Translate

Tuesday, 19 September 2017

असहमति के स्वर का कुचला जाना

गौरी लंकेश...! ‘असहमति’ के एक और स्वर को ‘निर्ममता’ से कुचल दिया गया। सत्ता के खिलाफ जाने और लिखने का ‘हश्र’ गौरी लंकेश को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। यों तो हम एक बहुत बड़े लोकतांत्रिक मुल्क हैं- ऐसा कहते हम कभी थकते नहीं- मगर पत्रकार या लेखक की आवाजें जब सत्ताओं के कानों के परदे फाड़ने लगती हैं तब उन निडर आवाजों को हमेशा के लिए थामने की कुत्सित कोशिशें की जाती हैं। फिर लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों का सत्ताओं के वास्ते कोई महत्त्व नहीं रह जाता। उस वक्त यह ख्याल जरूर मन में आता है कि क्या लोकतंत्र का एकमात्र उद्देश्य जनता से उसके ‘वोट की कीमत’ अदा करवाना ही है?

कथित लोकतांत्रिक सत्ताओं को ऊंची आवाजें पसंद नहीं। ऊंची आवाजों से वे खासा बेचैन हो उठते हैं। उन्हें यह कतई पसंद नहीं कि कोई भी उनके विरूद्ध जाए। बात केवल ‘सत्ताओं की तानाशाही’ तक सीमित नहीं। समाज के कथित ठेकेदारों को भी कहां पसंद है कि कोई उनके द्वारा स्थापित अंधविश्वासों या सामाजिक कुरीतियों पर ‘तीखा प्रहार’ करे। वे चाहते हैं कि समाज और जनता उनके हिसाब से चले। वे बोलें तो सवेरा। वे बोलें तो रात। भला क्या यह संभव है? हम एक आजाद मुल्क हैं। स्थापित तानाशाहियों के गुलाम नहीं।

गौरी लंकेश का ‘गुनाह’ केवल इतना था कि उन्होंने सत्ता के खिलाफ खुला सच लिखने की जुर्रत की थी। सिस्टम में जहां कुछ ‘गलत’ नजर आता था वे ‘बेबाकी’ से उस पर अपनी ‘असहमति’ जाहिर कर देती थीं। हालांकि उन्हें यह बहुत अच्छे से मालूम था कि उनका लिखा न सत्ता को ‘रास’ आ रहा है न समाज के स्वयंभू ठेकेदारों को। तिस पर भी उन्होंने अपनी ‘कलम की धार’ को कम नहीं होने दिया। यह दीगर बात है कि गलत को गलत कहना या लिखना न कभी सत्ताओं को पसंद आया है न हमारे सामाजिक-पारिवारिक परिवेश को। गलत के विरूद्ध हर सच को किसी न किसी स्तर पर हमेशा दबाया जाता रहा है। गौरी के साथ भी यही हुआ।

गौरी लंकेश हत्या के बाद विरोध के स्वर जिस तरह से उठ रहे हैं उसके मायने भी अलग-अलग हैं। यह ठीक उस कहावत की तरह है कि ‘जितने मुंह उतनी बातें।‘ शर्मसार कर देने वाली तो वे दलीलें हैं, जो किसी न किसी बहाने एक महिला पत्रकार के खिलाफ उसके ‘चरित्र को टारगेट’ करके कही-लिखी जा रही हैं। बेशक आप गौरी लंकेश से या उनकी विचारधारा से घोर असहमत हो सकते हैं। असहमति पर कोई रोक-टोक नहीं। किंतु असहमति को जस्टिफाई करने की आड़ में यह हक किसी को नहीं मिल जाता कि आप उनके चरित्र पर ही सवालिया निशान उठाने लग जाएं। एक स्त्री पर वो सबकुछ कहने-लिखने लगें जिसे सभ्य समाज कभी स्वीकार नहीं कर सकता।

कभी-कभी वैचारिक असहमतियां हम पर इस कदर हावी हो जाती हैं कि हम यह भूल जाते हैं कि किसके लिए क्या कह रहे हैं? क्यों कह रहे हैं? बुरा न मानिएगा पर सच यही है कि असहमति का जितना ‘विभत्स नंगा नाच’ सोशल मीडिया पर चलता है उतना अन्यत्र नहीं। मानो- यहां हर असहमत व्यक्ति सामने वाले को खा जाने को तैयार बैठा है। मन में इतना ‘हेट’। इतना ‘दुष्प्रचार’ कि अक्सर खुद पर ही ‘ग्लानि’ होने लगती है कि हम सोशल मीडिया पर हैं ही क्यों?

सबसे अधिक दुखद पहलू यह है कि दो प्रमुख धड़े (वाम और दक्षिणपंथी) एक-दूसरे की विचारधाराओं को इस हद तक गरियाने पर तुले हैं कि पढ़कर ‘लज्जा’ आती है। हत्या की जांच में अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं किंतु सोशल मीडिया के वीरों ने तो एक-दूसरों को उक्त घटना के लिए ‘जिम्मेदार’ ठहरा ही दिया है। वैचारिक रस्साकशी आपस में इतनी बढ़ती जा रही है कि पढ़कर लगता है, सोशल मीडिया पर अगला युद्ध विचारधारा को लेकर ही न छिड़ जाए कहीं!

