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Thursday, 3 March 2016

कन्हैया के नाम खत

प्यारे कन्हैया,

फिलहाल, अंतरिम जमानत पर जेल की सलाखों से बाहर आने की तुम्हें बधाई। हालांकि बधाई देने के लायक तो नहीं तुम फिर भी इसलिए दे रहा हूं, शायद तुम्हारे दिमाग पर पड़ा 'अतिवाद' का जाला हट जाए।

इसमें कोई शक नहीं कि तुम अब भगत सिंह से कहीं बड़े क्रांतिकारी बनकर उभरे हो। ठीक ऐसे ही, कुछ समय पहले, विश्व के एकमात्र ईमानदार अरविंद केजरीवाल दुनिया के पटल पर उभरे थे। अधिक बतलाने की आवश्यकता नहीं कि केजरीवाल ने भारतीय राजनीति और दिल्ली का कैसा और कितना 'नुकसान' किया। फिलहाल, तो दिल्ली का मुख्यमंत्री बनके चैन की बांसुरी बजा रहे हैं वो।

तुम्हारे हाव-भाव देखके कुछ-कुछ संकेत ऐसे मिल रहे हैं कि तुम संभवता अगले अरविंद केजरीवाल हो सकते हो! क्योंकि बंदा जब राजनीति के 'ग्लैमर' में पड़ जाता है न, तब उसके भीतर 'अपना कद कैसे ऊंचा किया जाए' टाइप तिकड़में ही चलती रहती हैं। उम्मीद हैं, तुम्हारे अंदर भी यही सब चल रहा होगा। और फिर अभी तुम जेल से छूटकर भी आए हो। यों भी, जेल से छूटे बंदे के दिमाग में बहुत ऊंचा क्रांतिकारी होने की खुशफहमी पल ही जाती है। कोई नहीं। पाले रहो।

जेल से बाहर आते ही, तुम्हारे सम्मान में तुम्हारे समर्थकों एवं कथित बुद्धिजीवियों ने जश्न मनाया। बिल्कुल ठीक किया। तुमने काम ही इतना बड़ा और महान किया था कि जश्न से नीचे कुछ भी मनाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अपने देश (ओह! सॉरी-सॉरी ये तो तुम्हारा देश है ही नहीं न) के खिलाफ वो भी जेएनयू में नारे लगाना व टुकड़े-टुकड़े टाइप कहना वाकई बहुत 'दिलेरी' का काम है। और यह सिर्फ तुम ही कर सकते थे।

हालांकि तुम्हारे इश्क में पड़े दीवाने तो अभी तलक यही कह रहे हैं कि तुम ऐसा कर ही नहीं सकते। वो तो कोई और 'बदमाश' टाइप था, जो इतना कुछ अपने देश के खिलाफ 'बक' गया। कोई नहीं यार। कोई नहीं। ये भारत है। यहां तो आदमी के हजार खून तक माफ कर दिए जाते हैं। फिर तुम तो अभी छात्र हो। एक पाकिस्तान है, जिसने विराट कोहली के दीवाने को- अपनी छत पर भारत का तिरंगा फहराने के जुर्म में- दस साल की सजा सुना दी। किंतु तुम्हें इससे क्या। इस मुल्क में तो तुम्हारी सांस यों भी घुट ही रही है न। तुम्हें तो आजादी चाहिए- आजादी। एक तुम ही नहीं बल्कि इस मुल्क के प्रत्येक वाम टाइप विचारक-बुद्धिजीवि-एक्टिविस्ट को आजादी चाहिए। पता नहीं साल-दो साल पहले ये लोग जाने किस मुल्क में रह रहे थे। जहां इन्हें पूरी आजादी मिली हुई थी। अब इनकी हर बात पर 'पहरा' बैठा दिया गया है।

होता है। होता है। जब बिना संघर्ष किए लोग आजादी का लुत्फ उठाने लग जाते हैं न, तब उन्हें अक्सर ऐसे 'काले ख्याल' आने लगते हैं।

