्त्री के लिए कुछ हैं आज भी।

बहरहाल, यह तो मानना पड़ेगा कि विश्व ने एक जग-प्रसिद्ध (पक्के) कम्यूनिस्ट नेता को खो दिया है। जिनके विचार और संघर्ष उनके जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर कायम रहेंगे। कास्त्रो कास्त्रो ही थे। कभी कास्त्रो ने कहा था- ‘क्रांति कोई गुलाबों की सेज नहीं है. यह भूत और भविष्य के बीच का संघर्ष है।‘

अंत में, मैं फिदेल कास्त्रो का कोई बहुत बड़ा जानकार नहीं। जो बातें मेरे दिमाग में- कॉमरेडों के आंसूओं को देखकर- आईं, उन्हें यहां व्यक्त कर दिया। फिदेल कास्त्रो पर और लिखने के लिए उन्हें अभी और जानना बाकी है।

Wednesday, 11 May 2016

पानी पर हाहाकार

फिलहाल, पानी के मसले ने हमें पानी-पानी कर रखा है। आकाश से लेकर पताल तक पानी के लिए 'हाहाकार' मचा है। आलम यह है कि एक दिन पानी मिलने के बाद अगले दिन मिलेगा या नहीं; कुछ नहीं पता। लंबी-लंबी लाइनों में लोग पानी के लिए यों इंतजार करते दिखते हैं मानो कोई राशन की दुकान हो। अभी तक पानी पाने के लिए 'संघर्ष' हो रहा था, अब लगता है, अगला 'युद्ध' ही पानी के लिए लड़ा जाएगा।

फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनके लिए पानी का कोई मोल नहीं। दिल खोलकर पानी ऐसे खर्च करते हैं मानो पानी की खेती का लाइसेंस हो उनके पास। खुद के नहाने से लेकर गाड़ी की धुलाई तक में बड़ी बेदर्दी से पानी खर्च करते हैं। कभी टोको तो उत्तर मिलता है, वाटर टैक्स दे रहे हैं तो क्या खर्च नहीं करेंगे? हमारे मोहल्ले में एक सज्जन हैं। वे सुबह-शाम खूब पानी डाल-डालकर जब तक अपने घर के बाहर की सड़क धो नहीं लेते, उनकी रोटी हजम नहीं होती। सड़क को पानी से इतना धोते हैं, इतना धोते हैं कि अड़ोसी-पड़ोसी तक भुनभुनाने लगते हैं। मगर क्या करें, पानी बहाना साहब की आदत है सो है।

पानी की बर्बादी के मद्देनजर अब तक बहुत कहा गया है। यहां तक कि कोर्ट ने भी सरकार को फटकार लगाई है। मुंबई में हो रहे आइपीएल मैचों को 30 अप्रैल के बाद वहां से बाहर करवाने के निर्देश भी दिए हैं। इतने पर भी न तो पानी का बेमतलब बहना रूक पा रहा है न किल्लत। लातूर और बुंदेलखंड के हालात तो इतने खराब हैं कि लोगों को नहाने का तो छोड़िए पीने का पानी भी मयस्सर नहीं। लोग खटिया पर बैठकर नहा रहे हैं ताकि अतिरिक्त पानी को स्टोर कर अन्य काम में लिया जा सके।

पानी की कमी के ये दयनीय हालात कोई साल दो साल या महीने दो महीने में नहीं बने हैं। जिस प्रकार से भू-जल का दोहन जारी है। धरती के गर्भ से जिस निर्मता के साथ पानी को मोटरों द्वारा खींचा जा रहा है, उसने आज हमें उस स्थिति में पहुंचा दिया है कि लोग पानी के वास्ते लड़ाई-झगड़े तक पर उतारू हो गए हैं। गांवों-देहातों में जो स्थिति है सो है, शहरों का हाल भी बहुत बुरा है। पानी निकालने के लिए इतनी गहराई तक बोरिंग की जा रही है कि जमीन की आंतें तक सुखने लगी हैं।

शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब गिरते भू-जल स्तर से संबंधित खबरें अखबारों में न आती हों। तमाम तरह के आंकड़ें ये बताने के लिए काफी हैं कि मनुष्य ने अपनी निजी सुविधाओं के लिए जल, जंगल, जमीन का किस बेरहमी से दोहन किया है। मगर फायदा क्या? प्रकाशित आंकड़ों को देखकर, थोड़ा अफसोस व्यक्त कर, सरकार और इंसान की अड़ियल प्रवृति को गरिया कर फिर सब अपने-अपने कामों में लग जाते हैं। चिंताएं महज चिंताएं बनकर ही रह जाती हैं। उन पर अमल न के बराबर ही हो पाता है।

गिरते जलस्तर या पानी की बर्बादी के लिए सरकारें या इंसान अगर वाकई गंभीर होते तो शायद आज हालात ऐसे न होते। यहां तो सब अपनी-अपनी राजनीतिक एवं व्यक्तिगत सुविधाओं को साधने में लगे हुए हैं। नेता बिरादरी जनता की चौखट पर आकर पानी या रोजगार देने का वायदा तो बहुत जोश से कर जाती है लेकिन चुनाव जीतते ही सारे वायदे जुमले में तब्दील हो जाते हैं। चूंकि जनता का काम सरकार और नेता का मुंह ताकना है सो ताक रही है।

एक तरफ पानी की मार, दूसरी तरफ सूखे का वार इस स्थिति में सबसे अधिक बदत्तर हालात तो किसानों के हैं। साहूकारों से लिया कर्ज किसान समय पर चुका नहीं पाता और आत्महत्या कर लेता है। कैसी विडंबना है, देश का अमीर वर्ग बैंक से लिया कर्ज न चुकाए कोई फर्क नहीं पड़ता मगर किसान का हजार रुपया भी माफ करना उसे मंजूर नहीं। मुझे डर है, आगे कहीं आत्महताएं पानी की किल्लत के लिए न होने लगें। क्योंकि हालात ऐसे ही बनते जा रहे हैं।

पानी की बर्बादी को रोकने के लिए कहना, यह काम सिर्फ सरकार या कोर्ट का नहीं बल्कि सबसे पहला हमारा फर्ज होना चाहिए। जहां पानी भरपूर मात्रा में है, वहां के बादिशों को पहल करनी होगी कि वे अतिरिक्त पानी की बर्बादी रोकें। ताकि बचाए गए पानी का इस्तेमाल उन लोगों के लिए हो, जहां पानी की भीषण कमी है।

पानी को बचाने की कवायदें ही लातूर और बुंदेलखंड जैसी जगह के लोगों को जीवन दे पाएंगी। अपने बारे में तो सब सोचते हैं, अब जरा गंभीरता के साथ पानी की कमी से तड़प रहे लोगों के बारे में भी सोचे लें।

Friday, 22 April 2016

शहर भीतर शहर

कभी-कभी मुझे अपना ही शहर 'अनजाना'-सा लगता है। मेरा शहर अब पहले जैसा 'छोटा' नहीं रहा। बढ़ गया है। निरंतर बढ़ता ही चला जा रहा है। एक ही शहर के लोग पुराने शहर को छोड़कर नए शहर में बसने को उतावले हुए बैठे हैं। अपने ही लोगों से इतनी दूर जाकर बस जाना चाहते हैं, जहां पहुंच पाना हर किसी के बस की बात न हो।

नए शहर में पहुंचकर लोगों के बीच आपस में मिलने-जुलने, बातचीत करने की 'इच्छा' भी धीरे-धीरे कर 'समाप्त' हो रही है। अपनों के ही बीच वो इस कदर 'अनजान' से बने रहते हैं, कि उनको देखकर लगता है मानो बरसों बाद देख रहे हों।

लगातार विस्तार पाते शहर और लोगों के दरमियान खत्म होती मोहल्लेदारी 'चिंतनीय' तो है पर कर भी क्या सकते हैं? वक्त की कमी ने ऐसी मार लगाई है कि हम एक-दूसरे से मिलने की बारे में अब कम से कम सोचने लगे हैं। फोन पर या सोशल साइट्स पर बात करने को ही आपस में मिलना मान लेते हैं।

पहले मोहल्लों के 'साझा' सुख-दुख हुआ करते थे। गर्मियों की दोपहर और सर्दियों की धूप में 'मीटिंगें' जुड़ा करती थीं। सब को सबके बारे में सबकुछ मालूम रहता था। आज किसने क्या खाया, क्या बनाया, क्या खरीदकर लाया, किसकी किससे किस बात पर 'अनबन' हुई, किसने कौन-सी फिल्म देखी, किसका अफेयर किस मोहल्ले के लड़के या लड़की के साथ चल रहा है, बिना कुछ छुपाए एक-दूसरे को सब बता दिया करते थे। तब लोगों के दिलों में इतना 'काईयांपन' न था। जितने बाहर से 'पारदर्शी' थे, उतने ही अंदर से भी।