जबकि दूध के धुले न ये हैं न वे। लेकिन आपस में जिद एक-दूसरे के विरूद्ध घृणित विष-वमन करते रहने की है।

इन सब से इतर क्या हमारा और सरकार का प्रयास यह नहीं होना चाहिए कि गौरी लंकेश के हत्यारों की जल्द से जल्द खोज हो और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले। ताकि आगे किसी गौरी लंकेश, नरेंद्र दभोलकर, गोविंद पानसरे, एमएम कलबर्गी, सफदर हाशमी को निष्पक्षता, निर्भकता और वैचारिक असहमतियों के लिए अपनी जान से हाथ न धोना पड़े।

Wednesday, 13 September 2017

हिन्दी की चिंता!

इसे विडंबना नहीं दोगलापन ही कहा जाएगा कि हम हिंदी की चिंता के लिए 'हिंदी दिवस' को चुनते हैं। पूरे साल इस बात से हमें कोई मतलब नहीं रहता कि हिंदी में क्या खास हो रहा है? हिंदी का विस्तार कितना और कहां तक हुआ? किस दिशा में हिंदी जा रही है? कहां तक हिंदी को लेकर जाना है? आदि।

स्पष्ट कर दूं, मैं हिंदी की चिंता लेकर कोई 'उपदेश' वगैरहा  देने नहीं जा रहा हूं। मुझे अच्छे से मालूम है कि हमारी हिंदी को किसी तरह की चिंता नहीं। वो हर तरह से 'समृद्ध' है। निरंतर विस्तार पा रही है। अंग्रेजी से खुलकर टक्कर ले रही है। बाजार, सोशल मीडिया और साहित्य में हिंदी का परचम बिंदास लहलहा रहा है।

हिंदी की सेहत को लेकर चिंता, दरअसल, वही लोग व्यक्त करते रहते हैं, जिन्होंने न तो कभी भाषा के लिए कुछ किया होता है न कुछ ऐसा लिखा ही होता है, जिसे पढ़कर लगे कि हां, वे भाषा के बड़े हितेषी हैं। खास 'हिंदी दिवस' पर ही हिंदी पर चिंता जतलाने का क्या मतलब है भाई?

हिंदी कोई बेचारी भाषा नहीं कि आप जब जी में आया हिंदी पर रोने या चिंता जताने बैठ गए। हिंदी आज किन्हीं चिंताओं से बहुत आगे निकल चुकी है। न केवल अपने देश बल्कि विदेशों में भी हिंदी का लोहा माना जाता रहा है।

दुख तब बहुत होता है जब हिंदी भाषा को लेकर तमाम तरह के विवाद उठाए जाते हैं। हिंदी को अन्य भाषाओं से कमतर रखने की कुत्सित कोशिश की जाती है। यहां तक की भाषा के नाम पर साम्प्रदायिक संघर्ष तक होते देखा गया है।

पिछले दिनों गैर-हिंदीशाषित राज्यों में हिंदी को लेकर हुए बबाल शोचनीय और दुखद हैं। कोई और मुद्दा नहीं मिला तो कुछ लोग हिंदी भाषा के नाम पर ही राज्यों में टकराव पैदा करने लगे। जबकि भाषा की सिफत तोड़ना नहीं, आपस में जोड़ना है। भाषा, कोई भी, कभी खराब नहीं होती। वो तो हमारे राजनीतिक हित भाषा के नाम पर एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य पैदा करते रहते हैं। प्रायः ऐसी कोशिशें वही लोग किया करते हैं, जिन्हें किसी भी भाषा से प्यार नहीं होता। ऐसे ही झगड़े कितनी ही दफा हम महाराष्ट्र में मराठी-हिंदी भाषियों के बीच देख चुके हैं।

विडंबना देखिए, हिंदी पर- खास हिंदी दिवस पर- चिंता जाहिर करने वाले महानुभाव ऐसे भाषागत मुद्दों पर कभी कुछ नहीं बोलते। प्रायः मौन ही साधे रहते हैं। कभी बोलते भी हैं तो खालिस साम्प्रदायिक लहजे में।

ऐसे बेमतलब के विवादों से हिंदी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हिंदी लगातार बढ़ रही है। फैल रही है। चिंतित लोगों को थोड़ा सोशल मीडिया का रूख करना चाहिए। वहां जाकर देखना चाहिए कि हिंदी को कितनी तेजी और सम्मान के साथ सोशल मीडिया पर अपनाया जा रहा है। सीधा अंग्रेजी को चुनौती दे रही है।

समय के साथ खुद में बदलाव लाती हिंदी बाजार को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है। यह हिंदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। और आप हैं कि हिंदी की चिंता में घुल दुबले हुए जा रहे हैं। अपनी सोच को बदलिए हिंदी के प्रति।