मुझे नहीं पता कि तुम्हें इस बात का एहसास है या नहीं कि इस मुल्क को कैसे और किन परिस्थितियों में ब्रिटिश हुकूमत से आजादी मिली थी। कितना-कितना संघर्ष किया था, हमारे क्रांतिकारियों ने इस मुल्क को आजाद करवाने में। अपना घर-परिवार, सुख-सुविधाएं, नौकरी-चाकरी सबकुछ छोड़-छाड़कर केवल मुल्क को आजाद कराने में लग गए थे। न केवल भगत सिंह बल्कि न जाने कितने ही देशभक्तों ने हंसी-हंसी फांसी को अपने गले का हार बनाया और झुल गए। उफ्फ तक न की।

जानता हूं, तुम्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि तुम्हें और तुम्हारे दीवानों को और आजादी चाहिए। एक ऐसी आजादी जिसमें आदमी विचारधारा का गुलाम बना रहे। एक ऐसी आजादी जिसका रंग 'लाल' हो। एक ऐसी आजादी जो अपने ही मुल्क और क्रांतिकारियों का टुकड़े-टुकड़े होंगे कहकर मजाक उड़ाए।

पता नहीं क्यों ये सब मैं तुमसे कह रहा हूं। मैं दरअसल 'बेवकूफ' हूं, जो अपने देश से प्रेम करता हूं। तुम्हारी तरह क्रांतिकारी नहीं, जो जेल से छूटने के बाद भी अपनी आदतों से बाज नहीं आया। जेल से छूटते वक्त कोर्ट की दी हुई हिदायत तक को दरकिनार कर दिया।

चलो। खैर। खत बहुत लंबा हो लिया है। आज तलक इतना लंबा खत तो मैंने अपनी किसी प्रेमिका को न लिखा।

अपनी जिंदगी के मालिक तुम खुद हो। जेएनयू में पढ़ने आए हो। पढ़ाई करो। थोड़ा करियर आदि बना लो। क्रांति करने के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है मेरे दोस्त।

हां, इतना और सुन लो। क्रांति चाहे तुम कितनी भी कर लो मगर उस भगत सिंह के पैर के अंगूठे के नाखून के बराबर भी नहीं हो पाओगे, जिसने देश की आजादी की खातिर फांसी पर चढ़ने से कोई समझौता नहीं किया।

Wednesday, 2 March 2016

ये कहां आ गए हम

क्या ऐसा नहीं लगता आपको कि बदलते समय के साथ हम और भी असंवेदनशील और आराजक हो गए हैं? हमारे भीतर से- गैरों की जाने दीजिए- अपनी ही आलोचना को सुनने का 'साहस' नहीं बचा अब। हर ऐरी-गैरी बातों-मुद्दों पर आपस में यों भिड़ जाते हैं मानो लड़ना ही हमारी नियति हो!

दूसरे को अपने अनुरूप बनाने की चाह ने हमें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हम अपने ही देश के विरूद्ध नारे लगा रहे हैं। क्रांतिकारियों द्वारा बरसों के संघर्ष के बाद दिलाई स्वतंत्रता का खुलकर यों 'मजाक' उड़ा रहे हैं, जैसे न यह देश, न यहां के नागरिक हमारे लिए कुछ हैं ही नहीं। चंद मुठ्ठीभर लोग अब यह तय कर रहे हैं कि हमें किस विचारधारा के साथ रहना चाहिए, किसके साथ नहीं। मानो, देश की गरिमा से ज्यादा उन्हें अपनी कथित विचाराधारा से प्यार है।