फिर धीरे-धीरे कर लोगों के दिलों-दिमाग में तरह-तरह के बदलाव आते गए। सोच संकुचित होती गई। मोहल्लों को छोड़ लोग नए शहरों में जाकर बसने लगे। मोहल्लेदारी खत्म हो गई। नई पीढ़ी को शायद मोहल्लों और मोहल्लेदारी की साझा विरासत के बारे में मालूम भी न हो। क्योंकि हमने उन्हें वो माहौल दिया ही नहीं। अब तो मोहल्लों की भी कॉलोनियां बन गई हैं, जहां अपने पड़ोसी को पड़ोस का आदमी नहीं जानता। किसी का नाम के साथ पता पूछ लो, तो साफ कह देता है, नहीं जी हम नहीं जानते। एक ही जगह रहकर एक-दूसरे से अनजान बने रहना न जाने शहरों-कॉलोनियों का कैसा विस्तार है ये? कितने सीमित हो गए हैं हम।

इस बात का ताना अक्सर मुझे भी मारा जाता है कि कहां मोहल्ले में पड़े हो। किसी पॉश इलाके में- पुराने शहर से दूर- नए शहर में अपार्टमेंट लेकर रहो। पुराने शहर, पुराने मोहल्लों, पुरानी गलियों में अब कुछ नहीं बचा है। गंदगी बहुत है यहां। जो कहता है, उसके कहे को चुपचाप सुन लेता हूं। अगले के दिल में अगर मोहल्ले, मोहल्लेदारी और गलियों के प्रति अपनापन नहीं पर मेरे दिल में तो है। पूरा बचपन इन्हीं गलियों-मोहल्लों के बीच रहकर-खेलकर बीता है मेरा। हालांकि यह सच है कि अब मोहल्ले केवल कहने भर को बचे हैं। उनमें भी नया शहरी कल्चर पनप गया है मगर फिर भी 'एहसास' तो अभी कायम है न। यही बहुत है मेरे लिए।

मानता हूं कि मैं पुराने शहर के मोहल्ले में रह रहा हूं। पर आजाद तो हूं न। मेरा मन अगर छत पर जाकर पतंग उड़ाने या सर्दियों में धूप सेंकने का करता है तो ये मैं यहां आराम से कर सकता हूं। लेकिन अपार्टमेंट में रहकर ये सब मैं नहीं कर सकता। जिस घर की सिर के ऊपर 'छत' ही न हो। ऐसे घर में रहने से क्या हासिल?

मैं किसी बदलाव का विरोधी नहीं। बदलाव नहीं होगा, तो नई चीजें हमारे बीच कैसे आएंगी। लेकिन शहर के भीतर बसते नए शहर हमें आपस में इतना 'दूर' ले जा रहे हैं, ये सब कभी-कभी 'दुख' देता है। एक ही जगह, एक ही शहर में रहकर हम एक-दूसरे से मिल भी न सकें। ऐसा विस्तार भला किस लायक?

एक शहर के बीच ही कितने नए-नए शहर। कितने नए-नए लोग। कितने नए टाइप का रहन-सहन। फिर भी आदमी की चाहतें, अभी और विस्तार पाने की हैं। फिर हम इस बात का रोना रोते हैं कि हवा विषैली हो रही है। पर्यावरण बद से बदतर होता जा रहा है। प्रकृति की हरियाली, उसके अपनत्त्व को तो हमने शहर पर शहर बना-बनाके लील लिया है। फिर ये रोना क्यों?