Monday, 11 September 2017

वहशी होते समाज के बीच मासूम बच्चे

समाज को हम किस ओर लिए जा रहे हैं यह हमें भी नहीं मालूम। बस चले जा रहे हैं। एक होड़ या कहूं एक जिद-सी है हमारे भीतर एक-दूसरे को ‘मात’ दे आगे निकल जाने की। आगे निकल जाने की यह घुड़-दौड़ हमसे कितना कुछ छीनती जा रही है, शायद हमें इसका अहसास भी नहीं। अगर अहसास हो तो भी हम उसे ‘महसूस’ नहीं करना चाहते।

हमारा समाज निरंतर ‘हिंसक’ और ‘वहशी’ बनते जाने को ‘अभिशप्त’ है। किसी का किसी को कोई ‘लिहाज’ नहीं। मन और शरीर के भीतर दबी कुंठाएं इस कदर बढ़ गई हैं कि उन्हें किसी भी तरह बाहर निकालना है। ऐसे कुंठित लोग यह भी नहीं देखते कि वे दैहिक शोषण स्त्री का कर रहे हैं या मासूम बच्चों का। खासकर, स्त्रियों के साथ शारीरिक, समाजिक, पारिवारिक शोषण की घटनाएं इतनी तादाद में सामने आने लगी हैं, कभी-कभी ऐसी खबरों को पढ़ और जानकर डर-सा लगता है। लगभग यही हाल हमारे मासूम बच्चों का भी है। बच्चों के प्रति शारीरिक दुराचार के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उनके भविष्य की चिंता सताने लगी है। जिन बच्चों में अपने कल व देश के सुनहरे भविष्य की उम्मीदें हम पालते हैं, उन्हीं का शोषण कर पौधे को बड़ा होने से पहले ही काटने पर तुले हैं हम।

हाल में गुरुग्राम के एक बड़े स्कूल में एक मासूम के साथ घटी दैहिक शोषण की घटना क्या हमारे कान नहीं खोलती? हेल्पर ने मासूम बच्चे का गला रेत डाला। दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे की उम्र ही कितनी होती है। उस मासूम को तो कुछ मालूम भी न होगा कि उसके साथ कितना ‘वहशी बर्ताब’ किया गया। फूल को खिलने से पहले ही उसे बेरहमी से तोड़ डाला गया। उक्त खबर पढ़कर ही हम भीतर से कितना हिल गए होंगे। लेकिन पूछिए जरा उस मासूम के मां-बाप से उनके दिलों पर क्या गुजरी होगी? उन्हें जीवन में मिला यह एक ऐसा ‘घाव’ है, जिसे अच्छे से अच्छा ‘मल्लम’ भी नहीं भर सकता। बेटे के न रहने के दर्द ने उनके पूरे जीवन का सुख-चैन छीन लिया।

ये कैसे यौन कुंठाओं से पीड़ित दरिंदे हैं, जिन्हें यह तक होश नहीं रहता कि वे मासूमों के साथ क्या गलत कर रहे हैं। यौन कुंठाओं की चरस का नशा उनके दिमाग पर कुछ तरह तारी रहता है कि वे यह भूल जाते हैं उनका किया कुकर्म किसी मासूम को हमेशा के लिए अंधेरे कुंए में भटकने को मजबूर कर सकता है। उन्हें अपनी ही आत्महत्या के लिए उकसा सकता है। उनसे उनकी सांसे छीन सकता है।

शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरता हो जब हमारे समक्ष मासूम बच्चों के साथ यौन या मानसिक शोषण की खबरें न आती हों। अखबार या सोशल मीडिया पर आने वाली हर दूसरी खबर किसी न किसी बच्चे के देह-शोषण से जुड़ी होती है।

न केवल बाहर अपने घर-परिवार में भी बच्चे गाहे-बगाहे ऐसी घटनाओं से दो-चार होते रहते हैं। पता चलता है कि उनके ही परिवार के करीबी सदस्य उनका यौन तिरस्कार करते रहे। समाज में जाने कितनी ऐसी मासूम बच्चियां हैं जो अपने पिता, अपने भाई, अपने मामा-चाचा की गलत हरकतों का शिकार हो चुकी हैं। कुछ तो परिवार वालों के खौफ के चलते मुंह भी नहीं खोल पातीं।

पाप के इस खेल में कोई एक नहीं बल्कि जिम्मेदार हम सब हैं। वजहें बेशक अलग-अलग हो सकती हैं। धीरे-धीरे कर हम एक ऐसा समाज बनते जा रहे हैं जहां यौन कुंठाएं इस कदर हमारे दिलो-दिमाग पर हावी होती जा हैं कि हम इसके अतिरिक्त न कुछ देखना चाहते हैं न समझना। पता नहीं हमारे जिस्म की यह कैसी भूख है, जो बड़ी ही बेरहमी और बेशर्मी के साथ मासूमों को अपना निवाला बनाने से नहीं रोक पा रही।

पैसे, नौकरी और सोशल मीडिया की भेड़चाल में लिप्त मां-बापों के पास समय ही नहीं अपने बच्चों के साथ बीताने को। उसका खामियाजा किसी न किसी रूप में हमारे बच्चों को झेलना पड़ रहा है। दुख होता है, अपने मासूम बच्चों को यों किसी वहशी की यौनिकता का शिकार होता देख।

ऐसे यौन पिपासुओं के विरूद्ध इतने सख्त कानून बनाएं जाएं कि वे तो क्या कोई भी मासूम बच्चों या स्त्रियों के साथ गलत हरकत करने की सोच तक नहीं। पता नहीं वो दिन कब आएगा?

