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Friday, 22 April 2016

शहर भीतर शहर

कभी-कभी मुझे अपना ही शहर 'अनजाना'-सा लगता है। मेरा शहर अब पहले जैसा 'छोटा' नहीं रहा। बढ़ गया है। निरंतर बढ़ता ही चला जा रहा है। एक ही शहर के लोग पुराने शहर को छोड़कर नए शहर में बसने को उतावले हुए बैठे हैं। अपने ही लोगों से इतनी दूर जाकर बस जाना चाहते हैं, जहां पहुंच पाना हर किसी के बस की बात न हो।

नए शहर में पहुंचकर लोगों के बीच आपस में मिलने-जुलने, बातचीत करने की 'इच्छा' भी धीरे-धीरे कर 'समाप्त' हो रही है। अपनों के ही बीच वो इस कदर 'अनजान' से बने रहते हैं, कि उनको देखकर लगता है मानो बरसों बाद देख रहे हों।

लगातार विस्तार पाते शहर और लोगों के दरमियान खत्म होती मोहल्लेदारी 'चिंतनीय' तो है पर कर भी क्या सकते हैं? वक्त की कमी ने ऐसी मार लगाई है कि हम एक-दूसरे से मिलने की बारे में अब कम से कम सोचने लगे हैं। फोन पर या सोशल साइट्स पर बात करने को ही आपस में मिलना मान लेते हैं।

पहले मोहल्लों के 'साझा' सुख-दुख हुआ करते थे। गर्मियों की दोपहर और सर्दियों की धूप में 'मीटिंगें' जुड़ा करती थीं। सब को सबके बारे में सबकुछ मालूम रहता था। आज किसने क्या खाया, क्या बनाया, क्या खरीदकर लाया, किसकी किससे किस बात पर 'अनबन' हुई, किसने कौन-सी फिल्म देखी, किसका अफेयर किस मोहल्ले के लड़के या लड़की के साथ चल रहा है, बिना कुछ छुपाए एक-दूसरे को सब बता दिया करते थे। तब लोगों के दिलों में इतना 'काईयांपन' न था। जितने बाहर से 'पारदर्शी' थे, उतने ही अंदर से भी।

फिर धीरे-धीरे कर लोगों के दिलों-दिमाग में तरह-तरह के बदलाव आते गए। सोच संकुचित होती गई। मोहल्लों को छोड़ लोग नए शहरों में जाकर बसने लगे। मोहल्लेदारी खत्म हो गई। नई पीढ़ी को शायद मोहल्लों और मोहल्लेदारी की साझा विरासत के बारे में मालूम भी न हो। क्योंकि हमने उन्हें वो माहौल दिया ही नहीं। अब तो मोहल्लों की भी कॉलोनियां बन गई हैं, जहां अपने पड़ोसी को पड़ोस का आदमी नहीं जानता। किसी का नाम के साथ पता पूछ लो, तो साफ कह देता है, नहीं जी हम नहीं जानते। एक ही जगह रहकर एक-दूसरे से अनजान बने रहना न जाने शहरों-कॉलोनियों का कैसा विस्तार है ये? कितने सीमित हो गए हैं हम।

इस बात का ताना अक्सर मुझे भी मारा जाता है कि कहां मोहल्ले में पड़े हो। किसी पॉश इलाके में- पुराने शहर से दूर- नए शहर में अपार्टमेंट लेकर रहो। पुराने शहर, पुराने मोहल्लों, पुरानी गलियों में अब कुछ नहीं बचा है। गंदगी बहुत है यहां। जो कहता है, उसके कहे को चुपचाप सुन लेता हूं। अगले के दिल में अगर मोहल्ले, मोहल्लेदारी और गलियों के प्रति अपनापन नहीं पर मेरे दिल में तो है। पूरा बचपन इन्हीं गलियों-मोहल्लों के बीच रहकर-खेलकर बीता है मेरा। हालांकि यह सच है कि अब मोहल्ले केवल कहने भर को बचे हैं। उनमें भी नया शहरी कल्चर पनप गया है मगर फिर भी 'एहसास' तो अभी कायम है न। यही बहुत है मेरे लिए।

मानता हूं कि मैं पुराने शहर के मोहल्ले में रह रहा हूं। पर आजाद तो हूं न। मेरा मन अगर छत पर जाकर पतंग उड़ाने या सर्दियों में धूप सेंकने का करता है तो ये मैं यहां आराम से कर सकता हूं। लेकिन अपार्टमेंट में रहकर ये सब मैं नहीं कर सकता। जिस घर की सिर के ऊपर 'छत' ही न हो। ऐसे घर में रहने से क्या हासिल?

मैं किसी बदलाव का विरोधी नहीं। बदलाव नहीं होगा, तो नई चीजें हमारे बीच कैसे आएंगी। लेकिन शहर के भीतर बसते नए शहर हमें आपस में इतना 'दूर' ले जा रहे हैं, ये सब कभी-कभी 'दुख' देता है। एक ही जगह, एक ही शहर में रहकर हम एक-दूसरे से मिल भी न सकें। ऐसा विस्तार भला किस लायक?

एक शहर के बीच ही कितने नए-नए शहर। कितने नए-नए लोग। कितने नए टाइप का रहन-सहन। फिर भी आदमी की चाहतें, अभी और विस्तार पाने की हैं। फिर हम इस बात का रोना रोते हैं कि हवा विषैली हो रही है। पर्यावरण बद से बदतर होता जा रहा है। प्रकृति की हरियाली, उसके अपनत्त्व को तो हमने शहर पर शहर बना-बनाके लील लिया है। फिर ये रोना क्यों?

शहर के भीतर शहर बसाते चले जाने का सिलसिला शायद कभी खत्म नहीं होगा। क्योंकि हमें अब एक-दूसरे से 'अनजान' बने रहने में मजा आने लगा है।