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Sunday, 31 December 2017

फेसबुक के अपने कुछ अनुभव

फेसबुक पर रहने के अपने फायदे-नुकसान हैं। पर, फेसबुक पर न रहने के भी अपने फायदे-नुकसान हैं। तकरीबन दो साल फेसबुक से दूरी बनाकर यह मैंने करीब से महसूस किया है। बताता हूं...।

दो साल में मैंने फेसबुक पर अपने दो खाते बनाए और बाद में उन्हें थोड़े-थोड़े अंतराल में हमेशा के लिए हटा दिया। फिर एक छोटा-सा गैप लिया। उसके बाद एक और नया खाता बनाया। तीसरी दफा जब मैं फेसबुक पर लौटा। तो देखता हूं यहां का तो पूरा परिदृश्य ही बदल चुका है। फेसबुक में जो अंदरूनी बदलाव हुए सो हुए ही। साथ में सिक्योरिटी मेजर्स भी इतने तगड़े हो गए कि कुछ पूछिए मत।

फिर किया मैंने ये कि अपने पिछले दोनों खातों में जो भी दोस्त-साथी थे उन्हें दोबारा जोड़ना शुरू किया। एक-एक कर सबको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजीं। पुराने कुछ साथियों ने तो रिक्वेस्ट पुनः स्वीकार कर भी ली। उनका दिल से शुक्रिया। पर साथ में यह प्रश्न जरूर दागा गया- 'यार, हमें अमित्र (अन-फ्रेंड) क्यों कर दिया था?' ये प्रश्न स्वभाविक ही था। इसका सहज उत्तर भी मैंने उन्हें दिया। कुछ पुराने साथी तो इतने व्यस्त हो लिए कि उन्होंने मेरी रिक्वेस्ट स्वीकार करना तो दूर साथ में जो संदेश इन-बॉक्स क्या था, वो नहीं पढ़ा। उनकी अति-व्यस्तताएं उन्हें मुबारक।

उनमें से ज्यादातर ने तो यही सोचा होगा कि हमें अन-फ्रेंड करने के बाद महाराज फिर से रिक्वेस्ट भेज रहे हैं, लिस्ट में पुनः जुड़ने की। भला हम क्यों जोड़ें? पड़ी रहने दो ऐसे ही पेंडिंग। कोई नहीं। मैंने बुरा भी माना। हर व्यक्ति की अपनी मर्जी है, रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट करने या न करने की। कोई जोर थोड़े है।

फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने के दौरन एक अनुभव यह भी हाथ आया कि बहुत से लोगों ने अपने फेसबुक की सिक्योरिटी को इतना मजबूत किया हुआ है कि किसी के द्वारा उन्हें रिक्वेस्ट भेजने से पहले फेसबुक आपसे पूछता कि 'आप व्यक्तिगत रूप से उक्त सज्जन को जानते हैं या नहीं?' कन्फर्म करने के बाद भी रिक्वेस्ट नहीं जा पाती। तब आपके पास उस सज्जन को 'फॉलो' करने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होता।

जैसे बिना परमिशन के आईसीयू वार्ड में घुसने की मनाही होती है ठीक ऐसे ही हम लोगों ने अपने फेसबुक एकाउंट को बना लिया है। यहां हर किसी की अपनी अलग दुनिया है। अपने संगी-साथी और संबंधी हैं। अपनी-अपनी डिजिटल विचारधाराएं हैं। सारे संघर्ष और क्रांतियां भी यहीं हैं।

मगर यहां असहमति या आलोचना को बर्दाश्त करने की गुंजाइश कतई नहीं है। सामने वाले से अगर आपने अपनी असहमति को जाहिर किया भी, वो या तो आपको ब्लॉक कर देगा या फिर अन-फ्रेंड कर मुक्ति पा लेगा। ये मैं यों ही हवा में नहीं कह रहा। मैंने ऐसा करते तमाम ऊंचे बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, लेखकों को अक्सर ही देखा है।

फेसबुक पर रहकर हम अपने आप को 'असुरक्षित'-सा महसूस करते हैं। बहस में अलोकतांत्रिक से हो जाते हैं। हरदम कोशिश यही रहती है कि हमसे सामान विचारधारा वाले मित्र लोग ही जुड़ें। विपरीत विचारधारा वालों के प्रति मन में एक 'घृणा' जैसा माहौल रखते हैं।

सबसे बड़ी समस्या फेसबुक से जुड़े लोगों की यह है कि यहां हर कोई खुद को 'विद्वान' समझता है। उस विद्वान से आप न तर्क कर सकते हैं न बहस। विद्वान से पहले उसके चेले ही आपकी इज्जत की ऐसी-तैसी कर डालेंगे। मसला अगर धर्म या जाति से जुड़ा हो तो क्या कहने! इस प्रकार के मसलों का आज सबसे बड़ा अखाड़ा सोशल मीडिया बना हुआ है। हर कोई ऐसे मुद्दों पर लड़ने-भिड़ने को तैयार बैठा है। आप खुद बच सकते हैं तो बचें।

ऐसा भी नहीं है कि फेसबुक पर कुछ सार्थक नहीं हो रहा। गंभीर-पढ़ा या लिखा नहीं जा रहा। ये सब भी हो रहा है पर हमें दिखाई नहीं देता। दिमाग को हमने इस कदर राजनीति के जालों के बीच उलझाए रखा है कि सार्थक चीजें हमें दिख ही नहीं दे पातीं। वही चौबीस घंटे बेमतलब की राजनीतिक बहसें। और अपने-अपने वैचारिक उल्लू सीधा करने की हसरतें।

मुझे लगता है, यही कुछ खास राजनीतिक वजहें हैं जिस कारण हमने अपने फेसबुक को सिक्योरिटी का जाल बना डाला है। कि, किसी भी अनजान का यहां प्रवेश करना सख्त मना है।

महिलाओं का तो समझ में आता है पर पुरुष कब से खुद को असुरक्षित मासूस करने लगे। वे तो इन संसार के राजा हैं। राजा को भला किसका और क्यों डर?

पहले तो मुझे भी थोड़ा अफसोस रहा था कि क्यों मैंने फेसबुक से अपने दोनों खातों को हमेशा के लिए हटा दिया। मगर उसके बाद यहां के जो अनुभव हासिल हुए तो मुझे लगा कि मैंने ठीक ही किया। सोशल मीडिया के अनुभव भी बहुत जरूरी हैं। आखिर पता तो चले कि डिजिटल होता इंसान अपने व्यवहार और स्वभाव में कैसा होता जा रहा है।

हम अक्सर कहते हैं न कि देखो दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है। फेसबुक के अनुभव पाने के बाद यह बात अब मुझे सौ फीसद सच साबित होती हुई दिख रही है। अभी आगे और कितना बदलेगी यह आगे देख पाएंगे।

Friday, 22 December 2017

समाज, रिश्ते और हम

क्या समाज खुद से हार चुका है? क्या समाज के सुधरने की उम्मीद खत्म हो चुकी है? अक्सर ऐसे प्रश्न हमारे सामने मुंह खोले खड़े रहते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर या तो हमारे पास होते नहीं या फिर हम खुद को इनसे बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं। लेकिन कब तक? कभी न कभी तो हमें इनसे रू-ब-रू होना ही पड़ेगा। महज टाल भर देने से काम नहीं चलने वाला।

जिन बेतरतीब रास्तों पर आज का समाज चल पड़ा है उसमें अस्थिरताओं के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता। हर रोज अखबारों में आने वाली खबरों में किसी न किसी रिश्ते के टूटने का जिक्र रहता है। रिश्ते ऐसे ही नहीं बल्कि बहुत बुरी तरह से टूटकर बिखर रहे हैं। कभी रिश्ते हमारी पहचान हुआ करते थे आज एक बोझ समान लगते हैं। किसी को किसी की चिंता नहीं। हर कोई अपनी ही धुन में मस्त अपने से ही मतलब रखे हुआ है। रिश्ते तो रिश्ते रहे यहां तो पड़ोस में भी कोई नहीं जानता एक दूसरे को। जानकर करना भी क्या है, तुम अपनी जिंदगी में व्यस्त हम अपनी।

यही वजह है कि आपसी रिश्तों में मिठास अब नाममात्र की रह गई है। बड़ा अजीब-सा लगता है, अखबारों में अपनी ही बेटी-बहू के साथ बलात्कार की खबरों को पढ़कर। रुपए-पैसे-जमीन के लिए आपने ही भाई-बंधु का कत्ल कर देना। प्रेम-प्रसंगों पर होने वाली घटनाओं की तो जाने ही दीजिए। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता जो जब किसी प्रेमी-युगल के आत्महत्या या ऑनर-किलिंग की खबरें अखबारों में न आती हों।