Wednesday, 9 August 2017

अंधविश्वासों की चोटियां

चोटियां काटी जा रही हैं। कौन काट रहा है? क्यों काट रहा है? किस उद्देश्य के लिए काट रहा है? इन प्रश्नों के जवाब किसी के पास नहीं। फिर भी, खबरें निरंतर चोटियां काटे जाने की आ रही हैं।

समाज में जितने मुंह, उतनी बातें हैं। चोटी काटने को कोई कोरी अफवाह करार दे रहा है। तो कोई टोने-टोटके का दुष्प्रभाव बता रहा है। मनोवैज्ञानिक कह रहे हैं कि यह ‘दिमागी फोबिया’ है। टोटल अंधविश्वास है। मानसिक संतुलन न खोएं।

जो भी हो, चोटियां तो निरंतर काटी ही जा रही हैं। चोटी कटना इतना ‘वायरल’ हो चुका है कि हर रोज अखबारों के पहले पन्ने पर प्रमुख खबर यही होती है। चूंकि खबर ‘मसालेदार’ है तो सोशल मीडिया पर भी लोग जमकर चोटी कटने के ‘चटकारे’ ले रहे हैं। कई ‘फोटोशॉप’ तो ऐसे भी देखे हैं, जिनमें महिलाओं की चोटियों में ‘नींबू-मिर्ची’ बंधी हुई है। यहां तक कि लोगों ने अपने घरों के दरवाजों पर नीम की डालियां और गोबर की थाप लगाई हुई है।

यों, हमारे देश में अफवाहों के पसरते और अंधविश्वासों के परवान चढ़ते जरा भी देर नहीं लगती। हर अफवाह और अंधविश्वास हमारे तईं किसी ‘वरदान’ से कम नहीं होता। देखिए न, जब भक्तगण एक साथ गणेशजी को टनों दूध पीला सकते हैं। जब नमक सौ रुपये किलो बिक सकता है। जब आलू-भिंडी में देवता नजर आ सकते हैं। जब राह चलते भूत दिख-मिल सकता है। फिर चोटियों का काटा जाना कोई बहुत बड़ी खबर नहीं! यहां कुछ भी हो सकता है। बस अफवाह या अंधविश्वास को जरा-सा हवा देने की जरूरत है।

चोटी कटने से जुडीं जो खबरें अखबारों में पढ़ने को मिल रही हैं, वो अधिकतर गांव-देहात से ही हैं। शहरों में या किसी शहरी महिला के साथ ऐसा हुआ हो ऐसी कोई खबर कम से कम मेरी निगाह से तो नहीं गुजरी। फिर भी थोड़ी-बहुत ‘दहशत’ शहरी महिलाओं के दिलो-दिमाग में भी धीरे-धीरे कर घर करने लगी है। स्वाभाविक है, इतनी तदाद में एक साथ खबरों का आना किसी को भी बेचैन कर सकता है।

सच यह भी है कि अफवाह और अंधविश्वास का सबसे ‘सॉफ्ट टरगेट’ भोले-भाले गांव-देहात के लोग ज्यादा होते हैं। उनका ध्यान भी ऐसी खबरों पर अधिक रहता है। किसी भी अंधविश्वास के सहारे उन्हें बरगलाया जा सकता है। यहां भी लगभग वही हो रहा है।

यह प्रायः देखा गया है कि देश या समाज तरक्की चाहे कितना ही कर ले मगर अंधविश्वासों पर यकीन करना नहीं छोड़ पाता। ऐसा नहीं है कि अंधविश्वास का शिकार केवल बे-पढ़े लिखे ही होते हैं। मैंने तमाम ऐसे पढ़े-लिखों को अंधविश्वास की चक्की में पिसते देखा है। अपना सबकुछ लुटाते देखा है। टोने-टोटकों, तांत्रिकों-मुल्लाओं के समक्ष घुटने टेकते देखा है। और तो और विज्ञान के अध्यापक को घोर अ-वैज्ञानिक बातें करते सुना है।

हां, यह सही है कि समाज में बदलाव बहुत तेजी से हो रहे हैं किंतु इंसानी दिमागों में बदलाव अभी भी उस तेजी से नहीं हो पा रहा। अफवाहें हमें आज भी डरा देती हैं। अंधविश्वास आज भी हमें अंधश्रद्धालू होने को मजबूर किए रहते हैं। प्रगतिशील समाज बनने से हम अभी भी बहुत दूर हैं।

हां, कहने को आप-हम चोटी काटने वाले को ‘महिला-विरोधी’ कहकर ‘गलिया’ सकते हैं। मगर महज गलियाने से तो न महिलाओं का चोटी कटना बंद होगा, न अंधविश्वास पर लगाम लग पाना।
पुलिस, प्रशासन, सरकार की मदद लेने से कहीं ज्यादा आवश्यक है हमें हमारे मनोवैज्ञानिक स्तर को चुस्त करना। दिमाग के दरवाजों को निरंतर खुला रखना। सच की तह में बिना जाए, अफवाहों-अंधविश्वासों पर आंखें मूंद कर विश्वास कर लेना।

