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Monday, 23 January 2017

सोशल मीडिया पर विरोध के बहाने

विरोध अब ‘जमीन’ पर कम, ‘सोशल मीडिया’ पर अधिक नजर आता है। एक तरह से- विरोध के नाम पर- यहां आपस में ‘ज़बानी दंगल’ छिड़ा ही रहता है। विरोध के बीच विचारधाराएं कोई जगह नहीं रखतीं। या यों कहिए कि सोशल मीडिया किसी प्रकार की विचारधारा को नहीं मानता। यहां विरोध के तरीके इतने अजीबो-गरीब हैं, कभी-कभी समझ ही नहीं आता कि विरोध क्यों और किसलिए किया जा रहा है। चूंकि सब विरोध कर रहे होते हैं तो दूसरे भी बहती गंगा में हाथ धोने निकल पड़ते हैं, बिना समझने-जाने।

अपवादों को छोड़ दें तो सोशल मीडिया पर छिड़े रहने वाले विरोध के संग्राम पर भाषाई शालीनता अभी भी दूर की कौड़ी है। यहां असहमति या विरोध जतलाने पर विरोधी लोग व्यक्तिगत धज्जियां उड़ाने से जरा भी नहीं चूकते। विरोध को सुनने या समझने का शऊर न विरोधियों के पास है न ट्रोलर्स के। खासकर, राजनीतिक मुद्दों या बहसों के बीच भाषाई बिगाड़ सबसे अधिक देखा व सुना जाता है।

सोशल मीडिया पर दो ही चीजें का दबदबा रहता हैं या तो आप किसी राजनीतिक दल के समर्थक (बल्कि अंध-समर्थक कहना ज्यादा ठीक होगा) हो या फिर विरोधी। आपसी संवाद में यहां बीच का रास्ता कोई नहीं होता। इधर कुछ सालों में जिस तेजी के साथ सोशल मीडिया पर राजनीति का वर्चस्व बढ़ा है, उसे देखकर लगता ही नहीं कि यहां इसके अतिरिक्त कुछ और भी संभव है। यहां हर दूसरी दीवार राजनीति या राजनीतिक दलों या नेताओं के कथित प्रवचनों से सनी नजर आती है। मतलब, जनता के हक की लड़ाई को जिन्हें जमीन पर लड़ना चाहिए था, वे अपने-अपने विरोधियों से सोशल मीडिया पर लड़ रहे हैं। एक-दूसरे से ज़बानी दंगल हो रहा है। समर्थक को भक्त और विरोधी को अ-भक्त होने के खिताब बांटे जा रहे हैं। अजीब माहौल बना दिया गया है सोशल मीडिया पर।

अच्छा, कुछ लोगों का काम यहां सिर्फ विरोध करना ही होता है। उनके स्टेटस को पढ़कर कभी-कभी तो लगता है कि वे दुनिया में आए ही इसीलिए हैं ताकि हर बात का विरोध कर सकें। यानी, उन्हें खराब का तो विरोध करना ही है साथ-साथ अच्छे का भी। विरोध के बीच वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भी ले ही आते हैं। सिक्के का एक ही पहलू देखते हैं, दूसरे को यों नजर-अंदाज कर जाते हैं मानो वो बेकार की चीज हो। बहुत हद तक इस तरह के कथित विरोधी लोग भी सोशल मीडिया पर बहस और संवाद के रिश्ते को तोड़ने के लिए जिम्मेवार हैं।

अभी हाल बैंगलौर में लड़कियों के साथ हुई छेड़खानी की वरदातों पर भी सोशल मीडिया पर किस्म-किस्म का विरोध खूब देखने-पढ़ने को मिला। गजब यह है कि यहां हर आदमी घटना पर अपना गुस्सा या विरोध खुलकर जतला रहा है किंतु समस्या का तार्किक समाधान किसी ने सामने नहीं रखा। ज्यादातर फेमिनिस्टों का एक ही राग-रंग था कि पुरूषों के खिलाफ जमकर विष-वमन करो या फिर उन्हें सरेआम नापुंसक बना डालो।

तो क्या ऐसा करने से महिलाओं के खिलाफ होने वाली घटनाएं कम या खत्म हो जाएंगी? ऐसा कर आप समाज को हिंसक ही बनाएंगे। फेमिनिस्टों का तीखा विरोध अपनी जगह जायज है मगर आप एक ही लाठी से पूरे पुरूष समाज को नहीं हांक सकतीं। हो दरअसल यही रहा है कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों को भी सोशल मीडिया पर हवा देकर कुछ दिनों तक विरोध-विरोध का खेल चलता है। फिर सब दूसरी घटना के होने तक शांत होकर बैठ जाते हैं। ये मुद्दे जमीन पर न के बराबर ही आ पाते हैं। अगर आ भी जाते हैं तो रस्म-अदायगी के बाद उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। पिछले दिनों निर्भया के मामले में भी हम विरोध के उबाल को चढ़ते-उतरते देख चके हैं। लेकिन हुआ क्या? तब से अब तक महिलाओं के प्रति हिंसा के परिपेक्ष्य में हालात बिगड़े ही हैं, सुधरे नहीं।

ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया पर विरोध के बहाने मुद्दों को सुलझाया नहीं जा सकता। सुलझ सब सकता है मगर मुद्दे कुछ दिनों हवा में उछलने के बाद निस्तेज पड़ जाते हैं। अब देखिए न, बीएसएफ और सीआपीएफ के जिन जवानों के वीडियो- खराब खाने और सुविधाओं को लेकर- सामने आए हैं, हां उनका विरोध तो खूब हो रहा है लेकिन उतनी ही शिद्दत के साथ इसे दबाने की कोशिशें भी जारी हैं। न तो सरकार का नजरिया स्पष्ट दिख रहा है न सेना के आला अधिकारियों का। बस सोशल मीडिया पर हर कोई अपना विरोधी तीर लेकर खड़ा है वार करने को। क्या इतने मात्र से चीजें सुधर जाएंगी?

अन्यथा न लें लेकिन सच यही है कि सोशल मीडिया पर होते रहने वाला विरोध महज भाषाई या शाब्दिक दंगल से आगे नहीं बढ़ पाता। उन लोगों के लिए यह रामबाण सिद्ध होता है, जो सोशल मीडिया पर आए ही विरोध के बहाने अपनी राजनीति को चमकाने हैं। फिर ऐसे ‘तुरंता विरोध’ का कोई अर्थ-मतलब नहीं है, जहां ‘मुद्दे’ नहीं सिर्फ ‘हवाबाजी’ ही प्राथमिकता में हो।