समझा जा सकता है जिस समाज में प्रेम करना ही गुनाह बना दिया गया हो उसमें रिश्तों की डोर को बांधे या साधे रखना कितना कठिन है।
पिछले दिनों एक बाप द्वारा अपनी चार बेटियों को चलती ट्रेन से फेंक देने की घटना भी ऐसे ही दरकते रिश्तों की बानगी थी। कैसे कोई बाप इतना क्रूर हो सकता है कि अपनी ही बेटियों को फेंक दे! और कैसे कोई बच्चे अपनी मां के प्रति इतने लापरवाह हो सकते हैं कि जब उनकी लाश उनके फ्लैट से निकाली जाए तो पता ये लगे कि उन्हें मरे हुए तो महीनों बीत चुके हैं। इतना ही नहीं हाल की एक घटना तो मेरे शहर से जुड़ी है, जिसमें एक बेटी को आत्महत्या इसलिए करनी पड़ी क्योंकि उसका पिता उसे खाने को कुछ नहीं देता था।

ऐसी तमाम घटनाओं से यह समाज भरा पड़ा है। कभी-कभी तो जानकर ही रौनटे खड़े हो जाते हैं।

बड़ा सवाल तो यह है कि इन सबके लिए किसे दोषी ठहरायें, किसे जाने दें? हमारा सामाजिक ताना-बाना इतनी बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो चुका है कि किसी से कुछ कहते या पूछते हुए भी डर-सा लगता है कि कहीं अगला बुरा न मान जाए। सहनशीलता का निरंतर छीजते जाना भी बड़ी वजह है।

जबकि पढ़ा और सुना यही गया है कि पढ़ा-लिखा प्रगतिशील समाज अधिक जागरूक होता है आपसी रिश्तों की महत्ता को समझ व निभा पाने में। मगर हो उल्टा रहा है, जो जितना प्रगतिशील ऊपर से दिख-जान पड़ता है, वो उतना ही अंदर से खोखला होता है। अपवादों को जाने दीजिए पर सामाजिक हकीकत यही है।

आधुनिकता से हमने कुछ नहीं सीखा। सिर्फ उसका लबादा भर ओढ़ रखा है। आधुनिक समाज इतना दकियानूसी नहीं हो सकता जो अपने ही रिश्तों का बलात्कार करने को उतावला हो बैठे! वो इतना भी बंद-दिमाग नहीं होता कि व्हाट्सअप कर अपनी बीवी को तलाक दे दे। अपने मां-बाप से इतना दूर चला जाए कि जब लौट तो उनकी लाश घर के किसी कोने में दबी-पड़ी मिले।

ये कृत्रिम सामाजिक अधुनिकतायें शहरों को तो विकसित कर रही हैं पर हमें अपने ही रिश्तों से काट भी रही हैं। शायद इस एहसास को हम समझकर भी समझने की कोशिश नहीं करना चाहते।

कभी-कभी इस बात पर यकीन कर लेने का मन करता है कि समाज की मानसिकता को समझ पाना बेहद कठिन है। पलभर में समाज किस करवट अलट-पलट जाएगा कोई नहीं जानता। ये जितना आ-संवेदनशील है उतना ही संवेदनशील भी। जितना आ-व्यहवारिक है उतना ही व्यहवारिक भी। यों समाजशास्त्री समाज को लेकर चाहे जितनी भी परिभाषाएं क्यों न गढ़ लें पर इसकी चाल है निराली।

समाज और हमारे बीच लगातार टूटते रिश्ते शायद ही किसी की चिंता का सबब बनते हों। 'सब चलता है' कि धुन में सबकुछ को बिसरा देने को उतारू हैं सभी। सोचिए, जब रिश्ते ही नहीं ठहर पाएंगे हमारे बीच तो अपना कहने को यहां रह क्या जाएगा? इतना फॉर्मल होना भी ठीक नहीं कि खुद से बिछड़ने का गम भी न रहे।

ये दुनिया भाग तो बहुत तेजी से रही है पर अपने पीछे कितना कुछ छोड़ती भी जा रही है, इसका एहसास नहीं किसी को। वक़्त की कमी के बहाने ने हर रिश्ते को खुद से दूर कर दिया है। जो पास है भी उसकी कोई कद्र नहीं।

कुछ और का कहा नहीं जा सकता पर हां आगे आने वाली पीढ़ी को हम विरासत में टूटे रिश्तों के खिलौने सौंपकर जाएंगे उनका मन बहलाने को! तब तक सामाजिक रिश्ते जाने कैसी शक्ल अख्तियार कर चुके होंगे।

Thursday, 21 December 2017

बूस्टर पर टिकी अर्थव्यवस्था!

इसे समय के साथ समझौता कह लीजिए या कुछ और मगर अब हमें गलत दिशा में चलना भाने-सा लगा है। हम अपनी चाल के शहंशाह बने रहना चाहते हैं। विडंबना यह है कि हमें हमारी गलत चाल के लिए अगर कोई टोकता भी है तो उसे हम तुरंत अपना विरोधी घोषित कर डालते हैं। एक पल को ठण्डे दिमाग से सोचने की जहमत भी नहीं फरमाते कि अगले ने अगर हमें टोका है तो क्यों और किस बात के लिए। टोका-टाकी को बर्दाश्त करने के जमाने शायद लद चुके हैं।

लेकिन मसला जब देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा हो तो हमें हर कदम फूंक-फूंक कर ही रखना पड़ता है। यहां न ढिलाई चलती है न अपनी मन-मर्जी। चूंकि हमारे यहां हर मुद्दे के आगे-पीछे राजनीति का वर्चस्व बना रहता है तो ऐसे में आर्थिक मुद्दे भी नहीं छूट पाते। अर्थव्यवस्था अगर गलत दिशा में जा रही है इस बाबत पार्टी का कोई वरिष्ठ आगाह करता है तो वित्तमंत्री का फर्ज है उन्हें भी सुना और समझा जाए। किंतु ऐसा न हो पाता है न कोई करना ही पसंद करता है। वो ही है न कि अपने मसले के बीच किसी दूसरे की टांग अड़ाना कौन सहन करेगा?
पिछले दिनों पूर्व वित्तमंत्री ने अर्थव्यवस्था के गलत दिशा में जाने को लेकर जो चिंताएं जतलाई थीं तो शायद उचित ही जतलाई थीं ये अगल बात रही कि सरकार का कोई भी मंत्री उसे स्वीकार करने को तैयार न हुआ। लगातार अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा को ठीक ही बताया जाता रहा।

मगर अभी हाल वित्तमंत्री द्वारा अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार को गति देने के लिए दिए गए आर्थिक बूस्टर, जिसमें बैंकों को नौ लाख करोड़ रुपए की संजीवनी दी गई है, के मद्देनजर पूर्व वित्तमंत्री की आशंका ठीक ही साबित प्रतीत होती है। अर्थव्यवस्था में अगर सबकुछ हरा-भरा था तो फिर इतना बड़ा आर्थिक बूस्टर दिया ही क्यों गया? बैंकों को इतने बड़े आर्थिक पैकेज देने के मायने आखिर क्या हैं? और सबसे बड़ा सवाल- क्या यह सब पिछले दिनों किसानों को दी गई कर्ज माफी के बोझ से निपटने की कसरत तो नहीं?

इस आर्थिक बूस्टर के पीछे कुछ न कुछ तो राज है ही जिसे डायरेक्ट कहने या स्वीकार करने से बचा जा रहा है!

हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर उर्जित पटेल ने इस कदम को ऐतिहासिक करार दिया है पर वर्तमान वस्तुस्थिति से वो वाकिफ न होंगे, इसे मानने का मन नहीं करता।

आर्थिक हालात अगर वाकई काबू में रहे होते तो नोटबंदी और जीएसटी के बाद छोटे और मझोले उद्योगों की दुर्दशा न हो रही होती। न किसान आत्महत्या कर रहा होता न ही अपनी खेती से पलायन को मजबूर होता।

इसे सरकार या वित्तमंत्री माने या न माने नोटबंदी का प्रतिकूल असर अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम आदमी पर भी गहरा पड़ा है। जाने कितने ही छोटे उद्योग-धंधों पर ताला लग चुका है। और सबसे बड़ी समस्या, जोकि पिछली सरकारों के साथ भी रही थी, कि रोजगार सृजन की गति ठहरी हुई है। तमाम बड़े-बड़े दावों के साथ सरकार यह खुलासा क्यों नहीं करती कि बीते तीन सालों में देश में कितने रोजगार बढ़े? बेरोजगारों के लिए क्या व्यवस्था की गई है?

रोजगार का मुद्दा भी अर्थव्यवस्था से इतर नहीं है। एक-एक नौकरी- चाहे सरकारी हो या निजी- के लिए लाखों बेरोजगार युवाओं की फौज की फौज तैयार खड़ी रहती है। पता नहीं सरकारें बेरोजगारी के प्रति इतना निष्क्रिय क्यों बनी रहना चाहती हैं?