अपने विश्वासों को अगर हम यों ही डिगाते रहे तो आज चोटियां काटी जा रही हैं हो, सकता है, कल को हमारे चेहरों पर कालिख पोती जाए।

Sunday, 23 July 2017

हमला
















उस रोज
एक और आतंकी हमला हुआ
फिर कुछ जानें
अपनी जानों से हाथ धो बैठीं

खबर पाते ही सोशल मीडिया
के भद्र (वीर) लोग अपने-अपने फेसबुक-टि्वटर के पेजों-पोस्टों पर
तरह-तरह की लानतें भेजने में जुट गए
किसी ने सरकार को गलियाया
किसी का खून आतंकवादियों की नापाक हरकत पर खौला
नेता लोग एक-एक कर 'कड़ी निंदा' में व्यस्त हो गए

पर...

जिन्होंने अपने प्रियजनों का हाथ और साथ
हमेशा के लिए खो दिया, उनका क्या कुसूर था?
हां, उनके प्रति संवेदनाएं तो बहुत लिखी-पढ़ी-बोली गईं
मगर मौत के रास्तों से लौट कर वापस
भला आया है कोई

सरकारी इमदादों या बौद्धिक चुगलबाजियों से
दर्द नहीं बांटे जाते
वो अंत तक बने रहते हैं निशब्द
हवा में केवल बातें और वायदे ही रह जाते हैं
यहां भी तो यही सब हो रहा है
जमीन पर भी और डिजिटल मंजर पर भी

सवालः तो क्या ये हमले ऐसे ही होते रहेंगे?
लोग मारे जाते और नेता-बुद्धिजीवि अपनी-अपनी राजनीतिक-बौद्धिक रोटियां सेकते रहेंगे?
क्या मनुष्य जीवन का अंत अब यही है?

लंबे अरसे से सुन रहे हैं कि
दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है
तोपों की तनातनी बनी हुई है
मगर उससे क्या...
जानें तो अब भी जा रही हैं
परिवार अब भी खत्म हो रहे हैं
न जाने सियासतदां कभी समझेंगे भी
इस पीड़ा को
या फिर कत्लो-गारत का यह सिलसिला यों ही चलता रहेगा हमेशा-हमेशा।

Sunday, 21 May 2017

व्यंग्य पर दंगल

आभासी दुनिया में व्यंग्य पर ‘दंगल’ जारी है। फेसबुक अखाड़ा है। व्यंग्य का हर तगड़ा और दियासलाई पहलवान अखाड़े में उतर आया है एक-दूसरे से ‘मुचैटा’ लेने को। दोनों तरफ के पहलवान अपने-अपने दांव चलते रहते हैं। मंशा केवल एक ही है, सामने वाले को चारों-खाने चित्त करना। तरह-तरह के दांव आजमा कर चित्त तो कोई भी नहीं होता मगर मनोरंजन का मजा भरपूर मिलता रहता है।

लुत्फ यह है कि फेसबुक के अखाड़े में मौजूद हर पहलवान व्यंग्य की वर्तमान स्थिति-परिस्थिति को लेकर चिंतित है। थोड़ा-बहुत नहीं बहुत-बहुत चिंतित है। कभी-कभी तो उनकी अति-चिंताओं को देख-पढ़कर मुझे डर-सा लगने लगता है कि कहीं चिंता की व्याधि इनका कुछ अ-नर्थ न कर दे। पुरानी कहावत मेरे दिमाग को घुमाए रहती है कि चिंता चिता समान।

इतने बड़े-बड़े पहलवान टाइप व्यंग्यकारों की चिंताओं के बावजूद व्यंग्य है कि सुधरने-संवरने का नाम ही नहीं ले रहा। व्यंग्य को ‘एटिट्यूट’ की प्रॉब्लम लग गई है (शायद)। शास्त्रों में भी लिखा है कि एटिट्यूट की बीमारी का इलाज तो स्वयं हकीम लुकमान के पास भी न था। किंतु व्यंग्य को यह बात समझ आए तब न।

फेसबुक के अखाड़े में जमे ज्यादातर पहलवान व्यंग्यकारों का यह मानना है कि व्यंग्य उस तरह से लिखा ही नहीं जा रहा, जैसा कभी श्री परसाई या श्री जोशी लिखा करते थे। आजकल के व्यंग्य में से संवेदना, भावना, ममता, प्रेरणा, गहराई, सरोकार, विचार, आदर्श, दर्शन आदि-इत्यादि सब गायब हो चुके हैं। बड़े ही सिंपल, लद्दड़, चालूपंती टाइप व्यंग्य लिखे जा रहे हैं। व्यंग्य में आई यह गिरावट वरिष्ठ टाइप व्यंग्यकारों को अंदर-अंदर की खाए जा रही है। इसीलिए उनके मन की चिंताएं फेसबुक पर प्रायः स्टेटस के रूप में टंगी रहती हैं।