शहर के भीतर शहर बसाते चले जाने का सिलसिला शायद कभी खत्म नहीं होगा। क्योंकि हमें अब एक-दूसरे से 'अनजान' बने रहने में मजा आने लगा है।

Thursday, 3 March 2016

कन्हैया के नाम खत

प्यारे कन्हैया,

फिलहाल, अंतरिम जमानत पर जेल की सलाखों से बाहर आने की तुम्हें बधाई। हालांकि बधाई देने के लायक तो नहीं तुम फिर भी इसलिए दे रहा हूं, शायद तुम्हारे दिमाग पर पड़ा 'अतिवाद' का जाला हट जाए।

इसमें कोई शक नहीं कि तुम अब भगत सिंह से कहीं बड़े क्रांतिकारी बनकर उभरे हो। ठीक ऐसे ही, कुछ समय पहले, विश्व के एकमात्र ईमानदार अरविंद केजरीवाल दुनिया के पटल पर उभरे थे। अधिक बतलाने की आवश्यकता नहीं कि केजरीवाल ने भारतीय राजनीति और दिल्ली का कैसा और कितना 'नुकसान' किया। फिलहाल, तो दिल्ली का मुख्यमंत्री बनके चैन की बांसुरी बजा रहे हैं वो।

तुम्हारे हाव-भाव देखके कुछ-कुछ संकेत ऐसे मिल रहे हैं कि तुम संभवता अगले अरविंद केजरीवाल हो सकते हो! क्योंकि बंदा जब राजनीति के 'ग्लैमर' में पड़ जाता है न, तब उसके भीतर 'अपना कद कैसे ऊंचा किया जाए' टाइप तिकड़में ही चलती रहती हैं। उम्मीद हैं, तुम्हारे अंदर भी यही सब चल रहा होगा। और फिर अभी तुम जेल से छूटकर भी आए हो। यों भी, जेल से छूटे बंदे के दिमाग में बहुत ऊंचा क्रांतिकारी होने की खुशफहमी पल ही जाती है। कोई नहीं। पाले रहो।

जेल से बाहर आते ही, तुम्हारे सम्मान में तुम्हारे समर्थकों एवं कथित बुद्धिजीवियों ने जश्न मनाया। बिल्कुल ठीक किया। तुमने काम ही इतना बड़ा और महान किया था कि जश्न से नीचे कुछ भी मनाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अपने देश (ओह! सॉरी-सॉरी ये तो तुम्हारा देश है ही नहीं न) के खिलाफ वो भी जेएनयू में नारे लगाना व टुकड़े-टुकड़े टाइप कहना वाकई बहुत 'दिलेरी' का काम है। और यह सिर्फ तुम ही कर सकते थे।

हालांकि तुम्हारे इश्क में पड़े दीवाने तो अभी तलक यही कह रहे हैं कि तुम ऐसा कर ही नहीं सकते। वो तो कोई और 'बदमाश' टाइप था, जो इतना कुछ अपने देश के खिलाफ 'बक' गया। कोई नहीं यार। कोई नहीं। ये भारत है। यहां तो आदमी के हजार खून तक माफ कर दिए जाते हैं। फिर तुम तो अभी छात्र हो। एक पाकिस्तान है, जिसने विराट कोहली के दीवाने को- अपनी छत पर भारत का तिरंगा फहराने के जुर्म में- दस साल की सजा सुना दी। किंतु तुम्हें इससे क्या। इस मुल्क में तो तुम्हारी सांस यों भी घुट ही रही है न। तुम्हें तो आजादी चाहिए- आजादी। एक तुम ही नहीं बल्कि इस मुल्क के प्रत्येक वाम टाइप विचारक-बुद्धिजीवि-एक्टिविस्ट को आजादी चाहिए। पता नहीं साल-दो साल पहले ये लोग जाने किस मुल्क में रह रहे थे। जहां इन्हें पूरी आजादी मिली हुई थी। अब इनकी हर बात पर 'पहरा' बैठा दिया गया है।

होता है। होता है। जब बिना संघर्ष किए लोग आजादी का लुत्फ उठाने लग जाते हैं न, तब उन्हें अक्सर ऐसे 'काले ख्याल' आने लगते हैं।

मुझे नहीं पता कि तुम्हें इस बात का एहसास है या नहीं कि इस मुल्क को कैसे और किन परिस्थितियों में ब्रिटिश हुकूमत से आजादी मिली थी। कितना-कितना संघर्ष किया था, हमारे क्रांतिकारियों ने इस मुल्क को आजाद करवाने में। अपना घर-परिवार, सुख-सुविधाएं, नौकरी-चाकरी सबकुछ छोड़-छाड़कर केवल मुल्क को आजाद कराने में लग गए थे। न केवल भगत सिंह बल्कि न जाने कितने ही देशभक्तों ने हंसी-हंसी फांसी को अपने गले का हार बनाया और झुल गए। उफ्फ तक न की।