दूसरी तरफ, आर्थिक पैकेज फौरी तौर पर तो अर्थव्यवस्था को संभाल सकते हैं मगर सुधार नहीं सकते। देश की आर्थिक सेहत तो सुधारने के लिए आपको हवाई किले बनाने से बेहतर जमीन पर काम करना ही पड़ेगा।

अभी हाल सरकार द्वारा बैंकों को जो बूस्टर दिया गया उसका सीधा असर स्टॉक मार्केट में देखने को मिला। सेंसेक्स ने रिकॉर्ड ऊंचाई को छूते हुए 33 हजार का आंकड़ा पार किया। निफ्टी ने भी 10 हजार की सीमा लांघ ली।

सेंसेक्स में आई इस तेजी को देखकर बहुतों ने मान लिया होगा कि देश की अर्थव्यवस्था भी ऐसे ही छलांगे मार रही है। हर तरफ हरियाली आई हुई है। मगर ऐसा है नहीं। सेंसेक्स की बढ़त को आप अर्थव्यवस्था की खुशहाली से नहीं जोड़ सकते। अर्थव्यवस्था में खुशहाली किसानों की आर्थिक मजबूती और खेती की बेहतर सेहत से ही आ सकती है। सेंसेक्स गुलाबी अर्थव्यवस्था व्यवस्था का तो प्रतीक हो-बन सकता मगर समूची अर्थव्यवस्था का नहीं।

और फिर सेंसेक्स की यह तेजी स्थाई नहीं अस्थाई है। इसका तो पल में शोला, पल में माशा वाला हिसाब है। जरा-सी छींक आने पर तो यह ताश के पत्तों की मानिंद बिखर जाता है।

तो फिर हम यह कैसे मान लें वित्तमंत्री द्वारा दी गई कथित आर्थिक सहायता लंबे समय तक टिकी रह पाएगी? वर्तमान में बैंकों की अंदरूनी हालत से भला कौन परिचित नहीं!

अर्थव्यवस्था में लाए गए मजबूत सुधारों से ही देश के जनमानस को संबल मिल पाएगा। विकास का सपना भी तभी सार्थकता पाएगा। अगर वाकई अर्थव्यवस्था में अंदरखाने कुछ गड़बड़ है तो उसे अवश्य ही सुधारा जाना चाहिए। आर्थिक बूस्टर तो महज बहाना भर हैं बेचैन दिल को तसल्ली देने के लिए। न सेंसेक्स की चाल ही देश की अर्थव्यवस्था का भाग्य तय कर सकती है। किसान, खेत और रेजगार कि तरफ सरकार को देखना ही होगा। अर्थव्यवस्था के प्रमुख टूल तो ये ही हैं।

हवा में उड़ते संकल्प

हर रोज हम कितनी तरह के संकल्प लेते हैं, इस बारे में शायद ठीक से हमें भी नहीं पता होगा! किसी मुद्दे पर जब सब संकल्प ले रहे होते हैं तो फॉर्मिल्टी निभाने के लिए हम भी लाइन में लग जाते हैं। अखबारों में लगभग हर रोज छपने वाली तस्वीरों में भीड़ नजर आती है जो संकल्प की मुद्रा में हाथों को आगे किए एकसाथ बुदबुदाती है। उनमें से ज्यादातर चेहरों पर मुस्कान यों छाई रहती है मानो कोई 'मेगा शो' टाइप चल रहा हो।

लिए गए संकल्पों में से कितने या कितनों को हम पूरा कर पाते हैं बताने की जरूरत नहीं। आजकल साफ-सफाई के प्रति जिस तरह से संकल्पों की बाढ़-सी आई हुई है, यह देखकर अच्छा तो बहुत लग रहा है लेकिन संकल्प की अंतिम लाइन खत्म होते ही सबकुछ हवा-हवाई सा ही नजर आता है। अपने-अपने घरों में पहुंचते ही लोग सबकुछ भूल जाते हैं। कूड़े का वैसे ही दुरपयोग शुरू कर देते हैं जैसा अब तक करते चले आए हैं। मैं यह कतई नहीं कह रहा कि प्रत्येक ऐसा ही कर रहा है, मगर न करने वालों की संख्या फिर भी बहुत कम है।

प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छ्ता की अलख जब से जलाई गई है तब से साफ-सफाई के नाम पर हल्ला तो बहुत हो रहा है, मसलन; नेताओं का झाड़ूएं पकड़े नजर आना, अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बनना, टीवी पर आते बड़े-बड़े सेलिब्रिटियों के विज्ञापन, आयोजनों में सफाई-पर्यावरण पर जोर आदि, तिस पर भी जमीनी हकीकत भाषणों से काफी भिन्न है। हमारी सोच में स्वच्छता, साफ-सफाई अब भी दोयम स्थान पर ही है।
प्रदूषण के प्रति हमारा नजरिया अब भी गंभीर नहीं। अगर हम वाकई इन बेहद जरूरी मसलों के प्रति गंभीर या संवेदनशील होते तो हाल में आये- सर्वोच्च न्यायालय के दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री संबंधी रोक पर सोशल मीडिया पर, आदेश के खिलाफ इतना उबल नहीं रहे होते। चेतन भगत जैसे मशहूर लेखक को अपना सख्त एतराज जताने के लिए ट्वीट नहीं करना पड़ता।

जबकि गए साल दीवाली पर दिल्ली में प्रदूषण की दुश्वारियां दिल्लीवाले खूब झेल चुके हैं। एक तरफ पटाखों से फैली धुंध तो दूसरी तरफ धुंआ उगलते वाहनों का जोर कि सांस लेना भी मुश्किल। फिर भी, हम न्यायालय के आदेश के विरोध में कुछ भी कहे-लिखे जा रहे हैं। कुछ टिप्पणियों को पढ़-सुनकर तो ऐसा लग रहा है मानो न्यायालय ने त्यौहार मनाने पर ही रोक लगा दी हो! विशेषकर यह रोक पटाखों बिक्री पर है न कि छोड़ने पर। अगर हम पर्यावरण और स्वच्छता के प्रति अपनी जरा भी जिम्मेदारी समझते हैं तो ऐसा कदापि नहीं करेंगे।

हां, यह सही है कि इस व्यवसाय से छोटे-बड़े कारोबारियों की रोजी-रोटी जुड़ी है। दीवाली पर वे भी अपने कारोबार से चार पैसे कमाने की मंशा रखते हैं। किंतु वर्तमान में पर्यावरण और प्रदूषण की जो हालत है देश में- वो कहीं ज्यादा भयावह है।

यों भी हमनें त्योहारों के पारंपरिक और व्यहवारिक महत्त्व को तो लगभग त्याग ही दिया है। आज त्यौहार का मतलब या तो ऑनलाइन खरीददारी है या फिर बेमतलब का शोर-शराबा। हमने खुद ही गंदगी कर-करके अपने त्योहारों के स्वास्थ्य को बिगाड़ कर रख दिया है। यही वजह है कि न्यायालय को बीच में दखल देना पड़ा।

जब हम ही अपने पर्यावरण और संकल्प के प्रति सजग नहीं होंगे फिर ऐसा भी एक दिन आएगा जब हमारे पास केवल पछतावे के अतिरिक्त कुछ नहीं रह जाएगा। हालांकि पछतावा तो हमें अभी भी होना चाहिए निरंतर बढ़ते प्रदूषण और स्वच्छता के प्रति बेरुखी को लेकर लेकिन चेत हम अब भी नहीं रहे हैं। प्रकृति के संतुलन को बिगाड़े चले जा रहे हैं हम। फिर रोना यह रो रहे हैं कि अक्टूबर में भी इतनी गर्मी का एहसास क्यों हो रहा है?

चाहे घर-बाहर की स्वच्छता हो या प्रदूषण से निजात पाना हो, ये सब करना हम-आपको मिलकर ही है। तो क्या यह बेहतर न होगा कि हम न्यायालय के पटाखों की बिक्री संबंधी आदेश का पालन और स्वागत करें नाकि सोशल मीडिया पर पहुंचकर तरह-तरह के एतराज जताएं। देश, समाज और नागरिकों के स्वास्थ्य का ख्याल हमारे-आपके हाथों में हैं, जैसा चाहें बना या बिगाड़ लें।

Wednesday, 8 November 2017

मुद्दों से भटकतीं सोशल मीडिया पर बहसें

सोशल मीडिया के खेल निराले हैं। यहां कब कौन-सा मुद्दा गेंद की तरह हवा में उछलकर वायरल हो जाए कोई नहीं जानता। वायरल होते ही उस मुद्दे को सोशल मीडिया पर तब तक भुनाया जाता है जब तक उसकी आत्मा सड़-गल नहीं जाती। कमाल ये है कि सोशल मीडिया पर कोई मसला लंबा नहीं चलता। जिस तेज उफान के साथ मुद्दे को उठाया जाता है उतनी ही तेजी से नीचे भी आ जाता है। थोड़े समय बाद सब भूल जाते हैं कि क्या हुआ? कैसे हुआ? फिर किसी अन्य मुद्दे पर यहां बहस और विवाद शुरू हो जाता है।

सोशल मीडिया को शुरुआती दौर में आपसी संवाद का एक अच्छा प्लेटफॉर्म माना-समझा गया था (है यह आज भी अच्छा) लेकिन जैसे-जैसे यहां चलने वाले संवाद बेतुके विवादों, निर्थक बहसों और व्यक्तिगत छिछालेदरों की शक्ल अख्तियार करने लगे; बहुत लोगों ने या तो इससे दूरी बना ली या फिर जो नहीं झेल पाए उन्होंने या तो आत्महत्या का रास्ता चुना या अवसाद में चले गए। मिसाल के तौर पर, ब्लू वेल गेम से जुड़ीं दर्दनाक खबरें किसी से छुपी नहीं।