ऐसा भी नहीं है कि मैंने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की। की। बहुत दफा की। संपूर्ण ऐड़ी-चोटी का जोर लगाकर की। मगर अपनी चिंताओं के आगे वे कुछ समझना-बुझना ही नहीं चाहते। बस लगे रहते हैं, एक-दूसरे (खासकर युवा टाइप व्यंग्यकारों) को व्यंग्य-लेखन का ज्ञान बांटने में। नई पीढ़ी के साथ मुसीबत यह है कि वे वरिष्ठों का ज्ञान लेना ही नहीं चाहते। कभी कोई वरिष्ठ प्रयास करता भी है उन्हें व्यंग्य-लेखन का बारीकियों को समझाने का तो उन्हें ऐसा-इतना लताड़ देते हैं कि बेचारे अपना-सा मुंह लिए सीधे ‘कोप भवन’ में जा बैठते हैं। चूंकि अधिक गर्मी होने के कारण कोप भवन में भी नहीं टिक पाते तो वापस फेसबुक के अखाड़े में कूद पड़ते हैं अपनी पीड़ा और खीझ उतारने को।

ये नई पीढ़ी भी न वरिष्ठ व्यंग्यकारों की कतई ‘इज्जत’ नहीं करती। टंगड़ी मार उन्हें धोबी पछाड़ दे ही देती है। चूंकि मैं वरिष्ठों की बे-इज्जती को अपनी आंखों से नहीं देख पाता तो स्वयं ही आंखें बंद कर लेता हूं।

वैसे, बदलते जमाने के साथ-साथ व्यंग्य का जमाना भी काफी कुछ बदल गया है। अब स्थितियां पहले जैसी न रहीं। अब सबकुछ इंस्टेंट टाइप है। इधर लिखा। उधर छपा। पैसा खाते में आया। जै राम जी की।

व्यंग्य का पारंपरिक फॉरमेट बिल्कुल बदल गया है। व्यंग्य कैटरीना कैफ की स्कर्ट जितना ही माइक्रो हो लिया है। कम शब्दों में गहरी बात। आज का व्यंग्य ‘वनलाइनर बेसड’ है। उसी में ‘पंच’ है। उसी में आनंद है। उसी में ग्लैमर है। उसी में मस्तियां हैं। लेकिन फेसबुक पर जमे कुछ वरिष्ठ टाइप व्यंग्यकारों को व्यंग्य का इस तरह ‘स्लिम’ होते जाना जम नहीं रहा। उन्हें तो वही 70-80 के दशक वाला भारी-भरकम व्यंग्य पसंद है।

वक्त के साथ न चला पाने में यही परेशानियां दर-पेश आती हैं। तब के समय से लेकर अब के समय तक लेखन और लेखक के रहन-सहन में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। अब वही हिट है जिसके व्यंग्य में स्लिमता है। चेतन भगत की भाषा जैसी सहजता है। अपने लेखन के दम पर जिसे मार्केट पर कब्जा कर आता है। फिर उसे हिट होने से कोई नहीं रोक सकता। मगर व्यंग्य के अखाड़े के वरिष्ठ पहलवान ये समझें तब न।

खामखां ही फेसबुक पर व्यंग्य का दंगल छिड़ाए बैठे रहते हैं। जबकि अच्छी तरह से यह मालूम उन्हें भी है कि कोई भी उनके अनुसार न चलने वाला है न उनकी मानने वाला। मगर फिर भी...। अब जिन्हें शौक ही अखाड़े में दंगल लड़ने का हो फिर कोई क्या कर सकता है। बैठे-ठाले मनोरंजन को एंजॉव्य करते रहने में क्या हर्ज है।

बाकी व्यंग्य अपने हिसाब से मस्त जा रहा है।

Wednesday, 29 March 2017

खुशहाली पर ग्रहण

इस पर यकीन करने के लिए कि ‘भारत कम खुशहाल देश है’ दिमाग पर अतिरिक्त लोड डालने की जरूरत नहीं। हालिया सर्वे ने इस बात की साफ पुष्टि कर दी है। जिक्र तो हालांकि हर किताब और ग्रंथ में यही मिलता है कि भारत या भारत के लोगों से खुशहाल इस दुनिया में कोई मुल्क नहीं है। किंतु 21वीं सदी तक आते-आते सीन काफी कुछ बदल चुका है।

भारत के कम खुशहाल होने के कारण तमाम हैं। कुछ कारण (इन्हें आप श्योर-शोर्ट न मानें) मेरे जहन में बार-बार आते हैं, जिनकी वजह से भी देश के नागरिकों की खुशहाली पर ग्रहण लगता जा रहा है।

कहने वाले तो झट्ट से सोशल मीडिया को खुशहाली का खलनायक बता डालते हैं। जबकि सोशल मीडिया ने तो हमें आपस में परस्पर जोड़ने का काम किया है। हमारी दोस्तियों एवं लेखन को विस्तार दिया है। न्यू डिजिटल इंडिया की ओर धकेला है। फिर भी, कुछ लोग अगर सोशल मीडिया को अपने अवसाद या तू-तू मैं-मैं का प्लेटफॉर्म बना लेते हैं फिर तो इसमें हकीम लुकमान भी कुछ नहीं कर सकते। सब दिमाग-दिमाग की बातें हैं।