जानता हूं, तुम्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि तुम्हें और तुम्हारे दीवानों को और आजादी चाहिए। एक ऐसी आजादी जिसमें आदमी विचारधारा का गुलाम बना रहे। एक ऐसी आजादी जिसका रंग 'लाल' हो। एक ऐसी आजादी जो अपने ही मुल्क और क्रांतिकारियों का टुकड़े-टुकड़े होंगे कहकर मजाक उड़ाए।

पता नहीं क्यों ये सब मैं तुमसे कह रहा हूं। मैं दरअसल 'बेवकूफ' हूं, जो अपने देश से प्रेम करता हूं। तुम्हारी तरह क्रांतिकारी नहीं, जो जेल से छूटने के बाद भी अपनी आदतों से बाज नहीं आया। जेल से छूटते वक्त कोर्ट की दी हुई हिदायत तक को दरकिनार कर दिया।

चलो। खैर। खत बहुत लंबा हो लिया है। आज तलक इतना लंबा खत तो मैंने अपनी किसी प्रेमिका को न लिखा।

अपनी जिंदगी के मालिक तुम खुद हो। जेएनयू में पढ़ने आए हो। पढ़ाई करो। थोड़ा करियर आदि बना लो। क्रांति करने के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है मेरे दोस्त।

हां, इतना और सुन लो। क्रांति चाहे तुम कितनी भी कर लो मगर उस भगत सिंह के पैर के अंगूठे के नाखून के बराबर भी नहीं हो पाओगे, जिसने देश की आजादी की खातिर फांसी पर चढ़ने से कोई समझौता नहीं किया।

Wednesday, 2 March 2016

ये कहां आ गए हम

क्या ऐसा नहीं लगता आपको कि बदलते समय के साथ हम और भी असंवेदनशील और आराजक हो गए हैं? हमारे भीतर से- गैरों की जाने दीजिए- अपनी ही आलोचना को सुनने का 'साहस' नहीं बचा अब। हर ऐरी-गैरी बातों-मुद्दों पर आपस में यों भिड़ जाते हैं मानो लड़ना ही हमारी नियति हो!

दूसरे को अपने अनुरूप बनाने की चाह ने हमें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हम अपने ही देश के विरूद्ध नारे लगा रहे हैं। क्रांतिकारियों द्वारा बरसों के संघर्ष के बाद दिलाई स्वतंत्रता का खुलकर यों 'मजाक' उड़ा रहे हैं, जैसे न यह देश, न यहां के नागरिक हमारे लिए कुछ हैं ही नहीं। चंद मुठ्ठीभर लोग अब यह तय कर रहे हैं कि हमें किस विचारधारा के साथ रहना चाहिए, किसके साथ नहीं। मानो, देश की गरिमा से ज्यादा उन्हें अपनी कथित विचाराधारा से प्यार है।

कैसी विडंबना है। दिन-ब-दिन तकनीकी खोजें हमारे लाइफ-स्टाइल को आसान से आसानतर बनाए चली जा रही हैं। दूसरी तरफ हम ज्ञान-विज्ञान को लगभग धक्का मारते हुए और भी धर्मभीरू व कट्टर टाइप के भक्त बनने को अभिशप्त हैं। सबके अपने-अपने गॉड-फादर हैं। सब अपने-अपने गॉड-फादरों की फिगर की रक्षा करने के लिए सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक पर हमेशा मुस्तैद रहते हैं। अपने गॉड-फादरों की आलोचना को सुनने का साहस न उनमें है न इनमें। जब से सोशल मीडिया पर फोटो-शॉप का चलन बढ़ा है, तब से यही पता नहीं चल पाता कि 'रियल' क्या है, 'फेक' क्या।

अपने विरोधियों या आलोचकों को 'सबक' सिखलाना अब (दोनों तरफ के) भक्त-संप्रदाय का मुख्य शगल बन गया है।

ऐसे-ऐसे बेढब मुद्दों में देश और जनता को हर वक्त फंसाकर रखा जा रहा है, जिसका कोई मतलब नहीं। तिल का ताड़ बना देना अब फैशन की श्रेणी में आ गया है। एक झूठ को इतनी ही दफा दिखाया व बताया जाता है कि कमजोर दिमाग वाले अंततः उसे 'सच' मान ही लेते हैं।