हां, यह सही है कि लोगों के बदलते लाइफस्टाइल के बरअक्स सामाजिक मुद्दों में भी काफी तब्दीली आई है। लोगों की सोच के दायरे बढ़े हैं। अक्सर ऐसे-ऐसे विषयों पर हमें चर्चा या बहस यहां होती हुई दिख जाती है, जिनके बारे में पहले खुलकर बात करना खराब माना जाता था। खासकर, महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर खुद महिलाएं ही मुस्तैदी से बोल रही हैं- यह सार्थक कदम है।

तकलीफ तब अधिक होती है जब किसी जरूरी या सार्थक विषय को बेतुके विवाद का सेंटर बनाकर यहां व्यक्तिगत छीछालेदर शुरू हो जाती है। किसी को कोई भी ट्रोल करना शुरू कर देता है। भीड़ में इतनी सारी ज़बानें हैं कि किस-किस को रोका और टोका जाए। सोशल मीडिया पर किसी से असहमति रखने का मतलब है उससे या उसके चाहने वालों से लगभग दुश्मनी मोल ले लेना।

सोशल मीडिया पर उठने वाले कई ऐसे मुद्दे भी संज्ञान में आए हैं, जिन्हें सिर्फ सनसनी बनाने के लिए ही छेड़ा गया था। उसका न मतलब समाज था न किसी सरोकार से। विडंबना देखिए, ऐसे मुद्दों पर लगातार बहस करने के लिए लोगों के पास समय भी खूब है।

नाक तक सिंदूर लगाने न लगने पर जिस तरह की बहस सोशल मीडिया पर चली, उसने हमारी कथित प्रगतिशील सोच की कलाई खोलकर रख दी है। दो धड़े- सहमति और असहमति रखने वाले- बन गए। दोनों के बीच विकट बहस चलती रही। कोई नाक तक सिंदूर को खोखली परंपरा का अभिशाप बता रहा तो कोई सम्मान करने की बात कहता रहा। बेहतर संवाद के लिए तर्क दोनों ही के पास नहीं थे। फिर भी बहस-विवाद जारी है।

देखा जाए तो सिंदूर लगाना न लगाना स्त्री का नितांत निजी मसला है मगर बेसिरपैर की बहसों में अपना समय खपाने वाले कहां ऐसा सोचते हैं।

'मी टू' और 'साड़ी स्वैग' पर भी अच्छी-खासी बहस छिड़ी है सोशल मीडिया पर। ये मुद्दे भी एक तरह से स्त्री से अपनी पारंपरिक छवि को तोड़ने का ही आह्वान करते हैं। अपनी यौन और शरीर की उन्मुक्तता को बोल्डली कन्वेंस करते हैं। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे बोल्ड मुद्दे, सोशल मीडिया से इतर- स्त्री की बंद छवि को ताड़ने में सफल हो पाते हैं? क्या ये बातें या मसले उन स्त्रियों तक पहुँचे पाते हैं जो सोशल मीडिया का ककहरा तक नहीं जानतीं-समझतीं? चंद लोगों के बीच ऐसे मुद्दों का सिमट कर रह जाना क्या बहस को निर्थक नहीं बनाता? ऐसे मुद्दों की प्रासंगिकता ही क्या जो थोड़े वक़्त के बाद खुद ही दफन हो जाएं।

सोशल मीडिया पर धैर्य मायने नहीं रखता। इधर मुद्दा उछला नहीं उधर किस्म-किस्म की प्रतिक्रियाएं शुरू। या तो मुद्दे पर सहमति रखो नहीं तो गालियां सुनो। खासकर, राजनीति, राष्ट्रवाद, महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर सोशल मीडिया पर गाली-गलौज अब आम-सी बात हो गई है। ट्रोलर्स की पूरी फौज तैयार रहती है अपने दुश्मनों से निपटने के लिए। विचारों का यहां कोई महत्त्व नहीं।

जैसे, स्मार्टफोन की लत हमारे दिमागों को कुंद किए जा रही है, यही हाल सोशल मीडिया का भी होता जा रहा है। मुद्दाविहीन मुद्दों पर हम आपस मे ऐसे लड़ने लग जाते हैं जैसे जानवर। हर कोई सोशल मीडिया के रास्ते क्रांति करने को बेकरार बैठा है, जमीनी संघर्ष सब भूल चुके हैं। बेतुके मुद्दों को छेड़ बस यही कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा लाइक और कमेंट पाए जा सकें। बाकी समाज और आम इंसान के हितों से जुड़े मूल मुद्दों से किसी को कोई मतलब नहीं।

सोशल मीडिया की मुद्दाविहीन बहसों की भेड़चाल इसे और हमें किस अंधे कुएं में धकेल रही है किसी को इसकी फिक्र नहीं। समय-असमय उठने वाले मी टू, सिंदूर, साड़ी स्वैग जैसे गैर-वाजिब मुद्दे सामाजिक जागरूकता के प्रतीक नहीं बल्कि उस बहस का हिस्सा भर हैं जिसमें सनसनी के अतिरिक्त कुछ भी विशेष नहीं रहता।

कभी-कभी तो सोशल मीडिया पर मौजूद कथित सच्चाईयां भी अफसाना ही नजर आती हैं। अफसानों पर यकीन कर उन्हें गाते रहना हमारी पुरानी आदत है, भला इतनी जल्दी कैसे छूट जानी है।

इंतजार करें। सोशल मीडिया का आगे आने वाला दौर जाने क्या-क्या और किन-किन सनसनीखेज बहसों और मुद्दों को लेकर आएगा। यानी, इंसान को अभी और 'आत्मकेंद्रित' होना है!

Tuesday, 19 September 2017

असहमति के स्वर का कुचला जाना

गौरी लंकेश...! ‘असहमति’ के एक और स्वर को ‘निर्ममता’ से कुचल दिया गया। सत्ता के खिलाफ जाने और लिखने का ‘हश्र’ गौरी लंकेश को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। यों तो हम एक बहुत बड़े लोकतांत्रिक मुल्क हैं- ऐसा कहते हम कभी थकते नहीं- मगर पत्रकार या लेखक की आवाजें जब सत्ताओं के कानों के परदे फाड़ने लगती हैं तब उन निडर आवाजों को हमेशा के लिए थामने की कुत्सित कोशिशें की जाती हैं। फिर लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों का सत्ताओं के वास्ते कोई महत्त्व नहीं रह जाता। उस वक्त यह ख्याल जरूर मन में आता है कि क्या लोकतंत्र का एकमात्र उद्देश्य जनता से उसके ‘वोट की कीमत’ अदा करवाना ही है?

कथित लोकतांत्रिक सत्ताओं को ऊंची आवाजें पसंद नहीं। ऊंची आवाजों से वे खासा बेचैन हो उठते हैं। उन्हें यह कतई पसंद नहीं कि कोई भी उनके विरूद्ध जाए। बात केवल ‘सत्ताओं की तानाशाही’ तक सीमित नहीं। समाज के कथित ठेकेदारों को भी कहां पसंद है कि कोई उनके द्वारा स्थापित अंधविश्वासों या सामाजिक कुरीतियों पर ‘तीखा प्रहार’ करे। वे चाहते हैं कि समाज और जनता उनके हिसाब से चले। वे बोलें तो सवेरा। वे बोलें तो रात। भला क्या यह संभव है? हम एक आजाद मुल्क हैं। स्थापित तानाशाहियों के गुलाम नहीं।

गौरी लंकेश का ‘गुनाह’ केवल इतना था कि उन्होंने सत्ता के खिलाफ खुला सच लिखने की जुर्रत की थी। सिस्टम में जहां कुछ ‘गलत’ नजर आता था वे ‘बेबाकी’ से उस पर अपनी ‘असहमति’ जाहिर कर देती थीं। हालांकि उन्हें यह बहुत अच्छे से मालूम था कि उनका लिखा न सत्ता को ‘रास’ आ रहा है न समाज के स्वयंभू ठेकेदारों को। तिस पर भी उन्होंने अपनी ‘कलम की धार’ को कम नहीं होने दिया। यह दीगर बात है कि गलत को गलत कहना या लिखना न कभी सत्ताओं को पसंद आया है न हमारे सामाजिक-पारिवारिक परिवेश को। गलत के विरूद्ध हर सच को किसी न किसी स्तर पर हमेशा दबाया जाता रहा है। गौरी के साथ भी यही हुआ।

गौरी लंकेश हत्या के बाद विरोध के स्वर जिस तरह से उठ रहे हैं उसके मायने भी अलग-अलग हैं। यह ठीक उस कहावत की तरह है कि ‘जितने मुंह उतनी बातें।‘ शर्मसार कर देने वाली तो वे दलीलें हैं, जो किसी न किसी बहाने एक महिला पत्रकार के खिलाफ उसके ‘चरित्र को टारगेट’ करके कही-लिखी जा रही हैं। बेशक आप गौरी लंकेश से या उनकी विचारधारा से घोर असहमत हो सकते हैं। असहमति पर कोई रोक-टोक नहीं। किंतु असहमति को जस्टिफाई करने की आड़ में यह हक किसी को नहीं मिल जाता कि आप उनके चरित्र पर ही सवालिया निशान उठाने लग जाएं। एक स्त्री पर वो सबकुछ कहने-लिखने लगें जिसे सभ्य समाज कभी स्वीकार नहीं कर सकता।

कभी-कभी वैचारिक असहमतियां हम पर इस कदर हावी हो जाती हैं कि हम यह भूल जाते हैं कि किसके लिए क्या कह रहे हैं? क्यों कह रहे हैं? बुरा न मानिएगा पर सच यही है कि असहमति का जितना ‘विभत्स नंगा नाच’ सोशल मीडिया पर चलता है उतना अन्यत्र नहीं। मानो- यहां हर असहमत व्यक्ति सामने वाले को खा जाने को तैयार बैठा है। मन में इतना ‘हेट’। इतना ‘दुष्प्रचार’ कि अक्सर खुद पर ही ‘ग्लानि’ होने लगती है कि हम सोशल मीडिया पर हैं ही क्यों?