हमारी खुशहाली को बे-सिर-पैर की चिंताएं लील रही हैं। मसलन- हम मोबाइल की स्क्रीन पर स्क्रेच पड़ने से चिंतित हो जाते हैं। बाथरूम में कॉकरोच मिलने पर चिंतित हो उठते हैं। फेसबुक पर कम लाइक मिलने से हमारी चिंताएं जाग्रत हो जाती हैं। ट्वीट को अगर रि-ट्वीट न मिले तो हम डिप्रेशन में आ लेते हैं। सिर में पांच-सात जुएं मिल जाना हमारी चिंता का सबब बन जाता है।
पड़ोसी का घर के पिछवाड़े कूड़ा डालना हमें क्रोधित कर देता है। गर्लफ्रेंड के साथ दोस्त के अफेयर को लेकर व्यथित हो उठते हैं। पड़ोस की भाभी का सुबह-शाम छत पर कपड़े सुखाने न आना हमें परेशान कर जाता है। चर्जर के न मिलने पर तो हम इतने अधिक चिंतित हो उठते हैं मानो हाईस्कूल का रिपोर्ट-कार्ड नाली में बह गया हो।

इस प्रकार की और भी कई किस्म की चिंताएं-परेशानियां हैं जो निरंतर हमारी खुशहाली का बैंड बजा रही हैं। वैसे, देखा जाए तो ये चिंताएं हैं कुछ भी नहीं। लाइफ में थोड़ा-बहुत ऊंच-नीच तो चलता रहता है। लेकिन क्या करें खुशहाली से कहीं ज्यादा हमारा ध्यान अपनी चिंताओं को इस-उस से जग-जाहिर करने पर जो रहता है।

सबसे खास वजह एक यह भी है कि हमने, दूसरों पर जाने दीजिए, खुद पर ही हंसना छोड़ दिया है। अगर कोई हम पर हंसता है तो हम अगले की हंसी का इतना बुरा मान जाते हैं मानो उसने हमारा मकान अपने नाम लिखवाने का फरमान जारी कर दिया हो। हंसी-मुस्कुराहट काम के बोझ तले दब कर दम तोड़ रही है। किस्म-किस्म की बीमारियां और बेबसियां खुशहाली को निपटा रही हैं। ऐसे में क्या खाक खुश रहेंगे हम?

बड़ों के साथ-साथ हमने बच्चों के बचपन की खुशहाली को भी कहीं का नहीं छोड़ा है। बच्चे के दो-ढाई साल का होते ही उसे स्कूल और किताबों के बंधन में ऐसा बांध देते हैं कि वो चाहकर भी खुश नहीं रह पाता। करियर की अंधी दौड़ उन्मुक्त जीवन की सबसे बड़ी बाधा है।

इसीलिए कह रहा हूं, सर्वे पर टसूए न बहाइए। खुशहाली हमसे दूर जा चुकी है। लेकिन अभी हम इतनी दूर भी नहीं गई है कि उसे वापस लाया नहीं जा सकता। अगर ला सकते हैं तो गई खुशहाली को पुनः अपने चेहरों पर लौटा लाइए वरना फिर मत कहिएगा कि खुशी की रौशन इतना मदम-सी क्यों पड़ती जा रही है हमारे आसपास।

क्यों न जीवन को ‘उत्सव’ की तरह जिया जाए। जैसा- ओशो अक्सर अपने प्रवचनों में कहते रहे हैं। जीवन जब उत्सव बन जाएगा फिर खुशी और खुशहाली हमारे पास से कभी जाने नहीं पाएगी।

Monday, 23 January 2017

सोशल मीडिया पर विरोध के बहाने

विरोध अब ‘जमीन’ पर कम, ‘सोशल मीडिया’ पर अधिक नजर आता है। एक तरह से- विरोध के नाम पर- यहां आपस में ‘ज़बानी दंगल’ छिड़ा ही रहता है। विरोध के बीच विचारधाराएं कोई जगह नहीं रखतीं। या यों कहिए कि सोशल मीडिया किसी प्रकार की विचारधारा को नहीं मानता। यहां विरोध के तरीके इतने अजीबो-गरीब हैं, कभी-कभी समझ ही नहीं आता कि विरोध क्यों और किसलिए किया जा रहा है। चूंकि सब विरोध कर रहे होते हैं तो दूसरे भी बहती गंगा में हाथ धोने निकल पड़ते हैं, बिना समझने-जाने।

अपवादों को छोड़ दें तो सोशल मीडिया पर छिड़े रहने वाले विरोध के संग्राम पर भाषाई शालीनता अभी भी दूर की कौड़ी है। यहां असहमति या विरोध जतलाने पर विरोधी लोग व्यक्तिगत धज्जियां उड़ाने से जरा भी नहीं चूकते। विरोध को सुनने या समझने का शऊर न विरोधियों के पास है न ट्रोलर्स के। खासकर, राजनीतिक मुद्दों या बहसों के बीच भाषाई बिगाड़ सबसे अधिक देखा व सुना जाता है।

