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Saturday, 23 January 2016

मजाक पर पहरा

यों भी हमारे बीच से हास्य और हंसी-मजाक निरंतर कम होता जा रहा है, ऐसे में एक कलाकार को एक बाबा की कथित मिमिक्री करने के आरोप में धर लेना, कोई हैरत का विषय नहीं। मिमिक्री या मजाक को ही अगर व्यक्तिगत मान-हानि मान लिया जाएगा फिर तो लोगों का आपस में हंसना-मुस्कुराना तक मुसीबत का सबब बन जाएगा। ऐसे में तो कोई भी किसी के भी खिलाफ कोर्ट-कचहरी का इस्तेमाल कर सकता है।

जिस समाज के भीतर मजाक को सहने या एंजॉय करने का ही साहस न हो, वो भला कैसे स्वतंत्र विचार को अपने बीच जगह दे पाएगा! किसी की मजाक या विचार से आप लाख असहमत हो सकते हैं, असहमति का पूरा हक है आपको। पर अपनी असहमति का जवाब अगर संवाद या बहस के तौर पर दिया जाए तो शायद ज्यादा बेहतर होगा। इससे सहमति-असहमति के बीच परस्पर विचार का रिश्ता भी बनेगा।

हां, यह बात सही है कि टीवी पर आने वाले अधिकतर कॉमेडी प्रोग्रामों में 'फूहड़ता' ही होती है। डबल-मीनिंग संवादों के सहारे वे अपने प्रोग्राम की टीआरपी को चमकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। मिमिक्री या हंसी-मजाक करते वक्त यह भी ध्यान में नहीं रखते कि इसका असर बच्चों पर या अन्य लोगों पर कैसा पड़ रहा होगा। मगर क्या करें, दर्शक भी इसी फूहड़ता को हास्य-व्यंग्य मानकर एंजॉय कर रहा है। 'दर्शक वर्ग यही चाहता है' के दम पर चैनलों पर फूहड़ हंसी का खेल जमकर खेला जा रहा है।

लेकिन इसका यह मतलब नहीं अगर वे फूहड़ता पर उतारू हैं तो हम भी वैसे ही हो जाएं। खुद पर जरा से मजाक को ही न सह पाएं। कम से कम इतना साहस तो हममें होना ही चाहिए। मजाक या मिमिक्री को अगर महज मजाक के तौर पर नहीं लिया गया फिर तो बड़ा गड़बड़ हो जाएगा। लोग आपस में ही हंसी-मजाक करने में 'संकोच' किया करेंगे।

यह जो बात-बात में 'भावनाओं के आहत' होने की प्रवृति हमारे भीतर तेजी बढ़ती जा रही है न, इसने सबसे अधिक बेड़ागर्ग किया है। आहत भावनाओं के सेंटिमेंट ने हमें सहिष्णु से असहिष्णु बना दिया है। जहां जरा किसी ने कुछ विपरित कहा या लिखा तुरंत सामने वाले की भावनाएं आहत हो लेती हैं। मानो, भावनाएं अब इतनी छुई-मुई टाइप हो गई हैं कि मात्र परछाई भर से मैली हो जाती हैं।

कहां डिजिटल इंडिया, बुलेट ट्रेन, स्टार्ट-अप जैसी बड़ी-बड़ी बातें हैं, और कहां हम जरा से मजाक पर ही उखड़े जा रहे हैं। बात-बात पर भुनभुनाने वाली ये प्रवृति हमें अंदर से कितना कुंठित और भयभीत समाज बना रही है, इसका अंदाजा नहीं हैं हमें। बस हर वक्त सबक सिखाने की जिद रहती है कि सामने वाले ने हमारे आका या विचार के खिलाफ बोला कैसे। हद है वैचारिक दरिद्रता की।

सुना है कि संत-महात्मा-बाबा लोग तो बड़े 'सहनशील' होते हैं। गलतियों को सुधारे का मौका देते हैं। मगर यहां तो सीन ही उलटा हो गया है। मजाक सहन न हुआ तो एक कलाकार पर मुकदमा ही ठोक दिया। इतना क्रोध भी ठीक नहीं।

ओशो और कबीर से सीखें जिंदगी के मायने। ओशो के लिए तो मौत भी उत्सव समान थी। कबीर ने तो अंधभक्त समाज पर ही तमाम सवाल खड़े कर दिए थे। कहने वालों ने जाने क्या-क्या नहीं कहा इनके खिलाफ मगर कभी किसी को कोर्ट-कचहरी में नहीं घसीटा इन्होंने। यही तो महानता थी इन महान-आत्माओं की।

केवल रहन-सहन, कपड़े-लत्तों या मोबाइल फोन के बदल लेने से भर से कुछ नहीं होता। जब तलक हम अपनी सोच, अपना नजरिया, अपनी मानसिकता में बदलाव नहीं लाते, तब तलक स्वतंत्र कलाकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों को भक्तों की कथित नाराजगी यों ही झेलते रहना होगा।