सबसे अधिक दुखद पहलू यह है कि दो प्रमुख धड़े (वाम और दक्षिणपंथी) एक-दूसरे की विचारधाराओं को इस हद तक गरियाने पर तुले हैं कि पढ़कर ‘लज्जा’ आती है। हत्या की जांच में अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं किंतु सोशल मीडिया के वीरों ने तो एक-दूसरों को उक्त घटना के लिए ‘जिम्मेदार’ ठहरा ही दिया है। वैचारिक रस्साकशी आपस में इतनी बढ़ती जा रही है कि पढ़कर लगता है, सोशल मीडिया पर अगला युद्ध विचारधारा को लेकर ही न छिड़ जाए कहीं!

जबकि दूध के धुले न ये हैं न वे। लेकिन आपस में जिद एक-दूसरे के विरूद्ध घृणित विष-वमन करते रहने की है।

इन सब से इतर क्या हमारा और सरकार का प्रयास यह नहीं होना चाहिए कि गौरी लंकेश के हत्यारों की जल्द से जल्द खोज हो और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले। ताकि आगे किसी गौरी लंकेश, नरेंद्र दभोलकर, गोविंद पानसरे, एमएम कलबर्गी, सफदर हाशमी को निष्पक्षता, निर्भकता और वैचारिक असहमतियों के लिए अपनी जान से हाथ न धोना पड़े।

Wednesday, 13 September 2017

हिन्दी की चिंता!

इसे विडंबना नहीं दोगलापन ही कहा जाएगा कि हम हिंदी की चिंता के लिए 'हिंदी दिवस' को चुनते हैं। पूरे साल इस बात से हमें कोई मतलब नहीं रहता कि हिंदी में क्या खास हो रहा है? हिंदी का विस्तार कितना और कहां तक हुआ? किस दिशा में हिंदी जा रही है? कहां तक हिंदी को लेकर जाना है? आदि।

स्पष्ट कर दूं, मैं हिंदी की चिंता लेकर कोई 'उपदेश' वगैरहा  देने नहीं जा रहा हूं। मुझे अच्छे से मालूम है कि हमारी हिंदी को किसी तरह की चिंता नहीं। वो हर तरह से 'समृद्ध' है। निरंतर विस्तार पा रही है। अंग्रेजी से खुलकर टक्कर ले रही है। बाजार, सोशल मीडिया और साहित्य में हिंदी का परचम बिंदास लहलहा रहा है।

हिंदी की सेहत को लेकर चिंता, दरअसल, वही लोग व्यक्त करते रहते हैं, जिन्होंने न तो कभी भाषा के लिए कुछ किया होता है न कुछ ऐसा लिखा ही होता है, जिसे पढ़कर लगे कि हां, वे भाषा के बड़े हितेषी हैं। खास 'हिंदी दिवस' पर ही हिंदी पर चिंता जतलाने का क्या मतलब है भाई?

हिंदी कोई बेचारी भाषा नहीं कि आप जब जी में आया हिंदी पर रोने या चिंता जताने बैठ गए। हिंदी आज किन्हीं चिंताओं से बहुत आगे निकल चुकी है। न केवल अपने देश बल्कि विदेशों में भी हिंदी का लोहा माना जाता रहा है।

दुख तब बहुत होता है जब हिंदी भाषा को लेकर तमाम तरह के विवाद उठाए जाते हैं। हिंदी को अन्य भाषाओं से कमतर रखने की कुत्सित कोशिश की जाती है। यहां तक की भाषा के नाम पर साम्प्रदायिक संघर्ष तक होते देखा गया है।

पिछले दिनों गैर-हिंदीशाषित राज्यों में हिंदी को लेकर हुए बबाल शोचनीय और दुखद हैं। कोई और मुद्दा नहीं मिला तो कुछ लोग हिंदी भाषा के नाम पर ही राज्यों में टकराव पैदा करने लगे। जबकि भाषा की सिफत तोड़ना नहीं, आपस में जोड़ना है। भाषा, कोई भी, कभी खराब नहीं होती। वो तो हमारे राजनीतिक हित भाषा के नाम पर एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य पैदा करते रहते हैं। प्रायः ऐसी कोशिशें वही लोग किया करते हैं, जिन्हें किसी भी भाषा से प्यार नहीं होता। ऐसे ही झगड़े कितनी ही दफा हम महाराष्ट्र में मराठी-हिंदी भाषियों के बीच देख चुके हैं।

विडंबना देखिए, हिंदी पर- खास हिंदी दिवस पर- चिंता जाहिर करने वाले महानुभाव ऐसे भाषागत मुद्दों पर कभी कुछ नहीं बोलते। प्रायः मौन ही साधे रहते हैं। कभी बोलते भी हैं तो खालिस साम्प्रदायिक लहजे में।

ऐसे बेमतलब के विवादों से हिंदी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हिंदी लगातार बढ़ रही है। फैल रही है। चिंतित लोगों को थोड़ा सोशल मीडिया का रूख करना चाहिए। वहां जाकर देखना चाहिए कि हिंदी को कितनी तेजी और सम्मान के साथ सोशल मीडिया पर अपनाया जा रहा है। सीधा अंग्रेजी को चुनौती दे रही है।

समय के साथ खुद में बदलाव लाती हिंदी बाजार को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है। यह हिंदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। और आप हैं कि हिंदी की चिंता में घुल दुबले हुए जा रहे हैं। अपनी सोच को बदलिए हिंदी के प्रति।

Monday, 11 September 2017

वहशी होते समाज के बीच मासूम बच्चे

समाज को हम किस ओर लिए जा रहे हैं यह हमें भी नहीं मालूम। बस चले जा रहे हैं। एक होड़ या कहूं एक जिद-सी है हमारे भीतर एक-दूसरे को ‘मात’ दे आगे निकल जाने की। आगे निकल जाने की यह घुड़-दौड़ हमसे कितना कुछ छीनती जा रही है, शायद हमें इसका अहसास भी नहीं। अगर अहसास हो तो भी हम उसे ‘महसूस’ नहीं करना चाहते।

हमारा समाज निरंतर ‘हिंसक’ और ‘वहशी’ बनते जाने को ‘अभिशप्त’ है। किसी का किसी को कोई ‘लिहाज’ नहीं। मन और शरीर के भीतर दबी कुंठाएं इस कदर बढ़ गई हैं कि उन्हें किसी भी तरह बाहर निकालना है। ऐसे कुंठित लोग यह भी नहीं देखते कि वे दैहिक शोषण स्त्री का कर रहे हैं या मासूम बच्चों का। खासकर, स्त्रियों के साथ शारीरिक, समाजिक, पारिवारिक शोषण की घटनाएं इतनी तादाद में सामने आने लगी हैं, कभी-कभी ऐसी खबरों को पढ़ और जानकर डर-सा लगता है। लगभग यही हाल हमारे मासूम बच्चों का भी है। बच्चों के प्रति शारीरिक दुराचार के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उनके भविष्य की चिंता सताने लगी है। जिन बच्चों में अपने कल व देश के सुनहरे भविष्य की उम्मीदें हम पालते हैं, उन्हीं का शोषण कर पौधे को बड़ा होने से पहले ही काटने पर तुले हैं हम।

हाल में गुरुग्राम के एक बड़े स्कूल में एक मासूम के साथ घटी दैहिक शोषण की घटना क्या हमारे कान नहीं खोलती? हेल्पर ने मासूम बच्चे का गला रेत डाला। दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे की उम्र ही कितनी होती है। उस मासूम को तो कुछ मालूम भी न होगा कि उसके साथ कितना ‘वहशी बर्ताब’ किया गया। फूल को खिलने से पहले ही उसे बेरहमी से तोड़ डाला गया। उक्त खबर पढ़कर ही हम भीतर से कितना हिल गए होंगे। लेकिन पूछिए जरा उस मासूम के मां-बाप से उनके दिलों पर क्या गुजरी होगी? उन्हें जीवन में मिला यह एक ऐसा ‘घाव’ है, जिसे अच्छे से अच्छा ‘मल्लम’ भी नहीं भर सकता। बेटे के न रहने के दर्द ने उनके पूरे जीवन का सुख-चैन छीन लिया।