हर समय की नारेबाजी, बयानबाजी, हिंसा, तोड़-फोड़ ही अब हर किसी की चिंता का विषय है। देश कहां जा रहा है? गरीब-बेरोजगार कहां या किस स्थिति में है, इसकी फिक्र न नेताओं को है, न चिंतकों को, न बुद्धिजीवियों को, न ही कथित भक्त-संप्रदाय को। उन्हें तो मतलब अपने-अपने कथित आंदोलनों और विचाराधरों के 'हिट' होने से है।

कभी-कभी मुझे वाकई हैरानी होती है, उन प्रगतिशीलों के विचारों को सुन-पढ़कर जिन्हें देश-समाज के भीतर हमेशा 'फासीवाद' के सिवाय कभी कुछ 'अच्छा' नजर ही नहीं आता। विडंबना देखिए, उन्हें जेएनयू में लगे देश विरोधी नारों में कुछ भी फासीवाद दिखलाई नहीं दिया। ऊपर से टीवी स्क्रीन पर यों 'अंधेरा' पसरा दिया गया मानो मुक्तिबोध की 'अंधेरे में...' कविता पढ़कर सुना रहे हों।

सच तो यह है- चाहे कोई माने या न माने- भरे पेट क्रांति और क्रांतिकारी बातें बहुत 'आसान' से कर ली जाती हैं। भरे पेट को दो जून की रोटी की चिंता नहीं रहती। भरे पेट नारे भी उतने ही उत्साह से लगते हैं, जितने उत्साह से राम मंदिर बनवाने के। दोनों ही तरफ की कथित विचारधारों में 'सहनशक्ति' की गुंजाइश जरा भी नहीं बची है।

अक्सर ऐसा महसूस होता है कि हम एक देश होते हुए भी छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गए हैं। हर किसी ने अपने हिस्से के आगे लक्ष्मण रेखा खींच रखी है। न कोई इधर से उधर जा सकता है। न उधर से इधर आ सकता है। वाद-विवाद के झगड़ों ने मानसिकताओं को पंगु बना दिया है। दुनिया विज्ञान और तकनीक के मामले में निरंतर आगे बढ़ती चली जा रही है। और एक हम हैं कि अभी तलक जाति-धर्म-विचारधाराओं की अंधी गलियों में भटक रहे हैं।

एक लोकतांत्रिक देश होते हुए भी हमने इसे इमरजेंसी के मुहाने पर ला खड़ा किया है। मत-भिन्नताएं कहां किस देश में नहीं होतीं। मगर इसका मतलब यह नहीं होता कि हम एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएं। देश, दुनिया और समाज सिर्फ बेहतर संवाद से ही चल सकता है।

न जाने ये कहां आ गए हैं हम, जहां आलोचना का विकल्प हिंसा बनती जा रही है।

Saturday, 23 January 2016

मजाक पर पहरा

यों भी हमारे बीच से हास्य और हंसी-मजाक निरंतर कम होता जा रहा है, ऐसे में एक कलाकार को एक बाबा की कथित मिमिक्री करने के आरोप में धर लेना, कोई हैरत का विषय नहीं। मिमिक्री या मजाक को ही अगर व्यक्तिगत मान-हानि मान लिया जाएगा फिर तो लोगों का आपस में हंसना-मुस्कुराना तक मुसीबत का सबब बन जाएगा। ऐसे में तो कोई भी किसी के भी खिलाफ कोर्ट-कचहरी का इस्तेमाल कर सकता है।

जिस समाज के भीतर मजाक को सहने या एंजॉय करने का ही साहस न हो, वो भला कैसे स्वतंत्र विचार को अपने बीच जगह दे पाएगा! किसी की मजाक या विचार से आप लाख असहमत हो सकते हैं, असहमति का पूरा हक है आपको। पर अपनी असहमति का जवाब अगर संवाद या बहस के तौर पर दिया जाए तो शायद ज्यादा बेहतर होगा। इससे सहमति-असहमति के बीच परस्पर विचार का रिश्ता भी बनेगा।