कैसी विडंबना है। दिन-ब-दिन तकनीकी खोजें हमारे लाइफ-स्टाइल को आसान से आसानतर बनाए चली जा रही हैं। दूसरी तरफ हम ज्ञान-विज्ञान को लगभग धक्का मारते हुए और भी धर्मभीरू व कट्टर टाइप के भक्त बनने को अभिशप्त हैं। सबके अपने-अपने गॉड-फादर हैं। सब अपने-अपने गॉड-फादरों की फिगर की रक्षा करने के लिए सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक पर हमेशा मुस्तैद रहते हैं। अपने गॉड-फादरों की आलोचना को सुनने का साहस न उनमें है न इनमें। जब से सोशल मीडिया पर फोटो-शॉप का चलन बढ़ा है, तब से यही पता नहीं चल पाता कि 'रियल' क्या है, 'फेक' क्या।

अपने विरोधियों या आलोचकों को 'सबक' सिखलाना अब (दोनों तरफ के) भक्त-संप्रदाय का मुख्य शगल बन गया है।

ऐसे-ऐसे बेढब मुद्दों में देश और जनता को हर वक्त फंसाकर रखा जा रहा है, जिसका कोई मतलब नहीं। तिल का ताड़ बना देना अब फैशन की श्रेणी में आ गया है। एक झूठ को इतनी ही दफा दिखाया व बताया जाता है कि कमजोर दिमाग वाले अंततः उसे 'सच' मान ही लेते हैं।

हर समय की नारेबाजी, बयानबाजी, हिंसा, तोड़-फोड़ ही अब हर किसी की चिंता का विषय है। देश कहां जा रहा है? गरीब-बेरोजगार कहां या किस स्थिति में है, इसकी फिक्र न नेताओं को है, न चिंतकों को, न बुद्धिजीवियों को, न ही कथित भक्त-संप्रदाय को। उन्हें तो मतलब अपने-अपने कथित आंदोलनों और विचाराधरों के 'हिट' होने से है।

कभी-कभी मुझे वाकई हैरानी होती है, उन प्रगतिशीलों के विचारों को सुन-पढ़कर जिन्हें देश-समाज के भीतर हमेशा 'फासीवाद' के सिवाय कभी कुछ 'अच्छा' नजर ही नहीं आता। विडंबना देखिए, उन्हें जेएनयू में लगे देश विरोधी नारों में कुछ भी फासीवाद दिखलाई नहीं दिया। ऊपर से टीवी स्क्रीन पर यों 'अंधेरा' पसरा दिया गया मानो मुक्तिबोध की 'अंधेरे में...' कविता पढ़कर सुना रहे हों।

सच तो यह है- चाहे कोई माने या न माने- भरे पेट क्रांति और क्रांतिकारी बातें बहुत 'आसान' से कर ली जाती हैं। भरे पेट को दो जून की रोटी की चिंता नहीं रहती। भरे पेट नारे भी उतने ही उत्साह से लगते हैं, जितने उत्साह से राम मंदिर बनवाने के। दोनों ही तरफ की कथित विचारधारों में 'सहनशक्ति' की गुंजाइश जरा भी नहीं बची है।

अक्सर ऐसा महसूस होता है कि हम एक देश होते हुए भी छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गए हैं। हर किसी ने अपने हिस्से के आगे लक्ष्मण रेखा खींच रखी है। न कोई इधर से उधर जा सकता है। न उधर से इधर आ सकता है। वाद-विवाद के झगड़ों ने मानसिकताओं को पंगु बना दिया है। दुनिया विज्ञान और तकनीक के मामले में निरंतर आगे बढ़ती चली जा रही है। और एक हम हैं कि अभी तलक जाति-धर्म-विचारधाराओं की अंधी गलियों में भटक रहे हैं।

एक लोकतांत्रिक देश होते हुए भी हमने इसे इमरजेंसी के मुहाने पर ला खड़ा किया है। मत-भिन्नताएं कहां किस देश में नहीं होतीं। मगर इसका मतलब यह नहीं होता कि हम एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएं। देश, दुनिया और समाज सिर्फ बेहतर संवाद से ही चल सकता है।

न जाने ये कहां आ गए हैं हम, जहां आलोचना का विकल्प हिंसा बनती जा रही है।