Sunday, 10 January 2016

मोबाइल फोन की बैट्री

काफी देर से मैं उन्हें देख रहा था। वे अत्यंत चिंतित मुद्रा में थे। कभी दाएं टहल लगाते, तो कभी बाएं। कभी दोनों हाथ सिर पर रखकर मन ही मन बुदबुदाते- 'हाय! अब क्या होगा। ये बहुत गलत हुआ।' उनके इस अजीबो-गरीब करतब-व्यवहार को देखकर मुझसे रहा न गया तो आखिरकार मैंने पूछ ही लिया- 'भाई साहब, क्या आपको कोई तकलीफ है? क्या कहीं कुछ खो गया है आपका?' उन्होंने एकदम चौंकते हुए मेरी तरफ देखा और बोले- 'हां, एक बड़ी समस्या आ गई है। मेरे मोबाइल की बैट्री सुबह खराब हो गई। मोबाइल बंद है। सारे कांटेक्ट नंबर उसी में हैं। सर्विस सेंटर वाला कह रहा है- ओरिजनल बैट्री आने में चार-पांच दिन लग जाएंगे। बिन मोबाइल मेरी हालत 'जल बिन मछली' जैसी है इस वक्त।'

भाई साहब की चिंता सुनने के बाद मैंने उन्हें 'संत्वना' देते हुए कहा- 'ज्यादा परेशान न हों। बैट्री आ ही जाएगी। जब तलक आप मेरे दूसरे फोन का इस्तेमाल कर सकते हैं।' इतना सुनकर भाई साहब के चेहरे पर हल्की खुशी तो थी मगर अफसोस इस बात का था कि उन्हें किसी का भी कोई मोबाइल नंबर याद न था। मुझे धन्यवाद देते हुए बोले- 'ससुरी जिंदगी की बैट्री चाहे जितनी डाउन क्यों न हो जाए फर्क नहीं पड़ता पर मोबाइल फोन की नहीं होनी चाहिए। बंदा 'अवसाद' में चला जाता है, ठीक मेरी तरह।'

शायद कुछ हद तक भाई साहब का 'कटाक्ष' उचित ही था। ऐसे न जाने कितने ही लोग मैंने देखे हैं, जो मोबाइल से कहीं ज्यादा चिंता उसकी बैट्री के 'न' चले जाने की किया करते हैं। मोबाइल खरीदते वक्त भी बंदे का पहला सवाल यही होता है कि इसका बैट्री बैकअप कितना है? बैट्री लंबी चलेगी या बीच में ही हांफ जाएगी। बिना बैट्री न मोबाइल की कोई औकात है, न उपभोक्ता की। जिंदगी की तमाम जद्दोजहद के बीच मोबाइल की बैट्री को हर समय जीवित (चार्ज) रखना किसी महत्त्वपूर्ण टास्क से कम नहीं होता।

कुछ लोग तो बैट्री को लेकर इतना फिक्रमंद रहते हैं कि सोते वक्त भी मोबाइल को चार्जिंग पर लगाना नहीं भूलते। यों भी, मोबाइल के स्मार्टफोन में तब्दील हो जाने के बाद से तो लोगों की नींद भी कम हो गई है। चैन की नींद लिए हुए लोगों को अब जमाने हुआ। रिश्ते मोबाइल सरीखे हो लिए हैं। लोगों के पास वक्त की कमी है। चंद मिनट बात हो गई तो समझिए 'जग' और 'मन' दोनों ही जीत लिया। हां, इसके लिए फोन की बैट्री को 'जिंदा' रखना बेहद जरूरी है। क्योंकि अब यही हमारी-आपकी 'लाइफ-लाइन' है।

बदलते वक्त के साथ हमारी चिंताओं के पैमाने भी कितना बदल गए हैं। पहले हम बड़ी-बड़ी चिंताओं पर सोच-सोचकर चिंतित हुआ करते थे। लेकिन अब तो हर छोटी से छोटी चिंता को भी ऐसे चिंतित होकर सोचते हैं मानो कोई बहुत बड़ा पहाड़ हम पर टूटकर आन गिरा हो। उन भाई साहब का अपने फोन की बैट्री के लिए इतना चिंतित (फिकरमंद) होना सबसे जीवंत उदाहरण है। ये तो चलो बैट्री की बात रही। मैंने तो लोगों को मोबाइल चार्जिंग पिन के वास्ते भी बेहद चिंतित एवं उद्वेलित होते देखा-सुना है। सुनने में आया है कि अब लोग स्मार्टफोन के आकार (साइज) को लेकर भी फिकरमंद रहने लगे हैं। कमाल है...।

भूल जाइए कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। बस इतना ध्यान में रखिए कि आज का मनुष्य मोबाइल-युक्त चिंतित प्राणी है। जिसकी चिंताओं के सिरे मोबाइल फोन की बैट्री से लेकर किस्म-किस्म की एप्स को डाउनलोड करने में जाने कहां-कहां तक बिखरे पड़े हैं। हम ऐसे मनुष्यों के बीच ही रह-जी रहे हैं। यह एक प्रकार से मोबाइल की गुलामी का युग है। क्या नहीं...?