हां, यह बात सही है कि टीवी पर आने वाले अधिकतर कॉमेडी प्रोग्रामों में 'फूहड़ता' ही होती है। डबल-मीनिंग संवादों के सहारे वे अपने प्रोग्राम की टीआरपी को चमकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। मिमिक्री या हंसी-मजाक करते वक्त यह भी ध्यान में नहीं रखते कि इसका असर बच्चों पर या अन्य लोगों पर कैसा पड़ रहा होगा। मगर क्या करें, दर्शक भी इसी फूहड़ता को हास्य-व्यंग्य मानकर एंजॉय कर रहा है। 'दर्शक वर्ग यही चाहता है' के दम पर चैनलों पर फूहड़ हंसी का खेल जमकर खेला जा रहा है।

लेकिन इसका यह मतलब नहीं अगर वे फूहड़ता पर उतारू हैं तो हम भी वैसे ही हो जाएं। खुद पर जरा से मजाक को ही न सह पाएं। कम से कम इतना साहस तो हममें होना ही चाहिए। मजाक या मिमिक्री को अगर महज मजाक के तौर पर नहीं लिया गया फिर तो बड़ा गड़बड़ हो जाएगा। लोग आपस में ही हंसी-मजाक करने में 'संकोच' किया करेंगे।

यह जो बात-बात में 'भावनाओं के आहत' होने की प्रवृति हमारे भीतर तेजी बढ़ती जा रही है न, इसने सबसे अधिक बेड़ागर्ग किया है। आहत भावनाओं के सेंटिमेंट ने हमें सहिष्णु से असहिष्णु बना दिया है। जहां जरा किसी ने कुछ विपरित कहा या लिखा तुरंत सामने वाले की भावनाएं आहत हो लेती हैं। मानो, भावनाएं अब इतनी छुई-मुई टाइप हो गई हैं कि मात्र परछाई भर से मैली हो जाती हैं।

कहां डिजिटल इंडिया, बुलेट ट्रेन, स्टार्ट-अप जैसी बड़ी-बड़ी बातें हैं, और कहां हम जरा से मजाक पर ही उखड़े जा रहे हैं। बात-बात पर भुनभुनाने वाली ये प्रवृति हमें अंदर से कितना कुंठित और भयभीत समाज बना रही है, इसका अंदाजा नहीं हैं हमें। बस हर वक्त सबक सिखाने की जिद रहती है कि सामने वाले ने हमारे आका या विचार के खिलाफ बोला कैसे। हद है वैचारिक दरिद्रता की।

सुना है कि संत-महात्मा-बाबा लोग तो बड़े 'सहनशील' होते हैं। गलतियों को सुधारे का मौका देते हैं। मगर यहां तो सीन ही उलटा हो गया है। मजाक सहन न हुआ तो एक कलाकार पर मुकदमा ही ठोक दिया। इतना क्रोध भी ठीक नहीं।

ओशो और कबीर से सीखें जिंदगी के मायने। ओशो के लिए तो मौत भी उत्सव समान थी। कबीर ने तो अंधभक्त समाज पर ही तमाम सवाल खड़े कर दिए थे। कहने वालों ने जाने क्या-क्या नहीं कहा इनके खिलाफ मगर कभी किसी को कोर्ट-कचहरी में नहीं घसीटा इन्होंने। यही तो महानता थी इन महान-आत्माओं की।

केवल रहन-सहन, कपड़े-लत्तों या मोबाइल फोन के बदल लेने से भर से कुछ नहीं होता। जब तलक हम अपनी सोच, अपना नजरिया, अपनी मानसिकता में बदलाव नहीं लाते, तब तलक स्वतंत्र कलाकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों को भक्तों की कथित नाराजगी यों ही झेलते रहना होगा।

Sunday, 10 January 2016

मोबाइल फोन की बैट्री

काफी देर से मैं उन्हें देख रहा था। वे अत्यंत चिंतित मुद्रा में थे। कभी दाएं टहल लगाते, तो कभी बाएं। कभी दोनों हाथ सिर पर रखकर मन ही मन बुदबुदाते- 'हाय! अब क्या होगा। ये बहुत गलत हुआ।' उनके इस अजीबो-गरीब करतब-व्यवहार को देखकर मुझसे रहा न गया तो आखिरकार मैंने पूछ ही लिया- 'भाई साहब, क्या आपको कोई तकलीफ है? क्या कहीं कुछ खो गया है आपका?' उन्होंने एकदम चौंकते हुए मेरी तरफ देखा और बोले- 'हां, एक बड़ी समस्या आ गई है। मेरे मोबाइल की बैट्री सुबह खराब हो गई। मोबाइल बंद है। सारे कांटेक्ट नंबर उसी में हैं। सर्विस सेंटर वाला कह रहा है- ओरिजनल बैट्री आने में चार-पांच दिन लग जाएंगे। बिन मोबाइल मेरी हालत 'जल बिन मछली' जैसी है इस वक्त।'

