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Wednesday, 29 March 2017

खुशहाली पर ग्रहण

इस पर यकीन करने के लिए कि ‘भारत कम खुशहाल देश है’ दिमाग पर अतिरिक्त लोड डालने की जरूरत नहीं। हालिया सर्वे ने इस बात की साफ पुष्टि कर दी है। जिक्र तो हालांकि हर किताब और ग्रंथ में यही मिलता है कि भारत या भारत के लोगों से खुशहाल इस दुनिया में कोई मुल्क नहीं है। किंतु 21वीं सदी तक आते-आते सीन काफी कुछ बदल चुका है।

भारत के कम खुशहाल होने के कारण तमाम हैं। कुछ कारण (इन्हें आप श्योर-शोर्ट न मानें) मेरे जहन में बार-बार आते हैं, जिनकी वजह से भी देश के नागरिकों की खुशहाली पर ग्रहण लगता जा रहा है।

कहने वाले तो झट्ट से सोशल मीडिया को खुशहाली का खलनायक बता डालते हैं। जबकि सोशल मीडिया ने तो हमें आपस में परस्पर जोड़ने का काम किया है। हमारी दोस्तियों एवं लेखन को विस्तार दिया है। न्यू डिजिटल इंडिया की ओर धकेला है। फिर भी, कुछ लोग अगर सोशल मीडिया को अपने अवसाद या तू-तू मैं-मैं का प्लेटफॉर्म बना लेते हैं फिर तो इसमें हकीम लुकमान भी कुछ नहीं कर सकते। सब दिमाग-दिमाग की बातें हैं।

हमारी खुशहाली को बे-सिर-पैर की चिंताएं लील रही हैं। मसलन- हम मोबाइल की स्क्रीन पर स्क्रेच पड़ने से चिंतित हो जाते हैं। बाथरूम में कॉकरोच मिलने पर चिंतित हो उठते हैं। फेसबुक पर कम लाइक मिलने से हमारी चिंताएं जाग्रत हो जाती हैं। ट्वीट को अगर रि-ट्वीट न मिले तो हम डिप्रेशन में आ लेते हैं। सिर में पांच-सात जुएं मिल जाना हमारी चिंता का सबब बन जाता है।
पड़ोसी का घर के पिछवाड़े कूड़ा डालना हमें क्रोधित कर देता है। गर्लफ्रेंड के साथ दोस्त के अफेयर को लेकर व्यथित हो उठते हैं। पड़ोस की भाभी का सुबह-शाम छत पर कपड़े सुखाने न आना हमें परेशान कर जाता है। चर्जर के न मिलने पर तो हम इतने अधिक चिंतित हो उठते हैं मानो हाईस्कूल का रिपोर्ट-कार्ड नाली में बह गया हो।

इस प्रकार की और भी कई किस्म की चिंताएं-परेशानियां हैं जो निरंतर हमारी खुशहाली का बैंड बजा रही हैं। वैसे, देखा जाए तो ये चिंताएं हैं कुछ भी नहीं। लाइफ में थोड़ा-बहुत ऊंच-नीच तो चलता रहता है। लेकिन क्या करें खुशहाली से कहीं ज्यादा हमारा ध्यान अपनी चिंताओं को इस-उस से जग-जाहिर करने पर जो रहता है।

सबसे खास वजह एक यह भी है कि हमने, दूसरों पर जाने दीजिए, खुद पर ही हंसना छोड़ दिया है। अगर कोई हम पर हंसता है तो हम अगले की हंसी का इतना बुरा मान जाते हैं मानो उसने हमारा मकान अपने नाम लिखवाने का फरमान जारी कर दिया हो। हंसी-मुस्कुराहट काम के बोझ तले दब कर दम तोड़ रही है। किस्म-किस्म की बीमारियां और बेबसियां खुशहाली को निपटा रही हैं। ऐसे में क्या खाक खुश रहेंगे हम?

बड़ों के साथ-साथ हमने बच्चों के बचपन की खुशहाली को भी कहीं का नहीं छोड़ा है। बच्चे के दो-ढाई साल का होते ही उसे स्कूल और किताबों के बंधन में ऐसा बांध देते हैं कि वो चाहकर भी खुश नहीं रह पाता। करियर की अंधी दौड़ उन्मुक्त जीवन की सबसे बड़ी बाधा है।

इसीलिए कह रहा हूं, सर्वे पर टसूए न बहाइए। खुशहाली हमसे दूर जा चुकी है। लेकिन अभी हम इतनी दूर भी नहीं गई है कि उसे वापस लाया नहीं जा सकता। अगर ला सकते हैं तो गई खुशहाली को पुनः अपने चेहरों पर लौटा लाइए वरना फिर मत कहिएगा कि खुशी की रौशन इतना मदम-सी क्यों पड़ती जा रही है हमारे आसपास।

क्यों न जीवन को ‘उत्सव’ की तरह जिया जाए। जैसा- ओशो अक्सर अपने प्रवचनों में कहते रहे हैं। जीवन जब उत्सव बन जाएगा फिर खुशी और खुशहाली हमारे पास से कभी जाने नहीं पाएगी।