ये कैसे यौन कुंठाओं से पीड़ित दरिंदे हैं, जिन्हें यह तक होश नहीं रहता कि वे मासूमों के साथ क्या गलत कर रहे हैं। यौन कुंठाओं की चरस का नशा उनके दिमाग पर कुछ तरह तारी रहता है कि वे यह भूल जाते हैं उनका किया कुकर्म किसी मासूम को हमेशा के लिए अंधेरे कुंए में भटकने को मजबूर कर सकता है। उन्हें अपनी ही आत्महत्या के लिए उकसा सकता है। उनसे उनकी सांसे छीन सकता है।

शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरता हो जब हमारे समक्ष मासूम बच्चों के साथ यौन या मानसिक शोषण की खबरें न आती हों। अखबार या सोशल मीडिया पर आने वाली हर दूसरी खबर किसी न किसी बच्चे के देह-शोषण से जुड़ी होती है।

न केवल बाहर अपने घर-परिवार में भी बच्चे गाहे-बगाहे ऐसी घटनाओं से दो-चार होते रहते हैं। पता चलता है कि उनके ही परिवार के करीबी सदस्य उनका यौन तिरस्कार करते रहे। समाज में जाने कितनी ऐसी मासूम बच्चियां हैं जो अपने पिता, अपने भाई, अपने मामा-चाचा की गलत हरकतों का शिकार हो चुकी हैं। कुछ तो परिवार वालों के खौफ के चलते मुंह भी नहीं खोल पातीं।

पाप के इस खेल में कोई एक नहीं बल्कि जिम्मेदार हम सब हैं। वजहें बेशक अलग-अलग हो सकती हैं। धीरे-धीरे कर हम एक ऐसा समाज बनते जा रहे हैं जहां यौन कुंठाएं इस कदर हमारे दिलो-दिमाग पर हावी होती जा हैं कि हम इसके अतिरिक्त न कुछ देखना चाहते हैं न समझना। पता नहीं हमारे जिस्म की यह कैसी भूख है, जो बड़ी ही बेरहमी और बेशर्मी के साथ मासूमों को अपना निवाला बनाने से नहीं रोक पा रही।

पैसे, नौकरी और सोशल मीडिया की भेड़चाल में लिप्त मां-बापों के पास समय ही नहीं अपने बच्चों के साथ बीताने को। उसका खामियाजा किसी न किसी रूप में हमारे बच्चों को झेलना पड़ रहा है। दुख होता है, अपने मासूम बच्चों को यों किसी वहशी की यौनिकता का शिकार होता देख।

ऐसे यौन पिपासुओं के विरूद्ध इतने सख्त कानून बनाएं जाएं कि वे तो क्या कोई भी मासूम बच्चों या स्त्रियों के साथ गलत हरकत करने की सोच तक नहीं। पता नहीं वो दिन कब आएगा?

Wednesday, 9 August 2017

अंधविश्वासों की चोटियां

चोटियां काटी जा रही हैं। कौन काट रहा है? क्यों काट रहा है? किस उद्देश्य के लिए काट रहा है? इन प्रश्नों के जवाब किसी के पास नहीं। फिर भी, खबरें निरंतर चोटियां काटे जाने की आ रही हैं।

समाज में जितने मुंह, उतनी बातें हैं। चोटी काटने को कोई कोरी अफवाह करार दे रहा है। तो कोई टोने-टोटके का दुष्प्रभाव बता रहा है। मनोवैज्ञानिक कह रहे हैं कि यह ‘दिमागी फोबिया’ है। टोटल अंधविश्वास है। मानसिक संतुलन न खोएं।

जो भी हो, चोटियां तो निरंतर काटी ही जा रही हैं। चोटी कटना इतना ‘वायरल’ हो चुका है कि हर रोज अखबारों के पहले पन्ने पर प्रमुख खबर यही होती है। चूंकि खबर ‘मसालेदार’ है तो सोशल मीडिया पर भी लोग जमकर चोटी कटने के ‘चटकारे’ ले रहे हैं। कई ‘फोटोशॉप’ तो ऐसे भी देखे हैं, जिनमें महिलाओं की चोटियों में ‘नींबू-मिर्ची’ बंधी हुई है। यहां तक कि लोगों ने अपने घरों के दरवाजों पर नीम की डालियां और गोबर की थाप लगाई हुई है।

यों, हमारे देश में अफवाहों के पसरते और अंधविश्वासों के परवान चढ़ते जरा भी देर नहीं लगती। हर अफवाह और अंधविश्वास हमारे तईं किसी ‘वरदान’ से कम नहीं होता। देखिए न, जब भक्तगण एक साथ गणेशजी को टनों दूध पीला सकते हैं। जब नमक सौ रुपये किलो बिक सकता है। जब आलू-भिंडी में देवता नजर आ सकते हैं। जब राह चलते भूत दिख-मिल सकता है। फिर चोटियों का काटा जाना कोई बहुत बड़ी खबर नहीं! यहां कुछ भी हो सकता है। बस अफवाह या अंधविश्वास को जरा-सा हवा देने की जरूरत है।

चोटी कटने से जुडीं जो खबरें अखबारों में पढ़ने को मिल रही हैं, वो अधिकतर गांव-देहात से ही हैं। शहरों में या किसी शहरी महिला के साथ ऐसा हुआ हो ऐसी कोई खबर कम से कम मेरी निगाह से तो नहीं गुजरी। फिर भी थोड़ी-बहुत ‘दहशत’ शहरी महिलाओं के दिलो-दिमाग में भी धीरे-धीरे कर घर करने लगी है। स्वाभाविक है, इतनी तदाद में एक साथ खबरों का आना किसी को भी बेचैन कर सकता है।

सच यह भी है कि अफवाह और अंधविश्वास का सबसे ‘सॉफ्ट टरगेट’ भोले-भाले गांव-देहात के लोग ज्यादा होते हैं। उनका ध्यान भी ऐसी खबरों पर अधिक रहता है। किसी भी अंधविश्वास के सहारे उन्हें बरगलाया जा सकता है। यहां भी लगभग वही हो रहा है।

यह प्रायः देखा गया है कि देश या समाज तरक्की चाहे कितना ही कर ले मगर अंधविश्वासों पर यकीन करना नहीं छोड़ पाता। ऐसा नहीं है कि अंधविश्वास का शिकार केवल बे-पढ़े लिखे ही होते हैं। मैंने तमाम ऐसे पढ़े-लिखों को अंधविश्वास की चक्की में पिसते देखा है। अपना सबकुछ लुटाते देखा है। टोने-टोटकों, तांत्रिकों-मुल्लाओं के समक्ष घुटने टेकते देखा है। और तो और विज्ञान के अध्यापक को घोर अ-वैज्ञानिक बातें करते सुना है।

हां, यह सही है कि समाज में बदलाव बहुत तेजी से हो रहे हैं किंतु इंसानी दिमागों में बदलाव अभी भी उस तेजी से नहीं हो पा रहा। अफवाहें हमें आज भी डरा देती हैं। अंधविश्वास आज भी हमें अंधश्रद्धालू होने को मजबूर किए रहते हैं। प्रगतिशील समाज बनने से हम अभी भी बहुत दूर हैं।

हां, कहने को आप-हम चोटी काटने वाले को ‘महिला-विरोधी’ कहकर ‘गलिया’ सकते हैं। मगर महज गलियाने से तो न महिलाओं का चोटी कटना बंद होगा, न अंधविश्वास पर लगाम लग पाना।
पुलिस, प्रशासन, सरकार की मदद लेने से कहीं ज्यादा आवश्यक है हमें हमारे मनोवैज्ञानिक स्तर को चुस्त करना। दिमाग के दरवाजों को निरंतर खुला रखना। सच की तह में बिना जाए, अफवाहों-अंधविश्वासों पर आंखें मूंद कर विश्वास कर लेना।

अपने विश्वासों को अगर हम यों ही डिगाते रहे तो आज चोटियां काटी जा रही हैं हो, सकता है, कल को हमारे चेहरों पर कालिख पोती जाए।

Sunday, 23 July 2017

हमला
















उस रोज
एक और आतंकी हमला हुआ
फिर कुछ जानें
अपनी जानों से हाथ धो बैठीं

खबर पाते ही सोशल मीडिया
के भद्र (वीर) लोग अपने-अपने फेसबुक-टि्वटर के पेजों-पोस्टों पर
तरह-तरह की लानतें भेजने में जुट गए
किसी ने सरकार को गलियाया
किसी का खून आतंकवादियों की नापाक हरकत पर खौला
नेता लोग एक-एक कर 'कड़ी निंदा' में व्यस्त हो गए

पर...

जिन्होंने अपने प्रियजनों का हाथ और साथ
हमेशा के लिए खो दिया, उनका क्या कुसूर था?
हां, उनके प्रति संवेदनाएं तो बहुत लिखी-पढ़ी-बोली गईं
मगर मौत के रास्तों से लौट कर वापस
भला आया है कोई

सरकारी इमदादों या बौद्धिक चुगलबाजियों से
दर्द नहीं बांटे जाते
वो अंत तक बने रहते हैं निशब्द
हवा में केवल बातें और वायदे ही रह जाते हैं
यहां भी तो यही सब हो रहा है
जमीन पर भी और डिजिटल मंजर पर भी

सवालः तो क्या ये हमले ऐसे ही होते रहेंगे?
लोग मारे जाते और नेता-बुद्धिजीवि अपनी-अपनी राजनीतिक-बौद्धिक रोटियां सेकते रहेंगे?
क्या मनुष्य जीवन का अंत अब यही है?