भाई साहब की चिंता सुनने के बाद मैंने उन्हें 'संत्वना' देते हुए कहा- 'ज्यादा परेशान न हों। बैट्री आ ही जाएगी। जब तलक आप मेरे दूसरे फोन का इस्तेमाल कर सकते हैं।' इतना सुनकर भाई साहब के चेहरे पर हल्की खुशी तो थी मगर अफसोस इस बात का था कि उन्हें किसी का भी कोई मोबाइल नंबर याद न था। मुझे धन्यवाद देते हुए बोले- 'ससुरी जिंदगी की बैट्री चाहे जितनी डाउन क्यों न हो जाए फर्क नहीं पड़ता पर मोबाइल फोन की नहीं होनी चाहिए। बंदा 'अवसाद' में चला जाता है, ठीक मेरी तरह।'

शायद कुछ हद तक भाई साहब का 'कटाक्ष' उचित ही था। ऐसे न जाने कितने ही लोग मैंने देखे हैं, जो मोबाइल से कहीं ज्यादा चिंता उसकी बैट्री के 'न' चले जाने की किया करते हैं। मोबाइल खरीदते वक्त भी बंदे का पहला सवाल यही होता है कि इसका बैट्री बैकअप कितना है? बैट्री लंबी चलेगी या बीच में ही हांफ जाएगी। बिना बैट्री न मोबाइल की कोई औकात है, न उपभोक्ता की। जिंदगी की तमाम जद्दोजहद के बीच मोबाइल की बैट्री को हर समय जीवित (चार्ज) रखना किसी महत्त्वपूर्ण टास्क से कम नहीं होता।

कुछ लोग तो बैट्री को लेकर इतना फिक्रमंद रहते हैं कि सोते वक्त भी मोबाइल को चार्जिंग पर लगाना नहीं भूलते। यों भी, मोबाइल के स्मार्टफोन में तब्दील हो जाने के बाद से तो लोगों की नींद भी कम हो गई है। चैन की नींद लिए हुए लोगों को अब जमाने हुआ। रिश्ते मोबाइल सरीखे हो लिए हैं। लोगों के पास वक्त की कमी है। चंद मिनट बात हो गई तो समझिए 'जग' और 'मन' दोनों ही जीत लिया। हां, इसके लिए फोन की बैट्री को 'जिंदा' रखना बेहद जरूरी है। क्योंकि अब यही हमारी-आपकी 'लाइफ-लाइन' है।

बदलते वक्त के साथ हमारी चिंताओं के पैमाने भी कितना बदल गए हैं। पहले हम बड़ी-बड़ी चिंताओं पर सोच-सोचकर चिंतित हुआ करते थे। लेकिन अब तो हर छोटी से छोटी चिंता को भी ऐसे चिंतित होकर सोचते हैं मानो कोई बहुत बड़ा पहाड़ हम पर टूटकर आन गिरा हो। उन भाई साहब का अपने फोन की बैट्री के लिए इतना चिंतित (फिकरमंद) होना सबसे जीवंत उदाहरण है। ये तो चलो बैट्री की बात रही। मैंने तो लोगों को मोबाइल चार्जिंग पिन के वास्ते भी बेहद चिंतित एवं उद्वेलित होते देखा-सुना है। सुनने में आया है कि अब लोग स्मार्टफोन के आकार (साइज) को लेकर भी फिकरमंद रहने लगे हैं। कमाल है...।

भूल जाइए कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। बस इतना ध्यान में रखिए कि आज का मनुष्य मोबाइल-युक्त चिंतित प्राणी है। जिसकी चिंताओं के सिरे मोबाइल फोन की बैट्री से लेकर किस्म-किस्म की एप्स को डाउनलोड करने में जाने कहां-कहां तक बिखरे पड़े हैं। हम ऐसे मनुष्यों के बीच ही रह-जी रहे हैं। यह एक प्रकार से मोबाइल की गुलामी का युग है। क्या नहीं...?