सोशल मीडिया पर दो ही चीजें का दबदबा रहता हैं या तो आप किसी राजनीतिक दल के समर्थक (बल्कि अंध-समर्थक कहना ज्यादा ठीक होगा) हो या फिर विरोधी। आपसी संवाद में यहां बीच का रास्ता कोई नहीं होता। इधर कुछ सालों में जिस तेजी के साथ सोशल मीडिया पर राजनीति का वर्चस्व बढ़ा है, उसे देखकर लगता ही नहीं कि यहां इसके अतिरिक्त कुछ और भी संभव है। यहां हर दूसरी दीवार राजनीति या राजनीतिक दलों या नेताओं के कथित प्रवचनों से सनी नजर आती है। मतलब, जनता के हक की लड़ाई को जिन्हें जमीन पर लड़ना चाहिए था, वे अपने-अपने विरोधियों से सोशल मीडिया पर लड़ रहे हैं। एक-दूसरे से ज़बानी दंगल हो रहा है। समर्थक को भक्त और विरोधी को अ-भक्त होने के खिताब बांटे जा रहे हैं। अजीब माहौल बना दिया गया है सोशल मीडिया पर।

अच्छा, कुछ लोगों का काम यहां सिर्फ विरोध करना ही होता है। उनके स्टेटस को पढ़कर कभी-कभी तो लगता है कि वे दुनिया में आए ही इसीलिए हैं ताकि हर बात का विरोध कर सकें। यानी, उन्हें खराब का तो विरोध करना ही है साथ-साथ अच्छे का भी। विरोध के बीच वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भी ले ही आते हैं। सिक्के का एक ही पहलू देखते हैं, दूसरे को यों नजर-अंदाज कर जाते हैं मानो वो बेकार की चीज हो। बहुत हद तक इस तरह के कथित विरोधी लोग भी सोशल मीडिया पर बहस और संवाद के रिश्ते को तोड़ने के लिए जिम्मेवार हैं।

अभी हाल बैंगलौर में लड़कियों के साथ हुई छेड़खानी की वरदातों पर भी सोशल मीडिया पर किस्म-किस्म का विरोध खूब देखने-पढ़ने को मिला। गजब यह है कि यहां हर आदमी घटना पर अपना गुस्सा या विरोध खुलकर जतला रहा है किंतु समस्या का तार्किक समाधान किसी ने सामने नहीं रखा। ज्यादातर फेमिनिस्टों का एक ही राग-रंग था कि पुरूषों के खिलाफ जमकर विष-वमन करो या फिर उन्हें सरेआम नापुंसक बना डालो।

तो क्या ऐसा करने से महिलाओं के खिलाफ होने वाली घटनाएं कम या खत्म हो जाएंगी? ऐसा कर आप समाज को हिंसक ही बनाएंगे। फेमिनिस्टों का तीखा विरोध अपनी जगह जायज है मगर आप एक ही लाठी से पूरे पुरूष समाज को नहीं हांक सकतीं। हो दरअसल यही रहा है कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों को भी सोशल मीडिया पर हवा देकर कुछ दिनों तक विरोध-विरोध का खेल चलता है। फिर सब दूसरी घटना के होने तक शांत होकर बैठ जाते हैं। ये मुद्दे जमीन पर न के बराबर ही आ पाते हैं। अगर आ भी जाते हैं तो रस्म-अदायगी के बाद उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। पिछले दिनों निर्भया के मामले में भी हम विरोध के उबाल को चढ़ते-उतरते देख चके हैं। लेकिन हुआ क्या? तब से अब तक महिलाओं के प्रति हिंसा के परिपेक्ष्य में हालात बिगड़े ही हैं, सुधरे नहीं।

ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया पर विरोध के बहाने मुद्दों को सुलझाया नहीं जा सकता। सुलझ सब सकता है मगर मुद्दे कुछ दिनों हवा में उछलने के बाद निस्तेज पड़ जाते हैं। अब देखिए न, बीएसएफ और सीआपीएफ के जिन जवानों के वीडियो- खराब खाने और सुविधाओं को लेकर- सामने आए हैं, हां उनका विरोध तो खूब हो रहा है लेकिन उतनी ही शिद्दत के साथ इसे दबाने की कोशिशें भी जारी हैं। न तो सरकार का नजरिया स्पष्ट दिख रहा है न सेना के आला अधिकारियों का। बस सोशल मीडिया पर हर कोई अपना विरोधी तीर लेकर खड़ा है वार करने को। क्या इतने मात्र से चीजें सुधर जाएंगी?

अन्यथा न लें लेकिन सच यही है कि सोशल मीडिया पर होते रहने वाला विरोध महज भाषाई या शाब्दिक दंगल से आगे नहीं बढ़ पाता। उन लोगों के लिए यह रामबाण सिद्ध होता है, जो सोशल मीडिया पर आए ही विरोध के बहाने अपनी राजनीति को चमकाने हैं। फिर ऐसे ‘तुरंता विरोध’ का कोई अर्थ-मतलब नहीं है, जहां ‘मुद्दे’ नहीं सिर्फ ‘हवाबाजी’ ही प्राथमिकता में हो।