लंबे अरसे से सुन रहे हैं कि
दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है
तोपों की तनातनी बनी हुई है
मगर उससे क्या...
जानें तो अब भी जा रही हैं
परिवार अब भी खत्म हो रहे हैं
न जाने सियासतदां कभी समझेंगे भी
इस पीड़ा को
या फिर कत्लो-गारत का यह सिलसिला यों ही चलता रहेगा हमेशा-हमेशा।

Sunday, 21 May 2017

व्यंग्य पर दंगल

आभासी दुनिया में व्यंग्य पर ‘दंगल’ जारी है। फेसबुक अखाड़ा है। व्यंग्य का हर तगड़ा और दियासलाई पहलवान अखाड़े में उतर आया है एक-दूसरे से ‘मुचैटा’ लेने को। दोनों तरफ के पहलवान अपने-अपने दांव चलते रहते हैं। मंशा केवल एक ही है, सामने वाले को चारों-खाने चित्त करना। तरह-तरह के दांव आजमा कर चित्त तो कोई भी नहीं होता मगर मनोरंजन का मजा भरपूर मिलता रहता है।

लुत्फ यह है कि फेसबुक के अखाड़े में मौजूद हर पहलवान व्यंग्य की वर्तमान स्थिति-परिस्थिति को लेकर चिंतित है। थोड़ा-बहुत नहीं बहुत-बहुत चिंतित है। कभी-कभी तो उनकी अति-चिंताओं को देख-पढ़कर मुझे डर-सा लगने लगता है कि कहीं चिंता की व्याधि इनका कुछ अ-नर्थ न कर दे। पुरानी कहावत मेरे दिमाग को घुमाए रहती है कि चिंता चिता समान।

इतने बड़े-बड़े पहलवान टाइप व्यंग्यकारों की चिंताओं के बावजूद व्यंग्य है कि सुधरने-संवरने का नाम ही नहीं ले रहा। व्यंग्य को ‘एटिट्यूट’ की प्रॉब्लम लग गई है (शायद)। शास्त्रों में भी लिखा है कि एटिट्यूट की बीमारी का इलाज तो स्वयं हकीम लुकमान के पास भी न था। किंतु व्यंग्य को यह बात समझ आए तब न।

फेसबुक के अखाड़े में जमे ज्यादातर पहलवान व्यंग्यकारों का यह मानना है कि व्यंग्य उस तरह से लिखा ही नहीं जा रहा, जैसा कभी श्री परसाई या श्री जोशी लिखा करते थे। आजकल के व्यंग्य में से संवेदना, भावना, ममता, प्रेरणा, गहराई, सरोकार, विचार, आदर्श, दर्शन आदि-इत्यादि सब गायब हो चुके हैं। बड़े ही सिंपल, लद्दड़, चालूपंती टाइप व्यंग्य लिखे जा रहे हैं। व्यंग्य में आई यह गिरावट वरिष्ठ टाइप व्यंग्यकारों को अंदर-अंदर की खाए जा रही है। इसीलिए उनके मन की चिंताएं फेसबुक पर प्रायः स्टेटस के रूप में टंगी रहती हैं।

ऐसा भी नहीं है कि मैंने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की। की। बहुत दफा की। संपूर्ण ऐड़ी-चोटी का जोर लगाकर की। मगर अपनी चिंताओं के आगे वे कुछ समझना-बुझना ही नहीं चाहते। बस लगे रहते हैं, एक-दूसरे (खासकर युवा टाइप व्यंग्यकारों) को व्यंग्य-लेखन का ज्ञान बांटने में। नई पीढ़ी के साथ मुसीबत यह है कि वे वरिष्ठों का ज्ञान लेना ही नहीं चाहते। कभी कोई वरिष्ठ प्रयास करता भी है उन्हें व्यंग्य-लेखन का बारीकियों को समझाने का तो उन्हें ऐसा-इतना लताड़ देते हैं कि बेचारे अपना-सा मुंह लिए सीधे ‘कोप भवन’ में जा बैठते हैं। चूंकि अधिक गर्मी होने के कारण कोप भवन में भी नहीं टिक पाते तो वापस फेसबुक के अखाड़े में कूद पड़ते हैं अपनी पीड़ा और खीझ उतारने को।

ये नई पीढ़ी भी न वरिष्ठ व्यंग्यकारों की कतई ‘इज्जत’ नहीं करती। टंगड़ी मार उन्हें धोबी पछाड़ दे ही देती है। चूंकि मैं वरिष्ठों की बे-इज्जती को अपनी आंखों से नहीं देख पाता तो स्वयं ही आंखें बंद कर लेता हूं।

वैसे, बदलते जमाने के साथ-साथ व्यंग्य का जमाना भी काफी कुछ बदल गया है। अब स्थितियां पहले जैसी न रहीं। अब सबकुछ इंस्टेंट टाइप है। इधर लिखा। उधर छपा। पैसा खाते में आया। जै राम जी की।

व्यंग्य का पारंपरिक फॉरमेट बिल्कुल बदल गया है। व्यंग्य कैटरीना कैफ की स्कर्ट जितना ही माइक्रो हो लिया है। कम शब्दों में गहरी बात। आज का व्यंग्य ‘वनलाइनर बेसड’ है। उसी में ‘पंच’ है। उसी में आनंद है। उसी में ग्लैमर है। उसी में मस्तियां हैं। लेकिन फेसबुक पर जमे कुछ वरिष्ठ टाइप व्यंग्यकारों को व्यंग्य का इस तरह ‘स्लिम’ होते जाना जम नहीं रहा। उन्हें तो वही 70-80 के दशक वाला भारी-भरकम व्यंग्य पसंद है।

वक्त के साथ न चला पाने में यही परेशानियां दर-पेश आती हैं। तब के समय से लेकर अब के समय तक लेखन और लेखक के रहन-सहन में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। अब वही हिट है जिसके व्यंग्य में स्लिमता है। चेतन भगत की भाषा जैसी सहजता है। अपने लेखन के दम पर जिसे मार्केट पर कब्जा कर आता है। फिर उसे हिट होने से कोई नहीं रोक सकता। मगर व्यंग्य के अखाड़े के वरिष्ठ पहलवान ये समझें तब न।

खामखां ही फेसबुक पर व्यंग्य का दंगल छिड़ाए बैठे रहते हैं। जबकि अच्छी तरह से यह मालूम उन्हें भी है कि कोई भी उनके अनुसार न चलने वाला है न उनकी मानने वाला। मगर फिर भी...। अब जिन्हें शौक ही अखाड़े में दंगल लड़ने का हो फिर कोई क्या कर सकता है। बैठे-ठाले मनोरंजन को एंजॉव्य करते रहने में क्या हर्ज है।

बाकी व्यंग्य अपने हिसाब से मस्त जा रहा है।

Wednesday, 29 March 2017

खुशहाली पर ग्रहण

इस पर यकीन करने के लिए कि ‘भारत कम खुशहाल देश है’ दिमाग पर अतिरिक्त लोड डालने की जरूरत नहीं। हालिया सर्वे ने इस बात की साफ पुष्टि कर दी है। जिक्र तो हालांकि हर किताब और ग्रंथ में यही मिलता है कि भारत या भारत के लोगों से खुशहाल इस दुनिया में कोई मुल्क नहीं है। किंतु 21वीं सदी तक आते-आते सीन काफी कुछ बदल चुका है।

भारत के कम खुशहाल होने के कारण तमाम हैं। कुछ कारण (इन्हें आप श्योर-शोर्ट न मानें) मेरे जहन में बार-बार आते हैं, जिनकी वजह से भी देश के नागरिकों की खुशहाली पर ग्रहण लगता जा रहा है।

कहने वाले तो झट्ट से सोशल मीडिया को खुशहाली का खलनायक बता डालते हैं। जबकि सोशल मीडिया ने तो हमें आपस में परस्पर जोड़ने का काम किया है। हमारी दोस्तियों एवं लेखन को विस्तार दिया है। न्यू डिजिटल इंडिया की ओर धकेला है। फिर भी, कुछ लोग अगर सोशल मीडिया को अपने अवसाद या तू-तू मैं-मैं का प्लेटफॉर्म बना लेते हैं फिर तो इसमें हकीम लुकमान भी कुछ नहीं कर सकते। सब दिमाग-दिमाग की बातें हैं।

हमारी खुशहाली को बे-सिर-पैर की चिंताएं लील रही हैं। मसलन- हम मोबाइल की स्क्रीन पर स्क्रेच पड़ने से चिंतित हो जाते हैं। बाथरूम में कॉकरोच मिलने पर चिंतित हो उठते हैं। फेसबुक पर कम लाइक मिलने से हमारी चिंताएं जाग्रत हो जाती हैं। ट्वीट को अगर रि-ट्वीट न मिले तो हम डिप्रेशन में आ लेते हैं। सिर में पांच-सात जुएं मिल जाना हमारी चिंता का सबब बन जाता है।
पड़ोसी का घर के पिछवाड़े कूड़ा डालना हमें क्रोधित कर देता है। गर्लफ्रेंड के साथ दोस्त के अफेयर को लेकर व्यथित हो उठते हैं। पड़ोस की भाभी का सुबह-शाम छत पर कपड़े सुखाने न आना हमें परेशान कर जाता है। चर्जर के न मिलने पर तो हम इतने अधिक चिंतित हो उठते हैं मानो हाईस्कूल का रिपोर्ट-कार्ड नाली में बह गया हो।

इस प्रकार की और भी कई किस्म की चिंताएं-परेशानियां हैं जो निरंतर हमारी खुशहाली का बैंड बजा रही हैं। वैसे, देखा जाए तो ये चिंताएं हैं कुछ भी नहीं। लाइफ में थोड़ा-बहुत ऊंच-नीच तो चलता रहता है। लेकिन क्या करें खुशहाली से कहीं ज्यादा हमारा ध्यान अपनी चिंताओं को इस-उस से जग-जाहिर करने पर जो रहता है।

सबसे खास वजह एक यह भी है कि हमने, दूसरों पर जाने दीजिए, खुद पर ही हंसना छोड़ दिया है। अगर कोई हम पर हंसता है तो हम अगले की हंसी का इतना बुरा मान जाते हैं मानो उसने हमारा मकान अपने नाम लिखवाने का फरमान जारी कर दिया हो। हंसी-मुस्कुराहट काम के बोझ तले दब कर दम तोड़ रही है। किस्म-किस्म की बीमारियां और बेबसियां खुशहाली को निपटा रही हैं। ऐसे में क्या खाक खुश रहेंगे हम?

बड़ों के साथ-साथ हमने बच्चों के बचपन की खुशहाली को भी कहीं का नहीं छोड़ा है। बच्चे के दो-ढाई साल का होते ही उसे स्कूल और किताबों के बंधन में ऐसा बांध देते हैं कि वो चाहकर भी खुश नहीं रह पाता। करियर की अंधी दौड़ उन्मुक्त जीवन की सबसे बड़ी बाधा है।

इसीलिए कह रहा हूं, सर्वे पर टसूए न बहाइए। खुशहाली हमसे दूर जा चुकी है। लेकिन अभी हम इतनी दूर भी नहीं गई है कि उसे वापस लाया नहीं जा सकता। अगर ला सकते हैं तो गई खुशहाली को पुनः अपने चेहरों पर लौटा लाइए वरना फिर मत कहिएगा कि खुशी की रौशन इतना मदम-सी क्यों पड़ती जा रही है हमारे आसपास।

क्यों न जीवन को ‘उत्सव’ की तरह जिया जाए। जैसा- ओशो अक्सर अपने प्रवचनों में कहते रहे हैं। जीवन जब उत्सव बन जाएगा फिर खुशी और खुशहाली हमारे पास से कभी जाने नहीं पाएगी।

Monday, 23 January 2017

सोशल मीडिया पर विरोध के बहाने

विरोध अब ‘जमीन’ पर कम, ‘सोशल मीडिया’ पर अधिक नजर आता है। एक तरह से- विरोध के नाम पर- यहां आपस में ‘ज़बानी दंगल’ छिड़ा ही रहता है। विरोध के बीच विचारधाराएं कोई जगह नहीं रखतीं। या यों कहिए कि सोशल मीडिया किसी प्रकार की विचारधारा को नहीं मानता। यहां विरोध के तरीके इतने अजीबो-गरीब हैं, कभी-कभी समझ ही नहीं आता कि विरोध क्यों और किसलिए किया जा रहा है। चूंकि सब विरोध कर रहे होते हैं तो दूसरे भी बहती गंगा में हाथ धोने निकल पड़ते हैं, बिना समझने-जाने।

अपवादों को छोड़ दें तो सोशल मीडिया पर छिड़े रहने वाले विरोध के संग्राम पर भाषाई शालीनता अभी भी दूर की कौड़ी है। यहां असहमति या विरोध जतलाने पर विरोधी लोग व्यक्तिगत धज्जियां उड़ाने से जरा भी नहीं चूकते। विरोध को सुनने या समझने का शऊर न विरोधियों के पास है न ट्रोलर्स के। खासकर, राजनीतिक मुद्दों या बहसों के बीच भाषाई बिगाड़ सबसे अधिक देखा व सुना जाता है।

सोशल मीडिया पर दो ही चीजें का दबदबा रहता हैं या तो आप किसी राजनीतिक दल के समर्थक (बल्कि अंध-समर्थक कहना ज्यादा ठीक होगा) हो या फिर विरोधी। आपसी संवाद में यहां बीच का रास्ता कोई नहीं होता। इधर कुछ सालों में जिस तेजी के साथ सोशल मीडिया पर राजनीति का वर्चस्व बढ़ा है, उसे देखकर लगता ही नहीं कि यहां इसके अतिरिक्त कुछ और भी संभव है। यहां हर दूसरी दीवार राजनीति या राजनीतिक दलों या नेताओं के कथित प्रवचनों से सनी नजर आती है। मतलब, जनता के हक की लड़ाई को जिन्हें जमीन पर लड़ना चाहिए था, वे अपने-अपने विरोधियों से सोशल मीडिया पर लड़ रहे हैं। एक-दूसरे से ज़बानी दंगल हो रहा है। समर्थक को भक्त और विरोधी को अ-भक्त होने के खिताब बांटे जा रहे हैं। अजीब माहौल बना दिया गया है सोशल मीडिया पर।

अच्छा, कुछ लोगों का काम यहां सिर्फ विरोध करना ही होता है। उनके स्टेटस को पढ़कर कभी-कभी तो लगता है कि वे दुनिया में आए ही इसीलिए हैं ताकि हर बात का विरोध कर सकें। यानी, उन्हें खराब का तो विरोध करना ही है साथ-साथ अच्छे का भी। विरोध के बीच वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भी ले ही आते हैं। सिक्के का एक ही पहलू देखते हैं, दूसरे को यों नजर-अंदाज कर जाते हैं मानो वो बेकार की चीज हो। बहुत हद तक इस तरह के कथित विरोधी लोग भी सोशल मीडिया पर बहस और संवाद के रिश्ते को तोड़ने के लिए जिम्मेवार हैं।

अभी हाल बैंगलौर में लड़कियों के साथ हुई छेड़खानी की वरदातों पर भी सोशल मीडिया पर किस्म-किस्म का विरोध खूब देखने-पढ़ने को मिला। गजब यह है कि यहां हर आदमी घटना पर अपना गुस्सा या विरोध खुलकर जतला रहा है किंतु समस्या का तार्किक समाधान किसी ने सामने नहीं रखा। ज्यादातर फेमिनिस्टों का एक ही राग-रंग था कि पुरूषों के खिलाफ जमकर विष-वमन करो या फिर उन्हें सरेआम नापुंसक बना डालो।

तो क्या ऐसा करने से महिलाओं के खिलाफ होने वाली घटनाएं कम या खत्म हो जाएंगी? ऐसा कर आप समाज को हिंसक ही बनाएंगे। फेमिनिस्टों का तीखा विरोध अपनी जगह जायज है मगर आप एक ही लाठी से पूरे पुरूष समाज को नहीं हांक सकतीं। हो दरअसल यही रहा है कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों को भी सोशल मीडिया पर हवा देकर कुछ दिनों तक विरोध-विरोध का खेल चलता है। फिर सब दूसरी घटना के होने तक शांत होकर बैठ जाते हैं। ये मुद्दे जमीन पर न के बराबर ही आ पाते हैं। अगर आ भी जाते हैं तो रस्म-अदायगी के बाद उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। पिछले दिनों निर्भया के मामले में भी हम विरोध के उबाल को चढ़ते-उतरते देख चके हैं। लेकिन हुआ क्या? तब से अब तक महिलाओं के प्रति हिंसा के परिपेक्ष्य में हालात बिगड़े ही हैं, सुधरे नहीं।

ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया पर विरोध के बहाने मुद्दों को सुलझाया नहीं जा सकता। सुलझ सब सकता है मगर मुद्दे कुछ दिनों हवा में उछलने के बाद निस्तेज पड़ जाते हैं। अब देखिए न, बीएसएफ और सीआपीएफ के जिन जवानों के वीडियो- खराब खाने और सुविधाओं को लेकर- सामने आए हैं, हां उनका विरोध तो खूब हो रहा है लेकिन उतनी ही शिद्दत के साथ इसे दबाने की कोशिशें भी जारी हैं। न तो सरकार का नजरिया स्पष्ट दिख रहा है न सेना के आला अधिकारियों का। बस सोशल मीडिया पर हर कोई अपना विरोधी तीर लेकर खड़ा है वार करने को। क्या इतने मात्र से चीजें सुधर जाएंगी?

अन्यथा न लें लेकिन सच यही है कि सोशल मीडिया पर होते रहने वाला विरोध महज भाषाई या शाब्दिक दंगल से आगे नहीं बढ़ पाता। उन लोगों के लिए यह रामबाण सिद्ध होता है, जो सोशल मीडिया पर आए ही विरोध के बहाने अपनी राजनीति को चमकाने हैं। फिर ऐसे ‘तुरंता विरोध’ का कोई अर्थ-मतलब नहीं है, जहां ‘मुद्दे’ नहीं सिर्फ ‘हवाबाजी’ ही प्राथमिकता में हो।